
– मैथ्यू मट्टम
किसी भी देश के इतिहास में कुछ ऐसे क्षण आते हैं, जब कोई अप्रत्याशित आंदोलन उस मूल मुद्दे से कहीं बड़ा बन जाता है, जिसने उसे जन्म दिया था। वह केवल एक विरोध प्रदर्शन नहीं रह जाता, बल्कि उम्मीद का प्रतीक बन जाता है। यह लोगों को याद दिलाता है कि लोकतंत्र केवल सत्ता में बैठे लोगों का नहीं, बल्कि हर नागरिक का होता है।
कॉकरोच जनता पार्टी (Cockroach Janata Party – CJP) आंदोलन भी भारत के लिए ऐसा ही एक महत्वपूर्ण पड़ाव बनता दिखाई दे रहा है। देश के अनेक युवाओं के लिए इस आंदोलन ने छात्र राजनीति में लंबे समय से मौजूद खालीपन को भरने का काम किया है। साथ ही इसने संविधान के मूल्यों, लोकतांत्रिक भागीदारी और शांतिपूर्ण नागरिक सहभागिता के प्रति युवाओं की रुचि को फिर से जीवित किया है।
मेरी अपनी राजनीतिक जागरूकता की शुरुआत 1970 के दशक में हुई थी, जब मैं स्कूल का छात्र था। वह दौर देश के लिए बेहद कठिन था। उस समय आपातकाल (Emergency) लागू था। छात्र होने के बावजूद हमें यह महसूस होता था कि न्याय के लिए आवाज़ उठाना और युवाओं के अधिकारों की रक्षा करना हमारी जिम्मेदारी है।
उस समय छात्र आंदोलनों में सक्रिय भागीदारी ने लोकतंत्र के प्रति मेरी समझ को मजबूत किया। यही अनुभव आने वाले पचास वर्षों तक सार्वजनिक सेवा, युवा विकास और राष्ट्र निर्माण के क्षेत्र में मेरे काम की सबसे बड़ी प्रेरणा बना।
हालांकि, पिछले कई वर्षों तक मुझे यह लगता रहा कि भारत ने वह लोकतांत्रिक ऊर्जा कहीं खो दी है। छात्र राजनीति धीरे-धीरे राजनीतिक दलों से जुड़े संगठनों तक सीमित होती चली गई, जबकि लाखों प्रतिभाशाली युवा लोकतांत्रिक प्रक्रिया से दूर हो गए। इसका परिणाम यह हुआ कि एक पूरी पीढ़ी ने राजनीति को उम्मीद की बजाय निराशा और अविश्वास की नजर से देखना शुरू कर दिया।
लेकिन पिछले कुछ दिनों में मेरा नजरिया बदलने लगा है। कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) आंदोलन में मुझे वही ऊर्जा, साहस और आदर्शवाद दिखाई देता है, जिसने 1970 के दशक में छात्र आंदोलनों को नई दिशा दी थी। यह आंदोलन मुझे विश्वास दिलाता है कि भारत का लोकतांत्रिक भविष्य आज भी मजबूत और उज्ज्वल है।
इस आंदोलन की सबसे बड़ी उपलब्धि केवल विरोध प्रदर्शन करना नहीं है। इसकी असली सफलता यह है कि इसने हजारों युवाओं को यह भरोसा दिलाया है कि उन्हें सार्वजनिक जीवन में भाग लेने का केवल अधिकार ही नहीं, बल्कि जिम्मेदारी भी है।
लोकतंत्र केवल हर पांच साल में चुनाव के दौरान मतदान करने से मजबूत नहीं बनता। एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए नागरिकों की लगातार भागीदारी जरूरी होती है। इसमें शांतिपूर्ण तरीके से सवाल पूछना, रचनात्मक आलोचना करना और समाज के प्रति सक्रिय जिम्मेदारी निभाना शामिल है।
हर किशोर और युवा को लोकतांत्रिक प्रक्रिया का हिस्सा बनने का अवसर मिलना चाहिए। इससे नेतृत्व क्षमता विकसित होती है, जिम्मेदारी का एहसास बढ़ता है, संवाद और समझौते की कला सीखने का अवसर मिलता है, सार्वजनिक मंच पर अपनी बात रखने का आत्मविश्वास आता है और संविधान के मूल्यों के साथ-साथ अलग-अलग विचारों का सम्मान करना भी सीखा जाता है।
ये गुण केवल कक्षा में पढ़ाई से विकसित नहीं होते। इन्हें समाज और लोकतांत्रिक जीवन में सक्रिय भागीदारी के माध्यम से ही सीखा और मजबूत बनाया जा सकता है।
आज भारत में व्यापक छात्र राजनीतिक भागीदारी लगातार कम होती दिखाई देती है। आजादी के बाद के शुरुआती पचास वर्षों में देश के कई बड़े राजनीतिक नेता विश्वविद्यालयों और छात्र आंदोलनों से निकलकर सामने आए थे। उस दौर में छात्र, शिक्षक, वकील, सामाजिक कार्यकर्ता और बुद्धिजीवी मिलकर राष्ट्रीय नीतियों को दिशा देने में सक्रिय भूमिका निभाते थे। उस समय राजनीति को सत्ता हासिल करने का माध्यम नहीं, बल्कि जनसेवा और राष्ट्र निर्माण का मिशन माना जाता था।
आज तस्वीर काफी बदल चुकी है। राजनीतिक नेतृत्व का बड़ा हिस्सा अब वंशवाद, धार्मिक ध्रुवीकरण, कारोबारी हितों या पहचान-आधारित राजनीति से उभरता दिखाई देता है। दूसरी ओर, बड़ी संख्या में प्रतिभाशाली छात्र राजनीति से दूरी बनाए रखना पसंद करते हैं, क्योंकि उन्हें लगता है कि आज की राजनीति में जनसेवा की जगह धनबल, आपराधिक प्रभाव, टकराव और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षाओं का दबदबा बढ़ गया है।
ऐसे समय में कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) आंदोलन ने यह साबित किया है कि देश के सामान्य युवाओं के भीतर नेतृत्व की अपार क्षमता मौजूद है। ऐसे युवा भी हैं जो किसी स्थापित राजनीतिक दल से जुड़े बिना केवल संविधान के मूल्यों और लोकतांत्रिक आदर्शों के आधार पर समाज के लिए आगे आना चाहते हैं।
इस आंदोलन का एक महत्वपूर्ण संदेश यह भी है कि राजनीति को फिर से नागरिकों के हाथों में लौटाया जाना चाहिए। सार्वजनिक जीवन केवल पेशेवर राजनेताओं तक सीमित नहीं रह सकता। लोकतंत्र में छात्रों, किसानों, मजदूरों, पेशेवरों, उद्यमियों, महिलाओं और आम नागरिकों—सभी की समान भागीदारी होनी चाहिए।
साथ ही, किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था की यह जिम्मेदारी भी होती है कि वह सार्वजनिक व्यवस्था बनाए रखे और नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की रक्षा करे। भारत का संविधान प्रत्येक नागरिक को शांतिपूर्ण सभा करने, अपनी बात कहने और लोकतांत्रिक तरीके से विरोध प्रदर्शन करने का अधिकार देता है। लेकिन इन अधिकारों के साथ सरकार की यह जिम्मेदारी भी जुड़ी होती है कि वह कानून-व्यवस्था बनाए रखे, हिंसा को रोके और कानून का निष्पक्ष तरीके से पालन सुनिश्चित करे।
इसी कारण किसी भी शांतिपूर्ण प्रदर्शन पर सरकारी कार्रवाई संतुलित, कानूनसम्मत और संवैधानिक स्वतंत्रताओं का सम्मान करने वाली होनी चाहिए।
इस आंदोलन से जुड़ी कुछ रिपोर्टों में यह भी दावा किया गया कि प्रदर्शन में शामिल होने वाले लोगों को हतोत्साहित करने की कोशिश की गई। इनमें अधिकारियों के घर जाकर मिलने या प्रतिभागियों से उनकी लाइव लोकेशन साझा करने जैसे अनुरोध किए जाने की बातें भी सामने आईं। ऐसी खबरों ने कई नागरिकों के बीच नागरिक स्वतंत्रता को लेकर चिंता पैदा की है।
यदि ऐसे दावों की पुष्टि होती है, तो उनका गंभीरता से परीक्षण किया जाना चाहिए। लोकतांत्रिक समाज की मजबूती इसी में है कि नागरिक बिना किसी अनावश्यक दबाव या भय के शांतिपूर्ण तरीके से अपनी असहमति व्यक्त कर सकें। वहीं प्रशासन की भी जिम्मेदारी है कि वह कानून के दायरे में रहते हुए काम करे और शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों तथा कानून तोड़ने वाले लोगों के बीच स्पष्ट अंतर बनाए रखे।
राजनीतिक व्यवस्था के कुछ वर्गों में इस आंदोलन को लेकर दिखाई देने वाली बेचैनी यह संकेत देती है कि युवाओं की संगठित और शांतिपूर्ण भागीदारी राजनीतिक रूप से प्रभावशाली हो सकती है। लेकिन किसी भी लोकतंत्र को नागरिकों के शांतिपूर्ण जनआंदोलनों से डरना नहीं चाहिए। इसके विपरीत, इसे इस बात के प्रमाण के रूप में देखना चाहिए कि नागरिक अब भी सार्वजनिक मुद्दों के प्रति जागरूक हैं और लोकतांत्रिक प्रक्रिया में सक्रिय रूप से भाग लेना चाहते हैं।
कई पर्यवेक्षकों ने यह भी सवाल उठाया है कि क्या इंटरनेट सेवाएं बंद करना, परिवहन व्यवस्था प्रभावित करना या बड़े पैमाने पर निषेधात्मक आदेश लागू करना हर शांतिपूर्ण प्रदर्शन के दौरान वास्तव में आवश्यक होता है। ऐसे कदम उठाते समय संवैधानिक अधिकारों और नागरिक स्वतंत्रताओं के बीच संतुलन बनाए रखना बेहद जरूरी है। इन उपायों का इस्तेमाल केवल तभी किया जाना चाहिए, जब कानून के तहत इसकी स्पष्ट आवश्यकता हो और सार्वजनिक सुरक्षा को वास्तविक खतरा मौजूद हो।
जहां तक संभव हो, शांतिपूर्ण और निहत्थे प्रदर्शनकारियों को सुरक्षित वातावरण में अपनी बात रखने का अवसर मिलना चाहिए, जबकि प्रशासन कानून-व्यवस्था बनाए रखने की अपनी जिम्मेदारी निभाए।
देश के अलग-अलग शहरों में हुए प्रदर्शनों के अनुभव भी महत्वपूर्ण सीख देते हैं। उदाहरण के तौर पर, पुणे में बड़ी संख्या में लोगों की मौजूदगी के बावजूद प्रदर्शन पुलिस की निगरानी में शांतिपूर्वक संपन्न होने की खबरें सामने आईं। वहां पुलिस ने प्रदर्शनकारियों की आवाजाही को व्यवस्थित करने और कानून-व्यवस्था बनाए रखने में सहयोगात्मक भूमिका निभाई।
ऐसे उदाहरण बताते हैं कि नागरिकों और पुलिस के बीच सहयोग लोकतंत्र को और मजबूत बना सकता है। पेशेवर पुलिस व्यवस्था का उद्देश्य केवल सार्वजनिक सुरक्षा सुनिश्चित करना ही नहीं, बल्कि नागरिकों के शांतिपूर्ण प्रदर्शन के अधिकार की रक्षा करना भी होता है। देश का हर शहर उन व्यवस्थाओं से सीख सकता है, जो टकराव को कम करते हुए कानून के शासन को मजबूत बनाती हैं।
यह आंदोलन भारत की राजनीतिक संस्कृति की गुणवत्ता को लेकर भी कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े करता है। यदि लोकतंत्र को मजबूत बनाए रखना है, तो सरकारों को जनता के प्रति जवाबदेह होना होगा, लोकतांत्रिक संस्थाओं को स्वतंत्र रहना होगा और नागरिकों का यह विश्वास कायम रहना चाहिए कि संविधान द्वारा दिए गए अधिकार हर व्यक्ति पर समान रूप से लागू होते हैं, चाहे उसकी राजनीतिक विचारधारा कुछ भी हो।
लोकतंत्र तब और मजबूत होता है, जब सरकारें आलोचना को दुश्मनी नहीं, बल्कि संवाद का अवसर मानती हैं।
इस पूरे परिदृश्य में मीडिया की भूमिका भी बेहद महत्वपूर्ण है। एक स्वतंत्र और निष्पक्ष प्रेस लोकतंत्र को मजबूत करने का काम करती है। मीडिया की जिम्मेदारी केवल खबरें देना नहीं, बल्कि विभिन्न दृष्टिकोणों को सामने लाना, तथ्यों की निष्पक्ष जांच करना और सरकार, विपक्ष, कॉरपोरेट संस्थानों तथा नागरिक समाज सहित सभी प्रभावशाली संस्थाओं को जवाबदेह बनाना भी है।
देश के नागरिक ऐसी पत्रकारिता की अपेक्षा करते हैं जो समाज को विभाजित करने के बजाय जागरूक बनाए और हर वर्ग की आवाज़ को बराबरी से स्थान दे। विशेष रूप से युवाओं के विचारों और चिंताओं को भी मीडिया में पर्याप्त महत्व मिलना चाहिए।
भारतीय लोकतांत्रिक व्यवस्था में न्यायपालिका का स्थान भी अत्यंत महत्वपूर्ण है। अदालतों पर जनता का भरोसा तभी मजबूत बना रहता है, जब लोगों को यह विश्वास हो कि न्याय पूरी तरह स्वतंत्र, निष्पक्ष और संविधान के अनुरूप दिया जा रहा है।
इसी संदर्भ में सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति उज्जल भुइयां की हालिया टिप्पणियां विशेष महत्व रखती हैं। उन्होंने कहा कि देश में अलग-अलग विचार व्यक्त करने के लिए उपलब्ध सार्वजनिक स्थान लगातार सिमटते हुए दिखाई दे रहे हैं। साथ ही उन्होंने दोहराया कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता लोकतंत्र के मूल अधिकार हैं।
उनकी यह टिप्पणी पूरे देश को याद दिलाती है कि बहस, असहमति और शांतिपूर्ण विरोध किसी संवैधानिक लोकतंत्र की कमजोरी नहीं, बल्कि उसकी सबसे बड़ी ताकत होते हैं।
कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) आंदोलन का सबसे बड़ा महत्व किसी एक प्रदर्शन या घटना तक सीमित नहीं है। इसकी वास्तविक ताकत इस बात में है कि यह देश में नागरिकों की एक नई पीढ़ी को लोकतांत्रिक भागीदारी के लिए प्रेरित कर सकता है।
भारत को ऐसे युवा नेताओं की आवश्यकता है जो सार्वजनिक जीवन में सत्ता, धन या व्यक्तिगत लाभ के लिए नहीं, बल्कि संवैधानिक शासन, जनसेवा, सामाजिक न्याय और राष्ट्र निर्माण के उद्देश्य से आगे आएं। इस आंदोलन ने अनेक युवाओं को यह विश्वास दिलाया है कि राजनीति एक बार फिर समाज के हित में काम करने वाला सम्मानजनक और आदर्शवादी क्षेत्र बन सकती है।
भारत का लोकतंत्र हमेशा आम नागरिकों की सक्रिय भागीदारी से मजबूत हुआ है। हर पीढ़ी ने ऐसे लोगों को जन्म दिया है जिन्होंने स्वतंत्रता, समानता, न्याय और बंधुत्व जैसे संवैधानिक मूल्यों की रक्षा के लिए आगे आकर भूमिका निभाई। अब यह जिम्मेदारी आज के युवाओं पर है कि वे इस परंपरा को शांतिपूर्ण, जिम्मेदार और पूरी तरह संवैधानिक तरीके से आगे बढ़ाएं।
यदि कॉकरोच जनता पार्टी (CJP) आंदोलन हजारों ईमानदार और नैतिक युवा नेताओं को लोकतांत्रिक संस्थाओं के साथ रचनात्मक रूप से जुड़ने, संविधान के मूल्यों का सम्मान करने और दलगत हितों से ऊपर उठकर राष्ट्रहित को प्राथमिकता देने के लिए प्रेरित करता है, तो इसका योगदान किसी एक आंदोलन से कहीं अधिक बड़ा होगा।
ऐसी स्थिति में यह आंदोलन भारतीय लोकतंत्र में लोगों के विश्वास को फिर से मजबूत करने का माध्यम बन सकता है। यह संदेश देगा कि भारतीय राजनीति में सकारात्मक बदलाव केवल गुस्से या विरोध से नहीं, बल्कि ईमानदारी, सक्रिय नागरिक भागीदारी, जवाबदेही और भारतीय संविधान के प्रति अटूट प्रतिबद्धता के माध्यम से भी संभव है।
यही किसी भी लोकतांत्रिक समाज की सबसे बड़ी शक्ति होती है—जहां नागरिक केवल दर्शक नहीं, बल्कि लोकतंत्र के सक्रिय भागीदार बनते हैं।
लोकतांत्रिक भागीदारी अमर रहे।
संवैधानिक मूल्य अमर रहें।
जिम्मेदार नागरिकता की भावना सदैव जीवित रहे।




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