
देश में मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने एक महत्वपूर्ण प्रस्ताव रखा है। यदि यह प्रस्ताव लागू होता है, तो MBBS के प्रथम वर्ष के छात्रों को अब अधूरी इमारतों, अपर्याप्त प्रयोगशालाओं या अस्थायी शिक्षण अस्पतालों के सहारे पढ़ाई नहीं करनी पड़ेगी। नए नियमों के तहत मेडिकल कॉलेजों को नियामक मंजूरी के लिए आवेदन करने से पहले अपनी शैक्षणिक और अस्पताल संबंधी सभी बुनियादी सुविधाएं पूरी तरह तैयार करनी होंगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि यह कदम मेडिकल शिक्षा की गुणवत्ता में बड़ा सुधार ला सकता है। हालांकि कुछ जानकारों ने यह भी आशंका जताई है कि इससे नए मेडिकल कॉलेजों की स्थापना की गति धीमी हो सकती है और निजी निवेश मुख्य रूप से बड़े शहरों तक सीमित रह सकता है।
NMC ने प्रस्तावित किए बड़े बदलाव
NMC ने Establishment of New Medical Institutions, Starting of New Medical Courses, Increase of Seats for Existing Courses & Assessment & Rating Regulations, 2023 में संशोधन का मसौदा जारी किया है। इसे मेडिकल कॉलेजों की मंजूरी प्रक्रिया में पिछले कई वर्षों के सबसे बड़े बदलावों में से एक माना जा रहा है।
इन प्रस्तावित संशोधनों के तहत मेडिकल कॉलेजों को 100 प्रतिशत बुनियादी ढांचा तैयार करने के बाद ही आवेदन करने की अनुमति होगी। इसके अलावा राज्य सरकारों द्वारा जारी किए जाने वाले Essentiality Certificate को समाप्त करने, संस्थानों के लिए अनिवार्य कोष (Corpus Fund) बनाने, चार्टर्ड अकाउंटेंट द्वारा सत्यापित सॉल्वेंसी सर्टिफिकेट जमा करने और मंजूरी प्रक्रिया को प्रभावित करने की कोशिश करने वालों पर सख्त कार्रवाई जैसे प्रावधान भी शामिल किए गए हैं।
मंजूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाने पर जोर
NMC के एक अधिकारी के अनुसार इन संशोधनों का उद्देश्य मेडिकल कॉलेजों की स्थापना से जुड़ी मंजूरी प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी, वस्तुनिष्ठ और गुणवत्ता आधारित बनाना है।
अधिकारी ने बताया कि नए प्रावधान यह सुनिश्चित करेंगे कि आवेदन पर विचार करने से पहले संस्थान के पास आवश्यक भवन, प्रयोगशालाएं, अस्पताल और अन्य शैक्षणिक सुविधाएं पूरी तरह उपलब्ध हों। इससे कमियों की संभावना घटेगी और मूल्यांकन प्रक्रिया अधिक प्रभावी बन सकेगी।
मेडिकल छात्रों को होगा सीधा फायदा
मेडिकल शिक्षकों का कहना है कि यह प्रस्ताव लंबे समय से चली आ रही एक बड़ी समस्या का समाधान कर सकता है। अक्सर नए मेडिकल कॉलेजों में छात्रों को प्रवेश तो मिल जाता है, लेकिन आवश्यक सुविधाएं समय पर उपलब्ध नहीं हो पातीं।
Dr Roy R Chandran के अनुसार मेडिकल शिक्षा का पहला वर्ष पूरे करियर की नींव होता है। इस दौरान छात्रों को आधुनिक एनाटॉमी डिसेक्शन हॉल, फिजियोलॉजी और बायोकेमिस्ट्री प्रयोगशालाएं, पुस्तकालय, स्किल लैब और डिजिटल लर्निंग सुविधाओं की आवश्यकता होती है।
उनका कहना है कि जब बुनियादी ढांचा अधूरा होता है, तो व्यावहारिक प्रशिक्षण प्रभावित होता है। शिक्षकों को पढ़ाई पर ध्यान देने के बजाय व्यवस्थागत समस्याओं से जूझना पड़ता है और छात्रों का संस्थान की गुणवत्ता पर विश्वास भी कम हो सकता है।
अस्थायी अस्पतालों पर रोक का प्रस्ताव
NMC के प्रस्ताव में निरीक्षण के दौरान अस्थायी अस्पतालों के उपयोग पर भी रोक लगाने की बात कही गई है। विशेषज्ञों का मानना है कि मेडिकल शिक्षा का आधार वास्तविक मरीजों के साथ सीखने की प्रक्रिया है, जिसे अस्थायी व्यवस्था से पूरा नहीं किया जा सकता।
डॉ. चंद्रन का कहना है कि एक शिक्षण अस्पताल समय के साथ अपनी शैक्षणिक संस्कृति विकसित करता है। वहां स्थापित विभाग, विशेषज्ञों की टीम, मानक उपचार प्रणाली, पर्याप्त मरीज और नियमित शैक्षणिक गतिविधियां होती हैं। केवल निरीक्षण के लिए तैयार किए गए अस्थायी अस्पताल इस माहौल की बराबरी नहीं कर सकते।
उनके अनुसार यदि देश को सक्षम डॉक्टर तैयार करने हैं, तो शिक्षण अस्पताल शुरुआत से ही पूरी तरह कार्यशील होने चाहिए, न कि केवल निरीक्षण के दिन।
Essentiality Certificate हटाने पर बहस
सबसे अधिक चर्चा राज्य सरकारों द्वारा जारी किए जाने वाले Essentiality Certificate को समाप्त करने के प्रस्ताव को लेकर हो रही है। यह प्रमाणपत्र अब तक यह तय करने में मदद करता था कि किसी क्षेत्र में नए मेडिकल कॉलेज की आवश्यकता है या नहीं।
NMC का तर्क है कि इस व्यवस्था को हटाने से मंजूरी प्रक्रिया सरल होगी। हालांकि कुछ विशेषज्ञों का मानना है कि इससे निजी निवेशक पहले से विकसित शहरों को प्राथमिकता दे सकते हैं, जबकि दूरदराज और स्वास्थ्य सुविधाओं से वंचित क्षेत्रों में मेडिकल कॉलेजों की जरूरत बनी रह सकती है।
क्या नए मेडिकल कॉलेज बड़े शहरों तक सीमित हो जाएंगे?
विशेषज्ञों का कहना है कि मेडिकल शिक्षा केवल भवनों और कक्षाओं तक सीमित नहीं है। छात्रों के प्रशिक्षण के लिए पर्याप्त संख्या में मरीजों का होना भी जरूरी है।
यदि एक ही शहर में बड़ी संख्या में मेडिकल कॉलेज खुलते हैं, तो सभी संस्थानों को समान मरीज समूह पर निर्भर रहना पड़ेगा। इससे छात्रों को मिलने वाले क्लीनिकल अनुभव की गुणवत्ता और विविधता प्रभावित हो सकती है।
डॉ. चंद्रन का मानना है कि मेडिकल कॉलेजों का विस्तार क्षेत्रीय स्वास्थ्य जरूरतों को ध्यान में रखकर किया जाना चाहिए। कई मामलों में नए संस्थान खोलने के बजाय मौजूदा सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों को मजबूत करना अधिक प्रभावी साबित हो सकता है।
मेडिकल शिक्षा में गुणवत्ता सुधार की दिशा में बड़ा कदम
NMC का यह प्रस्ताव मेडिकल शिक्षा व्यवस्था को अधिक जवाबदेह और गुणवत्ता केंद्रित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण प्रयास माना जा रहा है। यदि ये संशोधन लागू होते हैं, तो भविष्य में मेडिकल छात्रों को बेहतर सुविधाओं, मजबूत क्लीनिकल प्रशिक्षण और अधिक व्यवस्थित शैक्षणिक माहौल का लाभ मिल सकता है। वहीं यह भी सुनिश्चित करना होगा कि नए नियमों के कारण मेडिकल कॉलेजों के विस्तार और स्वास्थ्य सेवाओं की पहुंच पर नकारात्मक प्रभाव न पड़े।




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