Edinbox Hindi
Ragging Complaints in Higher Education Institutions More Than Double Between 2022 and 2025

क्या कमजोर पड़ गई है उच्च शिक्षण संस्थानों में रैगिंग के रोकथाम की व्यवस्था? तीन साल में दोगुनी हुई शिकायतें

Ragging Complaints in Higher Education Institutions More Than Double Between 2022 and 2025

देश के उच्च शिक्षण संस्थानों (HEIs) में रैगिंग के मामलों को लेकर चिंता बढ़ती जा रही है। हाल ही में लोकसभा में साझा किए गए आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2022 से 2025 के बीच रैगिंग से जुड़ी शिकायतों की संख्या दोगुनी से भी अधिक हो गई है। शिक्षा मंत्रालय का कहना है कि जागरूकता बढ़ने और शिकायत दर्ज कराने की बेहतर व्यवस्था के कारण अधिक छात्र अब सामने आ रहे हैं। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल बेहतर रिपोर्टिंग ही इस बढ़ोतरी की वजह नहीं हो सकती, बल्कि यह भी संकेत है कि कई संस्थानों में रैगिंग रोकने के उपाय प्रभावी ढंग से लागू नहीं हो रहे हैं।

लोकसभा में सांसद सयानी घोष के प्रश्न के जवाब में शिक्षा राज्य मंत्री सुकांत मजूमदार ने बताया कि पिछले चार वर्षों में रैगिंग से संबंधित शिकायतों में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार वर्ष 2022 में 655 शिकायतें दर्ज हुई थीं, जो 2023 में बढ़कर 962 और 2024 में 1,084 हो गईं। वर्ष 2025 में यह संख्या 1,369 तक पहुंच गई। वहीं 22 जुलाई 2026 तक ही 757 शिकायतें दर्ज की जा चुकी थीं।

UGC ने 107 संस्थानों को जारी किए नोटिस

शिक्षा मंत्रालय ने बताया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने वर्ष 2025 में 107 उच्च शिक्षण संस्थानों को कारण बताओ नोटिस जारी किए थे। इनमें 18 मेडिकल कॉलेज भी शामिल थे। इन संस्थानों पर एंटी-रैगिंग विनियम 2009 का पालन न करने का आरोप था।

मंत्रालय के अनुसार कई संस्थान छात्रों और अभिभावकों से अनिवार्य एंटी-रैगिंग शपथपत्र लेने में विफल रहे। इसके अलावा बार-बार निर्देश दिए जाने के बावजूद कई संस्थानों ने अनुपालन रिपोर्ट भी जमा नहीं की। इसे रैगिंग के बढ़ते मामलों की एक बड़ी वजह माना जा रहा है।

उत्तर प्रदेश और बिहार में सबसे अधिक शिकायतें

राज्यों के आंकड़ों पर नजर डालें तो उत्तर प्रदेश में रैगिंग शिकायतों में सबसे तेज वृद्धि दर्ज की गई है। यहां 2022 में 97 शिकायतें थीं, जो 2025 में बढ़कर 251 हो गईं। वर्ष 2026 में अब तक 135 मामले सामने आ चुके हैं।

बिहार में शिकायतों की संख्या 54 से बढ़कर 122 तक पहुंच गई। महाराष्ट्र में भी मामलों में उल्लेखनीय वृद्धि हुई और शिकायतें 41 से बढ़कर 89 हो गईं।

इसके अलावा मध्य प्रदेश में 73 से 117, राजस्थान में 32 से 75 और कर्नाटक में 20 से 51 मामलों तक वृद्धि दर्ज की गई। दूसरी ओर नागालैंड में पिछले पांच वर्षों के दौरान केवल एक शिकायत दर्ज हुई, जो देश में सबसे कम है।

एंटी-रैगिंग अभियान कमजोर पड़ने का दावा

रैगिंग विरोधी कार्यकर्ता और अमन कच्छरू ट्रस्ट के संस्थापक न्यासी राजेंद्र कच्छरू इस बढ़ोतरी से हैरान नहीं हैं। उनके बेटे अमन सत्य कच्छरू की 2009 में हिमाचल प्रदेश के एक मेडिकल कॉलेज में रैगिंग के दौरान हुई पिटाई के बाद मौत हो गई थी। इसके बाद उन्होंने देशभर में रैगिंग के खिलाफ अभियान शुरू किया।

उन्होंने बताया कि वर्ष 2012 से 2019 तक उनके ट्रस्ट ने UGC के साथ मिलकर राष्ट्रीय एंटी-रैगिंग कार्यक्रम का संचालन किया था। इस दौरान रैगिंग की घटनाएं लगभग 40 प्रतिशत से घटकर 5 प्रतिशत तक आ गई थीं। लेकिन कोविड-19 महामारी और 2022 में नई एजेंसी के आने के बाद कार्यक्रम की प्रभावशीलता कमजोर हो गई।

कच्छरू का दावा है कि आज एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन को छोड़कर कार्यक्रम के अधिकांश महत्वपूर्ण हिस्से लगभग निष्क्रिय हो चुके हैं। उनके अनुसार पहले शिकायत निवारण, अनुपालन ऑडिट, जागरूकता अभियान और निगरानी जैसे चार प्रमुख स्तंभ थे, लेकिन इनमें से कई व्यवस्थाएं अब प्रभावी रूप से काम नहीं कर रही हैं।

छात्रों और अभिभावकों से संवाद भी हुआ कम

राजेंद्र कच्छरू के मुताबिक पहले UGC और उनका ट्रस्ट प्रतिदिन लगभग एक लाख ईमेल अभिभावकों को भेजते थे, जिससे उन्हें रैगिंग विरोधी उपायों की जानकारी मिलती रहती थी। लेकिन 2020 के बाद यह संवाद लगभग बंद हो गया, जिससे छात्रों, अभिभावकों और संस्थानों के बीच जागरूकता की कड़ी कमजोर पड़ी।

नियम मजबूत, लेकिन अमल कमजोर

विशेषज्ञों का मानना है कि समस्या नियमों में नहीं, बल्कि उनके क्रियान्वयन में है। कच्छरू का कहना है कि भारत के एंटी-रैगिंग नियम आज भी दुनिया के सबसे मजबूत नियमों में गिने जाते हैं, लेकिन उनकी निगरानी और पालन सुनिश्चित करने वाली व्यवस्थाएं कमजोर हो गई हैं।

वर्तमान में राष्ट्रीय छात्र आत्महत्या टास्क फोर्स के सदस्य कच्छरू का कहना है कि पिछले एक दशक में रैगिंग से जुड़े कारणों के चलते छात्र आत्महत्या के मामलों में भी चिंताजनक वृद्धि हुई है। उनके अनुसार देश में हर साल लगभग 12,000 छात्र आत्महत्या करते हैं और इनमें कई मामलों की शुरुआत रैगिंग तथा शिकायतों के उचित समाधान न मिलने से होती है।

विश्वविद्यालयों में संवेदनशीलता की कमी

दिल्ली विश्वविद्यालय के राजनीति विज्ञान विभाग के प्रोफेसर एन. सुकुमार का मानना है कि कई संस्थानों में छात्र समस्याओं को केवल कानून-व्यवस्था का मुद्दा मान लिया जाता है। छात्रों के प्रति संवेदनशीलता की कमी के कारण संवाद और समाधान की प्रक्रिया कमजोर पड़ जाती है।

उन्होंने कहा कि UGC और अन्य समितियों ने कैंपस में काउंसलिंग सेंटर स्थापित करने की सिफारिश की थी, लेकिन अधिकांश संस्थानों में इन सुझावों को गंभीरता से नहीं लिया गया। कई जगह शिकायतों को दर्ज करने के बजाय समझौता कराने की कोशिश की जाती है, जिससे वास्तविक स्थिति सामने नहीं आ पाती।

रैगिंग अब केवल शारीरिक उत्पीड़न तक सीमित नहीं

विशेषज्ञों के अनुसार आज रैगिंग का स्वरूप बदल चुका है। यह केवल मारपीट या शारीरिक प्रताड़ना तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें ऑनलाइन बुलिंग, अपमानजनक टिप्पणियां, सामाजिक बहिष्कार, मानसिक दबाव और जबरन व्यवहार भी शामिल हो गए हैं।

बेंगलुरु स्थित सीएमआर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी के एंटी-रैगिंग सेल के मुख्य समन्वयक फजलुर रहमान का कहना है कि रैगिंग रोकने के लिए लगातार जागरूकता कार्यक्रम, छात्र परामर्श, फैकल्टी मेंटरशिप, गुमनाम शिकायत प्रणाली और सम्मानजनक कैंपस संस्कृति को बढ़ावा देना जरूरी है।

उन्होंने बताया कि उनके संस्थान में शैक्षणिक सत्र की शुरुआत में शिक्षक करीब दो महीने तक हॉस्टल में रात के समय भी मौजूद रहते हैं, ताकि नए छात्र खुद को सुरक्षित और सहज महसूस कर सकें।

वास्तविक संख्या कहीं अधिक हो सकती है

सोसाइटी अगेंस्ट वायलेंस इन एजुकेशन (SAVE) के उपाध्यक्ष गौरव सिंघल का कहना है कि संसद में प्रस्तुत आंकड़े समस्या का केवल एक छोटा हिस्सा दिखाते हैं। उनके अनुसार देश में हर साल एक करोड़ से अधिक नए छात्र उच्च शिक्षण संस्थानों में प्रवेश लेते हैं और रैगिंग के वास्तविक मामलों की संख्या लाखों में हो सकती है।

सिंघल के मुताबिक संसद में दर्ज आंकड़े केवल राष्ट्रीय एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन पर दर्ज शिकायतों को दर्शाते हैं। हजारों शिकायतें सीधे संस्थानों तक पहुंचती हैं, जबकि बड़ी संख्या में छात्र डर, दबाव और प्रतिशोध की आशंका के कारण शिकायत ही नहीं करते।

उन्होंने सुझाव दिया कि एंटी-रैगिंग हेल्पलाइन पर गुमनाम शिकायत दर्ज करने की व्यवस्था और मजबूत की जानी चाहिए, ताकि पीड़ित छात्र बिना डर के अपनी बात रख सकें।

विशेषज्ञों का मानना है कि रैगिंग को खत्म करने के लिए केवल नियम बनाना पर्याप्त नहीं है। संस्थानों, शिक्षकों, अभिभावकों और छात्रों को मिलकर ऐसा वातावरण तैयार करना होगा, जहां सम्मान, संवाद और सुरक्षा को सर्वोच्च प्राथमिकता मिले। तभी उच्च शिक्षा संस्थान वास्तव में सुरक्षित और समावेशी बन सकेंगे।

 

 

Asmita Sarkar

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed