
JoSAA Counselling 2026 समाप्त होने के बाद देश के प्रमुख तकनीकी संस्थानों में 15,000 से अधिक इंजीनियरिंग सीटें खाली रह गई हैं। इन सीटों को भरने के लिए अब केंद्रीय सीट आवंटन बोर्ड (CSAB) ने विशेष काउंसलिंग प्रक्रिया शुरू कर दी है। जॉइंट सीट एलोकेशन अथॉरिटी (JoSAA) की पांच चरणों वाली काउंसलिंग के बाद राष्ट्रीय प्रौद्योगिकी संस्थान (NIT), भारतीय इंजीनियरिंग विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी संस्थान (IIEST) शिबपुर, भारतीय सूचना प्रौद्योगिकी संस्थान (IIIT) और सरकारी वित्तपोषित तकनीकी संस्थानों (GFTI) में कुल 15,423 सीटें खाली पाई गईं।
सबसे अधिक 6,945 सीटें 60 GFTI संस्थानों में खाली रहीं। इसके बाद 31 NIT में 4,611 सीटें, 27 IIIT में 3,628 सीटें और IIEST शिबपुर में 239 सीटें रिक्त रहीं। दिलचस्प बात यह है कि छात्रों के बीच सबसे लोकप्रिय मानी जाने वाली कंप्यूटर साइंस एंड इंजीनियरिंग (CSE) शाखा में भी 3,098 सीटें खाली बची हैं। इनमें 503 सीटें NIT, 17 सीटें IIEST शिबपुर, 1,173 सीटें IIIT और 1,405 सीटें GFTI में हैं।
लगातार बढ़ रही हैं खाली सीटें
विशेषज्ञों का मानना है कि इंजीनियरिंग सीटों के खाली रहने के पीछे केवल छात्रों की घटती रुचि जिम्मेदार नहीं है। इसके पीछे कई संरचनात्मक, शैक्षणिक और व्यवहारिक कारण हैं। पिछले तीन वर्षों के आंकड़े भी यही संकेत देते हैं। वर्ष 2024 में 12,000 से अधिक सीटें खाली रह गई थीं, जबकि 2025 में यह संख्या 13,000 से ऊपर पहुंच गई थी। 2026 में यह आंकड़ा बढ़कर 15,423 हो गया है।
नए संस्थानों के जुड़ने से बढ़ा सीट पूल
NIT राउरकेला के कंप्यूटर साइंस एवं इंजीनियरिंग विभाग के प्रमुख प्रोफेसर पंकज के. सा के अनुसार, खाली सीटों की संख्या बढ़ने का मुख्य कारण इंजीनियरिंग के प्रति छात्रों की रुचि में कमी नहीं, बल्कि सीटों की संख्या में बढ़ोतरी है।
उन्होंने बताया कि इस वर्ष नए शामिल हुए GFTI संस्थानों के कारण लगभग 1,500 से 2,000 अतिरिक्त सीटें जोड़ी गई हैं। IIT, NIT और IIIT की संख्या पिछले कई वर्षों से लगभग स्थिर है, लेकिन नए GFTI और अन्य केंद्र या राज्य वित्तपोषित संस्थान लगातार JoSAA प्रक्रिया में शामिल हो रहे हैं। इससे हर साल कुल सीटों की संख्या बढ़ रही है।
छात्र अब भी प्रतिष्ठित संस्थानों को दे रहे प्राथमिकता
इंजीनियरिंग प्रवेश प्रक्रिया में छात्रों की पहली पसंद आज भी IIT, NIT और प्रमुख IIIT बने हुए हैं। यही वजह है कि नए या कम चर्चित संस्थानों को छात्रों को आकर्षित करने में कठिनाई होती है। खासकर ऐसे GFTI, जिन्होंने अभी तक मजबूत शैक्षणिक पहचान या प्लेसमेंट रिकॉर्ड विकसित नहीं किया है, वहां सीटें अधिक खाली रह जाती हैं।
विशेषज्ञों का कहना है कि JoSAA और CSAB की बहु-स्तरीय काउंसलिंग प्रक्रिया भी इस स्थिति में योगदान देती है। कई छात्र पहले से किसी संस्थान में सीट मिलने के बावजूद बेहतर विकल्प की तलाश में आगे की काउंसलिंग में भाग लेते रहते हैं, जिससे अंतिम चरण तक सीटों का संतुलन प्रभावित होता है।
AI और डेटा साइंस की मांग बढ़ी, पारंपरिक शाखाओं की लोकप्रियता घटी
IIEST शिबपुर के माइनिंग इंजीनियरिंग विभाग के सहायक प्रोफेसर लिंगमपल्ली साई विनय के अनुसार, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), डेटा साइंस और कंप्यूटर साइंस जैसे आधुनिक तकनीकी कोर्स लगातार छात्रों को आकर्षित कर रहे हैं।
इसके विपरीत सिविल, मैकेनिकल, इलेक्ट्रिकल और केमिकल इंजीनियरिंग जैसी पारंपरिक शाखाओं की मांग में गिरावट देखी जा रही है। कई छात्रों का मानना है कि इन क्षेत्रों में वेतन, प्लेसमेंट और निवेश पर मिलने वाला लाभ तकनीकी आधारित नई शाखाओं की तुलना में कम है।
इसके अलावा, अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (AICTE) द्वारा निर्धारित मानकों को पूरा करने वाले संस्थानों को सीटें बढ़ाने की अनुमति दिए जाने से भी उपलब्ध सीटों की संख्या तेजी से बढ़ी है। मांग की तुलना में आपूर्ति अधिक बढ़ने से रिक्त सीटों की संख्या में वृद्धि हुई है।
पारंपरिक इंजीनियरिंग शाखाओं की मांग फिर बढ़ सकती है
हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि भविष्य में पारंपरिक इंजीनियरिंग शाखाओं की मांग दोबारा बढ़ सकती है। प्रोफेसर पंकज के. सा का कहना है कि छात्र अब यह समझने लगे हैं कि AI केवल सॉफ्टवेयर तक सीमित नहीं है। इसके प्रभावी उपयोग के लिए मजबूत भौतिक ढांचे और पारंपरिक इंजीनियरिंग विशेषज्ञता की आवश्यकता होती है।
AI आधारित तकनीकों को चलाने के लिए डेटा सेंटर, हाई-परफॉर्मेंस GPU, बिजली आपूर्ति, कूलिंग सिस्टम और थर्मल मैनेजमेंट जैसी सुविधाओं की जरूरत होती है। इन सभी क्षेत्रों में मैकेनिकल, सिविल, इलेक्ट्रिकल और अन्य पारंपरिक इंजीनियरिंग शाखाओं की महत्वपूर्ण भूमिका है। इसी कारण आने वाले वर्षों में इन शाखाओं में दाखिले की मांग बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
बदल रही हैं छात्रों की प्राथमिकताएं
आज के छात्र केवल कोर्स नहीं, बल्कि संस्थान और उसकी लोकेशन को भी ध्यान में रखकर फैसला ले रहे हैं। अधिकांश छात्र महानगरों या बड़े शहरों के कॉलेजों को प्राथमिकता देते हैं, जहां बेहतर प्लेसमेंट, इंटर्नशिप और उद्योगों से जुड़ाव के अवसर उपलब्ध होते हैं।
दूसरी ओर, ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में स्थित संस्थानों, विशेषकर पूर्वोत्तर राज्यों के कई कॉलेजों को छात्रों को आकर्षित करने में कठिनाई का सामना करना पड़ रहा है।
इसके अलावा कई छात्र अब पारंपरिक डिग्री की जगह स्किल आधारित प्रशिक्षण, प्रोफेशनल सर्टिफिकेशन और विशेषीकृत तकनीकी पाठ्यक्रमों को भी चुन रहे हैं। निजी विश्वविद्यालयों के विस्तार और विदेश में पढ़ाई के बढ़ते अवसरों ने भी छात्रों के लिए विकल्पों की संख्या बढ़ा दी है।
निजी विश्वविद्यालय भी बदल रहे हैं प्रवेश का गणित
विशेषज्ञों के अनुसार निजी विश्वविद्यालयों की बढ़ती प्रतिष्ठा का असर भी सरकारी तकनीकी संस्थानों में दाखिलों पर पड़ रहा है। कई छात्र यदि शीर्ष सरकारी संस्थानों में मनपसंद शाखा, खासकर CSE, नहीं हासिल कर पाते तो वे कम रैंक वाले सरकारी संस्थानों की बजाय प्रतिष्ठित निजी विश्वविद्यालयों का विकल्प चुनते हैं।
इसके साथ ही कुछ इंजीनियरिंग कॉलेज आज भी पुराने पाठ्यक्रम, कमजोर प्रयोगशाला सुविधाओं और शिक्षकों की कमी जैसी चुनौतियों से जूझ रहे हैं। यही कारण है कि कई सरकारी वित्तपोषित तकनीकी संस्थान छात्रों के लिए अपेक्षाकृत कम आकर्षक साबित हो रहे हैं।
कुल मिलाकर JoSAA Counselling 2026 के बाद बड़ी संख्या में सीटों का खाली रहना केवल प्रवेश प्रक्रिया का परिणाम नहीं है, बल्कि यह देश में उच्च तकनीकी शिक्षा के बदलते स्वरूप, छात्रों की नई प्राथमिकताओं और संस्थानों के बीच बढ़ती प्रतिस्पर्धा की भी तस्वीर पेश करता है।




Add comment