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Degree vs Jobs in India: Why Are Graduates Struggling to Find Suitable Employment?

Degree vs Job in India: ग्रेजुएट होने के बाद भी नौकरी क्यों नहीं? आंकड़े बता रहे हैं शिक्षा और रोजगार की बड़ी चुनौती

Degree vs Jobs in India: Why Are Graduates Struggling to Find Suitable Employment?

Graduate Unemployment in India: भारत में हर साल लाखों युवा कॉलेज और यूनिवर्सिटी से डिग्री लेकर निकलते हैं। उम्मीद होती है कि पढ़ाई पूरी होने के बाद अच्छी नौकरी मिलेगी और करियर शुरू होगा। लेकिन जमीनी तस्वीर इतनी आसान नहीं है। देश में उच्च शिक्षा हासिल करने वालों की संख्या बढ़ रही है, जबकि उनके लिए अच्छी और उनकी योग्यता के मुताबिक नौकरियों का रास्ता उसी गति से नहीं बढ़ा है।

इसी वजह से भारत के रोजगार बाजार में एक अजीब स्थिति दिखाई देती है। कई युवा डिग्री होने के बावजूद लंबे समय तक नौकरी तलाशते हैं, जबकि दूसरी ओर कंपनियां सही कौशल वाले उम्मीदवार नहीं मिलने की शिकायत करती हैं। यानी समस्या सिर्फ नौकरियों की संख्या की नहीं, बल्कि शिक्षा, कौशल और रोजगार के बीच सही तालमेल की भी है।

अलग-अलग सरकारी और स्वतंत्र रिपोर्टों के आंकड़े इस चुनौती को समझने में मदद करते हैं।

ग्रेजुएट युवाओं में बेरोजगारी क्यों ज्यादा?

अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की State of Working India 2023 रिपोर्ट के अनुसार, कोविड के बाद बेरोजगारी दर शिक्षा के सभी स्तरों पर घटी है, लेकिन 25 साल से कम उम्र के ग्रेजुएट युवाओं में यह दर करीब 42% बनी हुई थी। रिपोर्ट यह भी बताती है कि ग्रेजुएट युवाओं की बेरोजगारी दर 15% से ऊपर थी।

इसी तस्वीर को International Labour Organization (ILO) और Institute for Human Development की India Employment Report 2024 भी सामने लाती है। रिपोर्ट के अनुसार, 2022 में ग्रेजुएट युवाओं की बेरोजगारी दर 29.1% थी, जबकि जो लोग पढ़-लिख नहीं सकते थे, उनमें यह दर सिर्फ 3.4% थी। सेकेंडरी या उससे ऊपर की शिक्षा वाले युवाओं में बेरोजगारी दर 18.4% थी।

यह आंकड़ा पहली नजर में उलटा लग सकता है। आम तौर पर माना जाता है कि ज्यादा पढ़ाई से नौकरी के मौके बढ़ने चाहिए। लेकिन यहां एक अहम बात समझना जरूरी है। ILO के ये आंकड़े युवा बेरोजगारी से जुड़े हैं, यानी इनकी तुलना पूरी आबादी के बेरोजगारी आंकड़ों से नहीं करनी चाहिए।

ज्यादा पढ़े युवा लंबे समय तक नौकरी क्यों तलाशते हैं?

इसकी एक वजह यह है कि उच्च शिक्षा हासिल करने वाले युवा अक्सर अपनी योग्यता और उम्मीद के मुताबिक नौकरी तलाशते हैं। वे हर तरह का काम तुरंत स्वीकार नहीं करते। इसके कारण नौकरी मिलने में समय लग सकता है।

दूसरी तरफ, डिग्री और नौकरी की जरूरतों के बीच कौशल का अंतर भी बड़ी चुनौती है। कंपनियों को ऐसे उम्मीदवार चाहिए जिनके पास डिग्री के साथ काम से जुड़े व्यावहारिक कौशल हों। कई बार कॉलेज की पढ़ाई और इंडस्ट्री की जरूरतों के बीच यह अंतर युवाओं के लिए नौकरी हासिल करना मुश्किल बना देता है।

अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी की रिपोर्ट भी बताती है कि भारत में आर्थिक विकास के बावजूद अच्छे रोजगार के साथ विकास का संबंध कमजोर रहा है। रिपोर्ट के मुताबिक, रोजगार बढ़ाने में निर्माण और अनौपचारिक सेवाओं की बड़ी भूमिका रही है, जबकि मैन्युफैक्चरिंग में रोजगार का हिस्सा पर्याप्त तेजी से नहीं बढ़ा।

सरकारी नौकरी के लिए करोड़ों आवेदन, चयन बहुत कम

भारत में सरकारी नौकरी को लेकर युवाओं की उम्मीद और प्रतियोगिता दोनों बहुत ज्यादा हैं। इसका अंदाजा केंद्र सरकार की ओर से संसद में दिए गए आंकड़ों से लगाया जा सकता है।

2014-15 से 2021-22 के बीच केंद्र सरकार के अलग-अलग विभागों में नियुक्तियों के लिए 22,05,99,238 आवेदन प्राप्त हुए। इनमें भर्ती एजेंसियों ने 7,22,311 उम्मीदवारों को नियुक्ति के लिए सिफारिश की। यानी आठ साल में आए कुल आवेदनों में चयन के लिए सिफारिश किए गए उम्मीदवारों का हिस्सा करीब 0.33% था।

इसका मतलब यह नहीं है कि 22 करोड़ अलग-अलग युवाओं ने आवेदन किया था, क्योंकि एक उम्मीदवार अलग-अलग भर्ती और कई पदों के लिए आवेदन कर सकता है। इसलिए इन आंकड़ों को आवेदन बनाम चयन के रूप में समझना ज्यादा सही है।

फिर भी आंकड़ा सरकारी नौकरियों के लिए मौजूद भारी प्रतियोगिता की तस्वीर साफ करता है। सीमित पदों के सामने आवेदन की संख्या बहुत बड़ी है, इसलिए एक सरकारी भर्ती में सफल होने के लिए उम्मीदवारों को बेहद कड़ी प्रतियोगिता का सामना करना पड़ता है।

हर साल 1 करोड़ से ज्यादा छात्र उच्च शिक्षा से निकल रहे

भारत में उच्च शिक्षा का दायरा भी लगातार बढ़ा है। शिक्षा मंत्रालय के All India Survey on Higher Education (AISHE) 2021-22 के अनुसार, देश में 2021-22 के दौरान उच्च शिक्षा से 1.07 करोड़ पास-आउट हुए, जबकि 2020-21 में यह संख्या 95.4 लाख थी।

यह आंकड़ा दिखाता है कि हर साल रोजगार बाजार में बड़ी संख्या में नए युवा प्रवेश कर रहे हैं। लेकिन सभी के लिए एक जैसी नौकरी उपलब्ध नहीं होती। कुछ युवा तुरंत रोजगार हासिल कर लेते हैं, कुछ उच्च शिक्षा में चले जाते हैं और कई लंबे समय तक नौकरी की तलाश करते हैं।

यही वजह है कि सिर्फ कॉलेजों और यूनिवर्सिटी में दाखिले बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। शिक्षा के विस्तार के साथ रोजगार के ऐसे अवसर भी बढ़ाने होंगे जिनमें युवाओं की पढ़ाई और कौशल का सही इस्तेमाल हो सके।

सिर्फ बेरोजगारी नहीं, Underemployment भी बड़ी समस्या

नौकरी मिल जाना हमेशा यह नहीं बताता कि समस्या हल हो गई। कई युवा ऐसी नौकरियां कर रहे हैं जो उनकी शैक्षणिक योग्यता और क्षमता से नीचे हैं। इसे Underemployment यानी कम स्तर का रोजगार कहा जाता है।

Economic Survey 2024-25 के अनुसार, 53% से ज्यादा ग्रेजुएट और 36% पोस्टग्रेजुएट ऐसे काम कर रहे हैं जो उनकी शैक्षणिक योग्यता से नीचे के स्तर के हैं। सर्वे में यह भी बताया गया कि केवल 8.25% ग्रेजुएट ऐसे कामों में हैं जो उनकी शिक्षा के स्तर से सीधे मेल खाते हैं।

यानी समस्या सिर्फ यह नहीं कि युवा नौकरी पा रहे हैं या नहीं। एक बड़ा सवाल यह भी है कि उन्हें उनकी योग्यता के मुताबिक काम मिल रहा है या नहीं।

अगर इंजीनियरिंग या मैनेजमेंट की डिग्री रखने वाला युवा ऐसी नौकरी करता है जिसमें उसकी विशेषज्ञता का इस्तेमाल नहीं होता, तो उसकी शिक्षा और रोजगार के बीच का अंतर बना रहता है। लंबे समय में इसका असर कम आय, कम करियर ग्रोथ और काम से असंतोष के रूप में दिखाई दे सकता है।

2030 तक हर साल 78.5 लाख गैर-कृषि नौकरियों की जरूरत

भारत की बढ़ती युवा आबादी को रोजगार देने के लिए आने वाले वर्षों में बड़ी संख्या में नई नौकरियां पैदा करनी होंगी। Economic Survey 2023-24 के मुताबिक, बढ़ती वर्कफोर्स की जरूरत पूरी करने के लिए देश को 2030 तक हर साल औसतन करीब 78.5 लाख गैर-कृषि नौकरियां पैदा करने की जरूरत होगी।

यह चुनौती सिर्फ सरकारी नौकरियों से पूरी नहीं हो सकती। इतने बड़े स्तर पर रोजगार पैदा करने के लिए प्राइवेट सेक्टर, मैन्युफैक्चरिंग, सर्विस सेक्टर, छोटे और मध्यम उद्योगों तथा नए रोजगार क्षेत्रों की अहम भूमिका होगी।

Economic Survey ने रोजगार के लिए कृषि से जुड़े प्रोसेसिंग उद्योग और Care Economy जैसे क्षेत्रों में भी संभावनाएं बताई हैं। टेक्नोलॉजी और ग्रीन एनर्जी जैसे नए क्षेत्रों में भी रोजगार के अवसर बढ़ सकते हैं, लेकिन इसके लिए युवाओं के कौशल को बदलती जरूरतों के साथ जोड़ना जरूरी होगा।

डिग्री से आगे कौशल पर देना होगा ध्यान

इन आंकड़ों को जोड़कर देखें तो भारत के सामने समस्या सिर्फ बेरोजगार युवाओं की संख्या की नहीं है। असली चुनौती तीन स्तरों पर दिखाई देती है—पर्याप्त रोजगार पैदा करना, युवाओं को रोजगार के लिए जरूरी कौशल देना और उनकी योग्यता के मुताबिक काम उपलब्ध कराना।

डिग्री आज भी जरूरी है, लेकिन अकेली डिग्री नौकरी की गारंटी नहीं देती। युवाओं के लिए अपने विषय की पढ़ाई के साथ डिजिटल स्किल, कम्युनिकेशन, समस्या समाधान, इंडस्ट्री से जुड़े व्यावहारिक कौशल और जरूरत के अनुसार लगातार सीखते रहना महत्वपूर्ण होता जा रहा है।

दूसरी तरफ, शिक्षा संस्थानों और कंपनियों के बीच बेहतर तालमेल की जरूरत है, ताकि पाठ्यक्रम सिर्फ परीक्षा पास करने तक सीमित न रहे और छात्रों को वास्तविक काम की जरूरतों के लिए तैयार करे।

भारत के लिए असली चुनौती यह नहीं है कि कितने युवा कॉलेज तक पहुंच रहे हैं, बल्कि यह है कि कॉलेज से निकलने के बाद कितने युवाओं को उनकी योग्यता के मुताबिक अच्छा और टिकाऊ रोजगार मिल रहा है। आने वाले दशक में भारत के युवा संसाधन को आर्थिक ताकत में बदलने के लिए शिक्षा और रोजगार के बीच इस दूरी को कम करना सबसे अहम कामों में से एक होगा।

 

Asmita Sarkar

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