
Civil Judge Recruitment 2026: निचली अदालतों में सिविल जज (जूनियर डिवीजन) के पद पर सीधे भर्ती की तैयारी कर रहे कानून स्नातकों के लिए सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा बदलाव किया है। अदालत ने तीन साल की अनिवार्य बार प्रैक्टिस की अपनी 2025 की शर्त को संशोधित करते हुए अब भविष्य की भर्तियों के लिए एक साल की वास्तविक और सत्यापित वकालत को पर्याप्त माना है।
हालांकि, इसे वकालत की शर्त पूरी तरह खत्म करना नहीं कहा जा सकता। सुप्रीम कोर्ट की नई व्यवस्था में चयन के बाद उम्मीदवारों को एक साल की न्यायिक अकादमी ट्रेनिंग और एक साल की संरचित लॉ क्लर्कशिप भी करनी होगी। यानी अदालत ने बार में जरूरी अनुभव की अवधि कम की है, लेकिन न्यायिक कामकाज का व्यावहारिक अनुभव सुनिश्चित करने के लिए चयन के बाद प्रशिक्षण का रास्ता बनाया है। यह फैसला 21 अगस्त 2026 को Bhumika Trust v. Union of India मामले में तीन जजों की पीठ ने सुनाया।
अब कितने साल की वकालत जरूरी होगी?
सुप्रीम कोर्ट के बहुमत के फैसले के अनुसार 1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी होने वाली भर्ती अधिसूचनाओं के लिए सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की परीक्षा में बैठने वाले उम्मीदवार के पास कम से कम एक साल की वास्तविक कानूनी प्रैक्टिस होनी चाहिए।
इस प्रैक्टिस को केवल कागजों पर दिखाना पर्याप्त नहीं होगा। उम्मीदवार को प्रमाणित करना होगा कि उसने जिला अदालतों में वास्तविक न्यायिक कार्यवाही में भाग लिया है। इसके लिए हाईकोर्ट की ओर से तय व्यवस्था के तहत Certificate of Practice जारी किया जाएगा।
इस तरह 2025 में तय की गई तीन साल की शर्त अब एक साल की हो गई है, लेकिन कोर्ट ने न्यायिक सेवा में प्रवेश से पहले व्यावहारिक अनुभव की जरूरत को बरकरार रखा है।
31 मार्च 2027 तक क्या नियम रहेगा?
सुप्रीम कोर्ट ने कानून स्नातकों के लिए एक संक्रमण अवधि भी तय की है। 20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 के बीच जारी होने वाली सिविल जज (जूनियर डिवीजन) भर्ती अधिसूचनाओं के लिए पहले से तीन साल की प्रैक्टिस जरूरी नहीं होगी।
इस अवधि में पात्र कानून स्नातक बिना पूर्व बार प्रैक्टिस के परीक्षा में शामिल हो सकेंगे। उनके लिए एक साल की प्रैक्टिस पूरी मानी जाएगी और इस अवधि के लिए अलग Certificate of Practice भी नहीं देना होगा।
हालांकि, चयन के बाद ऐसे उम्मीदवारों को सीधे नियमित न्यायिक अधिकारी के तौर पर काम शुरू करने की अनुमति नहीं होगी। उन्हें पहले Trainee Judicial Officer के रूप में प्रशिक्षण पूरा करना होगा।
चयन के बाद एक साल की Judicial Academy Training
नई व्यवस्था में चयनित उम्मीदवारों के लिए संबंधित राज्य की Judicial Academy में एक साल की गहन ट्रेनिंग अनिवार्य होगी। इस दौरान उम्मीदवार न्यायिक कामकाज, कोर्ट की प्रक्रिया और न्यायिक अधिकारी की जिम्मेदारियों से जुड़ी व्यावहारिक जानकारी हासिल करेंगे।
संक्रमण अवधि में चुने गए उम्मीदवारों के लिए भी यही व्यवस्था लागू होगी। कोर्ट ने स्पष्ट किया है कि उन्हें पहले एक साल की न्यायिक अकादमी ट्रेनिंग पूरी करनी होगी और उसके बाद संरचित लॉ क्लर्कशिप करनी होगी।
इसके बाद एक साल की Law Clerkship
अकादमी ट्रेनिंग पूरी होने के बाद उम्मीदवारों को एक साल की structured Law Clerkship करनी होगी। इसे दो हिस्सों में बांटा गया है।
पहले छह महीने उम्मीदवार Principal District Judge, District and Sessions Judge या Higher Judicial Service के किसी सदस्य की निगरानी में काम करेंगे। अगले छह महीने उन्हें संबंधित हाईकोर्ट के किसी मौजूदा जज के साथ क्लर्कशिप करनी होगी।
इस दौरान उम्मीदवारों को कोर्ट की कार्यवाही, केस की तैयारी, कानूनी दलीलों का विश्लेषण, प्रक्रिया संबंधी कानून और न्यायिक आदेश तैयार करने की प्रक्रिया को करीब से समझने का मौका मिलेगा।
सुप्रीम कोर्ट ने यह भी व्यवस्था की है कि इस क्लर्कशिप के अंत में संबंधित हाईकोर्ट जज उम्मीदवार के प्रदर्शन और न्यायिक पद के लिए उसकी उपयुक्तता पर एक कारण सहित मूल्यांकन रिपोर्ट देंगे। संतोषजनक मूल्यांकन के बाद ही उम्मीदवार नियमित न्यायिक पद पर नियुक्त होगा।
2025 में क्या फैसला हुआ था?
यह बदलाव सुप्रीम कोर्ट के 20 मई 2025 के उस फैसले की समीक्षा के बाद आया है, जिसमें सिविल जज (जूनियर डिवीजन) की सीधी भर्ती के लिए तीन साल की बार प्रैक्टिस अनिवार्य की गई थी।
2025 के फैसले में अदालत ने लंबे समय से हटाई गई प्रैक्टिस की शर्त को फिर लागू किया था। इस फैसले के बाद कानून स्नातकों, खासकर नए ग्रेजुएट्स और न्यायिक सेवा परीक्षा की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के बीच चिंता बढ़ी थी। समीक्षा याचिकाओं में यह भी दलील दी गई कि अचानक तीन साल की शर्त लागू करने से उन युवाओं को नुकसान हो सकता है, जिन्होंने पहले से लागू नियमों को ध्यान में रखकर अपनी पढ़ाई और करियर की योजना बनाई थी।
सुप्रीम कोर्ट ने अब तीन साल की शर्त को पूरी तरह वापस लेने के बजाय उसका ढांचा बदल दिया है।
कोर्ट ने तीन साल की प्रैक्टिस क्यों घटाई?
बहुमत के फैसले में कहा गया कि अदालत में काम करने का अनुभव जरूरी है, लेकिन केवल बार में बिताया गया समय ही अच्छे न्यायिक अधिकारी तैयार करने का एकमात्र तरीका नहीं है। कोर्ट ने माना कि वकालत का अनुभव उम्मीदवार के चैंबर, अदालत, मामलों में मिलने वाले अवसर, मार्गदर्शक और आर्थिक स्थिति जैसे कई कारकों पर निर्भर करता है।
इसी आधार पर अदालत ने बार प्रैक्टिस की अवधि को कम करते हुए चयन के बाद व्यवस्थित प्रशिक्षण और क्लर्कशिप को व्यवस्था का हिस्सा बनाया है।
हालांकि, पीठ के सदस्य जस्टिस के. विनोद चंद्रन ने बहुमत के इस फैसले से असहमति जताई। उन्होंने तीन साल की प्रैक्टिस की शर्त को कम करने के फैसले से सहमति नहीं जताई।
नए कानून स्नातकों के लिए क्या बदलेगा?
इस फैसले से उन कानून स्नातकों के लिए न्यायिक सेवा परीक्षा का रास्ता आसान होगा, जो लंबे समय तक बार में प्रैक्टिस करने के बजाय जल्द न्यायिक सेवा में जाना चाहते हैं। 1 अप्रैल 2027 के बाद जारी होने वाली भर्तियों में उन्हें परीक्षा के लिए आवेदन करने से पहले एक साल की वास्तविक वकालत करनी होगी।
दूसरी ओर, चयन के बाद दो साल की संस्थागत ट्रेनिंग और क्लर्कशिप पूरी करनी होगी। यानी कोर्ट ने व्यावहारिक अनुभव की जरूरत को खत्म नहीं किया, बल्कि उसके एक हिस्से को चयन के बाद होने वाली व्यवस्थित ट्रेनिंग से जोड़ दिया है।
यह योजना फिलहाल स्थायी रूप से अपरिवर्तनीय नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा है कि व्यवस्था के प्रभाव का आकलन करने के बाद इसे आगे फिर से देखा जा सकता है। अदालत ने मौजूदा योजना को पांच साल तक लागू रखने और उसके बाद अनुभव तथा अन्य आंकड़ों के आधार पर समीक्षा की संभावना रखी है।
उम्मीदवारों के लिए सबसे जरूरी बात
20 मई 2025 से 31 मार्च 2027 तक जारी भर्ती अधिसूचना: पहले से तीन साल की प्रैक्टिस जरूरी नहीं।
1 अप्रैल 2027 या उसके बाद जारी भर्ती अधिसूचना: परीक्षा में बैठने के लिए कम से कम एक साल की वास्तविक और प्रमाणित बार प्रैक्टिस जरूरी।
चयन के बाद: एक साल Judicial Academy Training + एक साल Structured Law Clerkship।
इस फैसले से न्यायिक सेवा की तैयारी कर रहे कानून स्नातकों के लिए पात्रता का रास्ता जरूर बदला है, लेकिन चयन के बाद व्यावहारिक प्रशिक्षण की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। इसलिए अब उम्मीदवारों को केवल परीक्षा की तैयारी पर नहीं, बल्कि अदालत की वास्तविक कार्यप्रणाली और पेशेवर कौशल पर भी ध्यान देना होगा।




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