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Justice Prasanna B. Varale Raises Concern Over Maharashtra Education Budget and Closure of Marathi-Medium Schools

सरकारी स्कूलों की हालत पर सुप्रीम कोर्ट जज ने जताई चिंता, कहा- कुंभ के 0.1% बजट से बच सकते थे सैकड़ों स्कूल

Justice Prasanna B. Varale Raises Concern Over Maharashtra Education Budget and Closure of Marathi-Medium Schools

सुप्रीम कोर्ट के न्यायमूर्ति प्रसन्ना बी. वराले ने महाराष्ट्र में शिक्षा के लिए बजट और सरकारी स्कूलों की स्थिति पर चिंता जताई है। उन्होंने कहा कि राज्य में बढ़ती शैक्षणिक जरूरतों के बावजूद शिक्षा पर खर्च पर्याप्त तेजी से नहीं बढ़ रहा है। इसके साथ ही उन्होंने बंद हो रहे मराठी माध्यम के स्कूलों और नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ जैसे बड़े आयोजनों तथा बुनियादी ढांचा परियोजनाओं के लिए किए जा रहे बड़े खर्च का उदाहरण दिया।

न्यायमूर्ति वराले ने यह बात महाराष्ट्र के धुले जिले में एक हाई स्कूल में आयोजित कार्यक्रम के दौरान कही। वह स्कूल उनके लिए खास है, क्योंकि उन्होंने अपने शुरुआती स्कूली वर्षों का एक हिस्सा वहीं पढ़ते हुए बिताया था। कार्यक्रम में उन्होंने स्मार्ट क्लासरूम का उद्घाटन किया।

कुंभ के बजट और स्कूलों के खर्च का दिया उदाहरण

अपने संबोधन में न्यायमूर्ति वराले ने नासिक-त्र्यंबकेश्वर सिंहस्थ कुंभ मेले और दूसरी बड़ी परियोजनाओं के लिए प्रस्तावित सरकारी खर्च का जिक्र किया। उन्होंने कहा कि उन्हें विकास परियोजनाओं पर हजारों करोड़ रुपये खर्च किए जाने से आपत्ति नहीं है, लेकिन स्कूलों की बुनियादी जरूरतों पर भी उतना ही ध्यान दिया जाना चाहिए।

उन्होंने बताया कि कुंभ मेले के लिए सरकार की ओर से ₹32,000 करोड़ से ₹34,000 करोड़ तक के आंकड़े बताए गए हैं। इसके अलावा एक कॉरिडोर परियोजना के लिए करीब ₹11,000 करोड़ के आवंटन का भी उन्होंने जिक्र किया।

न्यायमूर्ति वराले ने कहा कि अगर कुंभ के लिए बताए गए करीब ₹32,000 करोड़ के बजट का केवल 0.1 फीसदी यानी करीब ₹32 करोड़ शिक्षा पर खर्च किया जाता, तो राज्य के 100 से 125 मराठी माध्यम के स्कूलों को बंद होने से बचाया जा सकता था। यह उनका खर्च की प्राथमिकताओं को लेकर उठाया गया सवाल था।

हालांकि, महाराष्ट्र सरकार की ओर से कुंभ के लिए अलग-अलग परियोजनाओं और सुविधाओं पर स्वीकृत राशि के आंकड़े अलग हो सकते हैं। उदाहरण के लिए, मार्च 2026 में राज्य सरकार ने केंद्र को ₹22,425.39 करोड़ की व्यापक कुंभ विकास योजना के मंजूर होने की जानकारी दी थी। इसलिए ₹32,000 करोड़ और ₹34,000 करोड़ के आंकड़ों को न्यायमूर्ति वराले द्वारा अपने भाषण में बताए गए आंकड़ों के रूप में देखना उचित है, न कि एक ही आधिकारिक बजट राशि के रूप में।

महाराष्ट्र में मराठी माध्यम के स्कूलों को लेकर चिंता

न्यायमूर्ति वराले ने राज्य में बंद हो रहे मराठी माध्यम के स्कूलों को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि शिक्षा के लिए पर्याप्त संसाधन उपलब्ध होने से स्कूलों की बुनियादी सुविधाओं में सुधार किया जा सकता है और बच्चों को बेहतर माहौल दिया जा सकता है।

उन्होंने ग्रामीण और आवासीय स्कूलों की स्थिति का भी जिक्र किया। रिपोर्ट के अनुसार, उन्होंने एक आश्रमशाला में फर्श पर सोने के लिए मजबूर तीन छात्राओं की सांप के काटने से मौत की घटना का उल्लेख करते हुए ऐसी संस्थाओं की सुविधाओं पर चिंता जताई।

शिक्षा बजट बढ़ाने और स्कूलों को आधुनिक बनाने पर जोर

न्यायमूर्ति वराले ने कहा कि छात्रों की संख्या और शिक्षा की जरूरतें बढ़ रही हैं, लेकिन शिक्षा के लिए बजट में उसी अनुपात में बढ़ोतरी नहीं हो रही है। उन्होंने स्कूलों में बेहतर ढांचागत सुविधाएं उपलब्ध कराने की जरूरत पर जोर दिया।

उन्होंने आधुनिक स्कूलों के लिए डिजिटल स्क्रीन, कंप्यूटर की शुरुआती शिक्षा, इंटरैक्टिव क्लासरूम और आधुनिक लैब जैसी सुविधाओं को जरूरी बताया। उनका कहना था कि प्राथमिक और माध्यमिक स्तर पर बेहतर सुविधाएं उपलब्ध कराना गुणवत्तापूर्ण शिक्षा के लिए महत्वपूर्ण है।

मराठी माध्यम से पढ़ाई को लेकर क्या बोले जस्टिस वराले?

न्यायमूर्ति वराले ने अपने स्कूली अनुभव का भी उल्लेख किया। उन्होंने बताया कि उन्होंने 10वीं कक्षा तक नगरपालिका और जिला परिषद के मराठी माध्यम के स्कूलों में पढ़ाई की। उनके अनुसार, क्षेत्रीय भाषा में पढ़ाई ने उनके करियर में कोई रुकावट नहीं डाली, बल्कि उनके नजरिए को व्यापक बनाने में मदद की।

उनकी यह टिप्पणी ऐसे समय आई है जब महाराष्ट्र में सरकारी और स्थानीय निकायों द्वारा संचालित मराठी माध्यम के स्कूलों की संख्या और उनकी स्थिति को लेकर बहस जारी है। ऐसे में उनके बयान ने शिक्षा के लिए सरकारी खर्च की प्राथमिकताओं और क्षेत्रीय भाषा में शिक्षा की जरूरत पर फिर से ध्यान खींचा है।

क्यों महत्वपूर्ण है जस्टिस वराले का बयान?

न्यायमूर्ति वराले का बयान केवल स्कूल बंद होने के मुद्दे तक सीमित नहीं है। इसमें शिक्षा के लिए बजट, स्कूलों की बुनियादी सुविधाएं और बड़े सरकारी आयोजनों तथा विकास परियोजनाओं पर खर्च के बीच संतुलन का सवाल भी उठता है।

कुंभ जैसे बड़े आयोजन और कॉरिडोर जैसी परियोजनाएं बुनियादी ढांचे और अर्थव्यवस्था के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकती हैं, लेकिन स्कूलों में पर्याप्त कमरे, डिजिटल सुविधाएं, प्रयोगशालाएं और सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराना भी सरकार की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है। यही संतुलन न्यायमूर्ति वराले के संबोधन का मुख्य मुद्दा रहा।

 

Asmita Sarkar

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