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Engineering Education in the AI Era: Why Strong Fundamentals Must Go Hand in Hand with Emerging Technologies

AI के दौर में इंजीनियरिंग शिक्षा: मजबूत बुनियाद के साथ नई तकनीकों को अपनाना जरूरी

Engineering Education in the AI Era: Why Strong Fundamentals Must Go Hand in Hand with Emerging Technologies

इंजीनियरिंग शिक्षा अपने इतिहास के सबसे बड़े बदलावों में से एक से गुजर रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI), सेमीकंडक्टर, एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग, क्वांटम टेक्नोलॉजी, क्लीन एनर्जी और डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर तेजी से उद्योगों का स्वरूप बदल रहे हैं। भारत में भी इन क्षेत्रों पर काम अब केवल नीतियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका असर जमीन पर दिखाई देने लगा है। IndiaAI Mission के तहत कॉमन कंप्यूट सुविधा में 38,000 से अधिक GPU जोड़े जा चुके हैं, जिन्हें स्टार्टअप और शोधकर्ताओं को बाजार दरों के मुकाबले काफी कम कीमत पर उपलब्ध कराया जा रहा है। 2026 के अंत तक 1 लाख GPU का लक्ष्य रखा गया है।

नेशनल क्वांटम मिशन के तहत अमरावती क्वांटम वैली फरवरी 2026 में शुरू हुई, जहां देश का सबसे बड़ा IBM Quantum System स्थापित किया गया है। वहीं, सेमीकंडक्टर मिशन भी उत्पादन के चरण में पहुंच चुका है। सैनंद स्थित Micron की सुविधा से कमर्शियल मेमोरी मॉड्यूल की शिपमेंट शुरू हो गई है, जबकि धोलेरा में Tata Electronics-PSMC फैब इस साल के अंत में पहला सिलिकॉन तैयार करने का लक्ष्य लेकर चल रहा है।

इस बदलाव के साथ इंजीनियरिंग संस्थानों की जिम्मेदारी भी बढ़ गई है। अब उनका काम केवल तकनीकी रूप से सक्षम छात्रों को तैयार करना नहीं है। संस्थानों को ऐसे इनोवेटर, उद्यमी, जिम्मेदार लीडर और समस्या का समाधान खोजने वाले इंजीनियर तैयार करने होंगे, जो देश और दुनिया की बढ़ती जटिल चुनौतियों से निपट सकें।

इंजीनियरिंग की मजबूत बुनियाद से समझौता नहीं

नई तकनीकों को अपनाना जरूरी है, लेकिन इंजीनियरिंग की मजबूत बुनियादी समझ का महत्व कभी कम नहीं हो सकता। AI डिजाइन प्रक्रिया को तेज कर सकता है, विश्लेषण को ऑटोमेट कर सकता है और सिस्टम को बेहतर बना सकता है, लेकिन यह गणित, भौतिक विज्ञान, मटेरियल साइंस, थर्मोडायनामिक्स और इंजीनियरिंग के मूल सिद्धांतों की गहरी समझ की जगह नहीं ले सकता।

जिन इंजीनियरों की समझ मूल सिद्धांतों पर मजबूत होगी, वे तकनीक में होने वाले बदलावों के साथ खुद को ज्यादा आसानी से ढाल पाएंगे। केवल उस समय इस्तेमाल होने वाले टूल्स पर निर्भर रहने वाले छात्रों के लिए बदलती तकनीक के साथ आगे बढ़ना मुश्किल हो सकता है।

इसलिए सवाल यह नहीं है कि इंजीनियरिंग शिक्षा में बुनियादी ज्ञान रखा जाए या नई तकनीक अपनाई जाए। असली जरूरत दोनों को सही तरीके से जोड़ने की है। AI, डेटा साइंस, रोबोटिक्स, डिजिटल ट्विन और कंप्यूटेशनल इंटेलिजेंस जैसे विषयों को इंजीनियरिंग शिक्षा का हिस्सा बनाकर छात्रों को ज्यादा जटिल और अलग-अलग क्षेत्रों से जुड़ी समस्याओं को हल करने के लिए तैयार किया जा सकता है। IIT Roorkee में भी AI आधारित शिक्षण, प्रैक्टिकल लर्निंग और अलग-अलग विषयों को जोड़ने वाली शिक्षा पर काम किया जा रहा है, जबकि संस्थान की वैज्ञानिक और शैक्षणिक मजबूती को बनाए रखने पर जोर है।

रिसर्च को डीप-टेक इनोवेशन में बदलना जरूरी

इनोवेशन को शिक्षा का स्वाभाविक हिस्सा बनाना होगा। भारत ने रिसर्च के क्षेत्र में काफी प्रगति की है, लेकिन अगली बड़ी चुनौती रिसर्च को ऐसी तकनीकों में बदलने की है, जिनसे आर्थिक और सामाजिक लाभ पैदा हो सके।

इस दिशा में राष्ट्रीय स्तर पर निवेश भी बढ़ा है। Anusandhan National Research Foundation के लिए पांच साल में 50,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है। इसके तहत राज्य विश्वविद्यालयों में रिसर्च के लिए Prime Minister Professorships शुरू की गई हैं और Advanced Research Grant में बदलाव किया गया है। यह संस्था 2025 के अंत में घोषित 1 लाख करोड़ रुपये की Research, Development and Innovation Scheme को लागू करने वाली प्रमुख व्यवस्था भी है।

अब रिसर्च का लक्ष्य केवल रिसर्च पेपर प्रकाशित करना नहीं होना चाहिए। इसे प्रोटोटाइप, पेटेंट, टेक्नोलॉजी ट्रांसफर और डीप-टेक स्टार्टअप तक पहुंचाना जरूरी है। इसके लिए मजबूत इन्क्यूबेशन सिस्टम, अलग-अलग विषयों पर साथ काम करने वाले रिसर्च सेंटर, उद्योगों के साथ साझेदारी और टेक्नोलॉजी लाइसेंसिंग की व्यवस्था जरूरी होगी।

IIT Roorkee में Technology Incubation and Entrepreneurship Development Society (TIDES), Technology Innovation Hub और मजबूत इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी सिस्टम के जरिए छात्रों और शिक्षकों को रिसर्च को उपयोगी तकनीकों में बदलने का अवसर दिया जा रहा है। TIDES में शुरुआती स्तर के SAKSHI और NEENV प्रोग्राम से लेकर TIDES Ignition Programme तक सहायता उपलब्ध है। इसके अलावा BIRAC के सहयोग से बायो-इन्क्यूबेशन सुविधा भी संचालित की जा रही है।

जलवायु बदलाव से निपटने के लिए इंजीनियर तैयार करना जरूरी

जलवायु परिवर्तन अब केवल पर्यावरण से जुड़ा मुद्दा नहीं है। यह पानी की सुरक्षा, मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर, टिकाऊ ऊर्जा, आपदा प्रबंधन, परिवहन, कृषि और शहरी विकास से जुड़ी बड़ी इंजीनियरिंग चुनौती बन चुका है।

भारत के National Green Hydrogen Mission से इस क्षेत्र की संभावनाओं और चुनौती दोनों का अंदाजा लगाया जा सकता है। 2030 तक हर साल 50 लाख टन ग्रीन हाइड्रोजन उत्पादन का लक्ष्य है। 2026 की शुरुआत तक करीब 8,000 टन उत्पादन क्षमता शुरू हो पाई थी। वहीं 3,000 MW इलेक्ट्रोलाइजर क्षमता आवंटित की जा चुकी है और स्टील, पोर्ट और परिवहन क्षेत्रों में पायलट प्रोजेक्ट शुरू किए गए हैं।

ऐसे में इंजीनियरिंग छात्रों को टिकाऊ समाधान तैयार करने के लिए तैयार करना जरूरी है। सर्कुलर इकोनॉमी, रिन्यूएबल एनर्जी, संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल, ग्रीन मैन्युफैक्चरिंग, जलवायु के अनुसार बदलाव और मजबूत इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे विषयों को अलग-अलग इंजीनियरिंग पाठ्यक्रमों का हिस्सा बनाना होगा।

इसके साथ सिस्टम के स्तर पर सोचने की क्षमता भी जरूरी है। जलवायु जैसी जटिल समस्याओं का समाधान किसी एक विषय से नहीं हो सकता। भविष्य के इंजीनियरों को वैज्ञानिकों, अर्थशास्त्रियों, नीति निर्माताओं, सामाजिक विज्ञान के विशेषज्ञों और उद्योगों के साथ मिलकर काम करना होगा। IIT Roorkee में सस्टेनेबल एनर्जी, हाइड्रोजन टेक्नोलॉजी, आपदा प्रबंधन, जल संसाधन और जलवायु के अनुसार इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे क्षेत्रों पर बढ़ता ध्यान इसी जरूरत को दिखाता है।

इंडस्ट्री और संस्थानों के बीच साझेदारी और मजबूत करनी होगी

पिछले कुछ वर्षों में उद्योग और शिक्षण संस्थानों के बीच साझेदारी का स्वरूप बदला है। अब कंपनियां विश्वविद्यालयों से केवल नौकरी के लिए छात्रों की भर्ती नहीं करतीं, बल्कि रिसर्च, इनोवेशन, प्रोडक्ट डेवलपमेंट और नई तकनीक तैयार करने में भी साझेदारी कर रही हैं।

इसके बावजूद रिसर्च लैब से निकलने वाली तकनीक को उद्योग तक पहुंचाने के बीच अभी भी दूरी है। इसे कम करने के लिए लंबे समय के संयुक्त रिसर्च प्रोग्राम, जॉइंट इनोवेशन सेंटर, इंडस्ट्री फेलोशिप, शिक्षकों के लिए इंडस्ट्री में काम करने के अवसर और मिलकर तैयार किए गए पाठ्यक्रम मददगार हो सकते हैं।

उद्योगों की भागीदारी रिसर्च के शुरुआती चरण से ही होनी चाहिए, ताकि तैयार की जा रही तकनीक में शुरुआत से ही बड़े स्तर पर इस्तेमाल और बाजार की जरूरतों को ध्यान में रखा जा सके। छात्रों के लिए भी इंटर्नशिप, वास्तविक इंडस्ट्री प्रोजेक्ट और संयुक्त रिसर्च काफी उपयोगी हैं। इससे उन्हें इंजीनियरिंग की वास्तविक चुनौतियों को समझने का मौका मिलता है।

सेमीकंडक्टर सेक्टर के लिए कुशल इंजीनियर जरूरी

सेमीकंडक्टर, इलेक्ट्रॉनिक्स मैन्युफैक्चरिंग, AI, क्वांटम टेक्नोलॉजी, एडवांस्ड मटेरियल और रणनीतिक मैन्युफैक्चरिंग में भारत की बढ़ती महत्वाकांक्षाओं से इंजीनियरों के लिए नए अवसर पैदा हुए हैं।

Union Budget 2026-27 में Semiconductor Mission के लिए 8,000 करोड़ रुपये का प्रावधान किया गया है और Semiconductor Mission 2.0 शुरू किया गया है। इसमें उपकरण और मटेरियल मैन्युफैक्चरिंग, एडवांस्ड चिप डिजाइन और देश में विकसित बौद्धिक संपदा पर ज्यादा ध्यान दिया गया है। सात राज्यों में फैब, OSAT और ATMP यूनिट तथा कंपाउंड-सेमीकंडक्टर से जुड़ी परियोजनाओं सहित एक दर्जन से अधिक परियोजनाओं को मंजूरी मिल चुकी है।

इस गति को बनाए रखने के लिए एडवांस्ड लैब, रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर, शिक्षकों की ट्रेनिंग और अलग-अलग विषयों को जोड़ने वाली शिक्षा में लगातार निवेश करना होगा। इंजीनियरिंग संस्थानों को पाठ्यक्रम में समय के अनुसार बदलाव करते हुए डिजाइन प्रोजेक्ट, सिमुलेशन प्लेटफॉर्म, रिसर्च और इनोवेशन आधारित शिक्षा पर जोर देना होगा।

छात्रों को प्रयोग करने, नए विचार आजमाने और असफल होने से सीखने का अवसर भी मिलना चाहिए। जिज्ञासा और उद्यमिता की यही संस्कृति आने वाली पीढ़ी के इंजीनियरिंग लीडर्स को तैयार करेगी। IIT Roorkee में सेमीकंडक्टर टेक्नोलॉजी, साइबर-फिजिकल सिस्टम, क्लीन एनर्जी और एडवांस्ड मैन्युफैक्चरिंग पर बढ़ता काम इसी दिशा में एक उदाहरण है।

परीक्षा की पारदर्शिता और छात्रों की भलाई भी जरूरी

इंजीनियरिंग शिक्षा के केंद्र में छात्रों को रखना जरूरी है। अच्छी पढ़ाई को छात्रों की भलाई, ईमानदारी और समान अवसर से अलग नहीं किया जा सकता। संस्थानों को ऐसा माहौल तैयार करना होगा, जहां छात्र खुद को सुरक्षित और सम्मानित महसूस करें और बिना डर अपनी जिज्ञासा को आगे बढ़ा सकें।

परीक्षा और मूल्यांकन में पारदर्शिता, छात्रों के लिए सही मार्गदर्शन, मानसिक स्वास्थ्य सहायता, नैतिक आचरण, पढ़ाई के लचीले विकल्प और शिक्षकों तथा छात्रों के बीच बेहतर संवाद जरूरी हैं। इससे केवल अच्छे इंजीनियर ही नहीं, बल्कि जिम्मेदार नागरिक भी तैयार होंगे।

इंजीनियरिंग शिक्षा का मूल उद्देश्य हमेशा समाज की बड़ी समस्याओं का समाधान तलाशना रहा है। यह उद्देश्य आज भी वही है, लेकिन समस्याओं का स्तर और जटिलता काफी बढ़ गई है। भारत के भविष्य को आकार देने वाले इंजीनियरों में तकनीकी क्षमता के साथ रचनात्मक सोच, बदलाव के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता, नैतिक जिम्मेदारी, अलग-अलग क्षेत्रों को जोड़कर सोचने की समझ और टिकाऊ विकास के प्रति प्रतिबद्धता भी होनी चाहिए।

भारत के वैश्विक ज्ञान और इनोवेशन इकोनॉमी बनने की दिशा में आगे बढ़ने और विकसित भारत 2047 के लक्ष्य को हासिल करने में इंजीनियरिंग संस्थानों की बड़ी भूमिका होगी। इसके लिए मजबूत शैक्षणिक बुनियाद के साथ इनोवेशन, उद्यमिता, उद्योगों के साथ साझेदारी, टिकाऊ विकास और समाज से जुड़ाव को शिक्षा का हिस्सा बनाना होगा।

IIT Roorkee का मानना है कि इसी संतुलन के जरिए ऐसे इंजीनियर तैयार किए जा सकते हैं, जो केवल नई तकनीक बनाने वाले न हों, बल्कि भारत के लिए ज्यादा मजबूत, समावेशी और समृद्ध भविष्य की नींव भी रख सकें।

 

Asmita Sarkar

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