
बच्चों और किशोरों को सोशल मीडिया के संभावित नुकसान से बचाने के लिए सिर्फ उम्र की सीमा तय करना या रोजाना स्क्रीन टाइम कम करना काफी नहीं हो सकता। असली सवाल यह है कि सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म बच्चों को किस तरह का कंटेंट बार-बार दिखाते हैं और उनके एल्गोरिदम उन्हें उसी तरह की सामग्री की ओर क्यों खींचते हैं।
Meta के हालिया समझौते के बाद यह बहस एक बार फिर तेज हो गई है। कंपनी ने अमेरिका के राज्यों के साथ हुए समझौते के तहत बच्चों और किशोरों की ऑनलाइन सुरक्षा के लिए कई बदलावों पर सहमति दी है। इनमें 18 साल से कम उम्र के Facebook और Instagram यूजर्स के लिए डिफॉल्ट रूप से रोजाना दो घंटे की सीमा और रात 12 बजे से सुबह 6 बजे तक ऐप के इस्तेमाल पर रोक जैसे कदम शामिल हैं। समझौते की कुल राशि 10 वर्षों में 18 अरब डॉलर तक हो सकती है।
हालांकि, विशेषज्ञों का सवाल है कि क्या इन कदमों से बच्चों पर सोशल मीडिया के मानसिक स्वास्थ्य संबंधी असर की मूल समस्या दूर होगी। Nature की रिपोर्ट में विशेषज्ञों ने इस बात पर जोर दिया है कि बच्चों को मिलने वाले कंटेंट को तय करने वाले एल्गोरिदम पर भी गंभीरता से ध्यान देने की जरूरत है। Meta के समझौते में किशोरों के लिए कुछ गैर-एल्गोरिदमिक विकल्प दिए जाने की व्यवस्था है, लेकिन कई अहम सुरक्षा सेटिंग्स और कंटेंट सिस्टम के संचालन को लेकर बहस अभी जारी है।
सिर्फ स्क्रीन टाइम कम करने से समस्या खत्म होगी?
बच्चों के सोशल मीडिया इस्तेमाल का समय सीमित करना एक जरूरी कदम हो सकता है, लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि बच्चे उस समय में क्या देख रहे हैं। अगर कम समय में भी किसी किशोर को लगातार तनाव, शरीर की बनावट को लेकर असुरक्षा, हिंसा, आत्महत्या या दूसरे नुकसानदायक विषयों से जुड़ा कंटेंट दिखाया जाता है, तो केवल स्क्रीन टाइम कम करने से समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी।
यही वजह है कि विशेषज्ञ प्लेटफॉर्म के Recommendation Algorithms की भूमिका पर सवाल उठा रहे हैं। ये सिस्टम यूजर की पिछली गतिविधियों के आधार पर यह तय करते हैं कि आगे उसे किस तरह का कंटेंट दिखाया जाए। चिंता यह है कि अगर कोई कंटेंट ज्यादा देर तक यूजर को प्लेटफॉर्म पर बनाए रखता है, तो उसे बार-बार दिखाए जाने की संभावना बढ़ सकती है।
Meta के नए समझौते में बच्चों की सुरक्षा से जुड़े कई बदलाव शामिल हैं। इनमें रात के समय ऐप एक्सेस पर रोक, स्कूल के समय नोटिफिकेशन को सीमित करना, उम्र की पहचान के लिए तकनीक में सुधार और कुछ हानिकारक कंटेंट पर अतिरिक्त नियंत्रण जैसे कदम शामिल हैं।
उम्र की पाबंदी भी पूरी तरह कारगर नहीं
सोशल मीडिया से बच्चों को दूर रखने के लिए उम्र की सीमा लागू करना भी आसान नहीं है। ऑस्ट्रेलिया इसका बड़ा उदाहरण है। वहां 10 दिसंबर 2025 से 16 साल से कम उम्र के बच्चों को कई प्रमुख सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर अकाउंट रखने से रोकने के लिए नियम लागू हुए। Facebook, Instagram, TikTok, Snapchat, YouTube और X समेत कई प्लेटफॉर्म को ऐसे यूजर्स को रोकने के लिए उचित कदम उठाने हैं।
शुरुआती आंकड़ों में बदलाव जरूर दिखा है। ऑस्ट्रेलिया के eSafety Commissioner के अनुसार, नियम लागू होने के करीब तीन महीने बाद 16 साल से कम उम्र के बच्चों में सोशल मीडिया अकाउंट रखने का अनुपात 52.4 प्रतिशत से घटकर 42.1 प्रतिशत हो गया। हालांकि, बड़ी संख्या में बच्चों के पास अब भी ऐसे अकाउंट बने हुए थे।
जनवरी-फरवरी 2026 में 898 अभिभावकों और देखभाल करने वालों के सर्वे में भी पाया गया कि प्रतिबंध के बावजूद कुछ बच्चों के पास उम्र-प्रतिबंधित प्लेटफॉर्म पर अकाउंट बने हुए थे। eSafety के अनुसार, कई मामलों में बच्चों से अब तक उम्र की पुष्टि नहीं मांगी गई थी।
इससे साफ है कि केवल उम्र की सीमा तय कर देना पर्याप्त नहीं है। प्लेटफॉर्म के लिए यह पहचानना भी जरूरी है कि यूजर वास्तव में कितनी उम्र का है और वह उम्र की जांच से बचने के लिए गलत जानकारी तो नहीं दे रहा।
ब्यूटी फिल्टर पर रोक से कितना फायदा?
Meta ने किशोरों के लिए कुछ ऐसे ब्यूटी और मेकअप फिल्टर पर भी रोक लगाने की व्यवस्था की है, जो चेहरे या रूप-रंग में बहुत ज्यादा बदलाव करते हैं। इसका उद्देश्य बच्चों पर पड़ने वाले रूप-रंग संबंधी दबाव को कम करना है।
लेकिन विशेषज्ञों के मुताबिक चुनौती इससे बड़ी है। बच्चे केवल अपने चेहरे पर फिल्टर लगाकर फोटो या वीडियो नहीं देखते, बल्कि दूसरे लोगों का ऐसा कंटेंट भी देखते हैं। सोशल मीडिया पर लगातार एक खास तरह के चेहरे, शरीर और सुंदरता के मानक देखने से किशोरों में अपने रूप-रंग को लेकर असंतोष बढ़ सकता है।
इसलिए सिर्फ फिल्टर हटाना इस समस्या का पूरा समाधान नहीं माना जा सकता। जरूरी यह भी है कि प्लेटफॉर्म बच्चों को किस तरह का कंटेंट सुझा रहे हैं और किस तरह की सामग्री उनके सामने बार-बार आ रही है।
असली सवाल सोशल मीडिया के कारोबारी मॉडल पर
विशेषज्ञों की चिंता का सबसे बड़ा हिस्सा सोशल मीडिया के Business Model से जुड़ा है। इन प्लेटफॉर्म की कमाई काफी हद तक यूजर के समय, गतिविधि और Engagement से जुड़ी होती है। यूजर जितना ज्यादा समय प्लेटफॉर्म पर बिताता है, उतने अधिक विज्ञापन दिखाए जा सकते हैं और कमाई बढ़ सकती है।
इसी वजह से आलोचकों का सवाल है कि क्या बच्चों की सुरक्षा और यूजर Engagement बढ़ाने के कारोबारी लक्ष्य हमेशा एक-दूसरे के साथ आसानी से चल सकते हैं।
बाल सुरक्षा विशेषज्ञ और शोधकर्ता इसलिए एल्गोरिदम में ज्यादा पारदर्शिता, स्वतंत्र सुरक्षा जांच और बच्चों के लिए सुरक्षित सेटिंग को डिफॉल्ट बनाने की मांग कर रहे हैं। उनका मानना है कि कंपनियों को सिर्फ यह नहीं बताना चाहिए कि उन्होंने बच्चों का स्क्रीन टाइम कितना कम किया, बल्कि यह भी स्पष्ट करना चाहिए कि बच्चे उस समय में क्या देख रहे हैं और उन्हें वह कंटेंट क्यों दिखाया जा रहा है।
आगे की राह क्या हो सकती है?
Meta का समझौता बच्चों की ऑनलाइन सुरक्षा को लेकर एक बड़ा कदम है, लेकिन इससे बहस खत्म नहीं हुई है। विशेषज्ञों के अनुसार, बच्चों को सुरक्षित रखने के लिए उम्र की जांच, स्क्रीन टाइम सीमा, पैरेंटल कंट्रोल और रात के समय प्रतिबंध जैसे उपायों के साथ एल्गोरिदम की जवाबदेही पर भी ध्यान देना होगा।
ऑस्ट्रेलिया का अनुभव भी बताता है कि उम्र की पाबंदी से सोशल मीडिया अकाउंट की संख्या कम हो सकती है, लेकिन इसे लागू करना और उम्र की जांच को प्रभावी बनाना अलग चुनौती है।
इसलिए बच्चों की सोशल मीडिया सुरक्षा का सवाल केवल यह नहीं है कि वे कितनी देर ऑनलाइन रहते हैं, बल्कि यह भी है कि वे उस दौरान क्या देखते हैं, कौन-सा कंटेंट उन्हें बार-बार दिखाया जाता है और प्लेटफॉर्म उन्हें किस दिशा में ले जा रहा है। आने वाले समय में सोशल मीडिया कंपनियों के लिए यही सवाल सबसे बड़ी चुनौती बन सकता है।




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