
एंटीबायोटिक दवाओं के लगातार इस्तेमाल के बीच बैक्टीरिया में दवाओं के खिलाफ बढ़ता प्रतिरोध यानी एंटीमाइक्रोबियल रेजिस्टेंस (AMR) दुनिया के सामने एक बड़ी स्वास्थ्य चुनौती बन रहा है। इसी समस्या से निपटने के लिए भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान मद्रास (IIT Madras) के शोधकर्ताओं ने ऐसी सतह विकसित की है, जो रसायनों या एंटीबायोटिक दवाओं के इस्तेमाल के बिना बैक्टीरिया को भौतिक रूप से नष्ट कर सकती है।
यह शोध IIT Madras के मेटलर्जिकल एंड मैटेरियल्स इंजीनियरिंग विभाग से जुड़े प्रोफेसर परासुरामन स्वामीनाथन और उनकी टीम ने किया है। शोध में implant-grade और लचीले पॉलिमर polydimethylsiloxane (PDMS) की सतह पर बेहद छोटी नैनो संरचनाएं तैयार की गईं। इन संरचनाओं को ‘nanograss’ कहा गया है।
शोध के नतीजे प्रतिष्ठित सह-समीक्षित जर्नल ACS Applied Bio Materials में 3 जून 2026 को प्रकाशित हुए। शोधपत्र में बताया गया है कि nanograss वाली सतह बैक्टीरिया के संपर्क में आने पर उन पर इतना यांत्रिक दबाव डालती है कि उनकी कोशिका संरचना क्षतिग्रस्त हो जाती है और बैक्टीरिया नष्ट होने लगते हैं।
एंटीबायोटिक के बजाय सतह ही करेगी बैक्टीरिया पर हमला
आमतौर पर बैक्टीरिया से बचाव के लिए एंटीबायोटिक, कीटाणुनाशक या दूसरी रासायनिक antimicrobial सामग्री का इस्तेमाल किया जाता है। IIT Madras की इस तकनीक में तरीका अलग है। इसमें सतह पर मौजूद बेहद छोटे और घने नैनो उभार बैक्टीरिया के संपर्क में आने पर उन पर यांत्रिक दबाव डालते हैं।
शोधकर्ताओं के अनुसार, RIE प्रक्रिया से PDMS की सतह पर एक कठोर पॉलिमर परत बनती है। यह परत सतह की नैनो संरचनाओं को बैक्टीरिया तक यांत्रिक बल पहुंचाने में मदद करती है। शोध में बताया गया है कि बैक्टीरिया को नुकसान पहुंचाने के लिए nanograss संरचना की प्रोफाइल ऊंचाई का कम से कम करीब 5 नैनोमीटर होना महत्वपूर्ण है।
इसका महत्व इसलिए भी है क्योंकि यहां बैक्टीरिया को किसी दवा या रासायनिक पदार्थ से मारने के बजाय भौतिक तरीके से नष्ट करने की कोशिश की गई है। इस तरह की रणनीति बैक्टीरिया में पारंपरिक दवाओं के प्रति प्रतिरोध बढ़ने की समस्या से अलग तरीके से निपटने की संभावना दिखाती है।
कैसे तैयार की गई यह एंटीबैक्टीरियल सतह?
शोधकर्ताओं ने Reactive Ion Etching (RIE) नाम की कम दबाव वाली प्लाज्मा प्रक्रिया का इस्तेमाल किया। इस प्रक्रिया के जरिए PDMS की सतह पर अलग-अलग तरह की नैनो और माइक्रो संरचनाएं तैयार की गईं। इनमें nanograss संरचना ने सबसे प्रभावी जीवाणुनाशक क्षमता दिखाई।
खास बात यह है कि प्रक्रिया के दौरान सतह पर कोई अलग antimicrobial coating या बैक्टीरिया को मारने वाला रासायनिक एजेंट नहीं जोड़ा गया। प्लाज्मा प्रक्रिया ने खुद पॉलिमर की ऊपरी सतह के गुणों और उसकी संरचना को बदलकर ऐसी सतह तैयार की, जो बैक्टीरिया पर यांत्रिक प्रभाव डाल सके।
शोधकर्ताओं ने nanograss की इस जीवाणुनाशक क्षमता को प्रकृति से प्रेरित विचार से भी जोड़ा है। कुछ कीटों, खासकर dragonfly के पंखों पर मौजूद नैनो संरचनाओं के बारे में पहले के अध्ययनों ने दिखाया है कि उनकी सतह बैक्टीरिया को भौतिक रूप से नुकसान पहुंचा सकती है। IIT Madras की टीम ने इसी तरह के biomimetic approach से प्रेरणा लेकर पॉलिमर की सतह पर नैनो संरचनाएं तैयार की हैं।
तीन तरह के बैक्टीरिया पर किया गया परीक्षण
शोध के दौरान nanograss वाली सतहों का तीन अलग-अलग bacterial strains के खिलाफ परीक्षण किया गया। इनमें Gram-positive और Gram-negative दोनों प्रकार के बैक्टीरिया शामिल थे। परीक्षणों में nanograss सतह ने मजबूत bactericidal यानी बैक्टीरिया को मारने वाली गतिविधि दिखाई।
इसके अलावा, शोधकर्ताओं ने यह भी देखा कि सतह पर बनने वाले biofilm को रोकने में nanograss संरचना प्रभावी रही। अध्ययन के अनुसार, इसकी antibiofilm efficiency में कम से कम 68 प्रतिशत सुधार देखा गया। Biofilm बैक्टीरिया की वह परत होती है, जो किसी सतह पर चिपककर बन सकती है और कई बार बैक्टीरिया को बाहरी उपचारों से बचाने में मदद करती है।
मानव कोशिकाओं के लिए कितनी सुरक्षित है तकनीक?
किसी भी biomedical surface के लिए केवल बैक्टीरिया को मारना पर्याप्त नहीं है। यह भी जरूरी है कि वह मानव कोशिकाओं को नुकसान न पहुंचाए। इसी वजह से शोधकर्ताओं ने mammalian cells के साथ भी सतह की compatibility का अध्ययन किया।
अध्ययन में fibroblast cells के साथ परीक्षण किया गया। wrinkled PDMS सतह पर लगभग 91 प्रतिशत कोशिकाएं जीवित पाई गईं और कोशिकाओं ने सतह के साथ अच्छा जुड़ाव दिखाया। इससे संकेत मिलता है कि इस तरह की संरचनाओं में biomedical applications की संभावना है, हालांकि इनके वास्तविक चिकित्सा इस्तेमाल से पहले आगे के परीक्षण और मूल्यांकन जरूरी होंगे।
AMR के खिलाफ क्यों महत्वपूर्ण है यह शोध?
AMR तब होता है जब बैक्टीरिया दवाओं के असर के प्रति प्रतिरोधी हो जाते हैं और सामान्य उपचार उनके खिलाफ कम प्रभावी होने लगते हैं। ऐसे बैक्टीरिया को आम भाषा में कई बार ‘सुपरबग’ भी कहा जाता है।
IIT Madras की तकनीक का सबसे अहम पहलू यह है कि इसमें बैक्टीरिया को मारने के लिए किसी antibiotic या antimicrobial chemical पर निर्भरता नहीं है। इसके बजाय सतह की भौतिक संरचना को इस तरह तैयार किया गया है कि बैक्टीरिया के संपर्क में आते ही उनकी कोशिका संरचना पर यांत्रिक दबाव पड़े।
IIT Madras के शोधकर्ता अभिषेक कुमार ने इस काम को प्रकृति से प्रेरित दृष्टिकोण से जोड़ा है। उनके अनुसार, AMR बैक्टीरिया द्वारा दवाओं के खिलाफ प्रतिरोध विकसित करने की प्रक्रिया का हिस्सा है, जबकि प्रकृति में मौजूद कुछ नैनो संरचनाएं यह दिखाती हैं कि बैक्टीरिया को भौतिक तरीके से भी नुकसान पहुंचाया जा सकता है। टीम ने इसी विचार को ऐसी प्लाज्मा आधारित प्रक्रिया के साथ जोड़ा, जिसे पॉलिमर सतहों पर इस्तेमाल किया जा सकता है।
कैथेटर और दूसरी मेडिकल सतहों में हो सकता है इस्तेमाल
शोधकर्ताओं के अनुसार, यह तकनीक खास तौर पर ऐसी biomedical surfaces के लिए उपयोगी हो सकती है, जहां बैक्टीरियल contamination एक बड़ी समस्या होती है। अध्ययन में catheters और दूसरी biomedical surfaces को संभावित applications के रूप में बताया गया है।
हालांकि, अभी इसे व्यापक स्तर पर अस्पतालों या मरीजों में इस्तेमाल होने वाली तैयार चिकित्सा तकनीक के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए। वर्तमान शोध प्रयोगशाला स्तर पर विकसित और परीक्षण की गई सतह की क्षमता को दिखाता है। वास्तविक चिकित्सा उपयोग से पहले इसकी सुरक्षा, लंबे समय तक काम करने की क्षमता और अलग-अलग परिस्थितियों में प्रभावशीलता की आगे जांच जरूरी होगी।
फिर भी, एंटीबायोटिक प्रतिरोध की बढ़ती चुनौती के बीच बैक्टीरिया को दवा के बजाय सतह की भौतिक संरचना से नष्ट करने का यह तरीका biomedical research में एक महत्वपूर्ण दिशा दिखाता है। IIT Madras की टीम का काम यह संकेत देता है कि भविष्य में ऐसी implant-grade surfaces विकसित की जा सकती हैं, जो बैक्टीरियल संक्रमण और biofilm बनने के जोखिम को कम करने में मदद करें।




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