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West Bengal University Transfer Bill Sparks Controversy as JUTA Opposes Inter-University Staff Transfers

पश्चिम बंगाल में विश्वविद्यालय शिक्षकों के तबादले पर विवाद, JUTA ने प्रस्तावित विधेयक का किया विरोध

West Bengal University Transfer Bill Sparks Controversy as JUTA Opposes Inter-University Staff Transfers

पश्चिम बंगाल में एक विश्वविद्यालय से दूसरे विश्वविद्यालय में शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के तबादले की व्यवस्था लागू करने की राज्य सरकार की तैयारी को लेकर विवाद शुरू हो गया है। जादवपुर विश्वविद्यालय शिक्षक संघ (JUTA) ने प्रस्तावित कानून का विरोध करते हुए इसे विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा के लिए चिंता का विषय बताया है।

राज्य सरकार ने अंतर-विश्वविद्यालय तबादले के लिए कानूनी व्यवस्था बनाने की तैयारी की है। मुख्यमंत्री सुवेंदु अधिकारी ने 7 सितंबर को बताया कि ‘West Bengal Universities and Colleges Administration and Regulation (Amendment) Bill, 2026’ को विधानसभा में पेश किया जाएगा। इसके लिए 10 सितंबर को विधानसभा का एक दिवसीय विशेष सत्र बुलाया गया है। कैबिनेट पहले ही विधेयक को मंजूरी दे चुकी है।

क्या है प्रस्तावित अंतर-विश्वविद्यालय तबादला व्यवस्था?

प्रस्तावित विधेयक का उद्देश्य राज्य के विश्वविद्यालयों में काम कर रहे शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों को जरूरत के अनुसार एक विश्वविद्यालय से दूसरे विश्वविद्यालय में स्थानांतरित करने के लिए कानूनी ढांचा तैयार करना है।

सरकार की ओर से यह तर्क सामने आया है कि अनुभवी शिक्षकों की सेवाओं का इस्तेमाल नए विश्वविद्यालयों में किया जा सकेगा। राज्य सरकार का कहना है कि इससे नए संस्थानों को अनुभवी शिक्षकों और कर्मचारियों की विशेषज्ञता का लाभ मिल सकता है। फिलहाल विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की नियुक्ति और सेवा व्यवस्था संबंधित विश्वविद्यालयों के नियमों और कानूनों के तहत होती है।

विधेयक को 10 सितंबर को सुबह 11 बजे से दोपहर 1 बजे तक होने वाले विशेष विधानसभा सत्र में पेश करने की योजना है।

JUTA ने क्यों जताई आपत्ति?

जादवपुर विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने मंगलवार को जारी बयान में कहा कि हर विश्वविद्यालय की अपनी कार्यप्रणाली, नियम और सेवा शर्तें होती हैं। इन्हीं व्यवस्थाओं के आधार पर शिक्षकों और कर्मचारियों की नियुक्ति की जाती है। ऐसे में किसी कर्मचारी को उसकी मौजूदा सेवा व्यवस्था से अलग नियमों वाले दूसरे विश्वविद्यालय में भेजने से कई सवाल खड़े हो सकते हैं।

JUTA ने इसे कर्मचारियों की नौकरी की सुरक्षा और विश्वविद्यालयों की आत्मनिर्भरता से जुड़ा मामला बताया है। संघ का कहना है कि बिना कर्मचारियों की सहमति उनकी सेवा शर्तों में इस तरह का बदलाव करना उचित नहीं होगा।

जादवपुर विश्वविद्यालय शिक्षक संघ के अध्यक्ष पार्थ प्रतिम रे ने भी कहा कि मौजूदा व्यवस्था में जादवपुर विश्वविद्यालय के शिक्षकों का अंतर-विश्वविद्यालय तबादला सेवा शर्तों का हिस्सा नहीं है। ऐसे में नए कानून के तहत इन सेवा शर्तों में किस तरह बदलाव किया जाएगा, इसे स्पष्ट किया जाना जरूरी है।

विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता को लेकर चिंता

JUTA ने प्रस्तावित व्यवस्था को विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता से जोड़ते हुए कहा है कि उच्च शिक्षा संस्थानों को अपने अकादमिक और प्रशासनिक फैसले लेने की पर्याप्त स्वतंत्रता मिलनी चाहिए। संघ का आरोप है कि तबादलों की केंद्रीकृत व्यवस्था विश्वविद्यालयों की स्वतंत्र कार्यप्रणाली को कमजोर कर सकती है।

संघ ने यह भी कहा कि विश्वविद्यालयों में शिक्षकों की भूमिका केवल पढ़ाने तक सीमित नहीं होती। वे शोध, अकादमिक कार्यक्रमों, प्रयोगशालाओं और संस्थान के विकास में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसलिए एक विश्वविद्यालय से दूसरे विश्वविद्यालय में शिक्षक के स्थानांतरण के दूरगामी प्रभावों पर विचार किया जाना चाहिए।

हालांकि, यह ध्यान रखना जरूरी है कि विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता और UGC के सिद्धांतों से जुड़े JUTA के तर्क शिक्षक संघ की आपत्तियां और दावे हैं। प्रस्तावित कानून के अंतिम प्रावधान और उनका कानूनी प्रभाव विधेयक विधानसभा में पेश होने और उसके बाद की प्रक्रिया से स्पष्ट होगा।

क्या सरकार के आलोचक कर्मचारियों को निशाना बनाया जा सकता है?

JUTA ने प्रस्तावित तबादला व्यवस्था के संभावित दुरुपयोग को लेकर भी सवाल उठाया है। संघ ने आशंका जताई है कि यदि तबादले की प्रक्रिया पर्याप्त सुरक्षा और पारदर्शिता के बिना लागू होती है, तो सरकार की नीतियों की आलोचना करने वाले कर्मचारियों के खिलाफ इसका इस्तेमाल किया जा सकता है।

यह फिलहाल शिक्षक संघ की आशंका है। प्रस्तावित विधेयक में इस संबंध में क्या सुरक्षा प्रावधान होंगे, यह विधानसभा में विधेयक के वास्तविक पाठ और उस पर होने वाली चर्चा के बाद ही स्पष्ट होगा।

दूसरे विश्वविद्यालयों में क्या होगा?

इस प्रस्ताव ने विश्वविद्यालयों में नियुक्ति और सेवा शर्तों को लेकर भी कई सवाल खड़े किए हैं। शिक्षकों के तबादले की स्थिति में उनके शोध कार्य, प्रयोगशालाओं, शोध अनुदान और मौजूदा अकादमिक जिम्मेदारियों का क्या होगा, यह भी महत्वपूर्ण मुद्दा है।

कलकत्ता विश्वविद्यालय शिक्षक संघ ने भी विधेयक पर विस्तृत चर्चा और सभी विश्वविद्यालयों के हितधारकों से सलाह लेने की मांग की है। शिक्षक संघ ने यह सवाल उठाया है कि अलग-अलग विश्वविद्यालयों के मौजूदा नियमों और सेवा शर्तों को नई व्यवस्था के साथ किस तरह जोड़ा जाएगा।

JUTA की मांग क्या है?

JUTA ने मांग की है कि विश्वविद्यालय कर्मचारियों पर उनकी मौजूदा नियुक्ति और सेवा शर्तों के विपरीत कोई नई व्यवस्था जबरन लागू नहीं की जानी चाहिए। संघ चाहता है कि किसी भी बदलाव से पहले विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों के अधिकार तथा अलग-अलग संस्थानों की सेवा शर्तों को ध्यान में रखा जाए।

अब सबकी नजर 10 सितंबर के विधानसभा विशेष सत्र पर है। विधेयक पेश होने के बाद ही यह साफ होगा कि अंतर-विश्वविद्यालय तबादले की प्रक्रिया किन कर्मचारियों पर लागू होगी, तबादले का अधिकार किसके पास होगा और कर्मचारियों की मौजूदा सेवा शर्तों की सुरक्षा के लिए क्या प्रावधान किए गए हैं। फिलहाल इस प्रस्ताव ने पश्चिम बंगाल के उच्च शिक्षा क्षेत्र में विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता, कर्मचारी अधिकार और प्रशासनिक नियंत्रण को लेकर नई बहस शुरू कर दी है।

 

Asmita Sarkar

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