प्रमुख ख़बरें 

Grid List

नेशनल टेस्टिंग एजेंसी (NTA) ने मंगलवार, 23 जून 2026 को कॉमन यूनिवर्सिटी एंट्रेंस टेस्ट (CUET UG) 2026 का परिणाम घोषित कर दिया। परीक्षा में शामिल अभ्यर्थी अब आधिकारिक वेबसाइट cuet.nta.nic.in पर जाकर अपना स्कोरकार्ड डाउनलोड कर सकते हैं। इस बार एनटीए ने परीक्षा समाप्त होने के केवल 16 दिनों के भीतर परिणाम जारी कर दिया, जो पिछले वर्ष की तुलना में 14 दिन तेज माना जा रहा है।

सीयूईटी यूजी देश के केंद्रीय, राज्य, डीम्ड और निजी विश्वविद्यालयों में स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आयोजित होने वाली सबसे बड़ी प्रवेश परीक्षाओं में शामिल है। इस वर्ष परीक्षा का आयोजन कंप्यूटर आधारित परीक्षा (CBT) मोड में 11 मई से 31 मई 2026 तक किया गया था, जबकि कुछ विषयों की परीक्षाएं 6 और 7 जून को भी आयोजित हुई थीं।

हजारों छात्रों ने हासिल किया 100 पर्सेंटाइल

इस बार के परिणाम में कई छात्रों ने शानदार प्रदर्शन किया है। एनटीए के अनुसार, एक उम्मीदवार ने चार विषयों में 100 पर्सेंटाइल हासिल किया। वहीं 22 छात्रों ने तीन विषयों में, 180 उम्मीदवारों ने दो विषयों में और 3,214 छात्रों ने एक विषय में 100 पर्सेंटाइल प्राप्त किया।

पांच विषयों में सबसे अधिक कुल स्कोर 1232.19 दर्ज किया गया। अकाउंटेंसी, हिस्ट्री, साइकोलॉजी और ओड़िया जैसे विषयों में भी कई उम्मीदवारों ने 250 के करीब या पूर्ण अंक हासिल किए।

15.68 लाख से अधिक छात्रों ने कराया पंजीकरण

सीयूईटी यूजी 2026 के लिए इस बार कुल 15,68,867 यूनिक उम्मीदवारों ने पंजीकरण कराया। इनमें से 11,64,098 अभ्यर्थी परीक्षा में शामिल हुए।

पिछले वर्ष की तुलना में इस बार पंजीकृत उम्मीदवारों की संख्या में 15 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई। खास बात यह रही कि महिला अभ्यर्थियों की संख्या में करीब 20 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई, जिससे पुरुष और महिला उम्मीदवारों के बीच का अंतर पहले की तुलना में काफी कम हुआ है।

321 शहरों में हुई परीक्षा, 13 विदेशी शहर भी शामिल

एनटीए ने इस वर्ष सीयूईटी यूजी परीक्षा का आयोजन देश और विदेश के कुल 321 शहरों में किया। इनमें भारत के अलावा 13 अंतरराष्ट्रीय शहर भी शामिल रहे। इन शहरों में अबू धाबी, दोहा, काठमांडू, कुआलालंपुर, कुवैत सिटी, लागोस, मनामा, मस्कट, रियाद, शारजाह, सिंगापुर, वेस्ट जावा और वॉशिंगटन शामिल हैं।

परीक्षा का आयोजन 13 भाषाओं में किया गया, जिनमें हिंदी, अंग्रेजी, असमिया, बंगाली, गुजराती, कन्नड़, मलयालम, मराठी, ओड़िया, पंजाबी, तमिल, तेलुगु और उर्दू शामिल थीं। इससे देशभर के विभिन्न भाषाई क्षेत्रों के छात्रों को अपनी पसंदीदा भाषा में परीक्षा देने का अवसर मिला।

244 विश्वविद्यालयों ने अपनाया सीयूईटी

इस वर्ष कुल 244 विश्वविद्यालयों ने सीयूईटी यूजी के माध्यम से स्नातक प्रवेश प्रक्रिया में भाग लिया। पिछले वर्ष यह संख्या 241 थी। इससे स्पष्ट है कि विश्वविद्यालयों का इस साझा प्रवेश परीक्षा पर भरोसा लगातार बढ़ रहा है।

परीक्षा में छात्रों के लिए कुल 37 विषय उपलब्ध कराए गए थे। इनमें 13 भाषाएं, 23 डोमेन विषय और एक जनरल एप्टीट्यूड टेस्ट शामिल था। प्रत्येक उम्मीदवार को अधिकतम पांच विषय चुनने की अनुमति दी गई थी।

35 शिफ्टों में हुई परीक्षा

एनटीए ने परीक्षा को सुचारु रूप से आयोजित करने के लिए 35 अलग-अलग शिफ्टों में परीक्षा कराई। इस दौरान कुल 332 प्रश्नपत्रों का उपयोग किया गया और लगभग 18,160 यूनिक प्रश्न तैयार किए गए। अलग-अलग शिफ्टों में परीक्षा होने के बावजूद मूल्यांकन प्रक्रिया को निष्पक्ष बनाए रखने के लिए सामान्यीकरण (Normalization) प्रक्रिया अपनाई गई।

आगे क्या करें अभ्यर्थी?

रिजल्ट जारी होने के बाद अब विभिन्न विश्वविद्यालय अपनी-अपनी प्रवेश प्रक्रिया और काउंसलिंग का शेड्यूल जारी करेंगे। उम्मीदवारों को सलाह दी जाती है कि वे अपना स्कोरकार्ड सुरक्षित रखें और जिन विश्वविद्यालयों में आवेदन किया है, उनकी आधिकारिक वेबसाइट पर नियमित रूप से प्रवेश संबंधी अपडेट देखते रहें।

सीयूईटी यूजी 2026 का परिणाम ऐसे समय में आया है जब देशभर के लाखों छात्र स्नातक प्रवेश की तैयारी में जुटे हैं। तेजी से परिणाम घोषित होने से विश्वविद्यालयों की प्रवेश प्रक्रिया भी समय पर पूरी होने की उम्मीद है, जिससे नया शैक्षणिक सत्र निर्धारित समय पर शुरू करने में मदद मिलेगी।

राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने देश में स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा (Postgraduate Medical Education) को लेकर बड़ा नीतिगत फैसला लिया है। आयोग ने घोषणा की है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 पोस्टग्रेजुएट (PG) डिप्लोमा मेडिकल कोर्स में नए प्रवेश का अंतिम वर्ष होगा। इसके बाद शैक्षणिक सत्र 2027-28 से इन डिप्लोमा पाठ्यक्रमों में नए दाखिले पूरी तरह बंद कर दिए जाएंगे।

यह निर्णय देशभर में चिकित्सा शिक्षा को अधिक मानकीकृत, गुणवत्तापूर्ण और विशेषज्ञता आधारित बनाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।

2027-28 से बंद होंगे PG डिप्लोमा कोर्स में नए दाखिले

22 जून को जारी सार्वजनिक सूचना में एनएमसी ने स्पष्ट किया कि सभी पीजी डिप्लोमा पाठ्यक्रमों को चरणबद्ध तरीके से समाप्त किया जाएगा। इनकी जगह संबंधित विषयों के ब्रॉड स्पेशियलिटी डिग्री प्रोग्राम, यानी एमडी (Doctor of Medicine) और एमएस (Master of Surgery) को बढ़ावा दिया जाएगा।

इसका मतलब है कि 2026-27 बैच के बाद किसी भी नए छात्र को पीजी डिप्लोमा मेडिकल कोर्स में प्रवेश नहीं मिलेगा। हालांकि, पहले से दाखिला ले चुके छात्रों की पढ़ाई और डिग्री पर इस फैसले का कोई प्रभाव नहीं पड़ेगा।

मेडिकल कॉलेजों को शुरू करनी होगी सीट रूपांतरण प्रक्रिया

एनएमसी के पोस्टग्रेजुएट मेडिकल एजुकेशन बोर्ड (PGMEB) ने सभी मेडिकल कॉलेजों को निर्देश दिया है कि वे अपने पीजी डिप्लोमा कोर्स की सीटों को एमडी और एमएस सीटों में बदलने की प्रक्रिया शुरू करें।

इसके लिए संस्थानों को मेडिकल असेसमेंट एंड रेटिंग बोर्ड (MARB) के पास आवेदन करना होगा। आयोग ने बताया है कि इस प्रक्रिया के लिए जल्द ही एक विशेष ऑनलाइन पोर्टल शुरू किया जाएगा, जहां कॉलेज आवेदन कर सकेंगे। आवेदन की अंतिम तिथि और विस्तृत दिशा-निर्देश अलग से जारी किए जाएंगे।

जिन कॉलेजों में संसाधन हैं, उन्हें मिलेगा फायदा

एनएमसी के अनुसार, देश के कई मेडिकल कॉलेजों में एक ही विषय में डिप्लोमा और डिग्री दोनों कार्यक्रम पहले से संचालित हो रहे हैं। वहीं कुछ संस्थान केवल डिप्लोमा कोर्स चला रहे हैं।

आयोग का मानना है कि ऐसे अधिकांश संस्थानों के पास आवश्यक फैकल्टी, अस्पताल, क्लिनिकल सुविधाएं और बुनियादी ढांचा पहले से मौजूद है। इसलिए वे निर्धारित मानकों को पूरा करने के बाद आसानी से एमडी और एमएस कार्यक्रम संचालित कर सकते हैं।

हालांकि, सीटों का रूपांतरण केवल उन्हीं संस्थानों को मंजूर किया जाएगा जो एनएमसी के सभी शैक्षणिक और बुनियादी मानकों का पालन करेंगे।

क्यों लिया गया यह फैसला?

एनएमसी का कहना है कि इस बदलाव का उद्देश्य पूरे देश में स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा को एक समान और अधिक व्यवस्थित बनाना है। आयोग चाहता है कि विशेषज्ञ डॉक्टरों का प्रशिक्षण आधुनिक चिकित्सा शिक्षा के मानकों के अनुरूप हो और सभी छात्रों को समान गुणवत्ता वाली डिग्री आधारित शिक्षा मिले।

विशेषज्ञों का मानना है कि एमडी और एमएस जैसी डिग्री कोर्स अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक व्यापक मान्यता प्राप्त है। ऐसे में यह बदलाव भारतीय चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता बढ़ाने और भविष्य के विशेषज्ञ डॉक्टरों को बेहतर प्रशिक्षण देने में मदद करेगा।

राज्यों और विश्वविद्यालयों को जारी किए गए निर्देश

एनएमसी ने यह अधिसूचना सभी मान्यता प्राप्त मेडिकल कॉलेजों, राज्य चिकित्सा शिक्षा विभागों और संबंधित विश्वविद्यालयों को भेज दी है। आयोग ने सभी संस्थानों को समय रहते आवश्यक प्रक्रिया पूरी करने और सीट रूपांतरण के लिए तैयारी शुरू करने के निर्देश दिए हैं।

आने वाले महीनों में एमएआरबी द्वारा जारी दिशा-निर्देशों के आधार पर मेडिकल कॉलेजों को आवेदन करना होगा, जिसके बाद चरणबद्ध तरीके से पीजी डिप्लोमा सीटों को एमडी और एमएस सीटों में परिवर्तित किया जाएगा।

पंजाब सरकार ने निजी स्कूलों की मनमानी फीस बढ़ोतरी पर रोक लगाने के लिए बड़ा कदम उठाया है। राज्य कैबिनेट ने एक ऐसे प्रस्ताव को मंजूरी दी है, जिसके तहत अब कोई भी निजी स्कूल बिना निर्धारित प्रक्रिया अपनाए सालाना 5 प्रतिशत से अधिक फीस नहीं बढ़ा सकेगा। इस प्रस्ताव को कानून का रूप देने के लिए अंतिम मंजूरी हेतु राज्यपाल के पास भेजा गया है।

इस फैसले की जानकारी मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान ने पहले प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी थी। बाद में कैबिनेट बैठक के बाद वित्त मंत्री हरपाल सिंह चीमा और शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस ने नए कानून के प्रमुख प्रावधानों की जानकारी साझा की। सरकार का कहना है कि इस कानून का उद्देश्य छात्रों और अभिभावकों को राहत देना तथा निजी स्कूलों में फीस बढ़ोतरी को पारदर्शी और जवाबदेह बनाना है।

5 प्रतिशत से अधिक फीस बढ़ाने के लिए लेनी होगी मंजूरी

प्रस्तावित कानून के अनुसार, यदि कोई निजी स्कूल 5 प्रतिशत से अधिक फीस बढ़ाना चाहता है, तो उसे तय प्रक्रिया का पालन करना होगा। स्कूल को पहले यह स्पष्ट करना होगा कि फीस बढ़ाने की आवश्यकता क्यों है और इसके समर्थन में अपने वित्तीय दस्तावेज भी प्रस्तुत करने होंगे।

सरकार ने इसके लिए एक विशेष समिति बनाने का फैसला किया है। इस समिति में संबंधित डिविजनल कमिश्नर, दो जिला शिक्षा अधिकारी (DEO) और एक वित्तीय विशेषज्ञ शामिल होंगे। समिति स्कूल के वित्तीय रिकॉर्ड और ऑडिट रिपोर्ट की जांच करने के बाद ही फीस बढ़ाने पर अंतिम निर्णय लेगी।

36 महीनों में 15% से अधिक फीस बढ़ाई तो लौटानी होगी अतिरिक्त राशि

सरकार ने पहले से की गई फीस बढ़ोतरी को लेकर भी महत्वपूर्ण प्रावधान रखा है। शिक्षा मंत्री हरजोत सिंह बैंस के अनुसार, यदि किसी निजी स्कूल ने पिछले 36 महीनों के दौरान कुल मिलाकर 15 प्रतिशत से अधिक फीस बढ़ाई है, तो अतिरिक्त वसूली गई राशि अभिभावकों को वापस करनी होगी।

इस प्रावधान का उद्देश्य उन परिवारों को राहत देना है, जिन्होंने पिछले वर्षों में अधिक फीस का भुगतान किया है।

फीस बढ़ाने से पहले देना होगा छह महीने पहले आवेदन

नए नियमों के तहत यदि कोई स्कूल फीस बढ़ाना चाहता है, तो उसे प्रस्तावित बढ़ोतरी से कम से कम छह महीने पहले आवेदन देना होगा। आवेदन में यह बताना अनिवार्य होगा कि फीस बढ़ाने की आवश्यकता क्यों है।

यदि स्कूल ने नया भवन बनाया है, आधुनिक लैब स्थापित की है, अतिरिक्त शैक्षणिक सुविधाएं शुरू की हैं या अन्य कोई बड़ा निवेश किया है, तो उसका पूरा विवरण और वित्तीय रिकॉर्ड भी प्रस्तुत करना होगा।

केवल आवेदन देने से फीस बढ़ाने की अनुमति नहीं मिल जाएगी। पहले वित्तीय ऑडिट होगा और उसी के आधार पर समिति अंतिम फैसला करेगी कि फीस बढ़ोतरी उचित है या नहीं।

नए सत्र से पहले घोषित करनी होगी पूरी फीस

सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि प्रत्येक शैक्षणिक सत्र शुरू होने से कम से कम दो महीने पहले सभी निजी स्कूलों को अपनी फीस संरचना सार्वजनिक करनी होगी। इससे अभिभावकों को समय रहते जानकारी मिल सकेगी और अचानक फीस बढ़ाने जैसी स्थिति से बचा जा सकेगा।

यह नियम पंजाब के सभी प्रमुख शिक्षा बोर्डों से संबद्ध स्कूलों पर लागू होगा। इसमें पंजाब स्कूल शिक्षा बोर्ड (PSEB), CBSE, CISCE (ICSE) और अंतरराष्ट्रीय बोर्डों से संबद्ध निजी स्कूल शामिल हैं।

अभिभावकों को मिलेगी राहत, स्कूलों की बढ़ेगी जवाबदेही

राज्य सरकार का मानना है कि नया कानून निजी स्कूलों में फीस निर्धारण की प्रक्रिया को अधिक पारदर्शी बनाएगा। साथ ही स्कूलों को किसी भी फीस बढ़ोतरी के लिए ठोस कारण और वित्तीय आधार प्रस्तुत करना होगा। इससे मनमानी फीस वृद्धि पर रोक लगेगी और अभिभावकों के आर्थिक हितों की बेहतर सुरक्षा हो सकेगी।

यदि राज्यपाल की मंजूरी के बाद यह कानून लागू होता है, तो पंजाब उन राज्यों में शामिल हो जाएगा जहां निजी स्कूलों की फीस वृद्धि को स्पष्ट कानूनी ढांचे के तहत नियंत्रित किया जाएगा।

राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (NEET UG) 2026 की दोबारा आयोजित परीक्षा के बाद सोशल मीडिया पर पेपर लीक से जुड़ा एक वीडियो तेजी से वायरल हुआ। हालांकि, राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) ने इस वीडियो में किए गए दावों को पूरी तरह गलत और भ्रामक बताते हुए खारिज कर दिया है। एजेंसी ने कहा कि परीक्षा कड़ी सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी के बीच सफलतापूर्वक संपन्न हुई और पेपर लीक का दावा पूरी तरह निराधार है।

रविवार को आयोजित NEET UG 2026 री-एग्जाम में देशभर के 20 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने हिस्सा लिया। परीक्षा समाप्त होने के कुछ समय बाद सोशल मीडिया पर एक वीडियो वायरल होने लगा, जिसमें प्रश्नपत्र लीक होने का दावा किया गया था।

सोशल मीडिया पर वायरल हुआ वीडियो

सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स (पूर्व में ट्विटर) पर मोहम्मद नौमान नाम के एक यूजर ने एक वीडियो साझा करते हुए इसकी सत्यता पर सवाल उठाए। पोस्ट में उन्होंने NTA से वीडियो की जांच कर अधिकृत जानकारी जारी करने की मांग की। साथ ही टेलीग्राम पर लगाए गए प्रतिबंध को लेकर भी सवाल उठाए गए और पूछा गया कि क्या यह एहतियात के तौर पर उठाया गया कदम था या फिर किसी नई गड़बड़ी का संकेत है।

इस पोस्ट के बाद वीडियो तेजी से वायरल होने लगा और कई अभ्यर्थियों के बीच भ्रम की स्थिति पैदा हो गई।

NTA ने बताया दावा पूरी तरह फर्जी

NTA ने अपने आधिकारिक सोशल मीडिया हैंडल पर जारी बयान में स्पष्ट किया कि NEET UG 2026 की पुनर्परीक्षा पूरी सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी के साथ आयोजित की गई थी।

एजेंसी ने कहा कि सोशल मीडिया पर प्रसारित वीडियो में पेपर लीक का जो दावा किया जा रहा है, वह पूरी तरह मनगढ़ंत और फर्जी है। NTA ने छात्रों से अपील की कि वे इस तरह की अफवाहों पर भरोसा न करें और केवल आधिकारिक स्रोतों से ही जानकारी प्राप्त करें।

भ्रामक जानकारी फैलाना गंभीर अपराध: NTA

राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी ने कहा कि छात्रों को गुमराह करने या उनमें डर और भ्रम पैदा करने के उद्देश्य से इस तरह की झूठी सामग्री तैयार करना और उसे जानबूझकर प्रसारित करना गंभीर अपराध की श्रेणी में आता है।

NTA ने बताया कि वह भारतीय साइबर अपराध समन्वय केंद्र (I4C) और अन्य कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ मिलकर इस फर्जी सामग्री के स्रोत की पहचान कर रही है। दोषियों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।

छात्रों और अभिभावकों से की गई विशेष अपील

एजेंसी ने छात्रों, अभिभावकों और आम नागरिकों से अपील की है कि वे किसी भी परीक्षा से जुड़ी जानकारी के लिए केवल NTA की आधिकारिक वेबसाइट और सत्यापित सोशल मीडिया हैंडल पर ही भरोसा करें।

साथ ही, बिना पुष्टि किए किसी भी वीडियो, पोस्ट या संदेश को आगे साझा न करने की सलाह दी गई है, ताकि गलत जानकारी फैलने से रोका जा सके।

20 लाख से अधिक अभ्यर्थियों ने दी पुनर्परीक्षा

रविवार को आयोजित NEET UG 2026 की पुनर्परीक्षा में देशभर के 20 लाख से अधिक उम्मीदवार शामिल हुए। यह परीक्षा पहले रद्द की गई परीक्षा के बाद आयोजित की गई थी।

इस बीच, NTA के महानिदेशक अभिषेक सिंह ने कहा कि केंद्र और राज्य सरकारों सहित विभिन्न एजेंसियों के समन्वित प्रयासों के कारण इतनी बड़ी परीक्षा का आयोजन रिकॉर्ड समय में सफलतापूर्वक किया जा सका। उन्होंने इसे "समग्र सरकारी दृष्टिकोण" का परिणाम बताया।

NEET UG 2026 से जुड़ी किसी भी नई सूचना, उत्तर कुंजी, परिणाम या आधिकारिक घोषणा के लिए उम्मीदवारों को केवल NTA के अधिकृत माध्यमों पर ही नजर बनाए रखने की सलाह दी गई है।

मैनेजमेंट शिक्षा के क्षेत्र में IMT गाजियाबाद ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धि हासिल की है। वर्ष 2026 की अंतरराष्ट्रीय मास्टर्स इन फाइनेंस (Masters in Finance) रैंकिंग में संस्थान के फाइनेंस प्रोग्राम को भारत में पहला और दुनिया में 59वां स्थान मिला है। पिछले वर्ष की तुलना में संस्थान ने वैश्विक रैंकिंग में सात स्थान की बढ़त दर्ज की है।

यह रैंकिंग दुनिया भर के मान्यता प्राप्त बिजनेस स्कूलों द्वारा संचालित प्री-एक्सपीरियंस फाइनेंस प्रोग्राम का मूल्यांकन करती है। इसमें पूर्व छात्रों की करियर प्रगति, वेतन, अंतरराष्ट्रीय अवसर, विविधता, करियर सेवाएं और छात्रों को मिलने वाले समग्र शैक्षणिक एवं पेशेवर लाभ जैसे कई महत्वपूर्ण मानकों को आधार बनाया जाता है।

बदलती उद्योग जरूरतों के अनुरूप तैयार हो रहा है फाइनेंस एजुकेशन

आज के समय में बिजनेस स्कूलों पर फाइनेंस शिक्षा को उद्योग की बदलती जरूरतों के अनुसार तैयार करने का दबाव लगातार बढ़ रहा है। डिजिटल फाइनेंस, डेटा आधारित निर्णय, जोखिम प्रबंधन (रिस्क मैनेजमेंट) और वित्तीय सेवाओं के नए क्षेत्रों को ध्यान में रखते हुए संस्थान अपने पाठ्यक्रम में बदलाव कर रहे हैं।

इसी दिशा में IMT गाजियाबाद का फाइनेंस प्रोग्राम भी छात्रों को आधुनिक उद्योग की आवश्यकताओं के अनुरूप तैयार करने पर जोर देता है।

अकादमिक गुणवत्ता और इंडस्ट्री कनेक्ट बना सफलता की वजह

IMT गाजियाबाद के एसोसिएट डीन (BFS प्रोग्राम) डॉ. हरसिमरन संधू ने कहा कि यह उपलब्धि संस्थान के फाइनेंस प्रोग्राम की मजबूत अकादमिक गुणवत्ता, उद्योग से जुड़े प्रशिक्षण, शोध गतिविधियों और बेहतर करियर परिणामों का प्रमाण है।

उन्होंने कहा कि यह रैंकिंग इस बात को दर्शाती है कि संस्थान भविष्य की जरूरतों के अनुरूप वित्तीय क्षेत्र के नेतृत्वकर्ता तैयार करने के अपने लक्ष्य पर लगातार काम कर रहा है। उन्होंने इस सफलता का श्रेय फैकल्टी, छात्रों, पूर्व छात्रों, भर्ती करने वाली कंपनियों और उद्योग सहयोगियों को दिया।

पाठ्यक्रम और इंडस्ट्री साझेदारी का मिला लाभ

संस्थान के अनुसार, रैंकिंग में सुधार के पीछे आधुनिक पाठ्यक्रम, अनुभव आधारित शिक्षा (Experiential Learning), उद्योग के साथ मजबूत साझेदारी, अनुभवी फैकल्टी, प्रभावी करियर सेवाएं और मजबूत एलुमनाई नेटवर्क की महत्वपूर्ण भूमिका रही है।

संस्थान के छात्र भारत और विदेश की कई प्रमुख कंपनियों तथा वित्तीय संस्थानों में कार्यरत हैं, जिससे संस्थान की वैश्विक पहचान भी लगातार मजबूत हो रही है।

1980 से मैनेजमेंट शिक्षा में सक्रिय है IMT गाजियाबाद

वर्ष 1980 में स्थापित IMT गाजियाबाद देश के प्रमुख मैनेजमेंट संस्थानों में गिना जाता है। संस्थान AICTE से अनुमोदित कई प्रबंधन कार्यक्रम संचालित करता है, जिनमें PGDM, PGDM मार्केटिंग, PGDM फाइनेंशियल मैनेजमेंट, PGDM बैंकिंग एंड फाइनेंशियल सर्विसेज तथा PGDM ड्यूल कंट्री प्रोग्राम शामिल हैं। इसके अलावा अनुभवी पेशेवरों के लिए विशेष प्रबंधन कार्यक्रम और मैनेजमेंट में फेलो प्रोग्राम भी उपलब्ध हैं।

छात्रों के लिए क्यों महत्वपूर्ण है यह उपलब्धि?

उच्च शिक्षा के क्षेत्र में अब केवल डिग्री ही नहीं, बल्कि रोजगार, उद्योग से जुड़ाव और वैश्विक अवसर भी महत्वपूर्ण मानक बन चुके हैं। ऐसे में IMT गाजियाबाद की बेहतर वैश्विक रैंकिंग उन छात्रों के लिए सकारात्मक संकेत है, जो फाइनेंस और मैनेजमेंट के क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं। परिणाम आधारित शिक्षा, बेहतर प्लेसमेंट और अंतरराष्ट्रीय एक्सपोजर जैसे पहलू आज बिजनेस स्कूल चुनने में छात्रों की प्राथमिकता बनते जा रहे हैं।

हरियाणा सरकार ने योग को शिक्षा और सरकारी भर्ती प्रक्रिया का अहम हिस्सा बनाने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के अवसर पर मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने घोषणा की कि अब हरियाणा कर्मचारी चयन आयोग (HSSC) और हरियाणा लोक सेवा आयोग (HPSC) की सभी भर्ती परीक्षाओं में योग से जुड़े प्रश्न शामिल किए जाएंगे। इस फैसले का उद्देश्य युवाओं में योग के प्रति जागरूकता बढ़ाना और भारतीय ज्ञान परंपरा को शिक्षा व्यवस्था से जोड़ना है।

इस घोषणा के बाद सरकारी नौकरी की तैयारी कर रहे अभ्यर्थियों को अब सामान्य अध्ययन के साथ-साथ योग से जुड़े विषयों की भी तैयारी करनी होगी। सरकार का मानना है कि योग केवल शारीरिक व्यायाम नहीं, बल्कि स्वस्थ जीवनशैली और मानसिक संतुलन का महत्वपूर्ण आधार है।

HSSC और HPSC परीक्षाओं में बढ़ेगा योग का महत्व

राज्य सरकार के अनुसार, HSSC और HPSC की सभी प्रतियोगी परीक्षाओं में योग से संबंधित प्रश्न पूछे जाएंगे। इससे उम्मीदवारों की योग के मूल सिद्धांतों, इसके महत्व और भारतीय परंपरा से जुड़े ज्ञान की भी परीक्षा होगी।

सरकार का कहना है कि आज की भागदौड़ भरी जिंदगी में योग युवाओं के शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है। इसी सोच के तहत इसे सरकारी भर्ती परीक्षाओं का हिस्सा बनाया जा रहा है, ताकि अधिक से अधिक युवा योग के प्रति जागरूक हों।

मोरनी में बनेगा राज्य स्तरीय प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग संस्थान

योग शिक्षा और शोध को बढ़ावा देने के लिए सरकार ने पंचकूला जिले के मोरनी क्षेत्र में राज्य स्तरीय प्राकृतिक चिकित्सा एवं योग संस्थान स्थापित करने की घोषणा भी की है।

यह संस्थान योग, प्राकृतिक चिकित्सा, वेलनेस एजुकेशन और रिसर्च का प्रमुख केंद्र होगा। यहां विद्यार्थियों, शोधकर्ताओं और स्वास्थ्य क्षेत्र से जुड़े लोगों को आधुनिक सुविधाओं के साथ प्रशिक्षण और अध्ययन का अवसर मिलेगा। सरकार का मानना है कि यह संस्थान हरियाणा में योग आधारित शिक्षा और अनुसंधान को नई दिशा देगा।

यूनिवर्सिटी के सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में भी शामिल होगा योग

हरियाणा सरकार ने यह भी स्पष्ट किया है कि राज्य की विभिन्न यूनिवर्सिटीज में स्थापित किए जा रहे पांच सेंटर ऑफ एक्सीलेंस में योग को एक महत्वपूर्ण घटक के रूप में शामिल किया जाएगा।

इन केंद्रों के माध्यम से योग शिक्षा, प्रशिक्षण, रिसर्च और नवाचार को बढ़ावा दिया जाएगा। इससे उच्च शिक्षा संस्थानों में योग आधारित अध्ययन को मजबूती मिलेगी और विद्यार्थियों को इस क्षेत्र में नए अवसर भी उपलब्ध होंगे।

अंतरराष्ट्रीय योग दिवस पर मुख्यमंत्री ने कही यह बात

सिरसा जिले में आयोजित अंतरराष्ट्रीय योग दिवस कार्यक्रम को संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री नायब सिंह सैनी ने कहा कि योग भारत की प्राचीन संस्कृति की अमूल्य धरोहर है, जिसे ऋषि-मुनियों ने पूरी मानवता के कल्याण के लिए विकसित किया।

उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के प्रयासों से योग को वैश्विक पहचान मिली और आज दुनिया के अधिकांश देशों में लोग योग को अपनी जीवनशैली का हिस्सा बना रहे हैं।

मुख्यमंत्री ने याद दिलाया कि प्रधानमंत्री की पहल पर वर्ष 2014 में संयुक्त राष्ट्र महासभा ने 21 जून को अंतरराष्ट्रीय योग दिवस घोषित किया था। उस प्रस्ताव का 177 देशों ने समर्थन किया था, जो अपने आप में एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी। आज योग पूरी दुनिया में बेहतर स्वास्थ्य, मानसिक शांति और संतुलित जीवन का प्रभावी माध्यम माना जा रहा है।

प्रतियोगी छात्रों के लिए क्या है इसका मतलब?

हरियाणा सरकार के इस फैसले का सीधा असर HSSC और HPSC की तैयारी कर रहे लाखों अभ्यर्थियों पर पड़ेगा। आने वाले समय में उम्मीदवारों को योग के इतिहास, मूल सिद्धांतों, प्रमुख आसनों, प्राणायाम, योग दर्शन, स्वास्थ्य लाभ और अंतरराष्ट्रीय योग दिवस से जुड़े महत्वपूर्ण तथ्यों की भी तैयारी करनी होगी।

विशेषज्ञों का मानना है कि भर्ती परीक्षाओं के नए पैटर्न को देखते हुए अभ्यर्थियों को अब अपने अध्ययन में योग से जुड़े विषयों को भी शामिल कर लेना चाहिए, ताकि परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन किया जा सके।

 रामनाथ गोयनका अवार्ड से सम्मानित पत्रकार अवधेश आकोदिया से खास बातचीत

भारतीय पत्रकारिता के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक रामनाथ गोयनका अवार्ड से इस वर्ष सम्मानित पत्रकार अवधेश आकोदिया आज हिंदी मीडिया जगत का एक जाना-पहचाना नाम हैं। जमीनी रिपोर्टिंग, संवेदनशील मुद्दों पर पैनी नजर और तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले आकोदिया ने अपने काम के जरिए लगातार यह साबित किया है कि खबर सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम भी है।

फिलहाल देश के प्रमुख हिंदी अखबार दैनिक भास्कर से जुड़े अवधेश आकोदिया ने अपने करियर में कई अहम रिपोर्ट्स के जरिए जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाया है। उनकी पत्रकारिता में ईमानदारी, जोखिम उठाने का साहस और आम लोगों की आवाज को मंच देने की प्रतिबद्धता साफ नजर आती है।

इस विशेष बातचीत में हम उनसे जानेंगे उनके पत्रकारिता सफर की कहानी, इस सम्मान तक पहुंचने का अनुभव, रिपोर्टिंग के दौरान आई चुनौतियां और आज के दौर में मीडिया की बदलती भूमिका पर उनका नजरिया। पेश है एडइनबॉक्स (EdInbox) के लिए रईस अहमद 'लाली' से अवधेश आकोदिया की हुई लंबी वार्ता के सम्पादित अंश:

  1. सबसे पहले, इस वर्ष रामनाथ गोयनका अवार्ड प्राप्त करने पर आपको कैसा महसूस हुआ?

- यह सम्मान पाना हर भारतीय पत्रकार का सपना होता है। मुझे बेहद गर्व और विनम्रता का अनुभव हो रहा है। यह अवार्ड सिर्फ मेरे काम की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाने की जीत है जिसे मैंने अपनी रिपोर्टिंग के जरिए उजागर किया। इससे यह हौसला मिलता है कि सच्ची पत्रकारिता की कीमत आज भी सबसे ज्यादा है।

  1. इस पुरस्कार के लिए चुने गए आपके स्टोरी/रिपोर्ट की प्रेरणा क्या थी?

- जयपुर में जब फर्जी एनओसी के सहारे अंग प्रत्यारोपण का मामला सामने आया, तो मुझे लगा कि यह सिर्फ कुछ डॉक्टरों की मिलीभगत नहीं हो सकती। एक मरीज 35 लाख रुपए दे रहा था और अपनी जान दांव पर लगाने वाले गरीब डोनर को सिर्फ 3 लाख मिल रहे थे। अंतरराष्ट्रीय किडनी माफिया द्वारा गरीबों की इस मजबूरी का फायदा उठाना ही मेरे लिए इस नेक्सस की जड़ों तक जाने की सबसे बड़ी प्रेरणा बना।

  1. रिपोर्ट तैयार करते समय किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा और आपने उन्हें कैसे पार किया?

- बांग्लादेश के ढाका में जाकर अंडरकवर ऑपरेशन करना सबसे बड़ी चुनौती थी। भाषा की दीवार, तंग गलियों में डोनर्स को खोजना और पकड़े जाने का जोखिम बहुत बड़ा था। एक बार रिसिपिएंट के रिश्तेदार ने खुद को इंटेलिजेंस अधिकारी बताकर मेरी कड़ी पूछताछ भी की थी। लेकिन पुख्ता दस्तावेजों, गहरी तैयारी और एक स्थानीय ड्राइवर की मदद से मैंने इस ऑपरेशन को अंजाम तक पहुंचाया।

  1. क्या आपको लगता है कि आज भी गंभीर और ग्राउंड-रिपोर्टिंग को पर्याप्त स्पेस मिल रहा है?

- बिल्कुल। अगर आपकी कहानी में दम है और वह जनता से जुड़ी है, तो स्पेस हमेशा मिलेगा। दैनिक भास्कर जैसे संस्थान आज भी लंबी और जोखिम भरी इन्वेस्टिगेटिव स्टोरीज को पहले पन्ने पर पूरी प्रमुखता देते हैं। पाठक आज भी असली 'खबर' पढ़ना चाहते हैं।

  1. आज की डिजिटल पत्रकारिता पारंपरिक पत्रकारिता से किस तरह अलग हो चुकी है?

- डिजिटल पत्रकारिता में तात्कालिकता है, वहां सूचना सेकंडों में पहुंचती है। लेकिन पारंपरिक पत्रकारिता गहराई, ठहराव और पुख्ता सबूतों पर काम करती है। डिजिटल आपको बताता है कि 'क्या हुआ', जबकि पारंपरिक पत्रकारिता यह बताती है कि 'क्यों और कैसे हुआ'।

  1. यूथ जर्नलिस्ट्स के लिए आप क्या सबसे महत्वपूर्ण कौशल मानते हैं?

- जिज्ञासा, धैर्य और दस्तावेजों को पढ़ने की क्षमता। सिर्फ बयानों पर खबरें न बनाएं, आरटीआई (RTI) लगाना सीखें और सरकारी रिकॉर्ड्स की गहराइयों में जाकर सच खोजना सीखें।

  1. क्या सोशल मीडिया ने पत्रकारिता में जानकारी की गुणवत्ता को प्रभावित किया है?

- दोनों तरह से किया है। इसने आवाज़ों को लोकतांत्रिक बनाया है और कई बार बड़ी लीड्स भी यहीं से मिलती हैं। लेकिन दूसरी तरफ, इसने अफवाहों और एजेंडा-आधारित सूचनाओं का अंबार भी लगा दिया है, जिससे पत्रकार का काम (फैक्ट-चेकिंग) और ज्यादा मुश्किल हो गया है।

  1. आप ‘स्पीड बनाम अक्यूरेसी’ की चुनौती को कैसे देखते हैं?

- मैं हमेशा 'अक्यूरेसी' (सटीकता) को चुनूंगा। एक गलत खबर तेजी से देकर विश्वसनीयता खोने से बेहतर है कि खबर थोड़ी देर से आए, लेकिन 100% सच हो। दस्तावेजों पर आधारित इन्वेस्टिगेशन में जल्दबाजी की कोई जगह नहीं होती।

  1. जब आप किसी संवेदनशील मुद्दे पर ग्राउंड रिपोर्ट करने जाते हैं, आप तैयारी कैसे करते हैं?

- तैयारी ही सब कुछ है। फील्ड पर जाने से पहले मैं महीनों तक 'पेपर ट्रेल' फॉलो करता हूँ— कंपनियों के रिकॉर्ड, सरकारी टेंडर और ऑडिट रिपोर्ट्स खंगालता हूँ। अंडरकवर होने के लिए अपनी 'डमी प्रोफाइल' की एक-एक बारीकी तैयार करता हूँ ताकि फील्ड पर कोई चूक न हो।

  1. मैदान में रिपोर्टिंग करते समय आपका सबसे यादगार अनुभव कौन सा रहा?

- आरजीएचएस घोटाले का खुलासा सबसे यादगार रहा। मैंने एक 'डमी मरीज' बनकर सीने में दर्द की झूठी शिकायत की। सभी जांचें सामान्य होने के बावजूद मुझे 7 दिन अस्पताल में भर्ती रखा गया और फर्जी बिल बनाए गए। मुझे बिना बीमारी के हैवी दवाइयां दी गईं, जिससे मैं वॉशरूम में गिर गया था। वह जानलेवा जोखिम था, लेकिन उस खुलासे से 6500 करोड़ रुपए का घोटाला पकड़ा गया।

  1. फील्ड रिपोर्टिंग में सुरक्षा और मानसिक संतुलन कैसे बनाए रखते हैं?

- इतने भारी और जोखिम भरे प्रोजेक्ट्स के बीच मैं खुद को शांत रखने के लिए साहित्य की ओर मुड़ता हूँ। बशीर बद्र और अल्लामा इकबाल की शायरी मुझे मानसिक सुकून और ऊर्जा देती है। इसके अलावा, पेशेवर तरीके से काम करना और भावनाओं में न बहना सुरक्षा की सबसे बड़ी कुंजी है।

  1. कहानी को मानव आवाज़ देने के लिए आप किन बातों का विशेष ध्यान रखते हैं?

- मैं हमेशा यह देखता हूँ कि किसी बड़े घोटाले या नीतिगत नाकामी का सीधा असर अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति पर कैसे पड़ रहा है। सिस्टम की खामियों को जब किसी पीड़ित (चाहे वह शोषित डोनर हो या परेशान आम आदमी) के चेहरे और उसके दर्द के साथ दिखाया जाता है, तभी खबर में जान आती है।

  1. आज मीडिया पर पक्षपात के आरोप बढ़ रहे हैं। आप निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए क्या करते हैं?

- मैं 'डॉक्यूमेंट्री एविडेंस' (दस्तावेजी सबूतों) पर भरोसा करता हूँ। बयान और विचारधाराएं पक्षपाती हो सकती हैं, लेकिन आरटीआई से निकले सरकारी आंकड़े, बैंक रिकॉर्ड और हिडन कैमरे की फुटेज कभी झूठ नहीं बोलते।

  1. फेक न्यूज़ और मिसइन्फॉर्मेशन के दौर में पत्रकार सत्यापन को कैसे मजबूत कर सकते हैं?

- पत्रकार को हमेशा मूल स्रोत तक जाना चाहिए। सुनी-सुनाई बातों पर यकीन न करें। तकनीकी टूल्स का इस्तेमाल करें, क्रॉस-चेक करें और जब तक दो अलग-अलग स्वतंत्र स्रोतों से खबर की पुष्टि न हो जाए, उसे न छापें।

  1. क्या आपको लगता है कि मीडिया हाउसों पर बढ़ते कॉर्पोरेट दबाव से स्वतंत्र पत्रकारिता प्रभावित होती है?

- चुनौतियां हमेशा रही हैं, लेकिन अगर पत्रकार के पास अकाट्य सबूत हैं और संस्थान का संपादकीय नेतृत्व मजबूत है, तो अच्छी खबरें कभी नहीं रुकतीं। मैंने कॉरपोरेट और बड़े राजनीतिक गठजोड़ के खिलाफ रिपोर्टिंग की है और भास्कर ने हमेशा मेरे काम का समर्थन किया है।

  1. आज के न्यूज़ रूम में डेटा जर्नलिज़्म की क्या भूमिका देखते हैं?

- यह आज की खोजी पत्रकारिता की रीढ़ है। भ्रष्टाचार अब लिफाफों में नहीं, बल्कि टेंडरों, ग्रांट्स और डिजिटल ट्रांजैक्शन में होता है। डेटा में पैटर्न खोजना (जैसे एक ही कंपनी को बार-बार ठेका मिलना या फर्जी डीएनए डेटा का खेल) ही आज सबसे बड़ी खबरें दे रहा है।

  1. AI-आधारित टूल्स को आप पत्रकारिता के लिए खतरा मानते हैं या अवसर?

- यह एक बेहतरीन अवसर है। मैं व्यक्तिगत रूप से बड़ी रिपोर्ट्स को स्ट्रक्चर करने, डेटा विश्लेषण और यहां तक कि विजुअल्स (इमेज जनरेशन) के लिए AI का उपयोग करता हूँ। यह एक टूल है जो पत्रकार की क्षमता को बढ़ाता है, लेकिन फील्ड रिपोर्टिंग और मानवीय संवेदना की जगह कभी नहीं ले सकता।

  1. ग्राउंड रिपोर्टिंग को बढ़ावा देने के लिए मीडिया संस्थानों को क्या कदम उठाने चाहिए?

- संस्थानों को पत्रकारों को समय और संसाधन देने चाहिए। इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग एक या दो दिन का काम नहीं है। एक रिपोर्टर को हफ्तों या महीनों तक एक विषय के पीछे लगने की आज़ादी और कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।

  1. इस पुरस्कार के बाद आपका अगला लक्ष्य या प्रोजेक्ट क्या है?

- मैं सिस्टम में मौजूद 'डिजिटल और टेक्नोलॉजिकल सिंडिकेट्स' की गहराई में उतर रहा हूँ। जैसे ई-वेस्ट की तस्करी और एआई (AI) स्टार्टअप्स के नाम पर हो रहे सरकारी ग्रांट्स के घोटाले। मेरी कोशिश हमेशा उन अंधेरे कोनों को रोशन करने की रहती है जहां आम तौर पर किसी की नजर नहीं जाती।

  1. जर्नलिज़्म पढ़ रहे छात्रों के लिए आपकी तीन मुख्य सलाह क्या होंगी?

- पहली- खूब पढ़ें और खूब घूमें। दूसरी- सवाल पूछने से कभी न डरें। तीसरी- डेस्क डेस्क खेलने के बजाय फील्ड की धूल फांकें, असली खबरें सड़क और फाइलों के बीच ही मिलती हैं।

  1. क्या आप महसूस करते हैं कि शैक्षिक संस्थानों में व्यावहारिक प्रशिक्षण पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है?

- सिद्धांत अच्छी तरह पढ़ाए जा रहे हैं, लेकिन जो चीजें फील्ड में सबसे ज्यादा काम आती हैं— जैसे आरटीआई फाइल करना, बैलेंस शीट पढ़ना, या डार्क वेब/डेटा स्क्रैपिंग— उन्हें पाठ्यक्रम में और अधिक व्यावहारिक रूप से शामिल करने की जरूरत है।

  1. आज के समय में क्षेत्रीय भाषाओं में पत्रकारिता का भविष्य कैसा दिखता है?

- क्षेत्रीय भाषाएं ही भारत की असली ताकत हैं। सबसे बड़ा इम्पैक्ट वहीं होता है जहां आम जनता आपकी बात समझती है। नीतियां भले ही दिल्ली में बनती हों, लेकिन उनका असर क्षेत्रीय स्तर पर ही दिखाई देता है, इसलिए भाषाई पत्रकारिता का भविष्य बेहद उज्ज्वल और शक्तिशाली है।

 

 

 

 

भौतिक विज्ञानी मोहम्मद सोइफ अहमद से खास बातचीत

महज 30 वर्ष की उम्र में मोहम्मद सोइफ अहमद प्रतिष्ठित इम्पीरियल कॉलेज लंदन में मैरी स्क्लोडोव्स्का-क्यूरी एक्शंस पोस्टडॉक्टोरल फेलोशिप के तहत अपने शोध प्रोजेक्ट का नेतृत्व करने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन उनकी यह यात्रा अत्याधुनिक लैब से नहीं, बल्कि मुर्शिदाबाद के एक ऐसे गांव से शुरू हुई, जहां उनके घर में बिजली तक नहीं थी।

प्रश्न: आप बिना बिजली के बड़े हुए। शुरुआती दिनों की सबसे खास याद क्या है?

- मेरे घर में आठवीं कक्षा तक बिजली नहीं थी। हम रोशनी के लिए लालटेन का इस्तेमाल करते थे और पढ़ाई के लिए एक छोटी सी ढिबरी होती थी। मेरे दादा जितना वहन कर सकते थे, उतना करते थे। उस समय यह सब सामान्य लगता था—बस जिंदगी का हिस्सा था। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो समझ आता है कि उन्हीं परिस्थितियों ने मेरे अंदर अनुशासन और एकाग्रता विकसित की।

प्रश्न: अपनी शुरुआती स्कूली पढ़ाई के बारे में बताइए।

- मैंने कोमनगर के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाई की, जहां बुनियादी सुविधाएं बहुत कम थीं। केवल एक इमारत थी जो दफ्तर के रूप में इस्तेमाल होती थी और हम आम के पेड़ के नीचे जूट की चटाई पर बैठकर पढ़ाई करते थे। लेकिन सीखने में कभी कोई कमी नहीं आई। दरअसल, वही साल मेरे लिए सबसे ज्यादा सीख देने वाले रहे।

प्रश्न: आपकी शिक्षा में परिवार की क्या भूमिका रही?

- मैं एक संयुक्त परिवार में बड़ा हुआ, जहां पांच बच्चे साथ पढ़ते थे। हम एक-दूसरे की मदद करते थे। गणित में कोई समस्या होती तो मैं अपने मामा से पूछता, और अंग्रेजी में मेरी मौसी मदद करती थीं। यह एक सहयोगी माहौल था। हमने कभी आर्थिक परेशानियों को बाधा के रूप में नहीं देखा।

प्रश्न: आपने आर्थिक तंगी का जिक्र किया है। इसका आपकी रोजमर्रा की जिंदगी पर क्या असर पड़ा?

- हम बहुत सादगी से रहते थे। सुबह का नाश्ता अक्सर नहीं होता था—कभी-कभी स्कूल जाने से पहले बिस्कुट या सत्तू खा लेते थे। जो भी स्थानीय रूप से उपलब्ध होता, वही खाते थे। कई बार कई दिनों तक कच्चे केले या कटहल ही खाना पड़ता था। मछली बहुत कम मिलती थी और मटन तो उससे भी कम। लेकिन हमें कभी कमी महसूस नहीं हुई। हमारे लिए पढ़ाई और खेल सबसे महत्वपूर्ण थे।

प्रश्न: आपके परिवार की स्थिति में बदलाव कब आया?

- सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब मेरे पिता को स्कूल शिक्षक की नौकरी मिली। इससे हमारे जीवन में स्थिरता आई। हम नए घर में शिफ्ट हुए और पहली बार घर में बिजली आई। इससे मेरी पढ़ाई भी बेहतर हो गई।

प्रश्न: स्कूल के बाद आपकी पढ़ाई का सफर कैसे आगे बढ़ा?

- दसवीं के बाद मैं आगे की पढ़ाई के लिए कोलकाता चला गया, जो मेरे परिवार के लिए एक बड़ा कदम था। बाद में मैंने अलियाह यूनिवर्सिटी से फिजिक्स में इंटीग्रेटेड एमएससी किया, जिसे मैंने 2018 में पूरा किया। वहीं से मैंने रिसर्च को करियर के रूप में गंभीरता से लेना शुरू किया।

प्रश्न: आईआईटी हैदराबाद में पीएचडी करने का निर्णय कैसे लिया?

- GATE परीक्षा पास करने के बाद यह मौका मिला। पहली बार पश्चिम बंगाल से बाहर जाना मेरे लिए बड़ा बदलाव था, लेकिन आईआईटी हैदराबाद ने मुझे आगे बढ़ने का बेहतरीन मंच दिया। मेरे सुपरवाइजर साई संतोष कुमार रावी ने मुझे हर कदम पर सहयोग दिया।

प्रश्न: अपने रिसर्च को आसान भाषा में समझाइए।

- मेरा शोध इस बात पर केंद्रित है कि जब किसी पदार्थ पर प्रकाश डाला जाता है, खासकर अल्ट्राफास्ट लेजर पल्स के जरिए, तो वह कैसे व्यवहार करता है। इससे हमें सोलर सेल, एलईडी और फोटोडिटेक्टर जैसी तकनीकों को बेहतर बनाने में मदद मिलती है। इसका उद्देश्य इन डिवाइसों को अधिक कुशल बनाना है।

प्रश्न: वर्तमान में आप कहां काम कर रहे हैं?

- मैं इस समय स्पेन के IMDEA नैनोसाइंसिया में पोस्टडॉक्टोरल रिसर्चर के रूप में काम कर रहा हूं। यह एक ऐसा इंटरडिसिप्लिनरी स्थान है, जहां भौतिक विज्ञानी, रसायनज्ञ और जीवविज्ञानी मिलकर एडवांस्ड मैटेरियल्स पर काम करते हैं।

प्रश्न: मैरी क्यूरी फेलोशिप आपके लिए क्या मायने रखती है?

- यह मेरे लिए बहुत बड़ा अवसर है। नवंबर से मैं इम्पीरियल कॉलेज लंदन में अपना खुद का रिसर्च प्रोजेक्ट लीड करूंगा। यह मेरे लंबे समय के लक्ष्य—भारत में, खासकर किसी IIT या प्रमुख संस्थान में अपना रिसर्च ग्रुप बनाने—की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

प्रश्न: क्या आपने कभी इस तरह के सफर की कल्पना की थी?

- बिलकुल नहीं। दसवीं कक्षा तक मुझे यह भी नहीं पता था कि IIT या पीएचडी क्या होती है। मेरा एकमात्र लक्ष्य अपनी कक्षा में टॉप करना था। बाकी सब कुछ धीरे-धीरे अपने आप होता चला गया।

आम के पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई करने से लेकर दुनिया के शीर्ष संस्थानों में रिसर्च का नेतृत्व करने तक, सोइफ अहमद की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि मेहनत और जिज्ञासा किसी भी परिस्थिति को पीछे छोड़ सकती है।

प्रख्यात भारतीय लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमोयी पियू कुंडू से खास बातचीत

श्रीमोयी पियू कुंडू एक प्रख्यात भारतीय लेखिका, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो भारत में जेंडर, यौनिकता और अविवाहित महिलाओं के जीवन से जुड़े मुद्दों पर अपने काम के लिए जानी जाती हैं। वह “स्टेटस सिंगल” की संस्थापक हैं, जो शहरी अविवाहित महिलाओं के सशक्तिकरण और उनकी पहचान को सामने लाने के लिए समर्पित एक कम्युनिटी और प्लेटफॉर्म है। सोशल मीडिया और यूट्यूब चैनल के जरिए भी उन्होंने अच्छी पहचान बनाई है। श्रीमोयी पियू कुंडू से खास बातचीत के प्रमुख अंश: 

प्रश्न 1: सोशल मीडिया और यूट्यूब पर आपके चैनल और पेज काफी लोकप्रिय हैं, आपने इसकी शुरुआत कैसे की?

- मैंने अपना यूट्यूब चैनल 2024 में, मई महीने में शुरू किया था। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर मैं उससे पहले से ही सक्रिय थी। दरअसल, मैं शुरू से ही अलग-अलग मीडिया प्लेटफॉर्म्स से जुड़ी रही हूं, इसलिए यह मेरे लिए काफी स्वाभाविक रहा। अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए मैंने एक समय किताब भी लिखी और अब पॉडकास्ट करती हूं। माध्यम बदलता रहता है, लेकिन अगर मैं लोगों तक अपनी बात पहुंचा पा रही हूं, तो वही मेरी सफलता है।

प्रश्न 2: आप सोशल मीडिया और यूट्यूब पर अलग-अलग लोगों के साथ कई विषयों पर चर्चा और इंटरव्यू करती हैं। आपके प्लेटफॉर्म पर मुख्य फोकस किन विषयों पर रहता है?

- अगर आप मेरे यूट्यूब या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स देखेंगे, तो पाएंगे कि मेरे अधिकतर विषय और मेहमान महिलाओं से जुड़े होते हैं। मैं कोशिश करती हूं कि समाज में मौजूद महिलाओं के अलग-अलग रूप, उनकी भूमिका और उनके योगदान को सामने लाया जाए। महिलाएं समाज को कैसे प्रभावित कर रही हैं—यह सकारात्मक है या नकारात्मक—इन सभी पहलुओं को समझना जरूरी है।

मेरे कंटेंट में आमतौर पर इंटरव्यू देने वाली महिलाओं के जीवन और काम के अनुभवों को साझा किया जाता है। यही मेरे पॉडकास्ट और वीडियो का मुख्य विषय होता है। हालांकि हर व्यक्ति अलग होता है, इसलिए हर एपिसोड में विषय भी बदलता रहता है।

प्रश्न 3: आप कई बार राजनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा करती हैं। दर्शकों की प्रतिक्रिया कैसी रहती है? क्या वे निष्पक्षता से संतुष्ट होते हैं?

- देखिए, राजनीति समाज का एक हिस्सा है। यह अच्छा है या बुरा, इसका निर्णय मैं नहीं करूंगी, लेकिन एक लोकतांत्रिक देश में हर व्यक्ति की भागीदारी जरूरी है। चूंकि राजनीति पूरे समाज को प्रभावित करती है, इसलिए यह कई बार विवादित भी हो जाती है।

लेकिन मेरा मानना है कि अगर बहस और चर्चा के बाद हम किसी बेहतर निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, तो यह जरूरी और उपयोगी है। ऐसी चर्चाएं समाज के लिए नुकसानदायक नहीं बल्कि फायदेमंद हो सकती हैं।

प्रश्न 4: आप आधुनिक दौर के नए मीडिया की प्रतिनिधि हैं। आज के समय में इस मीडिया को आप कैसे देखती हैं?

- आज के दौर का मीडिया मुख्य रूप से सोशल मीडिया और इंटरनेट आधारित है। 2016 में जियो के आने और 2022 में 5G की शुरुआत के बाद भारत में इंटरनेट का उपयोग तेजी से बढ़ा है। आने वाले समय में यह और बढ़ेगा।

इससे लोगों तक ज्यादा जानकारी और अलग-अलग विचार आसानी से पहुंच पाएंगे और साझा किए जा सकेंगे।

प्रश्न 5: क्या नया मीडिया वास्तव में पारंपरिक मीडिया जैसे टीवी और अखबार को चुनौती दे पाया है?

- आज 2026 में खड़े होकर मैं कह सकती हूं कि नया मीडिया काफी हद तक पारंपरिक मीडिया पर भारी पड़ा है। अखबार और टीवी अब धीरे-धीरे पीछे छूटते नजर आ रहे हैं और उनकी जगह OTT और सोशल मीडिया ले रहे हैं।

इस डिजिटल दौर में मीडिया अधिक लोकतांत्रिक हो गया है। अब आम लोग भी अपनी बात दुनिया तक पहुंचा सकते हैं। यह एक सकारात्मक बदलाव है। हालांकि, हर किसी की राय सभी को पसंद नहीं आती, लेकिन यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।

प्रश्न 6: नए मीडिया का भविष्य आप कैसा देखती हैं? और आपके अपने प्लेटफॉर्म को लेकर आगे क्या योजना है?

- मेरे अनुसार नए मीडिया का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। तकनीक के विकास के साथ इस क्षेत्र में और भी नई संभावनाएं सामने आएंगी। लोगों को भी तकनीक के साथ खुद को अपडेट करना होगा और आधुनिक सोच अपनानी होगी, नहीं तो वे इस तेजी से बदलती दुनिया के साथ तालमेल नहीं बैठा पाएंगे।

 

 

 

 

 UPSC टॉपर ए.आर. राजा मोहिदीन से विशेष बातचीत

चेन्नई के रहने वाले ए.आर. राजा मोहिदीन (A.R. Rajah Mohaideen) ने इस वर्ष संघ लोक सेवा आयोग यानी Union Public Service Commission (UPSC) द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 7 हासिल कर शानदार सफलता पाई है। मेडिकल शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने सिविल सेवा का रास्ता चुना और चार वर्षों की निरंतर तैयारी, स्पष्ट लक्ष्य और कड़ी मेहनत के दम पर यह मुकाम हासिल किया। प्रस्तुत हैं एडइनबॉक्स (EdInbox) के लिए रईस अहमद 'लाली' (Raees Ahmad 'Lali') द्वारा उनसे की गई बातचीत के प्रमुख अंश:

रिजल्ट आने के बाद आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?

ए.आर. राजा मोहिदीन: सच कहूं तो मैं पूरी तरह चौंक गया था। मुझे उम्मीद थी कि मेरा चयन हो सकता है, लेकिन टॉप 10 में, वह भी सिंगल डिजिट रैंक मिलेगी—यह सोचा नहीं था। खुशी भी थी, लेकिन यकीन करने में थोड़ा समय लगा।

आपने UPSC की तैयारी कब शुरू की और कितने साल लगे?

राजा मोहिदीन: मैंने 2022 में तैयारी शुरू की थी। अब इसे चार साल हो चुके हैं। यह सफर लंबा था, लेकिन लगातार मेहनत करता रहा।

जामिया की कोचिंग का आपकी सफलता में कितना योगदान रहा?

राजा मोहिदीन: पहले एक साल मैंने चेन्नई में तैयारी की, लेकिन 2023 में प्रीलिम्स पास नहीं कर पाया। इसके बाद मैंने Jamia Millia Islamia की रेजिडेंशियल कोचिंग अकादमी की प्रवेश परीक्षा दी और चयन हो गया। दिल्ली आने के बाद पढ़ाई के लिए बहुत अच्छा माहौल मिला। प्रोफेसर समीना बानो मैम और अन्य शिक्षकों ने काफी मार्गदर्शन दिया। यहां की लाइब्रेरी, अखबार और सीनियर्स का सहयोग बहुत मददगार रहा। सीनियर्स ने मेरी गलतियां पहचानने और सुधारने में अहम भूमिका निभाई।

पहले प्रयास में क्या कमी रह गई थी?

राजा मोहिदीन: पहले प्रयास में मैं प्रीलिम्स क्लियर नहीं कर पाया। मैंने मॉक टेस्ट की पर्याप्त प्रैक्टिस नहीं की थी। हालांकि, उसी समय मैं मेंस की तैयारी भी करता रहा। मेंस की लगातार तैयारी का फायदा इस बार मिला और अच्छे अंक आए।

आपके विषय कौन-कौन से थे?

राजा मोहिदीन: जनरल स्टडीज़ तो सभी के लिए समान होता है। मेरा ऑप्शनल विषय एंथ्रोपोलॉजी था।

आप एमबीबीएस डॉक्टर हैं। फिर सिविल सेवा में आने का फैसला क्यों लिया?

राजा मोहिदीन: मैंने Government Cuddalore Medical College से MBBS किया। मेरी मेडिकल पढ़ाई 2016 में शुरू हुई और 2022 में पूरी हुई। शुरुआत में सिविल सेवा में आने की कोई योजना नहीं थी। लेकिन इंटर्नशिप के दौरान ही कोविड-19 महामारी का समय था। मैंने अपने शहर में सिविल सेवकों को लोगों के लिए दिन-रात काम करते देखा। वहीं से प्रेरणा मिली। मुझे लगा कि एक सिविल सेवक के रूप में मैं समाज के बड़े वर्ग की सेवा कर सकता हूं। इसी सोच ने मुझे ग्रेजुएशन के बाद UPSC की तैयारी के लिए प्रेरित किया।

आपके माता-पिता क्या करते हैं?

राजा मोहिदीन: मेरे माता-पिता शिक्षक रहे हैं और फिलहाल तमिलनाडु के सरकारी कॉलेजों में प्रिंसिपल के पद पर कार्यरत हैं।

जो छात्र UPSC की तैयारी कर रहे हैं, उन्हें आप क्या सलाह देना चाहेंगे?

राजा मोहिदीन: सबसे जरूरी है कि आपका लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। हमेशा याद रखें कि आपने यह परीक्षा क्यों चुनी है। यह सफर लंबा हो सकता है—मुझे चार साल लगे। इस दौरान मानसिक मजबूती और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।

दूसरी अहम बात है सिलेबस पर फोकस बनाए रखना। तैयारी बिखरी हुई नहीं होनी चाहिए।

रोज कितने घंटे पढ़ाई करनी चाहिए?

राजा मोहिदीन: मेरे हिसाब से घंटों की गिनती उतनी मायने नहीं रखती। जरूरी यह है कि आप अपना तय लक्ष्य पूरा करें। महीने और हफ्ते का टारगेट बनाएं और उसे हर हाल में पूरा करें। कुछ दिन मैंने पांच घंटे पढ़ाई की, कुछ दिन दस घंटे, लेकिन टारगेट पूरा किया।

सफलता का मूल मंत्र क्या रहा?

राजा मोहिदीन: लक्ष्य की स्पष्टता, नियमित तैयारी, सिलेबस पर पकड़ और मानसिक संतुलन—यही मेरी सफलता की कुंजी रहे।

जैसे-जैसे बैंकिंग तेजी से ब्रांच आधारित सेवाओं से आगे बढ़कर पूरी तरह डिजिटल इकोसिस्टम की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस बदलाव को दिशा देने में प्रोडक्ट मैनेजर्स की भूमिका बेहद अहम हो गई है। इसी बदलाव के केंद्र में काम कर रहे हैं अभिनव श्रीवास्तव, जो तकनीक, नियामकीय ढांचे और ग्राहक-केंद्रित नवाचार के बीच संतुलन बनाकर काम करते हैं।

भारत के बैंकिंग और वित्तीय सेवा क्षेत्र में सात साल से अधिक के अनुभव के साथ, उन्होंने जटिल व्यावसायिक जरूरतों को सुरक्षित, स्केलेबल और उपयोगकर्ता के अनुकूल डिजिटल प्रोडक्ट्स में बदलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।

वर्तमान में अभिनव श्रीवास्तव RBL बैंक में सीनियर प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं। वे बैंक के वेब और मोबाइल प्लेटफॉर्म के लिए पूरे प्रोडक्ट रोडमैप और उसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी संभालते हैं। इंजीनियरिंग, UX, मार्केटिंग, कंप्लायंस और ऑपरेशंस टीमों के साथ मिलकर वे यह सुनिश्चित करते हैं कि हर नवाचार सुरक्षा और नियामकीय मानकों के अनुरूप हो। उनका काम प्रोडक्ट के पूरे जीवनचक्र को कवर करता है—आइडिया से लेकर प्राथमिकता तय करने, डिलीवरी और लॉन्च के बाद सुधार तक—और यह सब डेटा आधारित निर्णयों पर आधारित होता है।

अपने करियर में अभिनव ने IndiaLends, ICICI बैंक और कोटक महिंद्रा प्राइम जैसी संस्थाओं के साथ काम किया है। यहां उन्हें डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्म, ग्राहक अधिग्रहण प्रक्रिया, SaaS और CRM सिस्टम तथा बड़े स्तर पर डिजिटल अपनाने का गहरा अनुभव मिला।

शिक्षा की बात करें तो उन्होंने ICFAI फाउंडेशन फॉर हायर एजुकेशन से मार्केटिंग में MBA और PGPM किया है, जबकि लखनऊ विश्वविद्यालय से इंटरनेशनल बिजनेस में BBA किया है। यह शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें सख्त नियामकीय माहौल में प्रभावी डिजिटल प्रोडक्ट तैयार करने की मजबूत समझ देती है।

सवाल: आपकी औपचारिक शिक्षा (MBA, PGPM, BBA) ने बैंकिंग जैसे कड़े नियामकीय सेक्टर में प्रोडक्ट स्ट्रैटेजी और निर्णय लेने की सोच को कैसे प्रभावित किया? उन छात्रों को क्या सलाह देंगे जो मानते हैं कि डिग्री ही टेक और फिनटेक में सफलता की गारंटी है?

- मेरी शिक्षा ने निश्चित रूप से एक मजबूत आधार दिया, लेकिन यह कभी भी अकेला अंतर पैदा करने वाला फैक्टर नहीं रही। BBA से मुझे ग्लोबल लेवल पर बिजनेस की समझ मिली, जबकि MBA और PGPM ने उपभोक्ता व्यवहार, रणनीति और निर्णय लेने की क्षमता को और मजबूत किया। बैंकिंग जैसे रेगुलेटेड सेक्टर में यह संरचित सोच काफी मदद करती है, जहां ग्रोथ, कस्टमर एक्सपीरियंस और कंप्लायंस के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।

लेकिन करियर की शुरुआत में ही मुझे यह समझ आ गया था कि डिग्रियां आपको असल दुनिया की जटिलताओं के लिए पूरी तरह तैयार नहीं करतीं। क्लासरूम यह नहीं सिखाता कि अधूरी जरूरतों, स्टेकहोल्डर के दबाव या अचानक आने वाले नियामकीय बदलावों को कैसे संभालना है। यह सब अनुभव से ही आता है। जो छात्र मानते हैं कि डिग्री ही सफलता की गारंटी है, उनसे मैं कहूंगा कि डिग्री आपको मौके तक पहुंचा सकती है, लेकिन वहां टिके रहना आपकी सीखने की गति, अनुकूलन क्षमता और काम करने के तरीके पर निर्भर करता है।

सवाल: सीमित संसाधनों में, जब आप वेब, मोबाइल, CRM और लेंडिंग जैसे कई डिजिटल प्लेटफॉर्म संभालते हैं, तो निवेश को कैसे प्राथमिकता देते हैं? मौजूदा फीचर्स सुधारने और नए फीचर लॉन्च करने के बीच कैसे फैसला करते हैं?

- जब संसाधन सीमित होते हैं, तो मैं सबसे पहले यह देखता हूं कि ग्राहक या बिजनेस की सबसे बड़ी समस्या कहां है। इसके लिए डेटा अहम भूमिका निभाता है—जैसे हाई ट्रैफिक जर्नी, ड्रॉप-ऑफ पॉइंट्स और वे प्लेटफॉर्म जो सीधे रेवेन्यू या कंप्लायंस से जुड़े हों। अगर कोई मौजूदा फीचर किसी जरूरी प्रक्रिया में बाधा बन रहा है, तो पहले उसे सुधारना मेरी प्राथमिकता होती है।

मेरे फैसले के मानदंड साफ होते हैं—ग्राहक पर प्रभाव, बिजनेस वैल्यू, नियामकीय जरूरत और मेहनत के मुकाबले मिलने वाला फायदा। बैंकिंग जैसे सेक्टर में मौजूदा जर्नी को बेहतर बनाना अक्सर कम जोखिम के साथ जल्दी परिणाम देता है, जबकि नए फीचर तभी लाए जाते हैं जब वे नया रेवेन्यू, कंप्लायंस समाधान या स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दें।

सवाल: मैनेजमेंट एजुकेशन और आज के डिजिटल प्रोडक्ट लीडर्स से इंडस्ट्री की अपेक्षाओं के बीच आपको क्या अंतर नजर आता है?

- मैनेजमेंट एजुकेशन फ्रेमवर्क और संरचित सोच सिखाने में अच्छा काम करती है, लेकिन इंडस्ट्री आज ऐसे प्रोडक्ट लीडर्स चाहती है जो अनिश्चित परिस्थितियों में भी परिणाम दे सकें। वास्तविक दुनिया में प्राथमिकताएं तेजी से बदलती हैं और अक्सर अधूरी जानकारी के साथ फैसले लेने पड़ते हैं। एक बड़ा अंतर तकनीकी समझ का भी है। प्रोडक्ट लीडर्स को कोडिंग आना जरूरी नहीं है, लेकिन सिस्टम, APIs और प्लेटफॉर्म की समझ होना जरूरी है ताकि वे इंजीनियरिंग टीम के साथ व्यावहारिक निर्णय ले सकें। इसके अलावा, स्टेकहोल्डर मैनेजमेंट और एग्जीक्यूशन स्किल्स—जहां बिजनेस, टेक, UX, कंप्लायंस और टाइमलाइन का संतुलन बनाना पड़ता है—ये चीजें क्लासरूम से ज्यादा फील्ड एक्सपीरियंस से आती हैं।

सवाल: डिजिटल लेंडिंग या बैंकिंग प्रोडक्ट में आप पूरे लाइफसाइकिल के दौरान किन KPIs को ट्रैक करते हैं और उनका इस्तेमाल कैसे करते हैं?

- मैं KPIs को सिर्फ रिपोर्टिंग के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए देखता हूं कि ग्राहक प्रोडक्ट में कहां अटक रहा है। अधिग्रहण चरण में ट्रैफिक क्वालिटी, CTR और लीड से एप्लिकेशन रेशियो पर नजर रहती है। ऑनबोर्डिंग में हर स्टेप पर ड्रॉप-ऑफ, प्रक्रिया पूरी करने में लगा समय और STP रेट अहम होते हैं। एंगेजमेंट के लिए एक्टिव यूजर्स, फीचर यूसेज और जर्नी कम्प्लीशन देखी जाती है। रिटेंशन में रीपीट यूसेज और रिटर्न रेट्स से भरोसे और जुड़ाव का अंदाजा मिलता है। मोनिटाइजेशन में फंडेड अकाउंट या लोन कन्वर्जन, प्रति ग्राहक रेवेन्यू और क्रॉस-सेल पर फोकस रहता है। इन मेट्रिक्स के आधार पर बैकलॉग को प्राथमिकता दी जाती है, ड्रॉप-ऑफ पॉइंट्स सुधारे जाते हैं और UX या मैसेजिंग में बदलाव किए जाते हैं।

सवाल: आपके क्षेत्र में निरंतर सीखने की कितनी अहमियत है और यूनिवर्सिटीज को छात्रों को डिजिटल भविष्य के लिए कैसे तैयार करना चाहिए?

- फिनटेक और बैंकिंग में निरंतर सीखना बेहद जरूरी है क्योंकि तकनीक, नियम और ग्राहक की उम्मीदें लगातार बदलती रहती हैं। जो आज काम करता है, वह कुछ सालों में अप्रासंगिक हो सकता है। यूनिवर्सिटीज को चाहिए कि वे खास टूल्स सिखाने के बजाय समस्या समाधान, आलोचनात्मक सोच और अनिश्चितता के साथ काम करने की क्षमता विकसित करें। रियल वर्ल्ड प्रोजेक्ट्स, इंडस्ट्री केस स्टडी और इंटर्नशिप से छात्रों को तेजी से बदलते डिजिटल इकोसिस्टम की बेहतर समझ मिल सकती है। लक्ष्य यह होना चाहिए कि छात्र सीखते रहना सीखें, न कि डिग्री के साथ सीखने की प्रक्रिया खत्म मान लें।

करियर, कोर्स, कॉलेज और भविष्य—सब कुछ जरूरी लगता है, सब कुछ स्थायी लगता है। रैंकिंग, वायरल सक्सेस स्टोरीज़, सोशल मीडिया की सलाह और अंतहीन तुलना के बीच आज के छात्र विकल्पों की कमी से नहीं, बल्कि स्पष्टता की कमी से जूझ रहे हैं।

एडइनबॉक्स (Edinbox) की Voices That Educate सीरीज़ के इस संस्करण में Edinbox की वर्टिकल हेड–PR और कम्युनिकेशंस, पूजा खन्ना, BCM स्कूल, लुधियाना की फाउंडर प्रिंसिपल वंदना शाही के साथ एक विचारपूर्ण संवाद करती हैं। वंदना शाही राष्ट्रीय पुरस्कार (2022) से सम्मानित हैं और CBSE डिस्ट्रिक्ट ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर भी हैं। छात्र-केंद्रित सोच के लिए जानी जाने वाली वंदना शाही नेतृत्व को करुणा, यथार्थ और विवेक के साथ जोड़ती हैं।

प्रश्न 1: आज एक सफल करियर बनाने को लेकर छात्रों की सबसे बड़ी गलतफहमी क्या है?

- कई छात्र मानते हैं कि किसी प्रतिष्ठित संस्थान में दाख़िला या किसी “ट्रेंडिंग” स्ट्रीम का चुनाव सफलता की गारंटी है। लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल है। आज करियर लचीले, अनिश्चित और पूरी तरह कौशल-आधारित हैं। अब दुनिया केवल डिग्री पर नहीं, बल्कि सोच की फुर्ती, गहरी दक्षता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता, समस्या-समाधान क्षमता और लगातार सीखने की भूख पर भरोसा करती है।

आज नियोक्ता डिग्री और पदनाम से आगे देखकर ऐसे लोगों को तलाशते हैं जो स्वतंत्र रूप से सोच सकें, तेज़ी से ढल सकें, सार्थक सहयोग करें और वास्तविक समय में मूल्य जोड़ें। इस बदलते परिदृश्य में सफलता उन्हें मिलती है जो व्यापक अनुभव के साथ किसी एक क्षेत्र में गहरी महारत विकसित करते हैं—जो अलग-अलग विषयों को जोड़ पाते हैं और विशेषज्ञता की मजबूत नींव पर खड़े रहते हैं। अंततः सार्थक करियर शुरुआती लेबल या सीधी रेखाओं से नहीं, बल्कि उद्देश्य, निरंतर प्रयास, नैतिक आधार और बदलाव के साथ आगे बढ़ने के साहस से बनता है।

प्रश्न 2: शिक्षा को “इंडस्ट्री-ड्रिवन” कहा जाता है, फिर भी कई ग्रेजुएट खुद को तैयार क्यों नहीं मानते?

- असल डिसकनेक्ट इरादों में नहीं, बल्कि क्रियान्वयन में है। शिक्षा को भले ही इंडस्ट्री-ड्रिवन कहा जाए, पर अक्सर जोर कंटेंट मिलान पर रहता है, क्षमता विकास पर नहीं। सिलेबस उद्योग के ट्रेंड दिखा सकता है, लेकिन कक्षा में अब भी रटने, सही जवाब और परीक्षा प्रदर्शन को प्राथमिकता मिलती है—जबकि कार्यस्थल पर क्रिटिकल थिंकिंग, सहयोग, निर्णय-क्षमता, अनुकूलन और जिम्मेदारी की मांग होती है।

शिक्षा आज छात्रों को परीक्षाएँ पास कराने के लिए तैयार करती है, अस्पष्ट परिस्थितियों से निपटने के लिए नहीं। दूसरी ओर इंडस्ट्री अनिश्चितता में काम करती है, जहाँ समस्याएँ स्पष्ट नहीं होतीं, समाधान विकसित होते रहते हैं और जवाबदेही सबसे अहम होती है। बदलाव की तेज़ रफ्तार इस अंतर को और बढ़ा देती है, क्योंकि स्थिर सिलेबस गतिशील पेशेवर वास्तविकताओं के साथ कदम नहीं मिला पाते।

वास्तविक तालमेल तब बनेगा जब शिक्षा परीक्षा-केंद्रित से अनुभव-केंद्रित बने—जब सीखने में अनुप्रयोग, चिंतन, मेंटरशिप, नैतिक विवेक और भावनात्मक बुद्धिमत्ता पर जोर होगा। तभी ग्रेजुएट खुद को कमजोर नहीं, बल्कि सीखने, अनसीखने और आत्मविश्वास के साथ नेतृत्व करने के लिए सशक्त महसूस करेंगे।

प्रश्न 3: छात्र परिणाम बेहतर करने के लिए सिस्टम में कौन-से बदलाव तात्कालिक हैं?

- सबसे पहले, अंकों-केंद्रित सोच से सीखने-केंद्रित संस्कृति की ओर बढ़ना होगा। जब सफलता की परिभाषा केवल परीक्षा तय करती है, तो समझ, रचनात्मकता, जिज्ञासा और वास्तविक जीवन में उपयोग पीछे छूट जाते हैं। आकलन का उद्देश्य रैंकिंग नहीं, बल्कि विकास और आत्ममंथन होना चाहिए।

दूसरा, शिक्षकों का सशक्तिकरण और सतत पेशेवर विकास अनिवार्य है। 21वीं सदी के परिणाम पुराने प्रशिक्षण से नहीं मिल सकते। शिक्षकों को समय, भरोसा, स्वायत्तता और सीखने-सहयोग-नवाचार के अवसर चाहिए—सशक्त शिक्षक ही छात्रों को गहराई से जोड़ते हैं।

अंत में, अनुभवात्मक सीख, इंटरडिसिप्लिनरी सोच और जरूरी जीवन कौशल को मुख्य पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। छात्रों को सिर्फ परीक्षा या नौकरी के लिए नहीं, बल्कि जटिलता, अनिश्चितता और आजीवन सीखने के लिए तैयार किया जाए। यही बदलाव शिक्षा को कठोर ढांचे से उत्तरदायी इकोसिस्टम में बदलेंगे।

प्रश्न 4: AI और डिजिटल टूल्स के दौर में कौन-से मानवीय कौशल और महत्वपूर्ण होंगे?

- जब बुद्धिमत्ता को ऑटोमेट किया जा सकता है, तब शिक्षा का पैमाना “क्या जानते हैं” से “कैसे सोचते हैं और क्या बनते हैं” पर आ जाता है। AI के युग में क्रिटिकल थिंकिंग और नैतिक विवेक सबसे जरूरी होंगे—ताकि सत्य पहचाना जा सके, एल्गोरिदम पर सवाल उठाए जा सकें और मूल्य-आधारित निर्णय लिए जा सकें।

रचनात्मकता और मौलिक सोच नवाचार को परिभाषित करेंगी, क्योंकि मशीनें पैटर्न दोहरा सकती हैं, उद्देश्य नहीं। साथ ही भावनात्मक बुद्धिमत्ता, सहानुभूति और प्रभावी संचार नेतृत्व, सहयोग और भरोसे की बुनियाद हैं। बदलाव सामान्य होगा, तो अनुकूलन क्षमता, लचीलापन और आत्म-जागरूकता दीर्घकालिक प्रासंगिकता तय करेंगे। तकनीक क्षमता बढ़ा सकती है, दिशा इंसानी विवेक और जिज्ञासा ही देती है।

प्रश्न 5: शिक्षा में ईमानदार संवाद कितना जरूरी है और Edinbox जैसी प्लेटफॉर्म्स विश्वसनीयता कैसे बनाए रखें?

- ईमानदार संवाद वैकल्पिक नहीं, बल्कि भरोसे और सार्थक सीख की नींव है। जानकारी की भरमार में स्पष्टता दावों से ज्यादा अहम है। पारदर्शी संवाद अपेक्षाओं को वास्तविकता से जोड़ता है—वरना शिक्षा लेन-देन बनकर रह जाती है।

एडइनबॉक्स (Edinbox) जैसे प्लेटफॉर्म्स सीखने वालों और संस्थानों के बीच नैतिक मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। सटीकता, संपादकीय ईमानदारी और छात्र-केंद्रित कंटेंट को प्राथमिकता देकर ही विश्वसनीयता बनी रहती है। सत्यापित जानकारी, संतुलित दृष्टिकोण और उद्देश्यपूर्ण सामग्री के साथ संस्थागत सहयोग संभव है। ईमानदार और मूल्य-आधारित संवाद शिक्षा संस्कृति को ऊंचा उठाता है।

प्रश्न 6: विकल्पों और रैंकिंग की भीड़ में छात्रों को क्या फ़िल्टर करना चाहिए?

- आज सबसे बड़ा कौशल है—विवेक। रैंकिंग और सलाह मार्गदर्शन दे सकती हैं, पर आत्म-चिंतन का विकल्प नहीं बननी चाहिए। छात्रों को पूछना चाहिए—“क्या लोकप्रिय है?” नहीं, बल्कि “क्या मेरी ताकत, मूल्यों और दीर्घकालिक विकास से मेल खाता है?”

जो ध्यान के योग्य है, वह गहराई बनाता है—ऐसे प्रोग्राम, मेंटर्स और अनुभव जो सोच, लचीलापन, नैतिकता और ट्रांसफरेबल स्किल्स विकसित करें। रैंकिंग एक समय की प्रतिष्ठा दिखाती है, व्यक्तिगत फिट या बदलाव की तैयारी नहीं। शोर में स्पष्टता भीतर से आती है।

प्रश्न 7: महिला लीडर के रूप में आपके सामने कौन-सी सूक्ष्म चुनौतियाँ रहीं?

- कई चुनौतियाँ खुली नहीं थीं—अदृश्य अपेक्षाएँ और खामोश समझौते। बार-बार योग्यता साबित करने का दबाव, सहानुभूति और अधिकार का संतुलन, बिना मान्यता के भावनात्मक श्रम—ये सब यात्रा को आकार देते हैं। कभी महत्वाकांक्षा को आक्रामकता समझा गया, तो संयम को सहमति।

मैंने रणनीतिक आत्म-जागरूकता और आंतरिक लचीलापन विकसित किया—कब दृढ़ बोलना है, कब परिणामों को बोलने देना है; अपराधबोध के बिना सीमाएँ तय करना; संदेह के बिना महत्वाकांक्षा बनाए रखना। मेंटरशिप, चिंतन और मजबूत मूल्य-प्रणाली मेरे सहारे बने। प्रभावी नेतृत्व पुराने ढाँचों में फिट होने से नहीं, बल्कि सोच-समझकर उन्हें नया रूप देने से आता है।

प्रश्न 8: स्टोरीटेलिंग और वास्तविक अनुभव छात्रों के फैसलों में कैसे मदद करते हैं?

- कहानियाँ अमूर्त विचारों और वास्तविक जीवन के बीच पुल बनाती हैं। डेटा और रैंकिंग जानकारी देते हैं, लेकिन कहानियाँ मानवीय पहलू दिखाती हैं—सफलता, असफलता और पुनर्निर्माण की जटिलताएँ। इससे छात्र समझते हैं कि करियर अक्सर सीधी राह पर नहीं चलते।

कहानियाँ भावनात्मक जुड़ाव और आत्म-चिंतन पैदा करती हैं, पारंपरिक मानकों से आगे संभावनाएँ दिखाती हैं और उन जटिलताओं से परिचित कराती हैं जिन्हें कोई सिलेबस पूरी तरह नहीं सिखा सकता। वास्तविक यात्राओं से जुड़कर छात्र विवेक, लचीलापन और आत्म-जागरूकता विकसित करते हैं—यह प्रेरणा ही नहीं, अंतर्ज्ञान की शिक्षा है।

प्रश्न 9: शिक्षा मीडिया पोर्टल्स को आगे किस तरह की बातचीत का नेतृत्व करना चाहिए?

- सूचना देने से आगे बढ़कर शिक्षा मीडिया को विवेक का क्यूरेटर और सार्थक संवाद का उत्प्रेरक बनना होगा। उन्हें यह सवाल उठाने चाहिए कि छात्र क्या सीखते हैं ही नहीं, क्यों और किस उद्देश्य से।

ऑटोमेशन, असमानता और तेज़ सामाजिक बदलाव के दौर में शिक्षा के उद्देश्य, तकनीक के नैतिक उपयोग, मानसिक स्वास्थ्य, समान अवसर, आजीवन सीख और भविष्य के काम पर चर्चा जरूरी है। सनसनी या रैंकिंग-ड्रिवन नैरेटिव्स के बजाय साक्ष्य-आधारित विमर्श को बढ़ावा दिया जाए। ऐसा मीडिया ट्रेंड्स रिपोर्ट नहीं करता—संस्कृति गढ़ता है।

प्रश्न 10: छात्रों के लिए वह सलाह जो कम सुनते हैं, पर सबसे जरूरी है?

- उपलब्धियों और तेज़ी के शोर में यह याद नहीं दिलाया जाता कि प्रगति से पहले उद्देश्य आता है। हर कोई जल्दी नहीं खिलता, हर योगदान तुरंत दिखाई नहीं देता। विकास अक्सर खामोशी में परिपक्व होता है—चिंतन, सीखने योग्य गलतियों और शांत दृढ़ता से।

स्थायी सफलता तब आती है जब योग्यता, मूल्य और प्रयास एक दिशा में हों—बिना जल्दबाज़ी। सच्ची सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं से अर्थ, प्रभाव और भलाई रचना है। करुणा, ईमानदारी और सेवा-भाव से जुड़ी महत्वाकांक्षा न सिर्फ करियर बनाती है, बल्कि एक अधिक संवेदनशील, जिम्मेदार और आशावादी दुनिया का निर्माण करती है।

भारत की चिकित्सा शिक्षा एक नए बदलाव के दौर से गुजर रही है। राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग (NMC) ने घोषणा की है कि शैक्षणिक सत्र 2026-27 पोस्टग्रेजुएट (PG) डिप्लोमा मेडिकल कोर्स में प्रवेश का अंतिम वर्ष होगा। इसके बाद 2027-28 से इन पाठ्यक्रमों में नए दाखिले नहीं होंगे और इन्हें चरणबद्ध तरीके से एमडी (MD) तथा एमएस (MS) डिग्री पाठ्यक्रमों में परिवर्तित किया जाएगा। पहली नजर में यह फैसला केवल पाठ्यक्रमों के पुनर्गठन जैसा लगता है, लेकिन वास्तव में इसका प्रभाव भारत की चिकित्सा शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और विशेषज्ञ डॉक्टरों की उपलब्धता तक दिखाई देगा।

बीते कई दशकों से पीजी डिप्लोमा मेडिकल कोर्स उन डॉक्टरों के लिए एक महत्वपूर्ण विकल्प रहे हैं, जो कम अवधि में किसी विशेष विषय में प्रशिक्षण लेकर स्वास्थ्य सेवाओं से जुड़ना चाहते थे। विशेष रूप से जिला अस्पतालों और छोटे शहरों में कार्यरत डॉक्टरों के लिए यह व्यवस्था काफी उपयोगी मानी जाती थी। लेकिन बदलते समय में चिकित्सा विज्ञान की जटिलताओं, आधुनिक उपचार तकनीकों और वैश्विक मानकों को देखते हुए डिग्री आधारित विशेषज्ञ शिक्षा की आवश्यकता लगातार महसूस की जा रही थी। इसी पृष्ठभूमि में एनएमसी का यह निर्णय सामने आया है।

इस फैसले का सबसे सकारात्मक पक्ष यह है कि देशभर में स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा का स्वरूप अधिक समान और मानकीकृत होगा। अभी तक कई संस्थानों में एक ही विषय में डिप्लोमा और डिग्री दोनों प्रकार के पाठ्यक्रम चलते थे, जिससे प्रशिक्षण की अवधि, पाठ्यक्रम और विशेषज्ञता के स्तर में अंतर देखने को मिलता था। यदि सभी सीटें एमडी और एमएस कार्यक्रमों में बदलती हैं तो छात्रों को अधिक व्यापक प्रशिक्षण मिलेगा और उनकी योग्यता का स्तर भी एक समान होगा।

दूसरा महत्वपूर्ण पहलू स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता से जुड़ा है। आधुनिक चिकित्सा में केवल सैद्धांतिक ज्ञान पर्याप्त नहीं है। जटिल बीमारियों के इलाज, नई तकनीकों के उपयोग और अनुसंधान आधारित चिकित्सा के लिए विशेषज्ञ डॉक्टरों का बेहतर प्रशिक्षण आवश्यक है। डिग्री आधारित पाठ्यक्रम इस दिशा में अधिक व्यवस्थित और व्यापक माने जाते हैं। ऐसे में यह बदलाव भविष्य में मरीजों को बेहतर चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराने में भी मदद कर सकता है।

हालांकि इस फैसले के साथ कुछ व्यावहारिक चुनौतियां भी जुड़ी हुई हैं। सबसे बड़ा प्रश्न यह है कि क्या देश के सभी मेडिकल कॉलेज एमडी और एमएस सीटों में बदलाव के लिए आवश्यक फैकल्टी, अस्पतालों में मरीजों की संख्या, बुनियादी ढांचे और शिक्षण संसाधनों की शर्तों को पूरा कर पाएंगे? यदि सीटों का रूपांतरण समय पर नहीं हो सका तो स्नातकोत्तर चिकित्सा शिक्षा में सीटों की उपलब्धता प्रभावित हो सकती है। इसका सीधा असर उन हजारों एमबीबीएस स्नातकों पर पड़ेगा जो हर वर्ष पीजी प्रवेश परीक्षा में शामिल होते हैं।

यह भी ध्यान रखना होगा कि भारत पहले से ही विशेषज्ञ डॉक्टरों की कमी से जूझ रहा है, खासकर ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों में। यदि संक्रमण काल के दौरान सीटों की संख्या घटती है या नए डिग्री कार्यक्रम पर्याप्त गति से शुरू नहीं हो पाते, तो स्वास्थ्य व्यवस्था पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है। इसलिए केवल नीति बनाना पर्याप्त नहीं होगा, बल्कि उसके प्रभावी क्रियान्वयन पर भी उतना ही ध्यान देना होगा।

एनएमसी ने मेडिकल कॉलेजों को डिप्लोमा सीटों को एमडी और एमएस में बदलने की प्रक्रिया शुरू करने के निर्देश दिए हैं। यदि यह प्रक्रिया पारदर्शी, समयबद्ध और संसाधनों के उचित विकास के साथ पूरी होती है, तो यह भारतीय चिकित्सा शिक्षा के लिए एक महत्वपूर्ण सुधार साबित हो सकती है। लेकिन यदि आवश्यक बुनियादी सुविधाओं और शिक्षकों की उपलब्धता सुनिश्चित नहीं की गई, तो इस बदलाव का उद्देश्य अधूरा रह सकता है।

भारत की स्वास्थ्य व्यवस्था तेजी से बदल रही है। बढ़ती आबादी, नई बीमारियां और आधुनिक चिकित्सा तकनीकें ऐसे विशेषज्ञ डॉक्टरों की मांग कर रही हैं, जो केवल डिग्रीधारी ही नहीं बल्कि बेहतर प्रशिक्षित भी हों। ऐसे में एनएमसी का यह फैसला भविष्य की जरूरतों के अनुरूप दिखाई देता है। फिर भी किसी भी बड़े शैक्षणिक सुधार की सफलता उसके क्रियान्वयन पर निर्भर करती है।

यह बदलाव केवल डिप्लोमा कोर्स समाप्त करने का निर्णय नहीं है, बल्कि चिकित्सा शिक्षा की गुणवत्ता को नए स्तर पर ले जाने की कोशिश है। अब चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि इस परिवर्तन के दौरान छात्रों के अवसर कम न हों, मेडिकल कॉलेजों की क्षमता बढ़े और देश को अधिक संख्या में योग्य विशेषज्ञ डॉक्टर मिल सकें। यदि ऐसा होता है, तो यह फैसला आने वाले वर्षों में भारतीय चिकित्सा शिक्षा के इतिहास में एक महत्वपूर्ण सुधार के रूप में याद किया जाएगा।

भारत में प्रतियोगी परीक्षाएं सिर्फ एक परीक्षा नहीं होतीं, बल्कि करोड़ों युवाओं के भविष्य का फैसला करती हैं। एक सीट, कुछ अंक और कुछ घंटों की परीक्षा कई छात्रों के वर्षों की मेहनत का परिणाम तय करती है। ऐसे में जब परीक्षा प्रक्रिया पर ही सवाल उठने लगें तो नुकसान केवल एक परीक्षा का नहीं होता, बल्कि पूरे शिक्षा तंत्र की विश्वसनीयता प्रभावित होती है।

मई 2026 में देश की चार बड़ी परीक्षाएं—नीट यूजी, सीयूईटी यूजी, सीबीएसई 12वीं बोर्ड और एसएससी जीडी—अलग-अलग कारणों से विवादों में रहीं। इन चारों मामलों की प्रकृति अलग हो सकती है, लेकिन एक बात समान है: छात्रों का भरोसा लगातार कमजोर हो रहा है।

नीट यूजी में पेपर लीक के आरोप सबसे गंभीर हैं। यह देश की सबसे बड़ी मेडिकल प्रवेश परीक्षा है, जिसमें हर साल लाखों छात्र भाग लेते हैं। जब परीक्षा रद्द होती है और दोबारा कराने की नौबत आती है, तो केवल प्रशासनिक चुनौती नहीं पैदा होती, बल्कि छात्रों पर मानसिक और आर्थिक दबाव भी बढ़ जाता है। कई छात्र महीनों तक तैयारी करते हैं, परिवार बड़ी उम्मीदों के साथ उनका साथ देता है, और फिर अचानक पूरी प्रक्रिया दोबारा शुरू करनी पड़ती है। यह स्थिति किसी भी परीक्षा प्रणाली के लिए चिंता का विषय है

दूसरी तरफ, सीयूईटी यूजी में सामने आई तकनीकी गड़बड़ियां डिजिटल परीक्षा प्रणाली की तैयारियों पर सवाल खड़े करती हैं। पिछले कुछ वर्षों में देश तेजी से कंप्यूटर आधारित परीक्षाओं की ओर बढ़ा है। इसका उद्देश्य पारदर्शिता और दक्षता बढ़ाना था। लेकिन यदि सर्वर, नेटवर्क और तकनीकी ढांचे की पर्याप्त तैयारी नहीं होगी, तो सबसे अधिक नुकसान छात्रों को ही उठाना पड़ेगा। कई केंद्रों पर छात्रों को घंटों इंतजार करना पड़ा। गर्मी, तनाव और अनिश्चितता के बीच परीक्षा देना किसी भी अभ्यर्थी के लिए आसान नहीं होता।

सीबीएसई की ऑन-स्क्रीन मार्किंग प्रणाली को आधुनिक मूल्यांकन की दिशा में एक बड़ा कदम माना गया था। लेकिन यदि परिणाम आने के बाद बड़ी संख्या में छात्र मूल्यांकन पर सवाल उठा रहे हैं, पुनर्मूल्यांकन के लिए आवेदन कर रहे हैं और उत्तर पुस्तिकाओं की जांच को लेकर शिकायतें सामने आ रही हैं, तो बोर्ड को केवल तकनीक पर भरोसा करने के बजाय उसकी विश्वसनीयता को साबित भी करना होगा। शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता उतनी ही महत्वपूर्ण है जितनी निष्पक्षता।

एसएससी जीडी परीक्षा में सामने आई अव्यवस्थाएं एक अलग समस्या की ओर संकेत करती हैं। परीक्षा केंद्रों पर भीड़, बैठने की अपर्याप्त व्यवस्था, सर्वर संबंधी दिक्कतें और कुछ शिफ्टों का रद्द होना यह दर्शाता है कि परीक्षा प्रबंधन की मूलभूत चुनौतियां अब भी बनी हुई हैं। जब लाखों उम्मीदवार किसी परीक्षा में शामिल होते हैं, तब केवल प्रश्नपत्र तैयार करना ही पर्याप्त नहीं होता, बल्कि पूरी व्यवस्था का सुचारू संचालन भी उतना ही महत्वपूर्ण होता है।

इन घटनाओं को अलग-अलग घटनाएं मानकर नजरअंदाज करना आसान होगा, लेकिन असल सवाल इससे कहीं बड़ा है। क्या भारत की परीक्षा प्रणाली बढ़ती संख्या के अनुरूप खुद को तैयार कर पा रही है? हर साल उम्मीदवारों की संख्या बढ़ रही है, परीक्षाएं डिजिटल हो रही हैं और प्रतिस्पर्धा पहले से अधिक तीव्र होती जा रही है। इसके बावजूद बार-बार सामने आने वाली तकनीकी खामियां, प्रशासनिक गलतियां और सुरक्षा संबंधी चुनौतियां यह संकेत देती हैं कि सुधार की गति अभी पर्याप्त नहीं है।

जरूरत केवल दोष तय करने की नहीं है, बल्कि ऐसी प्रणाली विकसित करने की है जिसमें जवाबदेही स्पष्ट हो। पेपर लीक की घटनाओं में त्वरित कार्रवाई के साथ कड़ी सजा सुनिश्चित हो, तकनीकी प्लेटफॉर्म का स्वतंत्र ऑडिट कराया जाए, परीक्षा केंद्रों की तैयारी का समय-समय पर मूल्यांकन हो और मूल्यांकन प्रक्रियाओं को अधिक पारदर्शी बनाया जाए। छात्रों को यह भरोसा होना चाहिए कि उनकी मेहनत का फैसला केवल उनकी योग्यता करेगी, न कि किसी तकनीकी गड़बड़ी या प्रशासनिक चूक से प्रभावित व्यवस्था।

भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। ऐसे में परीक्षा प्रणाली केवल एक प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि देश की मानव संसाधन नीति का आधार है। यदि यही प्रणाली लगातार सवालों के घेरे में रहेगी, तो इसका असर छात्रों के मनोबल और संस्थाओं की साख दोनों पर पड़ेगा।

परीक्षाओं में विवाद कोई नई बात नहीं है, लेकिन जब एक ही महीने में देश की चार बड़ी परीक्षाएं अलग-अलग कारणों से सुर्खियों में आ जाएं, तो इसे संयोग मानना मुश्किल है। यह एक चेतावनी है कि अब सुधार की चर्चा से आगे बढ़कर ठोस कार्रवाई का समय आ चुका है। क्योंकि आज देश के करोड़ों छात्र केवल परीक्षा नहीं दे रहे, वे व्यवस्था पर भरोसा भी कर रहे हैं। और उस भरोसे की रक्षा करना हर संस्थान की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।

भारत में शिक्षा केवल किताबों और कक्षाओं का विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समानता, आर्थिक अवसर और देश के भविष्य से सीधे जुड़ा मुद्दा है। ऐसे में 6 मई को जारी की गई ‘स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (SMC) गाइडलाइंस 2026’ को केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज मानना बड़ी भूल होगी। यह दरअसल उस गहरी चिंता का जवाब है, जो पिछले कई वर्षों से सरकारी स्कूलों की गिरती स्थिति को लेकर लगातार बढ़ रही थी।

केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा जारी इन गाइडलाइंस में पहली बार अभिभावकों को स्कूल प्रबंधन के केंद्र में लाने की स्पष्ट कोशिश दिखाई देती है। स्कूल प्रबंधन समितियों में 75 प्रतिशत अभिभावकों की भागीदारी, महिलाओं को आधी हिस्सेदारी, मासिक बैठक, सामाजिक ऑडिट और तीन साल का विकास प्लान जैसे प्रावधान इस बात का संकेत हैं कि सरकार अब यह समझ चुकी है कि केवल ऊपर से योजनाएं बनाकर सरकारी स्कूलों की हालत नहीं सुधारी जा सकती।

असल सवाल यह है कि क्या सरकारी स्कूलों की मौजूदा स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि अब सरकार को समुदाय आधारित निगरानी की जरूरत महसूस हुई? जवाब है — हां।

देश में करोड़ों गरीब और ग्रामीण परिवार आज भी सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जिन स्कूलों को सामाजिक न्याय और समान अवसर का माध्यम होना चाहिए था, वही धीरे-धीरे लोगों का भरोसा खोते गए। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारत में लगभग 14.7 लाख स्कूल हैं, जिनमें से 10 लाख से अधिक सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त संस्थान हैं। इतने बड़े ढांचे के बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता लगातार सवालों के घेरे में रही है।

ग्रामीण भारत की तस्वीर सबसे अधिक चिंताजनक है। कई गांवों में स्कूल भवन जर्जर हैं, शिक्षकों की भारी कमी है और पढ़ाई का स्तर बेहद कमजोर हो चुका है। एक शिक्षक कई कक्षाओं को संभाल रहा है। ऊपर से गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ अलग। नतीजा यह हुआ कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का सीखने का स्तर लगातार गिरता गया।

इसका सबसे बड़ा सामाजिक असर यह हुआ कि गरीब परिवार भी अब सरकारी स्कूलों से दूरी बनाने लगे। पहले निजी स्कूल शहरों तक सीमित थे, लेकिन अब गांवों और छोटे कस्बों में भी अंग्रेजी माध्यम और तथाकथित पब्लिक स्कूलों की बाढ़ दिखाई देती है। यह अलग बात है कि इनमें से कई निजी स्कूल खुद गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में सक्षम नहीं हैं, फिर भी अभिभावकों को वे सरकारी स्कूलों से बेहतर लगते हैं। कारण साफ है — जवाबदेही।

निजी स्कूलों में अभिभावक सीधे सवाल पूछते हैं। फीस देने वाला परिवार स्कूल से परिणाम चाहता है। वहीं सरकारी स्कूलों में लंबे समय तक अभिभावकों की भूमिका लगभग औपचारिक बनी रही। स्कूल प्रबंधन समितियां कागजों तक सीमित रहीं या स्थानीय राजनीति का हिस्सा बन गईं। ऐसे में नई SMC गाइडलाइंस एक महत्वपूर्ण सुधार की शुरुआत हो सकती हैं।

हालांकि केवल समितियां बना देने से शिक्षा व्यवस्था नहीं बदल जाएगी। असली चुनौती इन समितियों को सक्रिय, स्वतंत्र और प्रभावी बनाने की होगी। यदि अभिभावकों को केवल हस्ताक्षर करने तक सीमित रखा गया, तो यह पहल भी पुराने ढर्रे पर चली जाएगी। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि समितियों को वास्तविक अधिकार मिलें, उनकी नियमित ट्रेनिंग हो और उनकी रिपोर्ट पर कार्रवाई भी हो।

महिलाओं की 50 प्रतिशत भागीदारी का प्रावधान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ग्रामीण समाज में बच्चों की शिक्षा को लेकर माताओं की भूमिका बेहद अहम होती है। यदि उन्हें स्कूल प्रबंधन में प्रभावी स्थान मिलता है, तो स्कूलों की उपस्थिति, स्वच्छता, सुरक्षा और पढ़ाई के माहौल में सकारात्मक बदलाव आ सकता है।

कोविड महामारी ने भी सरकारी और निजी शिक्षा के बीच की खाई को और गहरा कर दिया। ऑनलाइन शिक्षा के दौर में सरकारी स्कूलों के लाखों बच्चे डिजिटल संसाधनों से दूर रह गए, जबकि निजी स्कूलों ने अपेक्षाकृत तेजी से खुद को ढाल लिया। इस अनुभव ने लोगों के मन में सरकारी स्कूलों को लेकर असुरक्षा और बढ़ा दी।

ऐसे समय में SMC गाइडलाइंस 2026 केवल एक नीति नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों में जनता का भरोसा लौटाने की कोशिश है। लेकिन यह भरोसा तभी लौटेगा जब स्कूलों में शिक्षक होंगे, नियमित पढ़ाई होगी, जवाबदेही तय होगी और अभिभावकों की आवाज वास्तव में सुनी जाएगी।

भारत जैसे विशाल देश में शिक्षा सुधार केवल मंत्रालयों के आदेश से संभव नहीं है। इसके लिए समाज, अभिभावकों, शिक्षकों और स्थानीय समुदाय की साझेदारी जरूरी है। यदि नई स्कूल मैनेजमेंट कमेटियां इस साझेदारी को मजबूत कर पाती हैं, तो यह सरकारी स्कूलों के लिए नई शुरुआत साबित हो सकती है। लेकिन अगर यह पहल भी केवल फाइलों और बैठकों तक सीमित रह गई, तो सरकारी स्कूलों से लोगों का टूटता भरोसा वापस लाना और मुश्किल हो जाएगा।

भारत में शिक्षा हमेशा केवल पढ़ाई का माध्यम नहीं रही, बल्कि सामाजिक बदलाव और आर्थिक प्रगति की सबसे बड़ी ताकत मानी गई है। किसी भी देश का भविष्य उसकी शिक्षा व्यवस्था से तय होता है। लेकिन आज भारत के स्कूली शिक्षा सिस्टम में जो बदलाव दिखाई दे रहा है, वह केवल आंकड़ों का बदलाव नहीं, बल्कि समाज की सोच और भरोसे में आए बड़े परिवर्तन का संकेत है।

नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट बताती है कि पिछले दो दशकों में सरकारी स्कूलों से लोगों का भरोसा तेजी से कम हुआ है। वर्ष 2005 में जहां देश के 71 प्रतिशत बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, वहीं अब यह संख्या घटकर करीब 49 प्रतिशत रह गई है। दूसरी ओर प्राइवेट स्कूलों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। यह बदलाव केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक और आर्थिक ढांचे का भी बड़ा संकेत है।

असल सवाल यह है कि क्या लोग सरकारी स्कूलों को छोड़ रहे हैं या वे बेहतर भविष्य खरीदने की कोशिश कर रहे हैं?

आज एक मध्यम वर्गीय परिवार के लिए बच्चे की शिक्षा सबसे बड़ा निवेश बन चुकी है। अभिभावकों को लगता है कि प्राइवेट स्कूल अंग्रेजी माध्यम, बेहतर अनुशासन और नौकरी के ज्यादा अवसर देंगे। यही वजह है कि कम आय वाले परिवार भी अपनी जरूरतों में कटौती करके बच्चों को प्राइवेट स्कूल भेजना पसंद कर रहे हैं। लेकिन समस्या यह है कि शिक्षा अब धीरे-धीरे “सेवा” से ज्यादा “ब्रांड” बनती जा रही है।

रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक हिस्सा यह है कि कम फीस वाले कई प्राइवेट स्कूल भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में पीछे हैं। अगर कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 की किताब नहीं पढ़ पा रहा और साधारण गणित हल नहीं कर पा रहा, तो यह केवल सरकारी स्कूलों की विफलता नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा मॉडल पर सवाल है।

आज देश में हजारों ऐसे प्राइवेट स्कूल हैं जहां न तो पर्याप्त शिक्षक हैं, न खेल का मैदान, न साफ पीने का पानी और न ही बच्चों के लिए सुरक्षित माहौल। कई जगह शिक्षकों को बेहद कम वेतन पर रखा जाता है। बिना ट्रेनिंग और नौकरी की सुरक्षा के पढ़ाने वाले शिक्षक आखिर बच्चों को कितनी बेहतर शिक्षा दे पाएंगे?

सरकारी स्कूलों की स्थिति भी कई जगह गंभीर बनी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में एक लाख से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक पूरे स्कूल को संभाल रहा है। सोचिए, एक ही शिक्षक अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को कैसे गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई दे सकता है? यह केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि नीति और प्रबंधन की भी कमजोरी है।

शिक्षा व्यवस्था की एक और बड़ी चुनौती “समान अवसर” की है। शहरों और गांवों, अमीर और गरीब, डिजिटल और गैर-डिजिटल भारत के बीच की दूरी स्कूलों में साफ दिखाई देती है। जहां बड़े शहरों के निजी स्कूल एआई और स्मार्ट क्लासरूम की बात कर रहे हैं, वहीं कई ग्रामीण स्कूलों में आज भी स्थायी शिक्षक और बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं।

सरकार अब कक्षा 3 से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कंप्यूटेशनल थिंकिंग पढ़ाने की तैयारी कर रही है। यह कदम भविष्य की जरूरतों को देखते हुए जरूरी भी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारे स्कूल इसके लिए तैयार हैं? जिन स्कूलों में बिजली, इंटरनेट और प्रशिक्षित शिक्षक तक नहीं हैं, वहां एआई शिक्षा लागू करना आसान नहीं होगा।

भारत की शिक्षा व्यवस्था को केवल नए विषयों की नहीं, बल्कि मजबूत नींव की जरूरत है। अगर शुरुआती कक्षाओं में बच्चे पढ़ना, लिखना और समझना ही ठीक से नहीं सीख पाएंगे, तो तकनीकी शिक्षा का फायदा सीमित रह जाएगा।

यह भी सच है कि केवल सरकारी या प्राइवेट स्कूल की बहस से समस्या हल नहीं होगी। असली मुद्दा गुणवत्ता, जवाबदेही और समान अवसर का है। शिक्षा को बाजार के भरोसे छोड़ देना भी खतरनाक हो सकता है और सरकारी सिस्टम को बिना सुधार के चलाना भी।

आज जरूरत इस बात की है कि सरकार सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारने पर गंभीरता से काम करे। शिक्षकों की भर्ती, ट्रेनिंग, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और स्कूल प्रबंधन में बड़े सुधार की जरूरत है। साथ ही प्राइवेट स्कूलों के लिए भी मजबूत रेगुलेशन जरूरी है, ताकि शिक्षा केवल कमाई का साधन न बन जाए।

भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश बनने की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में स्कूलों की गुणवत्ता केवल शिक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक बराबरी का भी सवाल है। अगर आज शिक्षा की बुनियाद मजबूत नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में इसका असर पूरे देश के विकास पर दिखाई देगा।

भारत में लड़कियों की शिक्षा को लेकर दशकों से जो बहस चलती रही—“बराबरी कब आएगी?”—उसका जवाब अब धीरे-धीरे सामने आने लगा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की हालिया रिपोर्ट “Women and Men in India 2025” सिर्फ आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि बदलते भारत की एक सामाजिक कहानी भी है। यह कहानी बताती है कि पढ़ाई के मैदान में बेटियां अब सिर्फ बराबरी नहीं कर रहीं, बल्कि कई मोर्चों पर आगे निकल चुकी हैं।

स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक लड़कियों की बढ़ती मौजूदगी इस बदलाव का सबसे बड़ा संकेत है। प्राथमिक से लेकर उच्च माध्यमिक स्तर तक नामांकन में लड़कियां लड़कों से आगे हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया है। इसमें नई शिक्षा नीति, सरकारी योजनाओं और समाज की बदलती सोच—तीनों की भूमिका है। खास बात यह है कि सिर्फ दाखिले ही नहीं बढ़े, बल्कि ड्रॉपआउट दर में भी गिरावट आई है। यानी बेटियां अब स्कूल तक पहुंच ही नहीं रहीं, बल्कि पढ़ाई जारी भी रख रही हैं।

लेकिन इस कहानी का एक और अहम पहलू है—पीढ़ी का फर्क। जहां कुल साक्षरता में अभी भी पुरुषों और महिलाओं के बीच लगभग 14 प्रतिशत का अंतर है, वहीं 15 से 24 साल की उम्र के युवाओं में यह अंतर घटकर महज 3.8 प्रतिशत रह गया है। इसका मतलब साफ है कि नई पीढ़ी में लैंगिक असमानता तेजी से कम हो रही है। 1981 में जहां महिला साक्षरता 30 प्रतिशत के आसपास थी, आज वह 70 प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुकी है। यह सिर्फ प्रगति नहीं, बल्कि एक सामाजिक बदलाव का संकेत है।

उच्च शिक्षा में भी तस्वीर उत्साहजनक है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लड़कियों का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो लड़कों से ज्यादा हो गया है। कुल पास होने वाले छात्रों में आधे से अधिक महिलाएं हैं, और एमफिल जैसे उच्च स्तर पर तो उनकी हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से भी ज्यादा है। यह दिखाता है कि अब लड़कियां सिर्फ पढ़ाई कर ही नहीं रहीं, बल्कि उसमें उत्कृष्ट प्रदर्शन भी कर रही हैं।

फिर भी, यह बदलाव पूरी तरह संतुलित नहीं है। विषयों के चयन में अब भी एक स्पष्ट अंतर दिखता है। आर्ट्स, साइंस, सोशल साइंस और मेडिकल क्षेत्रों में लड़कियों की भागीदारी अधिक है, लेकिन इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी, आईटी और मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में लड़के अभी भी आगे हैं। यह अंतर केवल पसंद का नहीं, बल्कि सामाजिक धारणा और अवसरों की असमानता का भी परिणाम है।

इसके अलावा, पढ़ाई के औसत वर्षों और खर्च में भी फर्क बना हुआ है। लड़कियों की औसत पढ़ाई लड़कों से एक साल कम है और उन पर खर्च भी कम किया जाता है। यह बताता है कि जमीनी स्तर पर अभी भी कई परिवारों में बेटियों की शिक्षा को लेकर प्राथमिकता उतनी मजबूत नहीं है जितनी होनी चाहिए।

यही वह बिंदु है जहां हमें ठहरकर सोचने की जरूरत है। क्या हम सिर्फ आंकड़ों से संतुष्ट हो सकते हैं? या हमें इस बदलाव को और गहरा और स्थायी बनाने की दिशा में काम करना होगा?

आज जब भारत तेजी से डिजिटल और तकनीकी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, तब यह जरूरी है कि लड़कियां भी उन क्षेत्रों में बराबरी से भागीदारी करें जो भविष्य को तय करेंगे। अगर इंजीनियरिंग, एआई, डेटा साइंस और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में उनकी हिस्सेदारी नहीं बढ़ती, तो यह प्रगति अधूरी रह जाएगी।

सकारात्मक पक्ष यह है कि दिशा सही है। समाज की सोच बदल रही है, नीतियां असर दिखा रही हैं और बेटियां खुद अपनी पहचान बना रही हैं। लेकिन असली चुनौती अब इस रफ्तार को बनाए रखने और इसे हर वर्ग, हर क्षेत्र और हर विषय तक पहुंचाने की है।

यह बदलाव सिर्फ शिक्षा का नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक और आर्थिक भविष्य का भी है। क्योंकि जब बेटियां पढ़ती हैं, तो सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरा समाज आगे बढ़ता है।

भारत में ऑनलाइन उच्च शिक्षा का तेजी से बढ़ता दायरा केवल एक शैक्षणिक बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का संकेत भी है। ट्रेनिंग्स कार्ट (TrainingsKart) के हालिया आकलन के अनुसार, यह क्षेत्र 2030 तक तेज़ रफ्तार से विस्तार करेगा। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह विस्तार गुणवत्ता, भरोसे और समान अवसरों के साथ आगे बढ़ पाएगा?

पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा के प्रति भारतीयों का नजरिया बदला है। अब डिग्री केवल कागज का प्रमाण नहीं, बल्कि रोजगार और कौशल से जुड़ी जरूरत बन गई है। हिमांशु राय जैसे शिक्षाविद मानते हैं कि उच्च शिक्षा एक संरचनात्मक बदलाव से गुजर रही है, जहां ऑनलाइन डिग्री की मांग लगातार बढ़ रही है। यह मांग इस बात का प्रमाण है कि छात्र और पेशेवर अब पारंपरिक कक्षा की सीमाओं से बाहर निकलना चाहते हैं।

इस बदलाव को मजबूती देने में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी University Grants Commission (UGC) की भूमिका अहम रही है। ऑनलाइन डिग्री को पारंपरिक डिग्री के बराबर मान्यता देने से छात्रों का भरोसा बढ़ा है। लेकिन केवल मान्यता देना ही पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि ऑनलाइन माध्यम में शिक्षा की गुणवत्ता और मूल्यांकन की सख्ती बनी रहे।

यहां एक बड़ा सवाल उभरता है—क्या सभी संस्थान इस बदलाव के लिए तैयार हैं? पंकज मित्तल का कहना है कि देश में कुछ संस्थान डिजिटल शिक्षा में आगे हैं, लेकिन पूरे सिस्टम में समान तैयारी नहीं है। यह असमानता आने वाले समय में शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है।

ऑनलाइन MBA जैसे कोर्सेज की बढ़ती लोकप्रियता यह दिखाती है कि छात्र अब सीधे करियर से जुड़े विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं। बेंगलुरु, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में काम करने वाले पेशेवर, जो तेज़ प्रतिस्पर्धा में खुद को बनाए रखना चाहते हैं, ऑनलाइन डिग्री को एक व्यावहारिक समाधान के रूप में देख रहे हैं।

ऑनलाइन शिक्षा का सबसे बड़ा लाभ इसका लचीलापन और कम लागत है। यह उन लोगों के लिए नए दरवाजे खोल रही है जो पारंपरिक शिक्षा से दूर रह जाते थे—जैसे छोटे शहरों के छात्र, गृहिणियां या मिड-करियर प्रोफेशनल्स। यह पहलू राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (National Education Policy 2020) के उस लक्ष्य से मेल खाता है, जिसमें शिक्षा को अधिक समावेशी और कौशल-आधारित बनाने की बात कही गई है।

लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। डिजिटल डिवाइड आज भी एक बड़ी चुनौती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और उपकरणों की कमी के कारण ऑनलाइन शिक्षा का लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा। इसके अलावा, कोर्स की गुणवत्ता में असमानता और मूल्यांकन की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते रहे हैं।

एक और चिंता यह है कि कहीं ऑनलाइन शिक्षा केवल ‘आसान डिग्री’ का माध्यम बनकर न रह जाए। अगर मूल्यांकन में सख्ती नहीं रही, तो डिग्री की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। ऐसे में विश्वविद्यालयों और नियामक संस्थाओं को तकनीक का उपयोग करते हुए पारदर्शी और मजबूत मूल्यांकन प्रणाली विकसित करनी होगी।

यह भी साफ है कि ऑनलाइन शिक्षा का भविष्य केवल तकनीक पर निर्भर नहीं करेगा। असली चुनौती शिक्षण पद्धति को बदलने की है। केवल डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनाना काफी नहीं, बल्कि यह समझना जरूरी है कि ऑनलाइन माध्यम में छात्रों को प्रभावी तरीके से कैसे पढ़ाया जाए और उनसे जुड़ाव कैसे बनाए रखा जाए।

भारत का ऑनलाइन उच्च शिक्षा क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। यह न केवल शिक्षा के अवसरों को बढ़ा रहा है, बल्कि कौशल-आधारित सीखने की दिशा में भी देश को आगे ले जा रहा है।

लेकिन इस बदलाव को सफल बनाने के लिए संतुलन जरूरी है—तेजी और गुणवत्ता के बीच, पहुंच और विश्वसनीयता के बीच। अगर यह संतुलन साध लिया गया, तो ऑनलाइन शिक्षा भारत के भविष्य को नई दिशा दे सकती है।

 

 

 

 

अगर आप 12वीं के बाद फोरेंसिक साइंस में करियर बनाने का सपना देख रहे हैं, तो AIFSET 2026 (All India Forensic Science Entrance Test) आपके लिए एक महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षा हो सकती है। पिछले कुछ वर्षों में भारत में फोरेंसिक साइंस के प्रति छात्रों की रुचि तेजी से बढ़ी है। अपराध जांच, डीएनए विश्लेषण, साइबर फोरेंसिक, डिजिटल जांच और वैज्ञानिक साक्ष्यों के बढ़ते उपयोग ने इस क्षेत्र को युवाओं के लिए आकर्षक करियर विकल्प बना दिया है।

ऐसे में हजारों छात्र AIFSET 2026 के बारे में जानकारी जुटा रहे हैं ताकि वे सही संस्थान और सही पाठ्यक्रम का चयन कर सकें।

क्या है AIFSET 2026?

AIFSET यानी ऑल इंडिया फोरेंसिक साइंस एंट्रेंस टेस्ट एक राष्ट्रीय स्तर की ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा है। यह उन छात्रों के लिए आयोजित की जाती है जो भारत के विभिन्न भाग लेने वाले संस्थानों में फोरेंसिक साइंस के स्नातक (UG) और स्नातकोत्तर (PG) कार्यक्रमों में प्रवेश लेना चाहते हैं।

यह परीक्षा छात्रों को अलग-अलग कॉलेजों में अलग-अलग आवेदन करने के बजाय एक साझा मंच उपलब्ध कराती है, जिसके माध्यम से वे AIFSET स्कोर के आधार पर प्रवेश के अवसर तलाश सकते हैं।

भारत में क्यों बढ़ रही है फोरेंसिक साइंस की मांग?

देश में अपराध जांच, साइबर अपराध, कानूनी मामलों और सुरक्षा एजेंसियों में वैज्ञानिक साक्ष्यों के बढ़ते उपयोग के कारण प्रशिक्षित फोरेंसिक विशेषज्ञों की मांग लगातार बढ़ रही है।

आज फोरेंसिक साइंस केवल क्राइम सीन जांच तक सीमित नहीं है। इस क्षेत्र में फोरेंसिक बायोलॉजी, डीएनए एनालिसिस, फोरेंसिक टॉक्सिकोलॉजी, साइबर फोरेंसिक, डिजिटल फोरेंसिक, फोरेंसिक केमिस्ट्री, फिंगरप्रिंट विश्लेषण और दस्तावेज़ परीक्षण जैसे कई विशेष क्षेत्र शामिल हैं।

इन्हीं अवसरों को देखते हुए बड़ी संख्या में छात्र 12वीं के बाद फोरेंसिक साइंस कोर्स, फोरेंसिक कॉलेज और प्रवेश परीक्षाओं की जानकारी प्राप्त कर रहे हैं।

क्या AIFSET एक भरोसेमंद प्रवेश परीक्षा है?

किसी भी प्रवेश परीक्षा की विश्वसनीयता उसके पारदर्शी प्रक्रिया, परीक्षा प्रणाली, पहुंच और छात्रों को मिलने वाले प्रवेश अवसरों के आधार पर आंकी जाती है।

AIFSET विशेष रूप से फोरेंसिक साइंस शिक्षा के लिए तैयार किया गया एक समर्पित प्रवेश मंच है। यदि कोई छात्र पहले से फोरेंसिक साइंस में करियर बनाने का निर्णय ले चुका है, तो यह परीक्षा उसके लिए उपयोगी विकल्प साबित हो सकती है क्योंकि इसका पूरा फोकस इसी क्षेत्र पर है।

हालांकि आवेदन करने से पहले छात्रों को आधिकारिक वेबसाइट पर उपलब्ध पात्रता, भाग लेने वाले संस्थानों, परीक्षा पैटर्न, आवेदन प्रक्रिया और प्रवेश नियमों की पूरी जानकारी अवश्य जांच लेनी चाहिए।

AIFSET 2026 के लिए कौन आवेदन कर सकता है?

AIFSET उन छात्रों के लिए आयोजित किया जाता है जो फोरेंसिक साइंस को अपने करियर के रूप में चुनना चाहते हैं।

12वीं कक्षा में विज्ञान (Science) विषयों से पढ़ाई करने वाले छात्र फोरेंसिक साइंस के स्नातक पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आवेदन कर सकते हैं। वहीं इस क्षेत्र में आगे विशेषज्ञता हासिल करने के इच्छुक छात्र स्नातकोत्तर कार्यक्रमों का विकल्प भी चुन सकते हैं। आवेदन करने से पहले उम्मीदवारों को नवीनतम पात्रता मानदंड, आवेदन तिथि और प्रवेश प्रक्रिया की जानकारी ध्यानपूर्वक पढ़नी चाहिए।

छात्रों के लिए AIFSET कैसे मददगार हो सकता है?

AIFSET का उद्देश्य छात्रों को फोरेंसिक साइंस शिक्षा और उससे जुड़े करियर विकल्पों तक पहुंच आसान बनाना है।

इस परीक्षा के माध्यम से छात्र उन संस्थानों के बारे में जानकारी प्राप्त कर सकते हैं, जहां फोरेंसिक जांच, प्रयोगशाला विज्ञान, साइबर फोरेंसिक, डिजिटल एविडेंस एनालिसिस और अन्य विशेष क्षेत्रों में अध्ययन की सुविधा उपलब्ध है।

यदि कोई छात्र पहले से फोरेंसिक साइंस में अपना भविष्य तय कर चुका है, तो AIFSET उसके लिए इस क्षेत्र में प्रवेश का एक केंद्रित मार्ग बन सकता है।

क्या AIFSET 2026 पर विचार करना चाहिए?

अगर आपकी रुचि विज्ञान, जांच-पड़ताल, तार्किक सोच और समस्याओं के समाधान में है, तो फोरेंसिक साइंस आपके लिए एक बेहतरीन करियर विकल्प हो सकता है।

AIFSET 2026 ऐसे छात्रों के लिए एक महत्वपूर्ण प्रवेश परीक्षा है जो फोरेंसिक साइंस की पढ़ाई करना चाहते हैं। हालांकि किसी भी शैक्षणिक निर्णय की तरह छात्रों को आवेदन करने से पहले परीक्षा, भाग लेने वाले संस्थानों, प्रवेश प्रक्रिया और अपने भविष्य के करियर लक्ष्यों के अनुरूप सभी पहलुओं का अच्छी तरह अध्ययन करना चाहिए।

भारत में फोरेंसिक साइंस तेजी से उभरता हुआ शैक्षणिक और पेशेवर क्षेत्र बन रहा है। AIFSET जैसी प्रवेश परीक्षाएं छात्रों को विज्ञान, तकनीक और जांच आधारित करियर की संभावनाओं तक पहुंचने का अवसर प्रदान कर रही हैं।

यदि आप फोरेंसिक साइंस में करियर बनाना चाहते हैं और AIFSET 2026 के बारे में अधिक जानकारी या निःशुल्क करियर काउंसलिंग प्राप्त करना चाहते हैं, तो AIFSET की आधिकारिक वेबसाइट aifset.com पर जाकर विस्तृत जानकारी हासिल कर सकते हैं।

क्या रचनात्मकता (Creativity) को एक सफल करियर में बदला जा सकता है? आज पहले से कहीं अधिक छात्र इसका जवाब "हां" मानते हैं। फैशन डिजाइन, ग्राफिक डिजाइन, इंटीरियर डिजाइन और डिजिटल मीडिया जैसे क्षेत्रों में तेजी से बढ़ते अवसरों के कारण 12वीं के बाद डिजाइन की पढ़ाई करने के इच्छुक छात्र सबसे बेहतर डिजाइन एंट्रेंस एग्जाम की तलाश कर रहे हैं। ऐसे में ऑल इंडिया डिजाइन एप्टीट्यूड टेस्ट (AIDAT) तेजी से छात्रों के बीच लोकप्रिय हो रहा है।

आइए जानते हैं वे पांच प्रमुख कारण, जिनकी वजह से कई छात्र B.Des और M.Des जैसे डिजाइन कोर्स में प्रवेश के लिए AIDAT को चुन रहे हैं।

एक परीक्षा, कई डिजाइन संस्थानों में प्रवेश का अवसर

कॉलेज में एडमिशन के दौरान छात्रों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अलग-अलग संस्थानों के लिए अलग आवेदन प्रक्रिया से गुजरना होती है। हर संस्थान के अलग फॉर्म, अंतिम तिथि और प्रवेश प्रक्रिया के कारण पूरा सिस्टम काफी जटिल और समय लेने वाला बन जाता है।

AIDAT छात्रों को एक ऐसा साझा मंच उपलब्ध कराता है, जिसके माध्यम से वे भाग लेने वाले डिजाइन संस्थानों में प्रवेश के अवसर तलाश सकते हैं। अलग-अलग प्रवेश प्रक्रियाओं में आवेदन करने के बजाय छात्र एक ही परीक्षा के जरिए डिजाइन शिक्षा के विभिन्न विकल्पों तक पहुंच बना सकते हैं।

जो छात्र आसान और सुविधाजनक प्रवेश प्रक्रिया चाहते हैं, उनके लिए यह एक बेहतर विकल्प साबित हो सकता है।

डिजाइन के विभिन्न क्षेत्रों में करियर बनाने वालों के लिए उपयुक्त

आज डिजाइन केवल फैशन तक सीमित नहीं है। अब यह क्षेत्र ग्राफिक डिजाइन, इंटीरियर डिजाइन, प्रोडक्ट डिजाइन, यूजर एक्सपीरियंस (UX) डिजाइन, विजुअल कम्युनिकेशन, एनीमेशन और कई नए उभरते क्षेत्रों तक फैल चुका है।

AIDAT में शामिल होने वाले छात्र अलग-अलग रचनात्मक रुचियों और करियर लक्ष्यों के साथ आते हैं। चाहे किसी छात्र की रुचि स्केचिंग, डिजिटल डिजाइन, ब्रांडिंग, विजुअल स्टोरीटेलिंग या स्पेस डिजाइन में हो, यह परीक्षा उन्हें डिजाइन के विभिन्न क्षेत्रों में आगे बढ़ने का अवसर देती है।

रचनात्मक उद्योगों के लगातार विस्तार के साथ छात्र ऐसे प्रवेश विकल्पों की तलाश कर रहे हैं, जो डिजाइन की कई शाखाओं में आगे बढ़ने का मौका दें।

रचनात्मकता और डिजाइन एप्टीट्यूड पर विशेष जोर

एक सफल डिजाइनर बनने के लिए केवल अच्छे अकादमिक अंक पर्याप्त नहीं होते। रचनात्मक सोच, अवलोकन क्षमता, समस्या समाधान की योग्यता, विजुअल थिंकिंग और नवाचार जैसी खूबियां डिजाइन शिक्षा में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

डिजाइन एप्टीट्यूड परीक्षाओं का उद्देश्य इन्हीं क्षमताओं का मूल्यांकन करना होता है। जो छात्र नए विचार विकसित करना पसंद करते हैं, अलग सोच रखते हैं और समस्याओं का रचनात्मक समाधान खोजने में रुचि रखते हैं, उनके लिए ऐसी परीक्षाएं अपनी प्रतिभा दिखाने का अच्छा अवसर होती हैं।

AIDAT भी ऐसे छात्रों की पहचान करने के उद्देश्य से तैयार किया गया है, जिनमें डिजाइन शिक्षा के लिए आवश्यक रचनात्मक सोच और क्षमता मौजूद हो।

देशभर के छात्रों के लिए आसान पहुंच

डिजाइन की पढ़ाई करने वाले छात्र भारत के अलग-अलग राज्यों, शहरों और शिक्षा बोर्डों से आते हैं। राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाएं सभी छात्रों को एक समान मंच प्रदान करती हैं, जहां वे एक ही प्रक्रिया के माध्यम से प्रवेश के अवसर प्राप्त कर सकते हैं।

आज उच्च शिक्षा में प्रवेश के दौरान आसान और सुलभ प्रक्रिया एक महत्वपूर्ण पहलू बन चुकी है। छात्र ऐसी व्यवस्था चाहते हैं, जिसमें बिना अनावश्यक जटिलताओं के अपने करियर के विकल्प तलाश सकें।

यही कारण है कि राष्ट्रीय स्तर की डिजाइन प्रवेश परीक्षाओं में छात्रों की रुचि लगातार बढ़ रही है।

डिजाइन करियर की बढ़ती मांग

पिछले एक दशक में डिजाइन इंडस्ट्री में बड़ा बदलाव आया है। आज कंपनियां ब्रांडिंग, डिजिटल एक्सपीरियंस, मार्केटिंग कम्युनिकेशन, प्रोडक्ट डेवलपमेंट, यूजर इंटरफेस, कंटेंट क्रिएशन और कस्टमर एंगेजमेंट जैसे कई क्षेत्रों में डिजाइन प्रोफेशनल्स पर निर्भर हैं।

इसी वजह से अब अधिक छात्र डिजाइन को केवल अपने शौक के रूप में नहीं, बल्कि एक पेशेवर करियर विकल्प के रूप में भी देख रहे हैं। बढ़ती मांग को देखते हुए विश्वविद्यालय और डिजाइन संस्थान भी अपने कोर्स और अवसरों का विस्तार कर रहे हैं।

फैशन डिजाइन, ग्राफिक डिजाइन, इंटीरियर डिजाइन, एनीमेशन, विजुअल कम्युनिकेशन और डिजिटल डिजाइन जैसे क्षेत्रों में करियर बनाने की इच्छा रखने वाले छात्रों के लिए AIDAT जैसी प्रवेश परीक्षाएं व्यवस्थित तरीके से इस सफर की शुरुआत करने का अवसर प्रदान करती हैं।

क्या AIDAT आपके लिए सही विकल्प है?

किसी भी प्रवेश परीक्षा का चयन छात्र की रुचि, करियर लक्ष्य और सीखने की पसंद पर निर्भर करता है। यदि आपको रचनात्मक कार्य, नए विचार विकसित करना, विजुअल कम्युनिकेशन और समस्याओं का समाधान करना पसंद है, तो डिजाइन शिक्षा आपके लिए एक बेहतर और संतोषजनक करियर विकल्प बन सकती है।

तकनीक, मीडिया, फैशन और बिजनेस सहित लगभग हर उद्योग में डिजाइन की भूमिका लगातार बढ़ रही है। ऐसे में कुशल और रचनात्मक डिजाइन प्रोफेशनल्स की मांग भी भविष्य में मजबूत बनी रहने की उम्मीद है।

यदि आप डिजाइन के क्षेत्र में उच्च शिक्षा प्राप्त करना चाहते हैं, तो ऑल इंडिया डिजाइन एप्टीट्यूड टेस्ट (AIDAT) आपके लिए इस सफर की शुरुआत करने का एक प्रभावी माध्यम हो सकता है।

हर रचनात्मक करियर की शुरुआत एक छोटे से फैसले से होती है—अपने जुनून को करियर में बदलने का फैसला। भारत के हजारों छात्रों के लिए यह यात्रा डिजाइन प्रवेश परीक्षाओं के माध्यम से सही अवसर तलाशने और अपनी प्रतिभा को साबित करने से शुरू होती है।

भारत में हर साल हजारों छात्र कानून (Law) के क्षेत्र में सफल करियर बनाने का सपना देखते हैं। कोई वकील बनना चाहता है, कोई जज, कानूनी सलाहकार, कॉर्पोरेट काउंसल, नीति विशेषज्ञ या फिर सिविल सेवा में जाना चाहता है। इन सभी करियर की शुरुआत एक अच्छे लॉ कॉलेज में दाखिले से होती है। हालांकि, पारंपरिक प्रवेश प्रक्रिया कई छात्रों के लिए चुनौतीपूर्ण होती है, क्योंकि उन्हें अलग-अलग कॉलेजों में आवेदन करना पड़ता है, कई शहरों की यात्रा करनी होती है और अलग-अलग प्रवेश परीक्षाओं में शामिल होना पड़ता है।

यही वजह है कि आज ऑनलाइन राष्ट्रीय स्तर की लॉ प्रवेश परीक्षाएं तेजी से छात्रों के बीच लोकप्रिय हो रही हैं। ये परीक्षाएं न केवल प्रवेश प्रक्रिया को आसान बनाती हैं, बल्कि समय, लागत और मेहनत भी कम करती हैं।

भारत में ऑनलाइन लॉ प्रवेश परीक्षाओं का बढ़ता महत्व

डिजिटल शिक्षा के विस्तार ने उच्च शिक्षा में प्रवेश की प्रक्रिया को पूरी तरह बदल दिया है। आज छात्र ऐसे विकल्प चाहते हैं जो आसान, सुविधाजनक और कम तनाव वाले हों। ऑनलाइन लॉ प्रवेश परीक्षाएं इसी जरूरत को पूरा करती हैं।

अब छात्रों को अलग-अलग शहरों में जाकर कई प्रवेश परीक्षाएं देने की जरूरत नहीं होती। वे एक राष्ट्रीय स्तर की परीक्षा देकर कई लॉ संस्थानों में प्रवेश के अवसर प्राप्त कर सकते हैं। इससे समय की बचत होती है और पूरी प्रवेश प्रक्रिया छात्रों और उनके परिवारों के लिए अधिक सरल बन जाती है।

देशभर के छात्रों को मिलता है समान अवसर

ऑनलाइन राष्ट्रीय स्तर की लॉ प्रवेश परीक्षा का सबसे बड़ा फायदा यह है कि यह सभी छात्रों को समान अवसर प्रदान करती है। चाहे कोई छात्र महानगर में रहता हो, छोटे शहर से हो या ग्रामीण क्षेत्र से, सभी एक ही परीक्षा के माध्यम से अपनी योग्यता साबित कर सकते हैं।

आज की लॉ प्रवेश परीक्षाएं केवल याद करने की क्षमता पर आधारित नहीं होतीं। इनमें तार्किक सोच, विश्लेषण क्षमता, कानूनी जागरूकता, संवाद कौशल और समस्या समाधान जैसी योग्यताओं का मूल्यांकन किया जाता है। इससे प्रतिभाशाली छात्रों को उनकी क्षमता के आधार पर आगे बढ़ने का मौका मिलता है, न कि उनके भौगोलिक या सामाजिक परिवेश के आधार पर।

एक परीक्षा से आसान होती है प्रवेश प्रक्रिया

पारंपरिक व्यवस्था में छात्रों को कई कॉलेजों के आवेदन भरने पड़ते हैं, अलग-अलग समय-सीमा का ध्यान रखना पड़ता है और कई प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी करनी होती है। इससे समय और संसाधनों दोनों की अधिक आवश्यकता होती है।

राष्ट्रीय स्तर की लॉ प्रवेश परीक्षा इस पूरी प्रक्रिया को काफी आसान बना देती है। एक ही परीक्षा के स्कोर के आधार पर छात्र कई भाग लेने वाले संस्थानों में प्रवेश के अवसर तलाश सकते हैं। इससे प्रशासनिक प्रक्रिया भी आसान होती है और छात्र अपने करियर की तैयारी पर अधिक ध्यान दे पाते हैं।

छात्रों और अभिभावकों के लिए किफायती विकल्प

विभिन्न शहरों में जाकर प्रवेश परीक्षाएं देने पर यात्रा, रहने, खाने और परीक्षा से जुड़े अन्य खर्च तेजी से बढ़ जाते हैं। कई परिवारों के लिए यह आर्थिक रूप से चुनौतीपूर्ण साबित होता है।

ऑनलाइन लॉ प्रवेश परीक्षा इन अतिरिक्त खर्चों को काफी हद तक कम कर देती है। छात्रों को बार-बार यात्रा करने की जरूरत नहीं पड़ती और पूरी प्रवेश प्रक्रिया अधिक किफायती बन जाती है। यह विशेष रूप से छोटे शहरों और ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों के लिए फायदेमंद है, जिनके लिए आर्थिक कारण अक्सर बड़ी बाधा बन जाते हैं।

आधुनिक कानूनी पेशे की जरूरतों के अनुसार तैयार परीक्षा

आज का कानूनी पेशा केवल किताबों तक सीमित नहीं है। लॉ फर्म, कॉर्पोरेट कंपनियां और शैक्षणिक संस्थान ऐसे छात्रों की तलाश करते हैं जिनमें विश्लेषण करने की क्षमता, प्रभावी संवाद कौशल, तार्किक सोच और समस्या समाधान की योग्यता हो।

इसी कारण राष्ट्रीय स्तर की कई लॉ प्रवेश परीक्षाएं अब केवल रटने की क्षमता की बजाय इन व्यावहारिक कौशलों का मूल्यांकन करती हैं। इससे ऐसे छात्रों की पहचान आसान हो जाती है, जिनमें कानूनी शिक्षा और भविष्य के पेशेवर जीवन में सफल होने की क्षमता होती है।

क्यों बढ़ रही है AICLET की लोकप्रियता?

ऑल इंडिया कॉमन लॉ एंट्रेंस टेस्ट (AICLET) राष्ट्रीय स्तर की उन नई प्रवेश परीक्षाओं में शामिल है, जो तेजी से छात्रों के बीच लोकप्रिय हो रही हैं। इसका उद्देश्य छात्रों को देशभर के भाग लेने वाले लॉ संस्थानों तक पहुंच प्रदान करना और उनकी कानूनी अध्ययन के लिए आवश्यक योग्यता का मूल्यांकन करना है।

AICLET को इस तरह तैयार किया गया है कि प्रवेश प्रक्रिया अधिक सरल, पारदर्शी और व्यवस्थित हो सके। इसके माध्यम से विभिन्न राज्यों के छात्र एक समान मंच पर अपनी क्षमता का प्रदर्शन कर सकते हैं और कई लॉ संस्थानों में प्रवेश के अवसर प्राप्त कर सकते हैं।

एक ही परीक्षा के जरिए कई विकल्प उपलब्ध होने से छात्रों को सुविधाजनक, सुलभ और राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त प्रवेश प्रक्रिया का लाभ मिलता है।

लॉ एडमिशन का भविष्य

शिक्षा क्षेत्र में तकनीक के बढ़ते उपयोग को देखते हुए आने वाले वर्षों में ऑनलाइन राष्ट्रीय स्तर की लॉ प्रवेश परीक्षाओं की भूमिका और मजबूत होने की संभावना है। ये परीक्षाएं अधिक सुलभ, कम खर्चीली और छात्र-केंद्रित प्रवेश प्रक्रिया उपलब्ध कराती हैं।

जो छात्र कानून के क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं, उनके लिए ऑनलाइन लॉ प्रवेश परीक्षा बेहतर अवसरों के साथ-साथ प्रवेश प्रक्रिया की कई चुनौतियों को भी कम करती है। वर्तमान समय में मुकदमेबाजी (Litigation), कॉर्पोरेट लॉ, न्यायिक सेवाओं, सार्वजनिक नीति और लीगल कंसल्टिंग जैसे क्षेत्रों में योग्य कानूनी पेशेवरों की मांग लगातार बढ़ रही है।

ऐसे में सही प्रवेश परीक्षा और सही संस्थान का चयन एक सफल कानूनी करियर की पहली सीढ़ी साबित हो सकता है। AICLET जैसे राष्ट्रीय स्तर के प्लेटफॉर्म इसी दिशा में छात्रों को अधिक सुलभ, प्रभावी और भविष्य के अनुरूप प्रवेश प्रक्रिया उपलब्ध कराने का प्रयास कर रहे हैं।

हर अपराध स्थल अपने भीतर एक कहानी छिपाए होता है। किसी गिलास पर मिला फिंगरप्रिंट, बाल का एक छोटा सा नमूना, खून का एक धब्बा या कंप्यूटर से डिलीट की गई कोई फाइल किसी बड़े मामले को सुलझाने की अहम कड़ी बन सकती है। इन छिपे हुए सबूतों को खोजकर सच्चाई सामने लाने का काम फॉरेंसिक साइंटिस्ट करते हैं। वे विज्ञान और जांच तकनीकों की मदद से तथ्यों को साबित करने और न्याय दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

पिछले एक दशक में फॉरेंसिक साइंस भारत में तेजी से उभरते हुए करियर विकल्पों में शामिल हो चुकी है। अपराध जांच, साइबर क्राइम और अदालतों में वैज्ञानिक साक्ष्यों के बढ़ते उपयोग के कारण प्रशिक्षित फॉरेंसिक विशेषज्ञों की मांग लगातार बढ़ रही है।

अगर आप जानना चाहते हैं कि भारत में फॉरेंसिक साइंटिस्ट कैसे बनें और क्या यह अच्छा करियर विकल्प है, तो सबसे पहले इसके शैक्षणिक सफर को समझना जरूरी है।

स्टेप 1: साइंस विषयों से मजबूत नींव तैयार करें

फॉरेंसिक साइंटिस्ट बनने की शुरुआत आमतौर पर 11वीं और 12वीं कक्षा से होती है। इस क्षेत्र में करियर बनाने के इच्छुक छात्रों को साइंस स्ट्रीम चुनने की सलाह दी जाती है क्योंकि फॉरेंसिक साइंस का आधार जीव विज्ञान (Biology), रसायन विज्ञान (Chemistry), भौतिक विज्ञान (Physics) और अब कंप्यूटर साइंस जैसे विषयों पर टिका होता है।

सिर्फ अच्छे अंक ही पर्याप्त नहीं हैं। जिज्ञासु स्वभाव, बारीकियों पर ध्यान देने की क्षमता, तार्किक सोच और जटिल समस्याओं को हल करने में रुचि भी इस क्षेत्र में सफलता के लिए बेहद जरूरी है। फॉरेंसिक साइंस केवल लैब में काम करने तक सीमित नहीं है, बल्कि वैज्ञानिक सबूतों को वास्तविक घटनाओं से जोड़कर समझने की कला भी है।

स्टेप 2: फॉरेंसिक साइंस में बैचलर डिग्री प्राप्त करें

12वीं पास करने के बाद छात्र बीएससी फॉरेंसिक साइंस (B.Sc. Forensic Science) में दाखिला ले सकते हैं। इस कोर्स के दौरान छात्रों को क्राइम सीन इन्वेस्टिगेशन, फॉरेंसिक बायोलॉजी, टॉक्सिकोलॉजी, फिंगरप्रिंट एनालिसिस, फॉरेंसिक केमिस्ट्री, डिजिटल फॉरेंसिक और कानूनी प्रक्रियाओं की पढ़ाई कराई जाती है।

फॉरेंसिक साइंस एक प्रैक्टिकल आधारित कोर्स है, जहां छात्रों को यह सिखाया जाता है कि सबूतों को कैसे इकट्ठा किया जाए, सुरक्षित रखा जाए, उनका वैज्ञानिक विश्लेषण कैसे किया जाए और अदालत में उन्हें कैसे प्रस्तुत किया जाए। अच्छे संस्थानों में थ्योरी के साथ आधुनिक लैब ट्रेनिंग और वास्तविक जांच प्रक्रियाओं का भी अनुभव कराया जाता है।

कई छात्र राष्ट्रीय स्तर की प्रवेश परीक्षाओं के माध्यम से फॉरेंसिक साइंस संस्थानों में प्रवेश लेते हैं। इनमें All India Forensic Science Entrance Test (AIFSET) एक प्रमुख प्रवेश परीक्षा है, जिसके जरिए देशभर के विभिन्न संस्थानों में स्नातक स्तर के फॉरेंसिक साइंस कोर्स में दाखिले का अवसर मिलता है।

स्टेप 3: पढ़ाई के दौरान प्रैक्टिकल अनुभव हासिल करें

फॉरेंसिक साइंस में केवल किताबों का ज्ञान पर्याप्त नहीं होता। आज के समय में नियोक्ता ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता देते हैं जिनके पास व्यावहारिक अनुभव भी हो।

इंटर्नशिप, लैब ट्रेनिंग, वर्कशॉप, रिसर्च प्रोजेक्ट और क्राइम सीन सिमुलेशन जैसी गतिविधियां छात्रों को वास्तविक जांच प्रक्रिया समझने का मौका देती हैं। इससे वैज्ञानिक उपकरणों का इस्तेमाल करने, सबूतों का विश्लेषण करने और तकनीकी कौशल विकसित करने में मदद मिलती है। यही अनुभव नौकरी के दौरान भी छात्रों को बढ़त दिलाता है।

स्टेप 4: किसी विशेष क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करें

फॉरेंसिक साइंस का दायरा लगातार बढ़ रहा है और इसके साथ नई-नई स्पेशलाइजेशन भी सामने आ रही हैं। कई छात्र स्नातक के बाद पोस्टग्रेजुएशन करते हैं, जबकि कुछ विशेष क्षेत्रों में सर्टिफिकेशन और एडवांस ट्रेनिंग का विकल्प चुनते हैं।

आज के समय में साइबर फॉरेंसिक सबसे तेजी से बढ़ने वाली स्पेशलाइजेशन में से एक है। इसके अलावा डीएनए एनालिसिस, डॉक्यूमेंट एग्जामिनेशन, फॉरेंसिक टॉक्सिकोलॉजी और फॉरेंसिक साइकोलॉजी जैसे क्षेत्रों में भी अच्छे करियर अवसर मौजूद हैं।

किसी विशेष क्षेत्र में विशेषज्ञता हासिल करने से सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में बेहतर पदों और अधिक वेतन की संभावनाएं बढ़ जाती हैं।

स्टेप 5: करियर की शुरुआत करें और लगातार सीखते रहें

कोर्स पूरा करने के बाद फॉरेंसिक साइंस ग्रेजुएट कई क्षेत्रों में नौकरी कर सकते हैं। इनमें फॉरेंसिक लैब, जांच एजेंसियां, साइबर क्राइम यूनिट, रिसर्च संस्थान और निजी फॉरेंसिक कंसल्टिंग कंपनियां शामिल हैं।

इस क्षेत्र में काम करने के कई विकल्प मौजूद हैं। कुछ विशेषज्ञ सीधे अपराध स्थल से मिले भौतिक सबूतों पर काम करते हैं, जबकि अन्य डिजिटल जांच, लैब रिसर्च या फॉरेंसिक कंसल्टिंग में अपना करियर बनाते हैं। जैसे-जैसे अनुभव और विशेषज्ञता बढ़ती है, करियर के अवसर भी बढ़ते जाते हैं।

कई छात्र यह जानना चाहते हैं कि क्या फॉरेंसिक साइंटिस्ट ₹70,000 से अधिक मासिक वेतन कमा सकते हैं। शुरुआती सैलरी आपकी योग्यता, स्थान, संस्थान और विशेषज्ञता पर निर्भर करती है। हालांकि अनुभव बढ़ने के साथ साइबर फॉरेंसिक, डिजिटल इन्वेस्टिगेशन, फॉरेंसिक कंसल्टिंग और एडवांस लैब एनालिसिस जैसे क्षेत्रों में कार्यरत विशेषज्ञ ₹70,000 या उससे अधिक मासिक आय प्राप्त कर सकते हैं।

क्या भारत में फॉरेंसिक साइंस अच्छा करियर विकल्प है?

फॉरेंसिक साइंस विज्ञान, तकनीक और अपराध जांच का ऐसा क्षेत्र है, जिसकी मांग लगातार बढ़ रही है। भारत में वैज्ञानिक जांच और साइबर अपराधों की जांच को मजबूत बनाने पर लगातार जोर दिया जा रहा है, जिसके कारण प्रशिक्षित फॉरेंसिक विशेषज्ञों की जरूरत भी बढ़ रही है।

यह केवल अच्छी सैलरी वाला करियर नहीं है, बल्कि समाज में न्याय व्यवस्था को मजबूत बनाने का भी अवसर देता है। फॉरेंसिक विशेषज्ञ वैज्ञानिक साक्ष्यों के आधार पर जांच एजेंसियों की मदद करते हैं और अपराधों की सच्चाई सामने लाने में महत्वपूर्ण योगदान देते हैं।

यदि आपकी रुचि विज्ञान, तकनीक और समस्या समाधान में है, तो फॉरेंसिक साइंस आपके लिए एक बेहतरीन करियर विकल्प हो सकता है। सही संस्थान का चयन, उचित कोर्स में दाखिला और AIFSET जैसी प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी इस क्षेत्र में सफल करियर की मजबूत शुरुआत साबित हो सकती है।

सरकारी और निजी दोनों क्षेत्रों में फॉरेंसिक साइंस प्रोफेशनल्स के लिए कई अवसर उपलब्ध हैं। सही शिक्षा, व्यावहारिक अनुभव और लगातार सीखने की इच्छा के साथ इस क्षेत्र में सफल और संतोषजनक करियर बनाया जा सकता है।

मीडिया, पत्रकारिता, कंटेंट क्रिएशन, पब्लिक रिलेशंस, विज्ञापन, फिल्ममेकिंग, ब्रॉडकास्टिंग या कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन में करियर बनाने का सपना देखने वाले मध्यम वर्ग के छात्रों के सामने सबसे बड़ा सवाल होता है—कौन-सा मीडिया कॉलेज सबसे बेहतर है?

अक्सर छात्र केवल फीस पर ध्यान देते हैं और इस प्रक्रिया में अच्छे मेंटर, इंटर्नशिप, इंडस्ट्री एक्सपोजर और प्लेसमेंट जैसी महत्वपूर्ण सुविधाओं से समझौता कर बैठते हैं। हालांकि, वर्ष 2026 में भारत में ऐसे कई प्रतिष्ठित संस्थान हैं जो किफायती फीस के साथ गुणवत्तापूर्ण मीडिया शिक्षा और बेहतर करियर अवसर प्रदान कर रहे हैं।

इस लेख में हम भारत के उन 10 बजट-फ्रेंडली मीडिया कॉलेजों के बारे में बता रहे हैं जो GMCET (Global Media Common Entrance Test) स्कोर स्वीकार करते हैं और मध्यम वर्ग के छात्रों के लिए बेहतरीन विकल्प माने जाते हैं। इन संस्थानों का चयन उनकी फीस, इंफ्रास्ट्रक्चर, मीडिया-केंद्रित पाठ्यक्रम, इंडस्ट्री एक्सपोजर, लोकेशन और शैक्षणिक प्रतिष्ठा जैसे मानकों के आधार पर किया गया है।

भारत के टॉप 10 मीडिया कॉलेज

1. Chandigarh University, मोहाली

चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी मीडिया और कम्युनिकेशन शिक्षा के क्षेत्र में देश के प्रमुख निजी विश्वविद्यालयों में शामिल है। यहां पत्रकारिता, ब्रॉडकास्टिंग, डिजिटल मीडिया, विज्ञापन और पब्लिक रिलेशंस से जुड़े कार्यक्रम संचालित किए जाते हैं। छात्रों को आधुनिक स्टूडियो, एडिटिंग लैब और प्रैक्टिकल लर्निंग की सुविधाएं उपलब्ध कराई जाती हैं।

मुख्य विशेषताएं:

  • इंडस्ट्री आधारित पाठ्यक्रम
  • आधुनिक मीडिया लैब और स्टूडियो
  • मजबूत प्लेसमेंट सपोर्ट
  • राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर एक्सपोजर के अवसर

2. Parul University, वडोदरा

पारुल यूनिवर्सिटी पत्रकारिता और जनसंचार सहित विभिन्न विषयों में किफायती शिक्षा प्रदान करने के लिए जानी जाती है। विश्वविद्यालय अनुभवात्मक शिक्षा और इंडस्ट्री सहयोग पर विशेष जोर देता है।

मुख्य विशेषताएं:

  • किफायती फीस संरचना
  • मजबूत इंडस्ट्री सहयोग
  • व्यावहारिक मीडिया प्रशिक्षण
  • बहुविषयक शिक्षण वातावरण

3. Vivekananda Global University (VGU), जयपुर

राजस्थान में गुणवत्तापूर्ण मीडिया शिक्षा की तलाश कर रहे छात्रों के बीच वीजीयू एक लोकप्रिय विकल्प बनकर उभरा है। यहां पत्रकारिता, डिजिटल स्टोरीटेलिंग, मीडिया प्रोडक्शन और कम्युनिकेशन मैनेजमेंट से जुड़े कोर्स उपलब्ध हैं।

मुख्य विशेषताएं:

  • बजट-फ्रेंडली कार्यक्रम
  • इंडस्ट्री-केंद्रित पाठ्यक्रम
  • स्कॉलरशिप के अवसर
  • आधुनिक कैंपस इंफ्रास्ट्रक्चर

4. JECRC University, जयपुर

जेईसीआरसी यूनिवर्सिटी मीडिया और कम्युनिकेशन के ऐसे पाठ्यक्रम प्रदान करती है जो अकादमिक ज्ञान के साथ-साथ व्यावहारिक इंडस्ट्री अनुभव पर भी जोर देते हैं। यहां छात्र कंटेंट क्रिएशन, डिजिटल कम्युनिकेशन और मल्टीमीडिया प्रोडक्शन का अनुभव प्राप्त करते हैं।

मुख्य विशेषताएं:

  • मजबूत शैक्षणिक माहौल
  • व्यावहारिक मीडिया शिक्षा
  • इंडस्ट्री इंटरैक्शन के अवसर
  • किफायती निजी विश्वविद्यालय

5. Dev Bhoomi Uttarakhand University, देहरादून

भारत के प्रमुख शिक्षा केंद्रों में से एक देहरादून में स्थित यह विश्वविद्यालय पत्रकारिता, ब्रॉडकास्टिंग और डिजिटल कम्युनिकेशन पर केंद्रित मीडिया कार्यक्रम संचालित करता है।

मुख्य विशेषताएं:

  • कम लागत वाली शिक्षा
  • प्रैक्टिकल लर्निंग के अवसर
  • अनुभवी फैकल्टी
  • बढ़ता हुआ इंडस्ट्री नेटवर्क

6. Uttaranchal University, देहरादून

उत्तरांचल यूनिवर्सिटी किफायती लागत पर पेशेवर शिक्षा प्रदान करने के लिए जानी जाती है। इसके मीडिया कार्यक्रम संचार कौशल, पत्रकारिता नैतिकता और डिजिटल मीडिया के उभरते रुझानों पर आधारित हैं।

मुख्य विशेषताएं:

  • किफायती ट्यूशन फीस
  • मजबूत अकादमिक सपोर्ट
  • इंडस्ट्री एक्सपोजर पहल
  • छात्र-केंद्रित शिक्षण वातावरण

7. CGC Jhanjeri, मोहाली

सीजीसी झंजेरी करियर-उन्मुख शिक्षा और इंडस्ट्री-केंद्रित प्रशिक्षण के लिए प्रसिद्ध है। इसके मीडिया और कम्युनिकेशन पाठ्यक्रम छात्रों को आधुनिक मीडिया उद्योग की जरूरतों के अनुरूप तैयार करते हैं।

मुख्य विशेषताएं:

  • पैसे के हिसाब से बेहतर मूल्य
  • आधुनिक शिक्षण सुविधाएं
  • इंडस्ट्री आधारित प्रशिक्षण
  • पेशेवर विकास के अवसर

8. NSHM Knowledge Campus, कोलकाता

एनएसएचएम नॉलेज कैंपस पूर्वी भारत के प्रमुख मीडिया एवं कम्युनिकेशन संस्थानों में से एक है। यहां व्यावहारिक प्रशिक्षण, इंडस्ट्री प्रोजेक्ट्स और स्किल डेवलपमेंट पर विशेष ध्यान दिया जाता है।

मुख्य विशेषताएं:

  • मजबूत मीडिया शिक्षा प्रणाली
  • बेहतर इंडस्ट्री एक्सपोजर
  • प्रोजेक्ट आधारित शिक्षण
  • महानगरों के कई संस्थानों की तुलना में किफायती

9. School of Broadcasting and Communication (SBC), मुंबई

देश की मीडिया राजधानी मुंबई में स्थित यह संस्थान छात्रों को ब्रॉडकास्टिंग, एंटरटेनमेंट और डिजिटल मीडिया इंडस्ट्री से सीधे जुड़ने का अवसर देता है। यहां के पाठ्यक्रमों में व्यावहारिक प्रशिक्षण को प्राथमिकता दी जाती है।

मुख्य विशेषताएं:

  • मुंबई मीडिया इंडस्ट्री का एक्सपोजर
  • ब्रॉडकास्टिंग-केंद्रित पाठ्यक्रम
  • इंडस्ट्री मेंटरशिप
  • बेहतर नेटवर्किंग अवसर

10. Renaissance University, इंदौर

रेनेसां यूनिवर्सिटी पत्रकारिता और जनसंचार के ऐसे कार्यक्रम संचालित करती है जो छात्रों को मीडिया, विज्ञापन, पब्लिक रिलेशंस और कॉर्पोरेट कम्युनिकेशन में करियर के लिए तैयार करते हैं।

मुख्य विशेषताएं:

  • किफायती फीस संरचना
  • इंडस्ट्री आधारित पाठ्यक्रम
  • व्यावहारिक संचार प्रशिक्षण
  • बढ़ती शैक्षणिक प्रतिष्ठा

अच्छा मीडिया कॉलेज चुनते समय किन बातों का रखें ध्यान?

मीडिया कॉलेज का चयन करते समय छात्रों को निम्नलिखित पहलुओं का मूल्यांकन जरूर करना चाहिए:

  • प्रैक्टिकल ट्रेनिंग की सुविधाएं
  • टेलीविजन और रेडियो स्टूडियो
  • डिजिटल मीडिया और कंटेंट क्रिएशन लैब
  • इंटर्नशिप सहायता
  • इंडस्ट्री सहयोग
  • प्लेसमेंट सपोर्ट
  • फैकल्टी का अनुभव
  • कैंपस मीडिया क्लब और प्रकाशन
  • फीस और स्कॉलरशिप के अवसर

कई बार ऐसा कॉलेज, जो किफायती फीस के साथ मजबूत इंडस्ट्री एक्सपोजर और व्यावहारिक प्रशिक्षण देता है, महंगे संस्थानों की तुलना में छात्रों के लिए अधिक लाभकारी साबित होता है।

छात्रों के लिए महत्वपूर्ण बात

सबसे अच्छा मीडिया कॉलेज हमेशा सबसे महंगा नहीं होता। ऐसा संस्थान जो व्यावहारिक प्रशिक्षण, आधुनिक इंफ्रास्ट्रक्चर, मजबूत इंडस्ट्री कनेक्शन और किफायती फीस प्रदान करता हो, वह पत्रकारिता, ब्रॉडकास्टिंग, विज्ञापन, पब्लिक रिलेशंस, डिजिटल मीडिया और कंटेंट क्रिएशन जैसे क्षेत्रों में सफल करियर की मजबूत नींव रख सकता है।

जो छात्र गुणवत्तापूर्ण शिक्षा और बजट के बीच संतुलन बनाना चाहते हैं, उनके लिए GMCET 2026 के माध्यम से उपलब्ध ये 10 विश्वविद्यालय बेहतरीन विकल्प साबित हो सकते हैं। स्किल डेवलपमेंट, इंडस्ट्री सहभागिता और प्रैक्टिकल लर्निंग पर जोर देकर ये संस्थान भारत के भविष्य के मीडिया प्रोफेशनल्स को तैयार करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहे हैं।

कुछ साल पहले तक मशीनों का चेहरों की पहचान करना, मेडिकल स्कैन का विश्लेषण करना या बिना किसी मानवीय हस्तक्षेप के कार चलाना विज्ञान-कथा जैसी बातें लगती थीं। लेकिन आज ये तकनीकें हमारी रोजमर्रा की जिंदगी का हिस्सा बन चुकी हैं। इसके पीछे सबसे महत्वपूर्ण भूमिका तेजी से विकसित हो रहे कंप्यूटर विज़न (Computer Vision) क्षेत्र की है। यह एक रोमांचक और संभावनाओं से भरा क्षेत्र है, जो नई तकनीकों में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए बेहतरीन अवसर प्रदान करता है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते प्रभाव के साथ अब छात्र पारंपरिक इंजीनियरिंग और सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट से आगे बढ़कर नए तकनीकी क्षेत्रों में करियर तलाश रहे हैं। ऐसे में एक सवाल अक्सर पूछा जाता है कि क्या 12वीं के बाद कंप्यूटर विज़न में करियर बनाया जा सकता है?

इसका जवाब है—हां। कंप्यूटर विज़न आमतौर पर आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कंप्यूटर साइंस से जुड़े कोर्सों का हिस्सा होता है, लेकिन छात्र उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के बाद ही इस क्षेत्र में प्रवेश कर सकते हैं।

कंप्यूटर विज़न क्या है?

कंप्यूटर विज़न, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की एक शाखा है, जो मशीनों को दृश्य डेटा यानी तस्वीरों और वीडियो को समझने और उनका विश्लेषण करने की क्षमता प्रदान करती है। सरल शब्दों में कहें तो यह तकनीक कंप्यूटर को “देखने” और देखी गई जानकारी के आधार पर निर्णय लेने में सक्षम बनाती है।

इसका उपयोग फेस रिकग्निशन सिस्टम, सेल्फ-ड्राइविंग कारों, स्मार्ट निगरानी कैमरों, मेडिकल इमेजिंग, औद्योगिक ऑटोमेशन और सोशल मीडिया फिल्टर जैसे कई क्षेत्रों में किया जा रहा है। ऑटोमेशन और डेटा आधारित निर्णय लेने की बढ़ती जरूरत के कारण कंप्यूटर विज़न विशेषज्ञों की मांग लगातार बढ़ रही है।

क्या 12वीं के बाद कंप्यूटर विज़न पढ़ा जा सकता है?

हालांकि भारत में कंप्यूटर विज़न के लिए समर्पित स्नातक डिग्री कार्यक्रम अभी सीमित हैं, लेकिन छात्र कई संबंधित कोर्सों के माध्यम से इस क्षेत्र में प्रवेश कर सकते हैं। इनमें B.Tech in Artificial Intelligence, B.Tech in Computer Science and Engineering, B.Tech in AI and Machine Learning, B.Sc Artificial Intelligence, B.Sc Data Science और विशेषीकृत BCA कार्यक्रम शामिल हैं।

इन कोर्सों में प्रोग्रामिंग, मशीन लर्निंग, डीप लर्निंग, इमेज प्रोसेसिंग और डेटा एनालिसिस जैसी महत्वपूर्ण तकनीकों की पढ़ाई कराई जाती है, जो कंप्यूटर विज़न की नींव मानी जाती हैं। पढ़ाई के दौरान छात्रों को फेस रिकग्निशन, ऑब्जेक्ट डिटेक्शन, इमेज क्लासिफिकेशन और वीडियो एनालिटिक्स जैसे प्रोजेक्ट्स पर काम करने का अवसर भी मिलता है।

कंप्यूटर विज़न कोर्स के लिए योग्यता

कंप्यूटर विज़न से जुड़े कोर्सों में प्रवेश के लिए पात्रता संस्थान के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। आमतौर पर छात्रों को किसी मान्यता प्राप्त बोर्ड से 12वीं पास होना आवश्यक होता है। इंजीनियरिंग और AI आधारित कार्यक्रमों के लिए गणित विषय अनिवार्य माना जाता है और विज्ञान संकाय के छात्रों को प्राथमिकता दी जाती है।

कुछ विश्वविद्यालय और संस्थान प्रवेश के लिए एंट्रेंस टेस्ट या एप्टीट्यूड टेस्ट भी आयोजित करते हैं। चूंकि यह क्षेत्र गणित, तार्किक सोच और प्रोग्रामिंग पर आधारित है, इसलिए तकनीक और समस्या समाधान में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए यह उपयुक्त विकल्प माना जाता है।

भारत में कंप्यूटर विज़न कोर्स की फीस

कंप्यूटर विज़न से संबंधित कोर्सों की फीस संस्थान और कार्यक्रम के आधार पर अलग-अलग होती है। सरकारी संस्थानों में फीस अपेक्षाकृत कम होती है, जबकि निजी विश्वविद्यालयों में उद्योग से जुड़ी सुविधाओं, आधुनिक प्रयोगशालाओं और विशेष शिक्षण संसाधनों के कारण फीस अधिक हो सकती है।

सामान्य तौर पर सरकारी संस्थानों में वार्षिक फीस ₹20,000 से ₹1.5 लाख तक हो सकती है, जबकि निजी विश्वविद्यालयों में यह ₹1 लाख से ₹4 लाख प्रति वर्ष के बीच होती है।

इसके अलावा छात्र अपनी डिग्री के साथ-साथ आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कंप्यूटर विज़न से जुड़े ऑनलाइन सर्टिफिकेशन कोर्स भी कर सकते हैं, जिससे उनकी तकनीकी दक्षता और बढ़ती है।

किसी भी कोर्स का चयन करते समय छात्रों को पाठ्यक्रम की गुणवत्ता, प्रैक्टिकल ट्रेनिंग, फैकल्टी का अनुभव, उद्योग से जुड़ाव, इंटर्नशिप और प्लेसमेंट सहायता जैसे पहलुओं पर विशेष ध्यान देना चाहिए।

भारत में कंप्यूटर विज़न का करियर स्कोप

विभिन्न उद्योगों में AI के बढ़ते उपयोग के साथ कंप्यूटर विज़न का भविष्य बेहद उज्ज्वल माना जा रहा है। स्वास्थ्य क्षेत्र में इसका उपयोग मेडिकल इमेज विश्लेषण के लिए किया जा रहा है, जबकि ऑटोमोबाइल उद्योग में यह स्वायत्त वाहन तकनीक को विकसित करने में मदद कर रहा है। मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर में इसका उपयोग स्मार्ट क्वालिटी कंट्रोल सिस्टम में किया जा रहा है।

इसके अलावा कृषि, रिटेल, साइबर सुरक्षा, रोबोटिक्स, रक्षा, स्मार्ट सिटी और वित्तीय सेवाओं जैसे क्षेत्रों में भी कंप्यूटर विज़न तकनीक तेजी से अपनाई जा रही है। यही कारण है कि प्रशिक्षित पेशेवरों की मांग लगातार बढ़ रही है।

उचित तकनीकी कौशल हासिल करने के बाद छात्र Computer Vision Engineer, Machine Learning Engineer, AI Engineer, Data Scientist, Robotics Specialist, Image Processing Expert और AI Research Associate जैसी भूमिकाओं में करियर बना सकते हैं। टेक स्टार्टअप्स, बहुराष्ट्रीय कंपनियां, रिसर्च लैब और इनोवेशन सेंटर भी ऐसे पेशेवरों को रोजगार के अवसर प्रदान करते हैं।

क्या कंप्यूटर विज़न एक अच्छा करियर विकल्प है?

जो छात्र आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, प्रोग्रामिंग और नई तकनीकों में रुचि रखते हैं, उनके लिए कंप्यूटर विज़न एक शानदार करियर विकल्प साबित हो सकता है। यह क्षेत्र तकनीकी ज्ञान और रचनात्मक सोच का अनूठा मिश्रण है, जहां काम का सीधा प्रभाव वास्तविक दुनिया की समस्याओं के समाधान पर पड़ता है।

कंप्यूटर विज़न AI, रोबोटिक्स, हेल्थकेयर टेक्नोलॉजी और ऑटोमेशन जैसे तेजी से बढ़ते क्षेत्रों के संगम पर स्थित है। जैसे-जैसे स्मार्ट और बुद्धिमान सिस्टम की मांग बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस क्षेत्र के विशेषज्ञों की जरूरत भी बढ़ रही है।

कंप्यूटर विज़न कोर्स के लिए प्रवेश परीक्षा

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, मशीन लर्निंग, डेटा साइंस और कंप्यूटर विज़न जैसे उभरते तकनीकी कार्यक्रमों में प्रवेश लेने के इच्छुक छात्रों के लिए Global Common Entrance Test (GMCET) एक उपयोगी प्रवेश मार्ग हो सकता है।

GMCET एक राष्ट्रीय स्तर की ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा है, जिसे भारत के कई प्रमुख विश्वविद्यालय B.Tech, BCA और M.Tech कार्यक्रमों में प्रवेश के लिए स्वीकार करते हैं। इसका उद्देश्य छात्रों को एक ही परीक्षा के माध्यम से विभिन्न तकनीकी संस्थानों में अवसर उपलब्ध कराना है।

यह परीक्षा छात्रों की समस्या समाधान क्षमता, तार्किक सोच, गणितीय योग्यता और समग्र शैक्षणिक तैयारी का मूल्यांकन करती है। GMCET में शामिल होकर छात्र प्रवेश प्रक्रिया को आसान बना सकते हैं और AI तथा कंप्यूटर विज़न से जुड़े अधिक विश्वविद्यालयों और कार्यक्रमों का चयन कर सकते हैं।

छात्रों को क्या जानना चाहिए?

कंप्यूटर विज़न अब भविष्य की तकनीक नहीं रह गया है। यह आज उद्योगों, अनुसंधान संस्थानों और व्यवसायों में सक्रिय रूप से इस्तेमाल की जा रही तकनीक है। स्वास्थ्य सेवाओं से लेकर स्मार्ट मैन्युफैक्चरिंग, स्वायत्त वाहनों से लेकर सुरक्षा प्रणालियों तक, इसके उपयोग लगातार बढ़ रहे हैं।

यदि आपने 12वीं पूरी कर ली है और भविष्य की तकनीकों में करियर बनाना चाहते हैं, तो आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, कंप्यूटर साइंस या डेटा साइंस के माध्यम से कंप्यूटर विज़न सीखना एक बेहतरीन विकल्प हो सकता है। यह क्षेत्र मजबूत शैक्षणिक आधार के साथ-साथ व्यावहारिक अनुभव भी प्रदान करता है, जिससे छात्र आधुनिक तकनीक के सबसे तेजी से विकसित होने वाले क्षेत्रों में सफल करियर बना सकते हैं।

इसलिए सही जानकारी जुटाएं, उपयुक्त प्रवेश परीक्षा की तैयारी करें और बेहतर अवसरों के लिए किसी प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय का चयन करें।

 प्रमुख ख़बरें 

Grid List

उत्तर प्रदेश की राजधानी लखनऊ के इंदिरा गांधी प्रतिष्ठान में 24 अप्रैल को आयोजित एडइनबॉक्स रीजनल हायर एजुकेशन समिट 2026 सफलतापूर्वक संपन्न हो गया। सुबह 9 बजे से शाम तक चले इस पूरे दिन के आयोजन में शिक्षा जगत के विशेषज्ञों, विश्वविद्यालय प्रतिनिधियों, स्कूल लीडर्स, नीति निर्माताओं और बड़ी संख्या में छात्रों ने भाग लिया। समिट ने उच्च शिक्षा, कौशल विकास, उभरते करियर विकल्पों और इंडस्ट्री-एकेडेमिया तालमेल जैसे महत्वपूर्ण मुद्दों पर सार्थक चर्चा का मंच प्रदान किया।

कार्यक्रम का उद्घाटन उत्तर प्रदेश फॉरेंसिक साइंस लैबोरेट्री (विधि विज्ञान प्रयोगशाला) के निदेशक प्रो. (डॉ.) आदर्श कुमार ने किया। उद्घाटन सत्र में उनके साथ प्रयोगशाला के उप निदेशक ए.के. श्रीवास्तव, उत्तर प्रदेश में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी के प्रो वाइस चांसलर डॉ. टी.पी. सिंह, लखनऊ स्थित समर्पण इंस्टीट्यूट ऑफ़ नर्सिंग एंड पैरामेडिकल साइंसेज की प्रिंसिपल प्रो. दीप्ति शुक्ला और टेक्नो इंडिया यूनिवर्सिटी, कोलकाता के प्रो वाइस चांसलर एवं एडइनबॉक्स कम्युनिकेशन्स के एडिटोरियल एडवाइजर प्रो. उज्जवल के. चौधरी समेत कई प्रमुख अतिथि मौजूद रहे।

उद्घाटन सत्र को संबोधित करते हुए प्रो. (डॉ.) आदर्श कुमार ने कहा कि आज के समय में शिक्षा को केवल सैद्धांतिक ज्ञान तक सीमित नहीं रखा जा सकता। उन्होंने जोर दिया कि छात्रों को व्यावहारिक कौशल, अनुसंधान क्षमता और वैज्ञानिक दृष्टिकोण से लैस करना जरूरी है, ताकि वे बदलते समय की चुनौतियों का सामना कर सकें। उन्होंने फॉरेंसिक साइंस को युवाओं के लिए उभरते और संभावनाओं से भरे क्षेत्र के रूप में रेखांकित किया।

समिट में इस वर्ष फॉरेंसिक साइंस पर विशेष फोकस रहा। विशेषज्ञों ने डीएनए प्रोफाइलिंग, डिजिटल फॉरेंसिक, टॉक्सिकोलॉजी और फिंगरप्रिंट विश्लेषण जैसी तकनीकों को सरल तरीके से समझाया और बताया कि कैसे छोटे-छोटे साक्ष्य बड़े मामलों को सुलझाने में अहम भूमिका निभाते हैं। साथ ही अदालत में वैज्ञानिक तथ्यों की प्रस्तुति और जांच प्रक्रिया की जटिलताओं पर भी विस्तार से चर्चा की गई।

उद्घाटन सत्र में चंडीगढ़ यूनिवर्सिटी, उत्तर प्रदेश के प्रो वाइस चांसलर डॉ. टी.पी. सिंह ने “इंटर, मल्टी और ट्रांस-डिसिप्लिनरी लर्निंग” तथा “टर्मिनल स्किल्स से निरंतर स्किल्स लर्निंग” के बीच अंतर को स्पष्ट करते हुए कहा कि आज की शिक्षा केवल एक विषय तक सीमित नहीं रह सकती।

उन्होंने बताया कि इंटर-डिसिप्लिनरी लर्निंग में दो विषयों का समन्वय होता है, जबकि मल्टी-डिसिप्लिनरी लर्निंग में कई विषयों की समानांतर समझ विकसित की जाती है। वहीं ट्रांस-डिसिप्लिनरी लर्निंग इन सभी सीमाओं से आगे बढ़कर वास्तविक जीवन की समस्याओं के समाधान पर केंद्रित होती है।

डॉ. सिंह ने “टर्मिनल स्किल्स” की अवधारणा को समझाते हुए कहा कि पहले शिक्षा एक निश्चित कौशल तक सीमित होती थी, जिसे सीखकर छात्र अपने करियर की शुरुआत करते थे। लेकिन बदलते समय में यह मॉडल पर्याप्त नहीं है। अब जरूरत “कंटीन्यूस स्किल्स लर्निंग” की है, जहां व्यक्ति को लगातार नई तकनीकों और कौशलों को सीखते रहना पड़ता है।

उन्होंने जोर देते हुए कहा कि तेजी से बदलती तकनीक और रोजगार के स्वरूप को देखते हुए छात्रों को लचीला, जिज्ञासु और आजीवन सीखने के लिए तैयार रहना होगा, तभी वे भविष्य की चुनौतियों का सफलतापूर्वक सामना कर पाएंगे।

कार्यक्रम के विभिन्न सत्रों में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, क्रिएटिव करियर, नई शिक्षा नीति और स्किल-आधारित शिक्षा जैसे विषयों पर विशेषज्ञों ने अपने विचार साझा किए। रीजनल प्रिंसिपल्स मीट, एकेडमिक लीडरशिप डायलॉग और स्कूल–यूनिवर्सिटी कनेक्ट इनिशिएटिव जैसे सत्रों ने शिक्षा क्षेत्र के विभिन्न हितधारकों के बीच संवाद को मजबूत किया।

समिट का एक प्रमुख आकर्षण छात्रों और विशेषज्ञों के बीच सीधा संवाद रहा, जिसमें युवाओं ने करियर विकल्प, प्रवेश परीक्षाओं और भविष्य की संभावनाओं से जुड़े सवाल पूछे। इस दौरान उन्हें व्यावहारिक और स्पष्ट मार्गदर्शन मिला। आयोजन में छात्रों के लिए प्रतियोगिताएं, करियर काउंसलिंग सत्र और विभिन्न गतिविधियां भी आयोजित की गईं, जिससे कार्यक्रम और अधिक सहभागी बना।

कार्यक्रम की मेजबानी लोकप्रिय रेडियो जॉकी RJ पुनीत और RJ मनीषा ने की। उनकी जीवंत प्रस्तुति ने पूरे आयोजन को ऊर्जावान बनाए रखा और छात्रों के साथ बेहतर जुड़ाव स्थापित किया।

समिट के दौरान शैक्षणिक उत्कृष्टता को बढ़ावा देने के लिए संस्थानों और स्कूल प्रिंसिपल्स को सम्मानित भी किया गया। ‘प्रिंसिपल अवॉर्ड ऑफ ऑनर’ के तहत कई शिक्षाविदों को उनके योगदान के लिए सराहा गया।

आयोजकों ने कहा कि इस तरह के मंच छात्रों को सही दिशा में मार्गदर्शन देने, नए करियर विकल्पों से परिचित कराने और शिक्षा प्रणाली को समय की मांग के अनुरूप ढालने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। उन्होंने उम्मीद जताई कि यह समिट भविष्य में शिक्षा क्षेत्र में सकारात्मक बदलावों को गति देगा।

कार्यक्रम के अंत में आयोजकों ने सभी अतिथियों, प्रतिभागियों और सहयोगियों का आभार व्यक्त किया।

 

 

देश और दुनिया में बढ़ते साइबर अपराध, डिजिटल फ्रॉड और तकनीक आधारित जांच के मामलों ने छात्रों की करियर पसंद में बड़ा बदलाव ला दिया है। अब बड़ी संख्या में छात्र पारंपरिक इंजीनियरिंग और मेडिकल जैसे कोर्स के बजाय साइबर सिक्योरिटी (Cyber Security), फोरेंसिक साइंस (Forensic Science) और क्रिमिनोलॉजी (Criminology) जैसे विशेषज्ञता वाले कोर्स की ओर रुख कर रहे हैं।

शिक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि पिछले कुछ वर्षों में इन क्षेत्रों की मांग तेजी से बढ़ी है। सरकारों, निजी कंपनियों और कानून प्रवर्तन एजेंसियों को ऐसे प्रशिक्षित पेशेवरों की जरूरत है जो डिजिटल अपराधों की जांच कर सकें और जटिल आपराधिक मामलों में वैज्ञानिक तरीके से साक्ष्य जुटाने में सक्षम हों।

इसी बढ़ती मांग को देखते हुए नेशनल फोरेंसिक साइंसेज यूनिवर्सिटी (NFSU) ने हाल ही में अपने चेन्नई परिसर में साइबर सिक्योरिटी, फोरेंसिक साइंस, क्रिमिनोलॉजी और क्राइम सीन मैनेजमेंट जैसे पाठ्यक्रमों में प्रवेश के लिए आवेदन आमंत्रित किए हैं। यह कदम राष्ट्रीय सुरक्षा, साइबर सुरक्षा और आपराधिक न्याय व्यवस्था से जुड़े कोर्स में बढ़ती रुचि को दर्शाता है।

Cyber Security क्यों बन रहा है सबसे पसंदीदा करियर?

डिजिटल सेवाओं के तेजी से विस्तार के साथ साइबर सिक्योरिटी दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते करियर क्षेत्रों में शामिल हो चुका है। बैंकिंग, हेल्थकेयर, ई-कॉमर्स, सूचना प्रौद्योगिकी (IT) और सरकारी संस्थानों सहित लगभग हर क्षेत्र अपनी डिजिटल प्रणाली और संवेदनशील डेटा को साइबर हमलों से सुरक्षित रखने के लिए बड़े पैमाने पर निवेश कर रहा है।

सामान्य कंप्यूटर साइंस कोर्स जहां मुख्य रूप से सॉफ्टवेयर डेवलपमेंट और प्रोग्रामिंग पर केंद्रित होते हैं, वहीं साइबर सिक्योरिटी पाठ्यक्रम छात्रों को एथिकल हैकिंग, साइबर डिफेंस, नेटवर्क सिक्योरिटी, डिजिटल फोरेंसिक और थ्रेट इंटेलिजेंस जैसे व्यावहारिक विषयों का प्रशिक्षण देते हैं। यही वजह है कि इन कोर्स की रोजगार क्षमता लगातार बढ़ रही है।

Forensic Science की बढ़ती अहमियत

फोरेंसिक साइंस भी आधुनिक आपराधिक जांच का महत्वपूर्ण हिस्सा बनकर उभरी है। भारत की आपराधिक न्याय प्रणाली में हुए हालिया सुधारों के बाद वैज्ञानिक साक्ष्यों पर आधारित जांच को अधिक महत्व दिया जा रहा है।

सरकार द्वारा गंभीर आपराधिक मामलों में फोरेंसिक जांच को अनिवार्य बनाने के फैसले से आने वाले वर्षों में क्राइम सीन इन्वेस्टिगेशन, फोरेंसिक एनालिसिस और एविडेंस मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में प्रशिक्षित पेशेवरों की मांग और बढ़ने की उम्मीद है।

प्रैक्टिकल ट्रेनिंग पर बढ़ रहा है फोकस

आज शैक्षणिक संस्थान केवल कक्षा आधारित पढ़ाई तक सीमित नहीं हैं। छात्रों को उद्योग के लिए तैयार करने के उद्देश्य से आधुनिक प्रयोगशालाओं, सिमुलेशन सुविधाओं, फील्ड ट्रेनिंग और इंटर्नशिप पर विशेष जोर दिया जा रहा है।

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि यही व्यावहारिक प्रशिक्षण छात्रों को वास्तविक कार्य अनुभव देता है और उन्हें नौकरी के लिए बेहतर तरीके से तैयार करता है।

सरकारी ही नहीं, निजी क्षेत्र में भी बढ़ रहे हैं अवसर

इन कोर्सों के बाद करियर विकल्प केवल सरकारी नौकरियों तक सीमित नहीं हैं। साइबर सिक्योरिटी विशेषज्ञों की भर्ती निजी कंपनियों, बैंकों, वित्तीय संस्थानों, आईटी कंपनियों और साइबर क्राइम यूनिट में तेजी से हो रही है।

वहीं फोरेंसिक साइंस के स्नातकों के लिए फोरेंसिक प्रयोगशालाओं, जांच एजेंसियों, पुलिस विभाग, कानून प्रवर्तन संगठनों और कानूनी सहायता सेवाओं में रोजगार के अवसर लगातार बढ़ रहे हैं।

आने वाले वर्षों में और बढ़ेगी मांग

विशेषज्ञों का मानना है कि जैसे-जैसे डिजिटल खतरे बढ़ेंगे और अपराधों की जांच में वैज्ञानिक तकनीकों का इस्तेमाल व्यापक होगा, वैसे-वैसे साइबर सिक्योरिटी और फोरेंसिक साइंस जैसे प्रोफेशनल कोर्स छात्रों की पहली पसंद बने रहेंगे। बेहतर रोजगार संभावनाओं, आकर्षक वेतन और तेजी से बढ़ती मांग के कारण ये क्षेत्र भविष्य के सबसे मजबूत करियर विकल्पों में शामिल माने जा रहे हैं।

12वीं का रिजल्ट जारी होने के बाद लाखों छात्र अपने करियर को लेकर सबसे अहम फैसले की तैयारी में जुट जाते हैं। कोई मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं के जरिए आगे की पढ़ाई करना चाहता है, तो कई छात्र केंद्रीय और राज्य विश्वविद्यालयों में दाखिले की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन एक बड़ा वर्ग ऐसा भी है, जो लंबी पढ़ाई के बजाय जल्द से जल्द नौकरी या प्रोफेशनल करियर शुरू करना चाहता है।

ऐसे छात्रों के लिए डिप्लोमा कोर्स एक अच्छा विकल्प साबित हो सकते हैं। ये कोर्स कम समय में इंडस्ट्री से जुड़ी स्किल्स सिखाते हैं और छात्रों को रोजगार के लिए तैयार करते हैं। कई डिप्लोमा कोर्स ऐसे भी हैं, जिन्हें पूरा करने के बाद नौकरी के साथ-साथ आगे की पढ़ाई का विकल्प भी खुला रहता है।

12वीं के बाद डिप्लोमा कोर्स क्यों हैं बेहतर विकल्प?

डिप्लोमा कोर्स का सबसे बड़ा फायदा यह है कि इनमें पढ़ाई के साथ प्रैक्टिकल ट्रेनिंग पर अधिक जोर दिया जाता है। छात्र केवल सैद्धांतिक जानकारी तक सीमित नहीं रहते, बल्कि वास्तविक कार्यक्षेत्र में इस्तेमाल होने वाली तकनीकों और स्किल्स को भी सीखते हैं। यही वजह है कि मैन्युफैक्चरिंग, हेल्थकेयर, बैंकिंग, डिजाइन और आईटी जैसे कई सेक्टरों में डिप्लोमा धारकों की मांग लगातार बनी रहती है।

अगर कोई छात्र जल्द नौकरी करना चाहता है या कम खर्च में प्रोफेशनल स्किल हासिल करना चाहता है, तो डिप्लोमा कोर्स उसके लिए उपयोगी विकल्प हो सकता है।

साइंस स्ट्रीम के छात्रों के लिए बेहतरीन डिप्लोमा कोर्स

साइंस स्ट्रीम के अधिकांश छात्र इंजीनियरिंग या मेडिकल की पढ़ाई का सपना देखते हैं। हालांकि हर छात्र इन कोर्सों में प्रवेश नहीं ले पाता। ऐसे में कई डिप्लोमा कोर्स मजबूत करियर विकल्प बन सकते हैं।

पॉलिटेक्निक (इंजीनियरिंग डिप्लोमा)
मैकेनिकल, सिविल, इलेक्ट्रिकल, इलेक्ट्रॉनिक्स, कंप्यूटर और अन्य इंजीनियरिंग शाखाओं में पॉलिटेक्निक डिप्लोमा काफी लोकप्रिय है। इसे पूरा करने के बाद उद्योगों में तकनीकी पदों पर नौकरी के अवसर मिलते हैं। साथ ही कई विश्वविद्यालयों में बीटेक के दूसरे वर्ष में लेटरल एंट्री के जरिए प्रवेश भी लिया जा सकता है।

नर्सिंग डिप्लोमा (ANM और GNM)
हेल्थकेयर सेक्टर में करियर बनाने के इच्छुक छात्रों के लिए ANM और GNM जैसे नर्सिंग कोर्स अच्छे विकल्प हैं। प्रशिक्षित नर्सों की मांग सरकारी और निजी दोनों अस्पतालों में लगातार बनी हुई है। हालांकि वर्तमान नियमों के अनुसार कई संस्थानों में GNM के लिए पात्रता और प्रवेश प्रक्रिया अलग-अलग हो सकती है, इसलिए आवेदन से पहले संबंधित संस्थान की शर्तें जरूर देखें।

पैरामेडिकल डिप्लोमा
मेडिकल लैब टेक्नोलॉजी, एक्स-रे, ऑपरेशन थिएटर टेक्नोलॉजी, रेडियोलॉजी और अन्य पैरामेडिकल क्षेत्रों में डिप्लोमा करने के बाद अस्पतालों, डायग्नोस्टिक सेंटर और हेल्थकेयर संस्थानों में रोजगार के अवसर मिलते हैं।

डिप्लोमा इन फार्मेसी (D.Pharm)
फार्मेसी सेक्टर में करियर बनाने वाले छात्रों के लिए डी.फार्म एक लोकप्रिय कोर्स है। इसे पूरा करने और संबंधित राज्य फार्मेसी परिषद में पंजीकरण कराने के बाद मेडिकल स्टोर या फार्मेसी क्षेत्र में रोजगार और स्वरोजगार के अवसर मिल सकते हैं।

कॉमर्स स्ट्रीम के छात्रों के लिए डिप्लोमा कोर्स

कॉमर्स के छात्र आमतौर पर बीकॉम, बीबीए, सीए या सीएस जैसे कोर्स चुनते हैं। लेकिन यदि जल्दी करियर शुरू करना चाहते हैं तो कई डिप्लोमा कोर्स भी उपयोगी हैं।

डिप्लोमा इन बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन (DBA)
यह कोर्स बिजनेस मैनेजमेंट की बुनियादी समझ विकसित करता है। इसमें मार्केटिंग, फाइनेंस, मानव संसाधन और बिजनेस संचालन से जुड़े विषय पढ़ाए जाते हैं। छोटे और मध्यम उद्योगों में इसकी अच्छी उपयोगिता है।

डिप्लोमा इन बैंकिंग एंड फाइनेंस
बैंकिंग, बीमा और वित्तीय सेवाओं के तेजी से विस्तार के कारण इस क्षेत्र में प्रशिक्षित युवाओं की मांग बढ़ रही है। इस कोर्स के बाद बैंकिंग सपोर्ट, कस्टमर सर्विस, फाइनेंशियल एडवाइजरी और अन्य संबंधित क्षेत्रों में अवसर मिल सकते हैं।

डिप्लोमा इन अकाउंटिंग
अकाउंटिंग, जीएसटी, टैक्सेशन और टैली जैसे अकाउंटिंग सॉफ्टवेयर की जानकारी देने वाला यह कोर्स नौकरी की दृष्टि से काफी उपयोगी माना जाता है। छोटे-बड़े कारोबार, सीए फर्म और निजी कंपनियों में अकाउंट्स से जुड़े पदों पर रोजगार के अवसर उपलब्ध रहते हैं।

आर्ट्स स्ट्रीम के छात्रों के लिए करियर विकल्प

आर्ट्स स्ट्रीम के छात्रों के लिए भी कई ऐसे डिप्लोमा कोर्स हैं, जिनकी मदद से वे कम समय में रोजगार योग्य स्किल्स विकसित कर सकते हैं।

डिप्लोमा इन इवेंट मैनेजमेंट
शादी, कॉर्पोरेट इवेंट, स्पोर्ट्स और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के विस्तार के साथ इवेंट मैनेजमेंट का क्षेत्र तेजी से बढ़ा है। इस कोर्स के बाद नौकरी के साथ-साथ अपना इवेंट मैनेजमेंट व्यवसाय शुरू करने का अवसर भी मिलता है।

डिप्लोमा इन फैशन डिजाइनिंग
फैशन इंडस्ट्री में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए यह कोर्स बेहतर विकल्प है। डिजाइनिंग, गारमेंट प्रोडक्शन और फैशन ब्रांड्स के साथ काम करने के अवसर इस क्षेत्र में उपलब्ध हैं।

डिप्लोमा इन मल्टीमीडिया एंड एनिमेशन
डिजिटल मीडिया, गेमिंग, विज्ञापन और फिल्म इंडस्ट्री में मल्टीमीडिया और एनिमेशन प्रोफेशनल्स की मांग लगातार बढ़ रही है। इस कोर्स के बाद ग्राफिक डिजाइन, वीडियो एडिटिंग, 2D-3D एनिमेशन और डिजिटल कंटेंट प्रोडक्शन जैसे क्षेत्रों में करियर बनाया जा सकता है।

डिप्लोमा कोर्स चुनते समय किन बातों का रखें ध्यान?

डिप्लोमा कोर्स का चयन केवल उसकी लोकप्रियता देखकर नहीं करना चाहिए। सबसे पहले अपनी रुचि, योग्यता और भविष्य के करियर लक्ष्य को समझें। साथ ही यह भी सुनिश्चित करें कि जिस संस्थान में दाखिला ले रहे हैं, वह संबंधित नियामक संस्था से मान्यता प्राप्त हो। कोर्स का प्लेसमेंट रिकॉर्ड, इंडस्ट्री ट्रेनिंग और आगे की पढ़ाई के अवसर भी जरूर जांचें।

12वीं के बाद हर छात्र का लक्ष्य अलग होता है। यदि आप कम समय में प्रोफेशनल स्किल हासिल कर नौकरी या स्वरोजगार की दिशा में आगे बढ़ना चाहते हैं, तो डिप्लोमा कोर्स एक मजबूत विकल्प हो सकता है। साइंस, कॉमर्स और आर्ट्स—तीनों स्ट्रीम के छात्रों के लिए आज ऐसे कई कोर्स उपलब्ध हैं, जो उन्हें तेजी से बदलते जॉब मार्केट के लिए तैयार करते हैं। सही संस्थान और सही कोर्स का चयन आपके करियर की मजबूत शुरुआत साबित हो सकता है।

कुछ साल पहले तक शिक्षा का मतलब अच्छी डिग्री हासिल करना और फिर नौकरी की तलाश करना माना जाता था। लेकिन आज यह सोच तेजी से बदल रही है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) के बढ़ते इस्तेमाल और उद्योगों की बदलती जरूरतों ने शिक्षा व्यवस्था को भी नई दिशा दी है। अब सवाल केवल यह नहीं रह गया कि छात्र क्या पढ़ रहे हैं, बल्कि यह भी महत्वपूर्ण हो गया है कि वे क्या कर सकते हैं।

भारत सहित पूरी दुनिया में शिक्षा का फोकस धीरे-धीरे डिग्री से हटकर कौशल यानी स्किल पर आ रहा है। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 भी इसी बदलाव को आगे बढ़ाती है। स्कूलों और विश्वविद्यालयों में इंटर्नशिप, प्रोजेक्ट आधारित सीखने, डिजिटल टूल्स और व्यावहारिक प्रशिक्षण पर पहले से अधिक जोर दिया जा रहा है। इसके पीछे सबसे बड़ी वजह यह है कि नौकरी का बाजार पहले से कहीं अधिक तेजी से बदल रहा है।

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने इस बदलाव को और तेज कर दिया है। आज AI कंटेंट तैयार कर सकता है, डेटा का विश्लेषण कर सकता है, कोड लिख सकता है और कई नियमित कार्यों को इंसानों से अधिक तेजी से पूरा कर सकता है। ऐसे में केवल किताबों का ज्ञान अब पर्याप्त नहीं माना जा सकता। कंपनियां ऐसे युवाओं की तलाश कर रही हैं जो समस्याओं का समाधान निकाल सकें, नई तकनीकों को समझ सकें और बदलती परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढाल सकें।

यही कारण है कि साइबर सिक्योरिटी, डेटा साइंस, फोरेंसिक साइंस, मशीन लर्निंग, डिजिटल मार्केटिंग और क्लाउड कंप्यूटिंग जैसे क्षेत्रों में छात्रों की रुचि लगातार बढ़ रही है। इन क्षेत्रों में केवल सैद्धांतिक जानकारी नहीं, बल्कि व्यावहारिक अनुभव और उद्योग के अनुरूप कौशल को अधिक महत्व दिया जाता है। कई विश्वविद्यालय अब अपने पाठ्यक्रमों में इंटर्नशिप, लाइव प्रोजेक्ट और उद्योग साझेदारी को शामिल कर रहे हैं, जिससे छात्रों को पढ़ाई के दौरान ही वास्तविक कार्य अनुभव मिल सके।

हालांकि, इस बदलाव को केवल तकनीक तक सीमित करके नहीं देखा जाना चाहिए। AI एक शक्तिशाली उपकरण है, लेकिन यह शिक्षक का विकल्प नहीं बन सकता। शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार दिलाना नहीं है। शिक्षा व्यक्ति में सोचने-समझने की क्षमता, नैतिक मूल्यों, सामाजिक जिम्मेदारी और रचनात्मकता का भी विकास करती है। यदि छात्र हर समस्या का उत्तर केवल AI से लेने लगेंगे, तो उनकी विश्लेषण क्षमता, मौलिक सोच और निर्णय लेने की योग्यता प्रभावित हो सकती है।

एक और चुनौती डिजिटल असमानता की है। देश के बड़े शहरों के छात्रों के पास आधुनिक तकनीक, तेज इंटरनेट और AI आधारित संसाधनों तक आसान पहुंच है, जबकि ग्रामीण और दूरदराज के क्षेत्रों के कई छात्र अभी भी इन सुविधाओं से पूरी तरह नहीं जुड़ पाए हैं। यदि शिक्षा में AI का उपयोग तेजी से बढ़ता है, तो यह सुनिश्चित करना भी जरूरी होगा कि सभी छात्रों को समान अवसर मिलें। अन्यथा तकनीकी संसाधनों की कमी शिक्षा में नई असमानता पैदा कर सकती है।

इसके साथ ही AI के जिम्मेदार उपयोग पर भी ध्यान देना होगा। छात्रों को केवल AI टूल इस्तेमाल करना नहीं, बल्कि यह भी सिखाना होगा कि इनका उपयोग नैतिक और जिम्मेदारी के साथ कैसे किया जाए। जानकारी की सत्यता की जांच करना, स्रोतों का सही उल्लेख करना और अपनी मौलिक सोच को बनाए रखना भविष्य की शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा होना चाहिए।

भारत आज दुनिया की सबसे युवा आबादी वाले देशों में शामिल है। यदि शिक्षा व्यवस्था समय रहते उद्योगों की जरूरतों के अनुसार खुद को नहीं बदलती, तो डिग्रीधारी युवाओं और रोजगार बाजार के बीच का अंतर और बढ़ सकता है। इसलिए स्किल आधारित शिक्षा की दिशा में उठाए जा रहे कदम स्वागत योग्य हैं। लेकिन इनका उद्देश्य केवल नौकरी दिलाना नहीं, बल्कि ऐसे नागरिक तैयार करना होना चाहिए जो तकनीकी रूप से सक्षम होने के साथ-साथ संवेदनशील, रचनात्मक और जिम्मेदार भी हों।

भविष्य की पढ़ाई निश्चित रूप से AI और स्किल आधारित होगी, लेकिन इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि तकनीक और मानवीय मूल्यों के बीच संतुलन कितना मजबूत बनाया जाता है। यदि शिक्षा व्यवस्था इस संतुलन को कायम रख पाती है, तो आने वाली पीढ़ी केवल बेहतर पेशेवर ही नहीं, बल्कि बेहतर नागरिक भी बनेगी।

एक समय भारत के स्टार्टअप इकोसिस्टम में BYJU'S को सफलता का सबसे बड़ा प्रतीक माना जाता था। कंपनी के संस्थापक Byju Raveendran को भारतीय स्टार्टअप संस्कृति का पोस्टर ब्वॉय कहा जाता था। छोटे शहर के एक शिक्षक से अरबपति बनने तक का उनका सफर लाखों युवाओं के लिए प्रेरणा माना जाता था। लेकिन आज वही कंपनी भारी कर्ज, कानूनी विवादों और दिवालियापन के संकट में फंसी हुई है।

हाल ही में सिंगापुर की एक अदालत द्वारा अवमानना से जुड़े मामले में बायजू रवींद्रन को छह महीने की सजा सुनाए जाने की खबर ने इस पूरे मामले को फिर चर्चा में ला दिया है। ऐसे में बड़ा सवाल यह है कि आखिर 22 अरब डॉलर वैल्यूएशन तक पहुंचने वाली कंपनी इतनी तेजी से कैसे बिखर गई?

एक शिक्षक से देश के सबसे बड़े एडटेक उद्यमी तक का सफर

केरल के अझीकोड में जन्मे बायजू रवींद्रन के माता-पिता शिक्षक थे। उन्होंने शुरुआत में एक शिपिंग कंपनी में इंजीनियर के तौर पर काम किया। खाली समय में वे दोस्तों को CAT परीक्षा की तैयारी कराते थे। गणित और लॉजिकल सवालों को आसान तरीके से समझाने की उनकी शैली तेजी से लोकप्रिय हो गई।

धीरे-धीरे उनके क्लासरूम बड़े ऑडिटोरियम और स्टेडियम तक पहुंच गए। इसी लोकप्रियता को डिजिटल रूप देने के लिए उन्होंने 2015 में BYJU’S Learning App लॉन्च किया। मोबाइल आधारित शिक्षा प्लेटफॉर्म को छात्रों और अभिभावकों से जबरदस्त प्रतिक्रिया मिली और कुछ ही वर्षों में कंपनी भारत की सबसे चर्चित एडटेक कंपनियों में शामिल हो गई।

कोरोना महामारी ने बदल दी कंपनी की किस्मत

BYJU’S की सबसे तेज ग्रोथ कोविड-19 महामारी के दौरान देखने को मिली। स्कूल बंद होने के बाद ऑनलाइन पढ़ाई अचानक जरूरत बन गई। इस दौर में लाखों नए यूजर्स प्लेटफॉर्म से जुड़े और विदेशी निवेशकों ने कंपनी में भारी निवेश किया।

तेजी से मिले फंड के दम पर कंपनी ने आक्रामक विस्तार शुरू किया। Aakash Educational Services, WhiteHat Jr और Great Learning जैसी कंपनियों का अधिग्रहण किया गया। इसके अलावा कंपनी ने खेल स्पॉन्सरशिप और बड़े विज्ञापन अभियानों पर भी भारी खर्च किया। उस समय BYJU’S को भारत के सबसे सफल स्टार्टअप मॉडल के तौर पर पेश किया जा रहा था।

फिर कहां से शुरू हुआ पतन?

विशेषज्ञों के मुताबिक कंपनी की सबसे बड़ी गलती यह थी कि उसने महामारी के दौरान मिली असाधारण ग्रोथ को स्थायी मान लिया। जैसे ही स्कूल दोबारा खुले, ऑनलाइन पढ़ाई की मांग में गिरावट आने लगी।

इसके साथ ही कंपनी की आक्रामक सेल्स रणनीति पर सवाल उठने लगे। कई अभिभावकों ने आरोप लगाया कि महंगे सब्सक्रिप्शन बेचने के लिए उन पर दबाव बनाया गया। कुछ मामलों में छात्रों के परिवारों को EMI और एजुकेशन लोन के जरिए कोर्स खरीदने के लिए प्रेरित किया गया, जिसे लेकर सोशल मीडिया पर भी आलोचना हुई।

शिक्षा क्षेत्र में भरोसा सबसे महत्वपूर्ण माना जाता है। जब कंपनी की बिक्री रणनीति और सेवा गुणवत्ता पर सवाल बढ़े, तो उसकी छवि को गहरा नुकसान पहुंचा।

वित्तीय संकट और कानूनी विवादों ने बढ़ाई मुश्किलें

कंपनी के विस्तार की रफ्तार इतनी तेज थी कि खर्च लगातार बढ़ता गया। इसी बीच वित्तीय रिपोर्ट समय पर दाखिल नहीं हो सकीं। बाद में कंपनी के ऑडिटर Deloitte और कई बोर्ड सदस्यों के इस्तीफे ने निवेशकों की चिंता और बढ़ा दी।

सबसे बड़ा संकट तब सामने आया जब BYJU’S ने करीब 1.2 अरब डॉलर का विदेशी लोन लिया। विदेशी कर्जदाताओं ने आरोप लगाया कि कंपनी से जुड़ी बड़ी रकम विदेशी खातों में ट्रांसफर की गई। इसके बाद भारत और अमेरिका समेत कई देशों में कानूनी विवाद शुरू हो गए।

धीरे-धीरे कंपनी की वित्तीय स्थिति इतनी खराब हो गई कि कर्मचारियों की सैलरी, वेंडर पेमेंट और संचालन पर असर पड़ने लगा। एक समय कंपनी की वैल्यूएशन 22 अरब डॉलर बताई जाती थी, लेकिन बाद में खुद बायजू रवींद्रन ने स्वीकार किया कि कंपनी की वैल्यू लगभग शून्य रह गई है।

क्या अधिग्रहण की रणनीति उलटी पड़ गई?

महामारी के दौरान BYJU’S ने तेजी से कई कंपनियों का अधिग्रहण किया। शुरुआत में इसे आक्रामक और दूरदर्शी रणनीति माना गया, लेकिन बाद में यही विस्तार कंपनी के लिए बड़ी चुनौती बन गया।

अलग-अलग देशों, तकनीकों और शिक्षा श्रेणियों वाली कंपनियों को एक साथ संभालना आसान नहीं था। विशेषज्ञों का मानना है कि इतनी तेजी से बढ़ते कारोबार को नियंत्रित करने के लिए मजबूत प्रबंधन और वित्तीय अनुशासन जरूरी था, जिसकी कमी धीरे-धीरे सामने आने लगी।

इसके कारण लागत बढ़ती गई, संचालन जटिल होता गया और फैसले लेने की प्रक्रिया कमजोर पड़ने लगी।

क्या केवल संस्थापक जिम्मेदार हैं?

विश्लेषकों का मानना है कि इस पूरी कहानी को केवल एक संस्थापक की विफलता के रूप में देखना सही नहीं होगा। महामारी के दौरान वैश्विक निवेशकों ने भी स्टार्टअप्स पर तेजी से विस्तार करने का भारी दबाव बनाया था।

उस दौर में मुनाफे से ज्यादा तेजी से ग्रोथ हासिल करना सफलता का पैमाना माना जा रहा था। निवेशकों ने कंपनियों को तेजी से विस्तार, बड़े अधिग्रहण और आक्रामक मार्केटिंग के लिए प्रोत्साहित किया। बाद में वही मॉडल कई स्टार्टअप्स के लिए संकट का कारण बन गया।

BYJU’S का मामला इस बात का उदाहरण माना जा रहा है कि केवल भारी फंडिंग और ऊंची वैल्यूएशन किसी कंपनी की स्थायी सफलता की गारंटी नहीं होती।

स्टार्टअप दुनिया के लिए क्या हैं बड़े सबक?

BYJU’S का पतन भारतीय स्टार्टअप इकोसिस्टम के लिए कई महत्वपूर्ण संकेत छोड़ गया है। पहला, कागजी वैल्यूएशन और वास्तविक कारोबार में बड़ा अंतर हो सकता है। दूसरा, तेज ग्रोथ की दौड़ में वित्तीय अनुशासन और कॉर्पोरेट गवर्नेंस की अनदेखी लंबे समय में खतरनाक साबित हो सकती है।

यह कंपनी एक झटके में नहीं गिरी, बल्कि अत्यधिक विस्तार, बढ़ते कर्ज, कमजोर वित्तीय नियंत्रण और जरूरत से ज्यादा आत्मविश्वास ने धीरे-धीरे इसे संकट में धकेल दिया।

आज BYJU’S की कहानी भारतीय स्टार्टअप जगत के लिए केवल एक कारोबारी विफलता नहीं, बल्कि तेजी से बढ़ती डिजिटल कंपनियों के लिए चेतावनी भी मानी जा रही है।

NEET UG 2026 पुनर्परीक्षा से पहले केंद्र सरकार ने मैसेजिंग प्लेटफॉर्म Telegram पर अस्थायी प्रतिबंध लगाने का फैसला किया है। यह कदम राष्ट्रीय परीक्षा एजेंसी (NTA) की सिफारिश पर उठाया गया है, जिसका उद्देश्य पुनर्परीक्षा को सुरक्षित, निष्पक्ष और पारदर्शी तरीके से आयोजित करना है। केंद्रीय इलेक्ट्रॉनिक्स एवं सूचना प्रौद्योगिकी मंत्रालय (MeitY) ने सूचना प्रौद्योगिकी अधिनियम, 2000 की धारा 69A के तहत यह निर्देश जारी किया है।

सरकार के आदेश के अनुसार, भारत में Telegram की पहुंच 22 जून 2026 तक सीमित रहेगी। यह अवधि 21 जून को होने वाली NEET UG पुनर्परीक्षा और उसके तुरंत बाद के समय को कवर करती है।

परीक्षा से जुड़ी अफवाहों और फर्जी दावों पर रोक लगाने की कोशिश

NTA का कहना है कि हाल के वर्षों में कुछ संगठित गिरोहों ने Telegram का इस्तेमाल परीक्षा से जुड़े फर्जी दावे फैलाने और छात्रों को गुमराह करने के लिए किया। एजेंसी के अनुसार, कई मामलों में कथित पेपर लीक के नाम पर अभ्यर्थियों और उनके परिवारों से पैसे मांगने की शिकायतें भी सामने आई थीं।

अधिकारियों का मानना है कि सोशल मीडिया और मैसेजिंग प्लेटफॉर्म पर फैलने वाली अपुष्ट जानकारी छात्रों के बीच भ्रम पैदा कर सकती है। इसी कारण परीक्षा अवधि के दौरान अतिरिक्त सतर्कता बरतने का निर्णय लिया गया है।

30 जून तक बंद रहेगा Message Editing फीचर

Telegram पर केवल अस्थायी पहुंच प्रतिबंध ही नहीं लगाया गया है, बल्कि भारत में उसके Message Editing फीचर पर भी सीमित अवधि के लिए रोक लगाई गई है। यह सुविधा 30 जून 2026 तक निष्क्रिय रहेगी। सरकार और NTA का मानना है कि कुछ मामलों में पुराने संदेशों को बाद में संपादित कर उन्हें कथित "पेपर लीक" के सबूत के रूप में पेश करने की कोशिश की गई थी।

विशेषज्ञों के अनुसार, Message Editing फीचर का सामान्य उपयोग कई वैध उद्देश्यों के लिए होता है, लेकिन परीक्षा सुरक्षा से जुड़े मामलों में इसके दुरुपयोग की आशंका को देखते हुए यह अस्थायी कदम उठाया गया है।

21 जून को होगी NEET UG 2026 पुनर्परीक्षा

NEET UG 2026 की पुनर्परीक्षा 21 जून को आयोजित की जाएगी। परीक्षा को लेकर इस बार सुरक्षा व्यवस्था को पहले से अधिक मजबूत बनाया गया है। केंद्र और राज्य स्तर की एजेंसियां परीक्षा संचालन की निगरानी कर रही हैं ताकि किसी भी तरह की गड़बड़ी या अफवाह से बचा जा सके।

NTA ने उम्मीदवारों से केवल आधिकारिक स्रोतों पर भरोसा करने और सोशल मीडिया पर फैल रही अपुष्ट सूचनाओं से सावधान रहने की अपील की है।

एडमिट कार्ड डाउनलोड को लेकर आई थीं शिकायतें

पुनर्परीक्षा से पहले कुछ छात्रों ने एडमिट कार्ड डाउनलोड करने में तकनीकी दिक्कतों की शिकायत की थी। सोशल मीडिया पर सर्वर और नेटवर्क संबंधी समस्याओं की चर्चा के बाद NTA ने स्पष्ट किया कि तकनीकी टीम लगातार स्थिति पर नजर रखे हुए है और सभी अभ्यर्थियों को समय पर एडमिट कार्ड उपलब्ध कराने के प्रयास किए जा रहे हैं।

एजेंसी के अनुसार, बड़ी संख्या में उम्मीदवार पहले ही अपने एडमिट कार्ड डाउनलोड कर चुके हैं और शेष छात्रों को भी किसी तरह की घबराहट न करने की सलाह दी गई है।

परीक्षा की विश्वसनीयता बनाए रखना सबसे बड़ी चुनौती

शिक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में पारदर्शिता और सुरक्षा सुनिश्चित करना आज सबसे बड़ी प्राथमिकताओं में शामिल है। लाखों छात्रों का भविष्य इन परीक्षाओं पर निर्भर करता है, इसलिए अफवाहों, साइबर धोखाधड़ी और फर्जी पेपर लीक दावों पर प्रभावी नियंत्रण जरूरी माना जा रहा है।

इसी उद्देश्य से सरकार और परीक्षा एजेंसियां इस बार सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाने पर विशेष ध्यान दे रही हैं, ताकि अभ्यर्थियों को निष्पक्ष माहौल में परीक्षा देने का अवसर मिल सके।

भारत में युवाओं के यात्रा करने के तरीके में तेजी से बदलाव देखने को मिल रहा है। अगर आपको लगता है कि नई पीढ़ी पहले की तुलना में कम घूमती-फिरती है, तो हालिया आंकड़े कुछ और ही कहानी बताते हैं। दरअसल, युवा यात्रा करना बंद नहीं कर रहे, बल्कि उन्होंने यात्रा करने का तरीका बदल दिया है। अब एक लंबी छुट्टी की बजाय साल भर में कई छोटी यात्राएं करना उनकी पहली पसंद बनता जा रहा है।

हाल ही में जारी हुई Airbnb की रिपोर्ट “Never the Same: The New Rules of Gen-Z Travel in India” में भारतीय Gen-Z यानी लगभग 18 से 27 वर्ष आयु वर्ग के युवाओं की यात्रा से जुड़ी बदलती पसंद और व्यवहार को सामने लाया गया है। रिपोर्ट के अनुसार, आज के युवा अनुभवों को महत्व देते हैं और यात्रा को केवल घूमने का साधन नहीं, बल्कि अपनी पहचान और जीवनशैली को व्यक्त करने का माध्यम मानते हैं।

एक लंबी छुट्टी नहीं, साल में कई छोटी ट्रिप्स

रिपोर्ट बताती है कि 10 में से 7 भारतीय Gen-Z युवा साल में एक बड़ी यात्रा करने के बजाय कई छोटी यात्राएं करना पसंद करते हैं। करीब 87 प्रतिशत युवाओं की पसंद ऐसी ट्रिप होती है, जिसकी अवधि एक सप्ताह से कम हो। इससे साफ संकेत मिलता है कि लंबे और पहले से तय किए गए टूर पैकेजों की जगह अब छोटी, लचीली और अनुभव आधारित यात्राएं लोकप्रिय हो रही हैं।

विशेषज्ञों का मानना है कि व्यस्त जीवनशैली, हाइब्रिड वर्क कल्चर और अचानक मिलने वाले अवकाश के कारण युवाओं के बीच शॉर्ट ट्रिप्स का चलन तेजी से बढ़ा है।

आखिरी समय में बनते हैं यात्रा के प्लान

Gen-Z की एक और खासियत उनकी स्पॉन्टेनियस ट्रैवलिंग यानी अचानक यात्रा की योजना बनाना है। रिपोर्ट के अनुसार, 66 प्रतिशत युवा यात्रा की बुकिंग कुछ दिन या कुछ सप्ताह पहले ही करते हैं। यानी अगर लंबा वीकेंड मिल जाए या दोस्तों का अचानक प्लान बन जाए, तो वे बिना ज्यादा तैयारी के यात्रा पर निकल पड़ते हैं।

यह प्रवृत्ति बताती है कि युवा अब यात्रा को कठोर योजना की बजाय लचीले और सहज अनुभव के रूप में देख रहे हैं।

सिर्फ घूमना नहीं, अपनी पहचान दिखाने का जरिया भी है ट्रैवल

रिपोर्ट में सामने आया कि Gen-Z के लिए यात्रा का मतलब केवल नई जगहें देखना नहीं है। लगभग 87 प्रतिशत युवाओं का मानना है कि उनकी यात्रा शैली उनकी व्यक्तिगत पहचान को दर्शाती है। यही वजह है कि 95 प्रतिशत युवा ऐसी यात्राएं करना चाहते हैं जो दूसरों से अलग और उनके व्यक्तित्व के अनुरूप हों।

दिलचस्प बात यह है कि 90 प्रतिशत युवा ऐसी जगहों की तलाश करते हैं जो सोशल मीडिया पर अत्यधिक लोकप्रिय या वायरल न हों। वे भीड़भाड़ वाले पर्यटन स्थलों की बजाय कम चर्चित और नए अनुभव देने वाली जगहों को प्राथमिकता देते हैं।

होटल से ज्यादा पसंद आ रहे हैं घर जैसे ठिकाने

रिपोर्ट से यह भी पता चलता है कि युवाओं की ठहरने की पसंद में भी बड़ा बदलाव आया है। करीब 63 प्रतिशत प्रतिभागियों ने कहा कि उन्होंने किसी गंतव्य का चयन वहां उपलब्ध रहने की सुविधा को ध्यान में रखकर किया, न कि केवल उस शहर या पर्यटन स्थल की लोकप्रियता के आधार पर।

दोस्तों के साथ यात्रा करने वाले आधे से अधिक युवा अलग-अलग होटल कमरों की बजाय एक ही घर या साझा आवास में रहना पसंद करते हैं। इससे न केवल खर्च कम होता है, बल्कि समूह के साथ बेहतर समय बिताने का अवसर भी मिलता है।

साथ कौन है, यह भी उतना ही महत्वपूर्ण

Gen-Z के लिए यात्रा में गंतव्य जितना महत्वपूर्ण है, उतना ही महत्व यात्रा साथी का भी है। रिपोर्ट के अनुसार, चार में से तीन युवा मानते हैं कि वे किसके साथ यात्रा कर रहे हैं, यह उनके लिए बेहद अहम है। दोस्तों, पार्टनर या करीबी लोगों के साथ बिताया गया समय उनके यात्रा अनुभव को और खास बनाता है।

ट्रैवल ट्रेंड्स में दिख रही मजबूत बढ़ोतरी

Airbnb के भारत और दक्षिण-पूर्व एशिया प्रमुख अमनप्रीत बजाज के अनुसार, आज के युवाओं के लिए यात्रा जीवन के सबसे व्यक्तिगत निर्णयों में से एक बन चुकी है। वे कहां जाते हैं, किसके साथ जाते हैं और कहां ठहरते हैं, इन सभी बातों के जरिए अपनी पसंद और व्यक्तित्व को व्यक्त करते हैं।

कंपनी के आंकड़ों के अनुसार, गर्मियों के दौरान भारतीय Gen-Z उपयोगकर्ताओं की खोजों में 30 प्रतिशत से अधिक की वृद्धि दर्ज की गई है। वहीं दो से छह रातों वाली घरेलू यात्राओं की बुकिंग में लगभग 80 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। दोस्तों के साथ की जाने वाली समूह यात्राओं में भी 55 प्रतिशत से अधिक का इजाफा देखा गया है।

बदल रही है भारतीय युवाओं की ट्रैवल संस्कृति

रिपोर्ट यह संकेत देती है कि भारत में युवा पीढ़ी की यात्रा संस्कृति तेजी से बदल रही है। अब यात्रा केवल छुट्टियां बिताने का माध्यम नहीं रह गई है, बल्कि यह आत्म-अभिव्यक्ति, नए अनुभवों की खोज और व्यक्तिगत पसंद को दर्शाने का एक महत्वपूर्ण तरीका बन चुकी है। आने वाले वर्षों में ट्रैवल इंडस्ट्री को भी इसी बदलती सोच के अनुसार अपने उत्पाद और सेवाएं विकसित करनी पड़ सकती हैं।

Upcoming Events

एडइनबॉक्स के साथ रहें शिक्षा जगत की ताजा खबरों से अपडेट 

आज की तेज भागती-दौड़ती दुनिया में शिक्षा जगत की नवीनतम जानकारियों और ताजा गतिविधियों से परिचित रहना शिक्षकों, इस क्षेत्र के प्रशासकों, छात्रों और अभिभावकों सभी के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। शिक्षा के बढ़ते दायरे के साथ स्वयं को इसके अनुकूल बनाने और प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने के लिए इससे संबंधित रुझानों, नीतियों और नवाचारों से अवगत रहना भी आवश्यक है। एडइनबॉक्स जैसा मंच शिक्षा जगत से जुड़ी हर खबर के लिए 'वन-स्टॉप डेस्टिनेशन' उपलब्ध कराता है यानी एक मंच पर सारी जरूरी जानकारियां। एडइनबॉक्स यह सुनिश्चित करता है कि आप मीडिया व शिक्षा जगत की हर हलचल, हर खबर से बाखबर रहें। 

क्यों महत्वपूर्ण हैं शिक्षा जगत की खबरें?

शिक्षा जगत की खबरों से तात्पर्य इस क्षेत्र से जुड़े विविध विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला है, पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धतियों में बदलाव से लेकर शैक्षिक नीतियों और सुधारों पर अपडेट तक। इसमें स्कूलों, विश्वविद्यालयों, शिक्षा प्रौद्योगिकी और शिक्षाशास्त्र में प्रगति संबंधी गतिविधियां भी शामिल हैं। शिक्षा जगत से संबंधित समाचारों से अपडेट रहना इससे जुड़े लोगों को ठोस निर्णय लेने, सर्वोत्तम विधाओं को लागू करने और शिक्षा क्षेत्र के सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने में मददगार साबित होता है।

मीडिया-शिक्षा की भूमिका

लेख, वीडियो, पॉडकास्ट और इन्फोग्राफिक्स सहित मीडिया-शिक्षा, शिक्षा जगत से जुड़े लोगों के बीच सूचना के प्रसार और महत्वपूर्ण विमर्शों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चाहे वह नवीन शिक्षण पद्धतियां की खोज हो, सफलता की गाथाओं को लोगों के समक्ष लाना हो, या फिर शिक्षकों के सामने आने वाली चुनौतियों पर चर्चा की बात हो, मीडिया-शिक्षा शिक्षण और सीखने के अनुभवों को बढ़ाने के लिए मूल्यवान अंतर्दृष्टि और संसाधन मुहैया कराती है।

एडइनबॉक्स: शैक्षिक समाचारों का भरोसेमंद स्रोत

एडइनबॉक्स शिक्षा जगत की खबरों की व्यापक कवरेज को समर्पित एक अग्रणी मंच है। यह आपके लिए एक जरूरी साधन है, जो आपके लक्ष्यों के संधान में आपकी मदद करता है क्योंकि यहां आपके लिए है:

विविधतापूर्ण सामग्री: एडइनबॉक्स दुनियाभर से शिक्षा के तमाम पहलुओं का समावेश करते हुए लेख, साक्षात्कार, वीडियो और पॉडकास्ट सहित विविध प्रकार की सामग्री उपलब्ध कराता है। चाहे आपकी रुचि के विषयों में के-12 शिक्षा, उच्च शिक्षा, एडटेक, या शैक्षिक नीतियां शामिल हों, एडइनबॉक्स पर आपको इससे संबंधित प्रासंगिक और महत्वपूर्ण सामग्री मिलेगी।

समय पर अपडेट: शिक्षा तेज गति से विकास कर रहा क्षेत्र है, जहां की नवीनतम गतिविधियों से अपडेट रहना हर किसी के लिए जरूरी है। और, एडइनबॉक्स वह मंच है जो शिक्षा जगत की हर नवीन जानकारियों को समय पर आप तक पहुंचाकर आपको अपडेट करता है। यह सुनिश्चित करता है कि आप इस क्षेत्र की हर गतिविधि को लेकर जागरूक रहें। चाहे वह ब्रेकिंग न्यूज हो या इसका गहन विश्लेषण, आप खुद को अपडेट रखने के लिए एडइनबॉक्स पर भरोसा कर सकते हैं।

विशेषज्ञ अंतदृष्टि: एडइनबॉक्स का संबंध शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों और विचारवान प्रणेताओं से है। ख्यात शिक्षकों और शोधकर्ताओं से लेकर नीति निर्माताओं और उद्योग के पेशेवरों तक, आप इस मंच पर मूल्यवान अंतदृष्टि और दृष्टिकोण से परिचित होंगे जो आपको न सिर्फ जागरूक करता है बल्कि आपके निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी धारदार बनाता है।

इंटरएक्टिव समुदाय: एडइनबॉक्स पर आप शिक्षकों, प्रशासकों, छात्रों और अभिभावकों के एक सक्रिय व जीवंत समूह के साथ जुड़ सकते हैं। इस मंच पर आप अपने विचार साझा करें, प्रश्न पूछें, और उन विषयों पर चर्चा में भाग लें जो आपके लिए महत्वपूर्ण हैं। समान विचारधारा वाले व्यक्तियों से जुड़ें और अपने पेशेवर नेटवर्क का भी विस्तार करें।

यूजर्स के अनुकूल इंटरफेस: एडइनबॉक्स की खासियत है, यूजर्स के अनुकूल इंटरफेस। यह आपकी रुचि की सामग्री को नेविगेट करना और खोजना आसान बनाता है। चाहे आप लेख पढ़ना, वीडियो देखना या पॉडकास्ट सुनना पसंद करते हों, आप एडइनबॉक्स पर सब कुछ मूल रूप से एक्सेस कर सकते हैं।

तेजी से बदलते शैक्षिक परिदृश्य में, इस क्षेत्र की हर गतिविधि से परिचित होना निहायत जरूरी है। एडइनबॉक्स एक व्यापक मंच प्रदान करता है जहां आप शिक्षा जगत के नवीनतम समाचारों तक अपनी पहुंच बना सकते हैं, विशेषज्ञों और समूहों के साथ जुड़ सकते हैं और शिक्षा के भविष्य को आकार देने वाली नई पहल को लेकर अपडेट रह सकते हैं। चाहे आप एक शिक्षक हों जो नवीन शिक्षण पद्धतियों की तलाश में हों, नीतियों में बदलाव पर नजर रखने वाले व्यवस्थापक हों, या आपके बच्चों की शिक्षा को लेकर चिंतित माता-पिता, एडइनबॉक्स ने हर किसी की चिंताओं-आवश्यकताओं को समझते हुए इस मंच को तैयार किया है। आज ही एडिनबॉक्स पर जाएं और शिक्षा पर एक वैश्विक विमर्श में शामिल हों!

कॉपीराइट @2024 एडइनबॉक्स!. सर्वाधिकार सुरक्षित।