केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) की कक्षा 12वीं के परिणाम का इंतजार कर रहे लाखों छात्रों के लिए बड़ी अपडेट सामने आई है। डिजिलॉकर पर हाल ही में हुई बैकएंड गतिविधियों और रिजल्ट होस्टिंग से जुड़े संकेतों के बाद यह संभावना तेज हो गई है कि सीबीएसई 12वीं का रिजल्ट जल्द जारी किया जा सकता है।
डिजिलॉकर प्लेटफॉर्म पर साझा की गई ताजा जानकारी ने छात्रों और अभिभावकों की उत्सुकता बढ़ा दी है। हालांकि बोर्ड की ओर से अभी तक रिजल्ट जारी करने की तारीख और समय की आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन पिछले वर्षों के ट्रेंड को देखते हुए माना जा रहा है कि परिणाम किसी भी समय घोषित हो सकते हैं।
18 लाख से अधिक छात्रों को रिजल्ट का इंतजार
सीबीएसई कक्षा 12वीं की बोर्ड परीक्षाएं इस वर्ष देशभर के 7,574 परीक्षा केंद्रों पर आयोजित की गई थीं। बोर्ड के अनुसार, 18 लाख से अधिक छात्रों ने परीक्षा में हिस्सा लिया। परीक्षाएं फरवरी से अप्रैल 2026 के बीच आयोजित की गईं, जिसके बाद से छात्र लगातार परिणाम का इंतजार कर रहे हैं।
हर साल की तरह इस बार भी रिजल्ट जारी होने से पहले डिजिलॉकर पर तकनीकी तैयारियां तेज हुई हैं। आमतौर पर जब डिजिलॉकर पर इस तरह की गतिविधियां दिखाई देती हैं, तो एक-दो दिन के भीतर परिणाम घोषित कर दिए जाते हैं। यही वजह है कि सोशल मीडिया और शिक्षा जगत में रिजल्ट को लेकर चर्चाएं बढ़ गई हैं।
डिजिलॉकर पर मिलेगी डिजिटल मार्कशीट
रिजल्ट जारी होने के तुरंत बाद छात्र अपनी प्रोविजनल डिजिटल मार्कशीट डिजिलॉकर के जरिए डाउनलोड कर सकेंगे। इसके अलावा UMANG ऐप और सीबीएसई की आधिकारिक वेबसाइटों पर भी परिणाम उपलब्ध रहेगा।
डिजिटल मार्कशीट ऑनलाइन उपयोग के लिए मान्य होगी, जबकि मूल अंकपत्र और प्रमाण पत्र बाद में संबंधित स्कूलों के माध्यम से छात्रों को दिए जाएंगे।
पिछले वर्षों में कब जारी हुए थे रिजल्ट?
सीबीएसई पिछले कई वर्षों से मई के दूसरे सप्ताह में 10वीं और 12वीं दोनों कक्षाओं के परिणाम जारी करता रहा है।
वर्ष 2024 में रिजल्ट 13 मई को घोषित किया गया था, जबकि 2023 में 12 मई को परिणाम जारी हुए थे। कोविड-19 महामारी के दौरान रिजल्ट में देरी देखने को मिली थी, लेकिन उसके बाद बोर्ड फिर सामान्य शेड्यूल पर लौट आया।
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वर्ष |
रिजल्ट जारी होने की तिथि |
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2024 |
13 मई |
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2023 |
12 मई |
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2022 |
22 जुलाई |
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2021 |
3 अगस्त |
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2020 |
13 जुलाई |
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2019 |
6 मई |
कहां और कैसे चेक करें CBSE 12th Result 2026?
रिजल्ट जारी होने के बाद छात्र कई प्लेटफॉर्म पर अपना स्कोर चेक कर सकेंगे। इसके लिए रोल नंबर, स्कूल नंबर और एडमिट कार्ड आईडी की जरूरत होगी।
रिजल्ट इन प्लेटफॉर्म्स पर उपलब्ध रहेगा:
- CBSE Official Website
- CBSE Results Portal
- DigiLocker
- UMANG App
छात्रों को क्या सलाह?
छात्रों को सलाह दी जा रही है कि वे किसी भी अफवाह या अनऑफिशियल सूचना पर भरोसा न करें और केवल आधिकारिक वेबसाइटों पर नजर बनाए रखें। रिजल्ट जारी होते ही वेबसाइटों पर ट्रैफिक बढ़ने के कारण स्लो स्पीड की समस्या आ सकती है, इसलिए धैर्य बनाए रखना जरूरी होगा।
उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के नेतृत्व में शिक्षा को भारतीय संस्कृति, संवाद कौशल और सामाजिक समावेश से जोड़ने की दिशा में एक अहम कदम बढ़ाया जा रहा है। इसी कड़ी में परिषदीय और कस्तूरबा विद्यालयों में 13 से 19 मई तक ‘भारतीय भाषा ग्रीष्मकालीन शिविर-2026’ आयोजित किया जाएगा। यह कार्यक्रम बच्चों की शैक्षणिक क्षमता को मजबूत करने के साथ-साथ उन्हें भारतीय भाषाओं और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति जागरूक बनाने का बड़ा मंच प्रदान करेगा।
इस शिविर का मुख्य उद्देश्य नई पीढ़ी को अपनी भाषाई जड़ों से जोड़ना और भाषा के माध्यम से राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना है। सरकार का मानना है कि भाषा केवल सीखने का विषय नहीं, बल्कि समाज और संस्कृति को समझने का माध्यम है।
बहुभाषावाद की ओर बड़ा कदम
राष्ट्रीय शिक्षा नीति-2020 के तहत राज्य सरकार बच्चों में बहुभाषावाद को बढ़ावा दे रही है। शिविर में छात्र अपनी मातृभाषा के गौरव को समझेंगे और साथ ही अन्य भारतीय भाषाओं के बुनियादी संवाद कौशल से परिचित होंगे। यह प्रयास बच्चों में भाषा सीखने को सहज, रोचक और उपयोगी बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण साबित होगा।
सरकार का उद्देश्य है कि छात्र भाषा को केवल पाठ्यपुस्तक का हिस्सा न समझें, बल्कि उसे परंपरा, विचार और सांस्कृतिक विविधता का सेतु मानें।
सांकेतिक भाषा से सामाजिक समावेश को मजबूती
इस शिविर की सबसे उल्लेखनीय विशेषता इंडियन साइन लैंग्वेज (ISL) का प्रशिक्षण है। पहली बार स्कूली बच्चों को सांकेतिक भाषा के बुनियादी कौशल से अवगत कराया जाएगा, ताकि वे दिव्यांगजनों के प्रति अधिक संवेदनशील और सहयोगी बन सकें।
आरपीडब्ल्यूडी अधिनियम-2016 के अनुरूप यह कदम समावेशी शिक्षा की दिशा में एक बड़ा प्रयास माना जा रहा है। इसके लिए एससीईआरटी द्वारा पीएम ई-विद्या चैनल के माध्यम से विशेष शिक्षण सामग्री उपलब्ध कराई जाएगी, जिससे छात्रों को आसानी से सीखने का अवसर मिलेगा।
सख्त मॉनिटरिंग और प्रभावी क्रियान्वयन पर जोर
योगी सरकार ने शिविर के सफल आयोजन के लिए प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत किया है। जिला शिक्षा एवं प्रशिक्षण संस्थान (डायट), बीएसए और खंड शिक्षा अधिकारियों को पूरे कार्यक्रम की निरंतर मॉनिटरिंग करने के स्पष्ट निर्देश दिए गए हैं।
यह सुनिश्चित किया जाएगा कि प्रत्येक गतिविधि का सही तरीके से क्रियान्वयन हो और बच्चों को अधिकतम लाभ मिले। सरकार का लक्ष्य है कि यह पहल छात्रों की संवाद क्षमता, भाषाई दक्षता और सामाजिक समझ को नई दिशा दे।
भविष्य के लिए मजबूत आधार
‘भारतीय भाषा ग्रीष्मकालीन शिविर-2026’ सिर्फ एक शैक्षिक कार्यक्रम नहीं, बल्कि भविष्य के आत्मविश्वासी, संवेदनशील और सांस्कृतिक रूप से जागरूक नागरिक तैयार करने का प्रयास है। भारतीय भाषाओं की विविधता को समझकर बच्चे न केवल अपनी मातृभूमि से जुड़ेंगे, बल्कि सामाजिक सद्भाव और राष्ट्रीय एकता के भी मजबूत वाहक बनेंगे।
यह पहल उत्तर प्रदेश में शिक्षा के क्षेत्र में एक नए अध्याय की शुरुआत मानी जा रही है।
Indian Institute of Technology Gandhinagar के शोधकर्ताओं की एक नई स्टडी में सामने आया है कि शहरों में हरियाली बढ़ाने से गर्मी और हीट स्ट्रेस को कम करने में मदद मिल सकती है, लेकिन सिर्फ पेड़ लगाना ही पर्याप्त नहीं होगा। शोध में कहा गया है कि शहरों की जलवायु, आबादी की घनत्व और शहरी डिजाइन को ध्यान में रखकर ही प्रभावी समाधान तैयार किए जा सकते हैं।
यह अध्ययन 2003 से 2020 के बीच भारत के 138 शहरों पर किया गया। इसमें ट्रॉपिकल सवाना, सेमी-एरिड स्टेपी और ह्यूमिड सबट्रॉपिकल जैसे अलग-अलग जलवायु क्षेत्रों को शामिल किया गया। शोधकर्ताओं ने पाया कि हरियाली का ठंडक देने वाला प्रभाव हर शहर में समान नहीं होता। यह नमी, पेड़ों की घनत्व, शहर की बनावट और हवा के बहाव जैसी स्थितियों पर निर्भर करता है।
यह रिसर्च अंतरराष्ट्रीय जर्नल Nature Communications में प्रकाशित हुई है। इस शोध पत्र को अंगना बोरा, अद्रिजा दत्ता, आशीष एस कुमार, रविराज दवे और उदित भाटिया ने मिलकर तैयार किया है।
हर शहर के लिए अलग होनी चाहिए ग्रीनिंग रणनीति
आईआईटी गांधीनगर के सिविल इंजीनियरिंग विभाग के एसोसिएट प्रोफेसर उदित भाटिया ने कहा कि जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए शहरों में हरियाली जरूरी है, लेकिन सभी शहरों में एक जैसे पेड़ लगाने का लक्ष्य कारगर नहीं होगा।
उन्होंने कहा कि शहरी हरियाली की योजना बनाते समय छाया, नमी और वेंटिलेशन यानी हवा के बहाव को साथ में ध्यान में रखना जरूरी है। वहीं रिसर्च ग्रेजुएट अंगना बोरा का कहना है कि असली सवाल यह नहीं है कि शहरों को हरा-भरा बनाया जाए या नहीं, बल्कि यह है कि किस तरह की हरियाली चाहिए, उसे कहां लगाया जाए और कितनी मात्रा सही होगी।
स्टडी के अनुसार सूखे शहरों में हरियाली ज्यादा ठंडक दे सकती है, लेकिन अधिक नमी और घनी आबादी वाले इलाकों में हवा का सही बहाव बनाए रखना भी उतना ही जरूरी है।
पार्क, पेड़ और खुली जगहों को साथ में प्लान करने की जरूरत
शोध में कहा गया है कि भारतीय शहरों को एकीकृत कूलिंग रणनीति अपनानी होगी। इसके तहत छायादार पेड़, पार्क, सड़क किनारे पौधारोपण, खुली जगहें और वेंटिलेशन कॉरिडोर को साथ में प्लान करना जरूरी होगा।
विशेषज्ञों के मुताबिक घने और नम इलाकों में पेड़ों की प्रजाति, उनकी दूरी, कटाई-छंटाई, सिंचाई और सड़क डिजाइन जैसे पहलू भी यह तय करते हैं कि हरियाली गर्मी कम करने में कितनी असरदार होगी।
गरीब और घनी बस्तियों में ज्यादा खतरा
रिसर्च में यह भी बताया गया कि खतरनाक गर्मी का सबसे ज्यादा असर उन लोगों पर पड़ता है जो घनी और कम वेंटिलेशन वाली बस्तियों में रहते या काम करते हैं। इन इलाकों में कूलिंग इंफ्रास्ट्रक्चर की कमी भी बड़ी समस्या है।
शोधकर्ताओं का मानना है कि बेहतर तरीके से प्लान की गई हरियाली ऐसी आबादी को लंबे समय तक गर्मी के खतरे से बचाने में मदद कर सकती है।
तापमान और नमी दोनों को ध्यान में रखकर हुई स्टडी
रिसर्च टीम ने Heat Index का इस्तेमाल किया, जो तापमान और नमी को मिलाकर यह बताता है कि इंसानी शरीर को गर्मी वास्तव में कितनी महसूस होती है। अध्ययन में सैटेलाइट डेटा, वनस्पति सूचकांक, पेड़ों की घनत्व, नाइट-टाइम लाइट डेटा और Local Climate Zone Mapping जैसी आधुनिक तकनीकों का भी इस्तेमाल किया गया।
स्टडी में पाया गया कि हरियाली सभी शहरों में एक जैसी ठंडक नहीं देती। कुछ मामलों में ज्यादा नमी और घनी आबादी वाले इलाकों में अत्यधिक पेड़ और घना कैनोपी स्ट्रक्चर उल्टा उमस और हीट स्ट्रेस को बढ़ा सकता है।
शोधकर्ताओं ने कहा कि भविष्य की शहरी योजना केवल ग्रीन कवर बढ़ाने तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। जैसे-जैसे शहर ज्यादा गर्म और नम होते जाएंगे, वैसे-वैसे ऐसी रणनीति की जरूरत होगी जो छाया दे, नमी को संतुलित रखे और हवा के बहाव को भी बनाए रखे।
शिक्षक बनने की तैयारी कर रहे उम्मीदवारों के लिए बड़ी खबर है। Central Board of Secondary Education ने CTET September 2026 परीक्षा का नोटिफिकेशन जारी कर दिया है। इसके साथ ही आवेदन प्रक्रिया भी शुरू हो चुकी है। इच्छुक उम्मीदवार आधिकारिक वेबसाइट ctet.nic.in पर जाकर ऑनलाइन आवेदन कर सकते हैं।
CTET यानी Central Teacher Eligibility Test देश की प्रमुख शिक्षक पात्रता परीक्षाओं में शामिल है। इस परीक्षा को पास करने के बाद उम्मीदवार केंद्रीय विद्यालय, नवोदय विद्यालय समेत कई सरकारी और निजी स्कूलों में शिक्षक भर्ती के लिए आवेदन करने के पात्र हो जाते हैं।
आवेदन प्रक्रिया शुरू, 10 जून तक भर सकेंगे फॉर्म
CTET September 2026 के लिए ऑनलाइन आवेदन प्रक्रिया 11 मई 2026 से शुरू हो चुकी है। उम्मीदवार 10 जून 2026 रात 11:59 बजे तक आवेदन कर सकते हैं। इसी तारीख तक परीक्षा शुल्क जमा करने की भी अंतिम समय सीमा तय की गई है।
वहीं आवेदन फॉर्म में सुधार करने के लिए करेक्शन विंडो 15 जून से 18 जून 2026 तक खुली रहेगी। परीक्षा का आयोजन 6 सितंबर 2026, रविवार को किया जाएगा।
एडमिट कार्ड और परीक्षा शहर की जानकारी कब मिलेगी
सीबीएसई की ओर से जारी जानकारी के अनुसार परीक्षा शहर की डिटेल एग्जाम से पहले जारी की जाएगी। वहीं एडमिट कार्ड परीक्षा से लगभग दो दिन पहले वेबसाइट पर अपलोड किए जाएंगे।
रिजल्ट अक्टूबर 2026 के अंत तक जारी होने की संभावना जताई गई है, हालांकि आधिकारिक तारीख बाद में घोषित की जाएगी।
ऐसे करें CTET 2026 के लिए आवेदन
उम्मीदवार सबसे पहले आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं। इसके बाद होमपेज पर दिए गए “CTET September 2026 Registration” लिंक पर क्लिक करें।
अब New Registration पर क्लिक कर जरूरी जानकारी दर्ज करें। रजिस्ट्रेशन पूरा होने के बाद लॉगिन करें और आवेदन फॉर्म भरें। इसके बाद जरूरी दस्तावेज, फोटो और सिग्नेचर अपलोड करें। अंत में अपनी श्रेणी के अनुसार फीस जमा कर फॉर्म सबमिट करें और उसका प्रिंटआउट सुरक्षित रख लें।
आवेदन फीस कितनी है
CTET 2026 में एक पेपर के लिए आवेदन करने वाले General, OBC और EWS उम्मीदवारों को 1000 रुपये फीस देनी होगी। वहीं SC, ST और PH श्रेणी के उम्मीदवारों के लिए शुल्क 500 रुपये निर्धारित किया गया है।
अगर कोई उम्मीदवार दोनों पेपर यानी Primary Level और Junior Level के लिए आवेदन करता है, तो General, OBC और EWS उम्मीदवारों को 1200 रुपये फीस देनी होगी। वहीं SC, ST और PH उम्मीदवारों के लिए फीस 600 रुपये तय की गई है।
फीस का भुगतान डेबिट कार्ड, क्रेडिट कार्ड, नेट बैंकिंग या ई-चालान के जरिए किया जा सकता है।
क्या है CTET परीक्षा का महत्व
CTET परीक्षा केंद्रीय स्कूलों में शिक्षक भर्ती के लिए जरूरी पात्रता परीक्षा मानी जाती है। इसके जरिए उम्मीदवारों की शिक्षण क्षमता और विषय ज्ञान का मूल्यांकन किया जाता है।
पिछले कुछ वर्षों में शिक्षक भर्ती में CTET का महत्व लगातार बढ़ा है। यही वजह है कि हर साल लाखों उम्मीदवार इस परीक्षा में शामिल होते हैं। विशेषज्ञों के अनुसार समय पर आवेदन और सही तैयारी उम्मीदवारों को बेहतर अवसर दिला सकती है।
देश के प्रतिष्ठित इंजीनियरिंग संस्थानों में प्रवेश के लिए आयोजित होने वाली JEE Advanced 2026 परीक्षा का एडमिट कार्ड जारी कर दिया गया है। Indian Institute of Technology Roorkee की ओर से उम्मीदवारों के लिए हॉल टिकट जारी किए गए हैं। परीक्षा में शामिल होने वाले छात्र अब आधिकारिक वेबसाइट jeeadv.ac.in
पर जाकर अपना एडमिट कार्ड डाउनलोड कर सकते हैं।
उम्मीदवार 17 मई 2026 तक एडमिट कार्ड डाउनलोड कर सकेंगे। परीक्षा में शामिल होने के लिए एडमिट कार्ड अनिवार्य दस्तावेज माना गया है। ऐसे में छात्रों को सलाह दी गई है कि वे समय रहते अपना हॉल टिकट डाउनलोड कर लें और उसमें दी गई सभी जानकारियों को ध्यान से जांच लें।
17 मई को दो शिफ्ट में होगी परीक्षा
JEE Advanced 2026 परीक्षा का आयोजन 17 मई को दो अलग-अलग शिफ्ट में किया जाएगा। पहला पेपर सुबह 9 बजे से दोपहर 12 बजे तक होगा, जबकि दूसरा पेपर दोपहर 2:30 बजे से शाम 5:30 बजे तक आयोजित किया जाएगा।
परीक्षा प्राधिकरण ने स्पष्ट किया है कि सभी उम्मीदवारों के लिए दोनों पेपर में शामिल होना अनिवार्य होगा। यदि कोई छात्र किसी एक पेपर में अनुपस्थित रहता है, तो उसे मूल्यांकन प्रक्रिया से बाहर किया जा सकता है।
एडमिट कार्ड में क्या-क्या जानकारी होगी
JEE Advanced 2026 के एडमिट कार्ड में उम्मीदवार का नाम, रोल नंबर, फोटो, सिग्नेचर, परीक्षा केंद्र का पता, परीक्षा की तारीख और समय जैसी महत्वपूर्ण जानकारी दी गई है। इसके अलावा परीक्षा से जुड़े जरूरी दिशा-निर्देश भी हॉल टिकट में शामिल किए गए हैं।
उम्मीदवारों को सलाह दी गई है कि डाउनलोड करने के बाद एडमिट कार्ड में दर्ज सभी जानकारी को सावधानी से जांच लें। किसी भी प्रकार की गलती मिलने पर तुरंत परीक्षा प्राधिकरण या IIT रुड़की से संपर्क करें।
ऐसे डाउनलोड करें JEE Advanced 2026 Admit Card
एडमिट कार्ड डाउनलोड करने के लिए उम्मीदवार सबसे पहले आधिकारिक वेबसाइट पर जाएं। इसके बाद होम पेज पर दिए गए “JEE Advanced 2026 Admit Card” लिंक पर क्लिक करें।
अब रजिस्ट्रेशन नंबर, जन्मतिथि और रजिस्टर्ड मोबाइल नंबर या ईमेल आईडी दर्ज कर लॉगिन करें। जानकारी सबमिट करने के बाद एडमिट कार्ड स्क्रीन पर दिखाई देगा। छात्र इसे डाउनलोड कर प्रिंटआउट निकालकर सुरक्षित रख सकते हैं।
परीक्षा केंद्र पर क्या ले जाना जरूरी है
उम्मीदवारों को परीक्षा केंद्र पर एडमिट कार्ड के साथ एक वैध फोटो पहचान पत्र भी लेकर जाना होगा। बिना एडमिट कार्ड और फोटो आईडी के किसी भी उम्मीदवार को परीक्षा केंद्र में प्रवेश नहीं दिया जाएगा।
इसके अलावा छात्रों को परीक्षा शुरू होने से पहले समय पर केंद्र पहुंचने की सलाह दी गई है ताकि सुरक्षा जांच और दस्तावेज सत्यापन में किसी तरह की परेशानी न हो।
परीक्षा पैटर्न में इस बार कोई बदलाव नहीं
IIT रुड़की ने जानकारी दी है कि JEE Advanced 2026 के परीक्षा पैटर्न में इस बार कोई बदलाव नहीं किया गया है। परीक्षा पहले की तरह ही आयोजित होगी और दोनों पेपर में फिजिक्स, केमिस्ट्री और मैथ्स से प्रश्न पूछे जाएंगे।
JEE Advanced देश के 23 IIT समेत कई प्रमुख इंजीनियरिंग संस्थानों में दाखिले के लिए आयोजित की जाने वाली महत्वपूर्ण परीक्षा है। हर साल लाखों छात्र इस परीक्षा में शामिल होते हैं।
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड यानी Central Board of Secondary Education ने छात्रों को पढ़ाई के साथ बेहतर करियर मार्गदर्शन देने के लिए नई पहल शुरू की है। अब स्कूलों की भूमिका केवल पढ़ाई और परीक्षा तक सीमित नहीं रहेगी, बल्कि उन्हें छात्रों को करियर विकल्पों, प्रवेश परीक्षाओं, स्कॉलरशिप और इंटर्नशिप से जुड़ी जानकारी भी उपलब्ध करानी होगी।
सीबीएसई ने 8 मई को जारी एक सर्कुलर में स्कूल प्रिंसिपल और काउंसलर्स के लिए “Entrance Exam and Career Pathways Awareness Program” शुरू करने की घोषणा की है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य छात्रों को समय रहते सही जानकारी देकर उनके करियर निर्णय को आसान बनाना है।
स्कूलों में मजबूत होगी करियर काउंसलिंग व्यवस्था
सीबीएसई की यह पहल नई शिक्षा नीति 2020 के तहत शुरू की गई है। बोर्ड का मानना है कि आज के समय में छात्रों को केवल अकादमिक पढ़ाई तक सीमित रखना पर्याप्त नहीं है। तेजी से बदलती दुनिया में छात्रों को अलग-अलग करियर विकल्पों और भविष्य की जरूरतों के बारे में जागरूक करना भी जरूरी है।
इसी को ध्यान में रखते हुए स्कूलों में करियर काउंसलिंग व्यवस्था को मजबूत किया जाएगा। छात्रों को उनकी रुचि, क्षमता और कौशल के आधार पर सही दिशा दिखाने का प्रयास किया जाएगा ताकि वे बिना दबाव के अपने लिए बेहतर करियर चुन सकें।
पारंपरिक करियर से आगे बढ़ने का मौका
विशेषज्ञों का कहना है कि कई छात्र अक्सर भीड़ का हिस्सा बनकर करियर का चुनाव कर लेते हैं, जिससे बाद में उन्हें परेशानियों का सामना करना पड़ता है। ऐसे में यह कार्यक्रम छात्रों को नए और उभरते क्षेत्रों के बारे में जानकारी देने में मदद करेगा।
अब छात्रों को केवल डॉक्टर या इंजीनियर जैसे पारंपरिक विकल्पों तक सीमित नहीं रखा जाएगा, बल्कि डेटा साइंस, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिजाइन, डिजिटल मीडिया, स्किल आधारित प्रोफेशन और रिसर्च जैसे क्षेत्रों की जानकारी भी दी जाएगी।
JEE, NEET और स्कॉलरशिप की जानकारी स्कूल में ही मिलेगी
इस कार्यक्रम के लागू होने के बाद छात्रों को विभिन्न एंट्रेंस एग्जाम जैसे JEE, NEET, CUET और अन्य प्रोफेशनल कोर्सों से जुड़ी जानकारी स्कूल स्तर पर ही उपलब्ध कराई जाएगी। इसके अलावा देश और विदेश में मिलने वाली स्कॉलरशिप, फेलोशिप और इंटर्नशिप के अवसरों की जानकारी भी छात्रों तक पहुंचाई जाएगी।
काउंसलर्स छात्रों को यह समझने में मदद करेंगे कि किस कोर्स के लिए कौन-सी परीक्षा जरूरी है, तैयारी कैसे करनी है और आगे करियर की संभावनाएं क्या हैं।
छात्रों के भविष्य पर पड़ेगा सकारात्मक असर
शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार यह पहल छात्रों में करियर को लेकर स्पष्टता बढ़ाने में मदद कर सकती है। सही समय पर सही जानकारी मिलने से छात्र बेहतर योजना बना सकेंगे और गलत निर्णय लेने की संभावना कम होगी।
सीबीएसई की यह पहल ऐसे समय में आई है जब प्रतियोगी परीक्षाओं और करियर विकल्पों की संख्या तेजी से बढ़ रही है। ऐसे में स्कूल स्तर पर मार्गदर्शन मिलने से छात्रों और अभिभावकों दोनों को काफी फायदा हो सकता है।
रामनाथ गोयनका अवार्ड से सम्मानित पत्रकार अवधेश आकोदिया से खास बातचीत
भारतीय पत्रकारिता के सबसे प्रतिष्ठित सम्मानों में से एक रामनाथ गोयनका अवार्ड से इस वर्ष सम्मानित पत्रकार अवधेश आकोदिया आज हिंदी मीडिया जगत का एक जाना-पहचाना नाम हैं। जमीनी रिपोर्टिंग, संवेदनशील मुद्दों पर पैनी नजर और तथ्यपरक पत्रकारिता के लिए पहचाने जाने वाले आकोदिया ने अपने काम के जरिए लगातार यह साबित किया है कि खबर सिर्फ सूचना नहीं, बल्कि समाज को दिशा देने का माध्यम भी है।
फिलहाल देश के प्रमुख हिंदी अखबार दैनिक भास्कर से जुड़े अवधेश आकोदिया ने अपने करियर में कई अहम रिपोर्ट्स के जरिए जनहित के मुद्दों को मजबूती से उठाया है। उनकी पत्रकारिता में ईमानदारी, जोखिम उठाने का साहस और आम लोगों की आवाज को मंच देने की प्रतिबद्धता साफ नजर आती है।
इस विशेष बातचीत में हम उनसे जानेंगे उनके पत्रकारिता सफर की कहानी, इस सम्मान तक पहुंचने का अनुभव, रिपोर्टिंग के दौरान आई चुनौतियां और आज के दौर में मीडिया की बदलती भूमिका पर उनका नजरिया। पेश है एडइनबॉक्स (EdInbox) के लिए रईस अहमद 'लाली' से अवधेश आकोदिया की हुई लंबी वार्ता के सम्पादित अंश:
- सबसे पहले, इस वर्ष रामनाथ गोयनका अवार्ड प्राप्त करने पर आपको कैसा महसूस हुआ?
- यह सम्मान पाना हर भारतीय पत्रकार का सपना होता है। मुझे बेहद गर्व और विनम्रता का अनुभव हो रहा है। यह अवार्ड सिर्फ मेरे काम की नहीं, बल्कि उस पूरी व्यवस्था पर सवाल उठाने की जीत है जिसे मैंने अपनी रिपोर्टिंग के जरिए उजागर किया। इससे यह हौसला मिलता है कि सच्ची पत्रकारिता की कीमत आज भी सबसे ज्यादा है।
- इस पुरस्कार के लिए चुने गए आपके स्टोरी/रिपोर्ट की प्रेरणा क्या थी?
- जयपुर में जब फर्जी एनओसी के सहारे अंग प्रत्यारोपण का मामला सामने आया, तो मुझे लगा कि यह सिर्फ कुछ डॉक्टरों की मिलीभगत नहीं हो सकती। एक मरीज 35 लाख रुपए दे रहा था और अपनी जान दांव पर लगाने वाले गरीब डोनर को सिर्फ 3 लाख मिल रहे थे। अंतरराष्ट्रीय किडनी माफिया द्वारा गरीबों की इस मजबूरी का फायदा उठाना ही मेरे लिए इस नेक्सस की जड़ों तक जाने की सबसे बड़ी प्रेरणा बना।
- रिपोर्ट तैयार करते समय किन चुनौतियों का सामना करना पड़ा और आपने उन्हें कैसे पार किया?
- बांग्लादेश के ढाका में जाकर अंडरकवर ऑपरेशन करना सबसे बड़ी चुनौती थी। भाषा की दीवार, तंग गलियों में डोनर्स को खोजना और पकड़े जाने का जोखिम बहुत बड़ा था। एक बार रिसिपिएंट के रिश्तेदार ने खुद को इंटेलिजेंस अधिकारी बताकर मेरी कड़ी पूछताछ भी की थी। लेकिन पुख्ता दस्तावेजों, गहरी तैयारी और एक स्थानीय ड्राइवर की मदद से मैंने इस ऑपरेशन को अंजाम तक पहुंचाया।
- क्या आपको लगता है कि आज भी गंभीर और ग्राउंड-रिपोर्टिंग को पर्याप्त स्पेस मिल रहा है?
- बिल्कुल। अगर आपकी कहानी में दम है और वह जनता से जुड़ी है, तो स्पेस हमेशा मिलेगा। दैनिक भास्कर जैसे संस्थान आज भी लंबी और जोखिम भरी इन्वेस्टिगेटिव स्टोरीज को पहले पन्ने पर पूरी प्रमुखता देते हैं। पाठक आज भी असली 'खबर' पढ़ना चाहते हैं।
- आज की डिजिटल पत्रकारिता पारंपरिक पत्रकारिता से किस तरह अलग हो चुकी है?
- डिजिटल पत्रकारिता में तात्कालिकता है, वहां सूचना सेकंडों में पहुंचती है। लेकिन पारंपरिक पत्रकारिता गहराई, ठहराव और पुख्ता सबूतों पर काम करती है। डिजिटल आपको बताता है कि 'क्या हुआ', जबकि पारंपरिक पत्रकारिता यह बताती है कि 'क्यों और कैसे हुआ'।
- यूथ जर्नलिस्ट्स के लिए आप क्या सबसे महत्वपूर्ण कौशल मानते हैं?
- जिज्ञासा, धैर्य और दस्तावेजों को पढ़ने की क्षमता। सिर्फ बयानों पर खबरें न बनाएं, आरटीआई (RTI) लगाना सीखें और सरकारी रिकॉर्ड्स की गहराइयों में जाकर सच खोजना सीखें।
- क्या सोशल मीडिया ने पत्रकारिता में जानकारी की गुणवत्ता को प्रभावित किया है?
- दोनों तरह से किया है। इसने आवाज़ों को लोकतांत्रिक बनाया है और कई बार बड़ी लीड्स भी यहीं से मिलती हैं। लेकिन दूसरी तरफ, इसने अफवाहों और एजेंडा-आधारित सूचनाओं का अंबार भी लगा दिया है, जिससे पत्रकार का काम (फैक्ट-चेकिंग) और ज्यादा मुश्किल हो गया है।
- आप ‘स्पीड बनाम अक्यूरेसी’ की चुनौती को कैसे देखते हैं?
- मैं हमेशा 'अक्यूरेसी' (सटीकता) को चुनूंगा। एक गलत खबर तेजी से देकर विश्वसनीयता खोने से बेहतर है कि खबर थोड़ी देर से आए, लेकिन 100% सच हो। दस्तावेजों पर आधारित इन्वेस्टिगेशन में जल्दबाजी की कोई जगह नहीं होती।
- जब आप किसी संवेदनशील मुद्दे पर ग्राउंड रिपोर्ट करने जाते हैं, आप तैयारी कैसे करते हैं?
- तैयारी ही सब कुछ है। फील्ड पर जाने से पहले मैं महीनों तक 'पेपर ट्रेल' फॉलो करता हूँ— कंपनियों के रिकॉर्ड, सरकारी टेंडर और ऑडिट रिपोर्ट्स खंगालता हूँ। अंडरकवर होने के लिए अपनी 'डमी प्रोफाइल' की एक-एक बारीकी तैयार करता हूँ ताकि फील्ड पर कोई चूक न हो।
- मैदान में रिपोर्टिंग करते समय आपका सबसे यादगार अनुभव कौन सा रहा?
- आरजीएचएस घोटाले का खुलासा सबसे यादगार रहा। मैंने एक 'डमी मरीज' बनकर सीने में दर्द की झूठी शिकायत की। सभी जांचें सामान्य होने के बावजूद मुझे 7 दिन अस्पताल में भर्ती रखा गया और फर्जी बिल बनाए गए। मुझे बिना बीमारी के हैवी दवाइयां दी गईं, जिससे मैं वॉशरूम में गिर गया था। वह जानलेवा जोखिम था, लेकिन उस खुलासे से 6500 करोड़ रुपए का घोटाला पकड़ा गया।
- फील्ड रिपोर्टिंग में सुरक्षा और मानसिक संतुलन कैसे बनाए रखते हैं?
- इतने भारी और जोखिम भरे प्रोजेक्ट्स के बीच मैं खुद को शांत रखने के लिए साहित्य की ओर मुड़ता हूँ। बशीर बद्र और अल्लामा इकबाल की शायरी मुझे मानसिक सुकून और ऊर्जा देती है। इसके अलावा, पेशेवर तरीके से काम करना और भावनाओं में न बहना सुरक्षा की सबसे बड़ी कुंजी है।
- कहानी को मानव आवाज़ देने के लिए आप किन बातों का विशेष ध्यान रखते हैं?
- मैं हमेशा यह देखता हूँ कि किसी बड़े घोटाले या नीतिगत नाकामी का सीधा असर अंतिम पंक्ति में खड़े व्यक्ति पर कैसे पड़ रहा है। सिस्टम की खामियों को जब किसी पीड़ित (चाहे वह शोषित डोनर हो या परेशान आम आदमी) के चेहरे और उसके दर्द के साथ दिखाया जाता है, तभी खबर में जान आती है।
- आज मीडिया पर पक्षपात के आरोप बढ़ रहे हैं। आप निष्पक्षता सुनिश्चित करने के लिए क्या करते हैं?
- मैं 'डॉक्यूमेंट्री एविडेंस' (दस्तावेजी सबूतों) पर भरोसा करता हूँ। बयान और विचारधाराएं पक्षपाती हो सकती हैं, लेकिन आरटीआई से निकले सरकारी आंकड़े, बैंक रिकॉर्ड और हिडन कैमरे की फुटेज कभी झूठ नहीं बोलते।
- फेक न्यूज़ और मिसइन्फॉर्मेशन के दौर में पत्रकार सत्यापन को कैसे मजबूत कर सकते हैं?
- पत्रकार को हमेशा मूल स्रोत तक जाना चाहिए। सुनी-सुनाई बातों पर यकीन न करें। तकनीकी टूल्स का इस्तेमाल करें, क्रॉस-चेक करें और जब तक दो अलग-अलग स्वतंत्र स्रोतों से खबर की पुष्टि न हो जाए, उसे न छापें।
- क्या आपको लगता है कि मीडिया हाउसों पर बढ़ते कॉर्पोरेट दबाव से स्वतंत्र पत्रकारिता प्रभावित होती है?
- चुनौतियां हमेशा रही हैं, लेकिन अगर पत्रकार के पास अकाट्य सबूत हैं और संस्थान का संपादकीय नेतृत्व मजबूत है, तो अच्छी खबरें कभी नहीं रुकतीं। मैंने कॉरपोरेट और बड़े राजनीतिक गठजोड़ के खिलाफ रिपोर्टिंग की है और भास्कर ने हमेशा मेरे काम का समर्थन किया है।
- आज के न्यूज़ रूम में डेटा जर्नलिज़्म की क्या भूमिका देखते हैं?
- यह आज की खोजी पत्रकारिता की रीढ़ है। भ्रष्टाचार अब लिफाफों में नहीं, बल्कि टेंडरों, ग्रांट्स और डिजिटल ट्रांजैक्शन में होता है। डेटा में पैटर्न खोजना (जैसे एक ही कंपनी को बार-बार ठेका मिलना या फर्जी डीएनए डेटा का खेल) ही आज सबसे बड़ी खबरें दे रहा है।
- AI-आधारित टूल्स को आप पत्रकारिता के लिए खतरा मानते हैं या अवसर?
- यह एक बेहतरीन अवसर है। मैं व्यक्तिगत रूप से बड़ी रिपोर्ट्स को स्ट्रक्चर करने, डेटा विश्लेषण और यहां तक कि विजुअल्स (इमेज जनरेशन) के लिए AI का उपयोग करता हूँ। यह एक टूल है जो पत्रकार की क्षमता को बढ़ाता है, लेकिन फील्ड रिपोर्टिंग और मानवीय संवेदना की जगह कभी नहीं ले सकता।
- ग्राउंड रिपोर्टिंग को बढ़ावा देने के लिए मीडिया संस्थानों को क्या कदम उठाने चाहिए?
- संस्थानों को पत्रकारों को समय और संसाधन देने चाहिए। इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग एक या दो दिन का काम नहीं है। एक रिपोर्टर को हफ्तों या महीनों तक एक विषय के पीछे लगने की आज़ादी और कानूनी सुरक्षा मिलनी चाहिए।
- इस पुरस्कार के बाद आपका अगला लक्ष्य या प्रोजेक्ट क्या है?
- मैं सिस्टम में मौजूद 'डिजिटल और टेक्नोलॉजिकल सिंडिकेट्स' की गहराई में उतर रहा हूँ। जैसे ई-वेस्ट की तस्करी और एआई (AI) स्टार्टअप्स के नाम पर हो रहे सरकारी ग्रांट्स के घोटाले। मेरी कोशिश हमेशा उन अंधेरे कोनों को रोशन करने की रहती है जहां आम तौर पर किसी की नजर नहीं जाती।
- जर्नलिज़्म पढ़ रहे छात्रों के लिए आपकी तीन मुख्य सलाह क्या होंगी?
- पहली- खूब पढ़ें और खूब घूमें। दूसरी- सवाल पूछने से कभी न डरें। तीसरी- डेस्क डेस्क खेलने के बजाय फील्ड की धूल फांकें, असली खबरें सड़क और फाइलों के बीच ही मिलती हैं।
- क्या आप महसूस करते हैं कि शैक्षिक संस्थानों में व्यावहारिक प्रशिक्षण पर पर्याप्त ध्यान दिया जा रहा है?
- सिद्धांत अच्छी तरह पढ़ाए जा रहे हैं, लेकिन जो चीजें फील्ड में सबसे ज्यादा काम आती हैं— जैसे आरटीआई फाइल करना, बैलेंस शीट पढ़ना, या डार्क वेब/डेटा स्क्रैपिंग— उन्हें पाठ्यक्रम में और अधिक व्यावहारिक रूप से शामिल करने की जरूरत है।
- आज के समय में क्षेत्रीय भाषाओं में पत्रकारिता का भविष्य कैसा दिखता है?
- क्षेत्रीय भाषाएं ही भारत की असली ताकत हैं। सबसे बड़ा इम्पैक्ट वहीं होता है जहां आम जनता आपकी बात समझती है। नीतियां भले ही दिल्ली में बनती हों, लेकिन उनका असर क्षेत्रीय स्तर पर ही दिखाई देता है, इसलिए भाषाई पत्रकारिता का भविष्य बेहद उज्ज्वल और शक्तिशाली है।
भौतिक विज्ञानी मोहम्मद सोइफ अहमद से खास बातचीत
महज 30 वर्ष की उम्र में मोहम्मद सोइफ अहमद प्रतिष्ठित इम्पीरियल कॉलेज लंदन में मैरी स्क्लोडोव्स्का-क्यूरी एक्शंस पोस्टडॉक्टोरल फेलोशिप के तहत अपने शोध प्रोजेक्ट का नेतृत्व करने की तैयारी कर रहे हैं। लेकिन उनकी यह यात्रा अत्याधुनिक लैब से नहीं, बल्कि मुर्शिदाबाद के एक ऐसे गांव से शुरू हुई, जहां उनके घर में बिजली तक नहीं थी।
प्रश्न: आप बिना बिजली के बड़े हुए। शुरुआती दिनों की सबसे खास याद क्या है?
- मेरे घर में आठवीं कक्षा तक बिजली नहीं थी। हम रोशनी के लिए लालटेन का इस्तेमाल करते थे और पढ़ाई के लिए एक छोटी सी ढिबरी होती थी। मेरे दादा जितना वहन कर सकते थे, उतना करते थे। उस समय यह सब सामान्य लगता था—बस जिंदगी का हिस्सा था। आज जब पीछे मुड़कर देखता हूं, तो समझ आता है कि उन्हीं परिस्थितियों ने मेरे अंदर अनुशासन और एकाग्रता विकसित की।
प्रश्न: अपनी शुरुआती स्कूली पढ़ाई के बारे में बताइए।
- मैंने कोमनगर के एक सरकारी स्कूल में पढ़ाई की, जहां बुनियादी सुविधाएं बहुत कम थीं। केवल एक इमारत थी जो दफ्तर के रूप में इस्तेमाल होती थी और हम आम के पेड़ के नीचे जूट की चटाई पर बैठकर पढ़ाई करते थे। लेकिन सीखने में कभी कोई कमी नहीं आई। दरअसल, वही साल मेरे लिए सबसे ज्यादा सीख देने वाले रहे।
प्रश्न: आपकी शिक्षा में परिवार की क्या भूमिका रही?
- मैं एक संयुक्त परिवार में बड़ा हुआ, जहां पांच बच्चे साथ पढ़ते थे। हम एक-दूसरे की मदद करते थे। गणित में कोई समस्या होती तो मैं अपने मामा से पूछता, और अंग्रेजी में मेरी मौसी मदद करती थीं। यह एक सहयोगी माहौल था। हमने कभी आर्थिक परेशानियों को बाधा के रूप में नहीं देखा।
प्रश्न: आपने आर्थिक तंगी का जिक्र किया है। इसका आपकी रोजमर्रा की जिंदगी पर क्या असर पड़ा?
- हम बहुत सादगी से रहते थे। सुबह का नाश्ता अक्सर नहीं होता था—कभी-कभी स्कूल जाने से पहले बिस्कुट या सत्तू खा लेते थे। जो भी स्थानीय रूप से उपलब्ध होता, वही खाते थे। कई बार कई दिनों तक कच्चे केले या कटहल ही खाना पड़ता था। मछली बहुत कम मिलती थी और मटन तो उससे भी कम। लेकिन हमें कभी कमी महसूस नहीं हुई। हमारे लिए पढ़ाई और खेल सबसे महत्वपूर्ण थे।
प्रश्न: आपके परिवार की स्थिति में बदलाव कब आया?
- सबसे बड़ा बदलाव तब आया जब मेरे पिता को स्कूल शिक्षक की नौकरी मिली। इससे हमारे जीवन में स्थिरता आई। हम नए घर में शिफ्ट हुए और पहली बार घर में बिजली आई। इससे मेरी पढ़ाई भी बेहतर हो गई।
प्रश्न: स्कूल के बाद आपकी पढ़ाई का सफर कैसे आगे बढ़ा?
- दसवीं के बाद मैं आगे की पढ़ाई के लिए कोलकाता चला गया, जो मेरे परिवार के लिए एक बड़ा कदम था। बाद में मैंने अलियाह यूनिवर्सिटी से फिजिक्स में इंटीग्रेटेड एमएससी किया, जिसे मैंने 2018 में पूरा किया। वहीं से मैंने रिसर्च को करियर के रूप में गंभीरता से लेना शुरू किया।
प्रश्न: आईआईटी हैदराबाद में पीएचडी करने का निर्णय कैसे लिया?
- GATE परीक्षा पास करने के बाद यह मौका मिला। पहली बार पश्चिम बंगाल से बाहर जाना मेरे लिए बड़ा बदलाव था, लेकिन आईआईटी हैदराबाद ने मुझे आगे बढ़ने का बेहतरीन मंच दिया। मेरे सुपरवाइजर साई संतोष कुमार रावी ने मुझे हर कदम पर सहयोग दिया।
प्रश्न: अपने रिसर्च को आसान भाषा में समझाइए।
- मेरा शोध इस बात पर केंद्रित है कि जब किसी पदार्थ पर प्रकाश डाला जाता है, खासकर अल्ट्राफास्ट लेजर पल्स के जरिए, तो वह कैसे व्यवहार करता है। इससे हमें सोलर सेल, एलईडी और फोटोडिटेक्टर जैसी तकनीकों को बेहतर बनाने में मदद मिलती है। इसका उद्देश्य इन डिवाइसों को अधिक कुशल बनाना है।
प्रश्न: वर्तमान में आप कहां काम कर रहे हैं?
- मैं इस समय स्पेन के IMDEA नैनोसाइंसिया में पोस्टडॉक्टोरल रिसर्चर के रूप में काम कर रहा हूं। यह एक ऐसा इंटरडिसिप्लिनरी स्थान है, जहां भौतिक विज्ञानी, रसायनज्ञ और जीवविज्ञानी मिलकर एडवांस्ड मैटेरियल्स पर काम करते हैं।
प्रश्न: मैरी क्यूरी फेलोशिप आपके लिए क्या मायने रखती है?
- यह मेरे लिए बहुत बड़ा अवसर है। नवंबर से मैं इम्पीरियल कॉलेज लंदन में अपना खुद का रिसर्च प्रोजेक्ट लीड करूंगा। यह मेरे लंबे समय के लक्ष्य—भारत में, खासकर किसी IIT या प्रमुख संस्थान में अपना रिसर्च ग्रुप बनाने—की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
प्रश्न: क्या आपने कभी इस तरह के सफर की कल्पना की थी?
- बिलकुल नहीं। दसवीं कक्षा तक मुझे यह भी नहीं पता था कि IIT या पीएचडी क्या होती है। मेरा एकमात्र लक्ष्य अपनी कक्षा में टॉप करना था। बाकी सब कुछ धीरे-धीरे अपने आप होता चला गया।
आम के पेड़ के नीचे बैठकर पढ़ाई करने से लेकर दुनिया के शीर्ष संस्थानों में रिसर्च का नेतृत्व करने तक, सोइफ अहमद की यह यात्रा इस बात का प्रमाण है कि मेहनत और जिज्ञासा किसी भी परिस्थिति को पीछे छोड़ सकती है।
प्रख्यात भारतीय लेखिका और सामाजिक कार्यकर्ता श्रीमोयी पियू कुंडू से खास बातचीत
श्रीमोयी पियू कुंडू एक प्रख्यात भारतीय लेखिका, पत्रकार और सामाजिक कार्यकर्ता हैं, जो भारत में जेंडर, यौनिकता और अविवाहित महिलाओं के जीवन से जुड़े मुद्दों पर अपने काम के लिए जानी जाती हैं। वह “स्टेटस सिंगल” की संस्थापक हैं, जो शहरी अविवाहित महिलाओं के सशक्तिकरण और उनकी पहचान को सामने लाने के लिए समर्पित एक कम्युनिटी और प्लेटफॉर्म है। सोशल मीडिया और यूट्यूब चैनल के जरिए भी उन्होंने अच्छी पहचान बनाई है। श्रीमोयी पियू कुंडू से खास बातचीत के प्रमुख अंश:
प्रश्न 1: सोशल मीडिया और यूट्यूब पर आपके चैनल और पेज काफी लोकप्रिय हैं, आपने इसकी शुरुआत कैसे की?
- मैंने अपना यूट्यूब चैनल 2024 में, मई महीने में शुरू किया था। फेसबुक और इंस्टाग्राम पर मैं उससे पहले से ही सक्रिय थी। दरअसल, मैं शुरू से ही अलग-अलग मीडिया प्लेटफॉर्म्स से जुड़ी रही हूं, इसलिए यह मेरे लिए काफी स्वाभाविक रहा। अपनी बात लोगों तक पहुंचाने के लिए मैंने एक समय किताब भी लिखी और अब पॉडकास्ट करती हूं। माध्यम बदलता रहता है, लेकिन अगर मैं लोगों तक अपनी बात पहुंचा पा रही हूं, तो वही मेरी सफलता है।
प्रश्न 2: आप सोशल मीडिया और यूट्यूब पर अलग-अलग लोगों के साथ कई विषयों पर चर्चा और इंटरव्यू करती हैं। आपके प्लेटफॉर्म पर मुख्य फोकस किन विषयों पर रहता है?
- अगर आप मेरे यूट्यूब या अन्य सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म्स देखेंगे, तो पाएंगे कि मेरे अधिकतर विषय और मेहमान महिलाओं से जुड़े होते हैं। मैं कोशिश करती हूं कि समाज में मौजूद महिलाओं के अलग-अलग रूप, उनकी भूमिका और उनके योगदान को सामने लाया जाए। महिलाएं समाज को कैसे प्रभावित कर रही हैं—यह सकारात्मक है या नकारात्मक—इन सभी पहलुओं को समझना जरूरी है।
मेरे कंटेंट में आमतौर पर इंटरव्यू देने वाली महिलाओं के जीवन और काम के अनुभवों को साझा किया जाता है। यही मेरे पॉडकास्ट और वीडियो का मुख्य विषय होता है। हालांकि हर व्यक्ति अलग होता है, इसलिए हर एपिसोड में विषय भी बदलता रहता है।
प्रश्न 3: आप कई बार राजनीतिक मुद्दों पर भी चर्चा करती हैं। दर्शकों की प्रतिक्रिया कैसी रहती है? क्या वे निष्पक्षता से संतुष्ट होते हैं?
- देखिए, राजनीति समाज का एक हिस्सा है। यह अच्छा है या बुरा, इसका निर्णय मैं नहीं करूंगी, लेकिन एक लोकतांत्रिक देश में हर व्यक्ति की भागीदारी जरूरी है। चूंकि राजनीति पूरे समाज को प्रभावित करती है, इसलिए यह कई बार विवादित भी हो जाती है।
लेकिन मेरा मानना है कि अगर बहस और चर्चा के बाद हम किसी बेहतर निष्कर्ष पर पहुंचते हैं, तो यह जरूरी और उपयोगी है। ऐसी चर्चाएं समाज के लिए नुकसानदायक नहीं बल्कि फायदेमंद हो सकती हैं।
प्रश्न 4: आप आधुनिक दौर के नए मीडिया की प्रतिनिधि हैं। आज के समय में इस मीडिया को आप कैसे देखती हैं?
- आज के दौर का मीडिया मुख्य रूप से सोशल मीडिया और इंटरनेट आधारित है। 2016 में जियो के आने और 2022 में 5G की शुरुआत के बाद भारत में इंटरनेट का उपयोग तेजी से बढ़ा है। आने वाले समय में यह और बढ़ेगा।
इससे लोगों तक ज्यादा जानकारी और अलग-अलग विचार आसानी से पहुंच पाएंगे और साझा किए जा सकेंगे।
प्रश्न 5: क्या नया मीडिया वास्तव में पारंपरिक मीडिया जैसे टीवी और अखबार को चुनौती दे पाया है?
- आज 2026 में खड़े होकर मैं कह सकती हूं कि नया मीडिया काफी हद तक पारंपरिक मीडिया पर भारी पड़ा है। अखबार और टीवी अब धीरे-धीरे पीछे छूटते नजर आ रहे हैं और उनकी जगह OTT और सोशल मीडिया ले रहे हैं।
इस डिजिटल दौर में मीडिया अधिक लोकतांत्रिक हो गया है। अब आम लोग भी अपनी बात दुनिया तक पहुंचा सकते हैं। यह एक सकारात्मक बदलाव है। हालांकि, हर किसी की राय सभी को पसंद नहीं आती, लेकिन यही लोकतंत्र की खूबसूरती है।
प्रश्न 6: नए मीडिया का भविष्य आप कैसा देखती हैं? और आपके अपने प्लेटफॉर्म को लेकर आगे क्या योजना है?
- मेरे अनुसार नए मीडिया का भविष्य बहुत उज्ज्वल है। तकनीक के विकास के साथ इस क्षेत्र में और भी नई संभावनाएं सामने आएंगी। लोगों को भी तकनीक के साथ खुद को अपडेट करना होगा और आधुनिक सोच अपनानी होगी, नहीं तो वे इस तेजी से बदलती दुनिया के साथ तालमेल नहीं बैठा पाएंगे।
UPSC टॉपर ए.आर. राजा मोहिदीन से विशेष बातचीत
चेन्नई के रहने वाले ए.आर. राजा मोहिदीन (A.R. Rajah Mohaideen) ने इस वर्ष संघ लोक सेवा आयोग यानी Union Public Service Commission (UPSC) द्वारा आयोजित सिविल सेवा परीक्षा में ऑल इंडिया रैंक 7 हासिल कर शानदार सफलता पाई है। मेडिकल शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने सिविल सेवा का रास्ता चुना और चार वर्षों की निरंतर तैयारी, स्पष्ट लक्ष्य और कड़ी मेहनत के दम पर यह मुकाम हासिल किया। प्रस्तुत हैं एडइनबॉक्स (EdInbox) के लिए रईस अहमद 'लाली' (Raees Ahmad 'Lali') द्वारा उनसे की गई बातचीत के प्रमुख अंश:
रिजल्ट आने के बाद आपकी पहली प्रतिक्रिया क्या थी?
ए.आर. राजा मोहिदीन: सच कहूं तो मैं पूरी तरह चौंक गया था। मुझे उम्मीद थी कि मेरा चयन हो सकता है, लेकिन टॉप 10 में, वह भी सिंगल डिजिट रैंक मिलेगी—यह सोचा नहीं था। खुशी भी थी, लेकिन यकीन करने में थोड़ा समय लगा।
आपने UPSC की तैयारी कब शुरू की और कितने साल लगे?
राजा मोहिदीन: मैंने 2022 में तैयारी शुरू की थी। अब इसे चार साल हो चुके हैं। यह सफर लंबा था, लेकिन लगातार मेहनत करता रहा।
जामिया की कोचिंग का आपकी सफलता में कितना योगदान रहा?
राजा मोहिदीन: पहले एक साल मैंने चेन्नई में तैयारी की, लेकिन 2023 में प्रीलिम्स पास नहीं कर पाया। इसके बाद मैंने Jamia Millia Islamia की रेजिडेंशियल कोचिंग अकादमी की प्रवेश परीक्षा दी और चयन हो गया। दिल्ली आने के बाद पढ़ाई के लिए बहुत अच्छा माहौल मिला। प्रोफेसर समीना बानो मैम और अन्य शिक्षकों ने काफी मार्गदर्शन दिया। यहां की लाइब्रेरी, अखबार और सीनियर्स का सहयोग बहुत मददगार रहा। सीनियर्स ने मेरी गलतियां पहचानने और सुधारने में अहम भूमिका निभाई।
पहले प्रयास में क्या कमी रह गई थी?
राजा मोहिदीन: पहले प्रयास में मैं प्रीलिम्स क्लियर नहीं कर पाया। मैंने मॉक टेस्ट की पर्याप्त प्रैक्टिस नहीं की थी। हालांकि, उसी समय मैं मेंस की तैयारी भी करता रहा। मेंस की लगातार तैयारी का फायदा इस बार मिला और अच्छे अंक आए।
आपके विषय कौन-कौन से थे?
राजा मोहिदीन: जनरल स्टडीज़ तो सभी के लिए समान होता है। मेरा ऑप्शनल विषय एंथ्रोपोलॉजी था।
आप एमबीबीएस डॉक्टर हैं। फिर सिविल सेवा में आने का फैसला क्यों लिया?
राजा मोहिदीन: मैंने Government Cuddalore Medical College से MBBS किया। मेरी मेडिकल पढ़ाई 2016 में शुरू हुई और 2022 में पूरी हुई। शुरुआत में सिविल सेवा में आने की कोई योजना नहीं थी। लेकिन इंटर्नशिप के दौरान ही कोविड-19 महामारी का समय था। मैंने अपने शहर में सिविल सेवकों को लोगों के लिए दिन-रात काम करते देखा। वहीं से प्रेरणा मिली। मुझे लगा कि एक सिविल सेवक के रूप में मैं समाज के बड़े वर्ग की सेवा कर सकता हूं। इसी सोच ने मुझे ग्रेजुएशन के बाद UPSC की तैयारी के लिए प्रेरित किया।
आपके माता-पिता क्या करते हैं?
राजा मोहिदीन: मेरे माता-पिता शिक्षक रहे हैं और फिलहाल तमिलनाडु के सरकारी कॉलेजों में प्रिंसिपल के पद पर कार्यरत हैं।
जो छात्र UPSC की तैयारी कर रहे हैं, उन्हें आप क्या सलाह देना चाहेंगे?
राजा मोहिदीन: सबसे जरूरी है कि आपका लक्ष्य स्पष्ट होना चाहिए। हमेशा याद रखें कि आपने यह परीक्षा क्यों चुनी है। यह सफर लंबा हो सकता है—मुझे चार साल लगे। इस दौरान मानसिक मजबूती और मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना बेहद जरूरी है।
दूसरी अहम बात है सिलेबस पर फोकस बनाए रखना। तैयारी बिखरी हुई नहीं होनी चाहिए।
रोज कितने घंटे पढ़ाई करनी चाहिए?
राजा मोहिदीन: मेरे हिसाब से घंटों की गिनती उतनी मायने नहीं रखती। जरूरी यह है कि आप अपना तय लक्ष्य पूरा करें। महीने और हफ्ते का टारगेट बनाएं और उसे हर हाल में पूरा करें। कुछ दिन मैंने पांच घंटे पढ़ाई की, कुछ दिन दस घंटे, लेकिन टारगेट पूरा किया।
सफलता का मूल मंत्र क्या रहा?
राजा मोहिदीन: लक्ष्य की स्पष्टता, नियमित तैयारी, सिलेबस पर पकड़ और मानसिक संतुलन—यही मेरी सफलता की कुंजी रहे।
जैसे-जैसे बैंकिंग तेजी से ब्रांच आधारित सेवाओं से आगे बढ़कर पूरी तरह डिजिटल इकोसिस्टम की ओर बढ़ रही है, वैसे-वैसे इस बदलाव को दिशा देने में प्रोडक्ट मैनेजर्स की भूमिका बेहद अहम हो गई है। इसी बदलाव के केंद्र में काम कर रहे हैं अभिनव श्रीवास्तव, जो तकनीक, नियामकीय ढांचे और ग्राहक-केंद्रित नवाचार के बीच संतुलन बनाकर काम करते हैं।
भारत के बैंकिंग और वित्तीय सेवा क्षेत्र में सात साल से अधिक के अनुभव के साथ, उन्होंने जटिल व्यावसायिक जरूरतों को सुरक्षित, स्केलेबल और उपयोगकर्ता के अनुकूल डिजिटल प्रोडक्ट्स में बदलने में महत्वपूर्ण योगदान दिया है।
वर्तमान में अभिनव श्रीवास्तव RBL बैंक में सीनियर प्रोडक्ट मैनेजर के रूप में कार्यरत हैं। वे बैंक के वेब और मोबाइल प्लेटफॉर्म के लिए पूरे प्रोडक्ट रोडमैप और उसके क्रियान्वयन की जिम्मेदारी संभालते हैं। इंजीनियरिंग, UX, मार्केटिंग, कंप्लायंस और ऑपरेशंस टीमों के साथ मिलकर वे यह सुनिश्चित करते हैं कि हर नवाचार सुरक्षा और नियामकीय मानकों के अनुरूप हो। उनका काम प्रोडक्ट के पूरे जीवनचक्र को कवर करता है—आइडिया से लेकर प्राथमिकता तय करने, डिलीवरी और लॉन्च के बाद सुधार तक—और यह सब डेटा आधारित निर्णयों पर आधारित होता है।
अपने करियर में अभिनव ने IndiaLends, ICICI बैंक और कोटक महिंद्रा प्राइम जैसी संस्थाओं के साथ काम किया है। यहां उन्हें डिजिटल लेंडिंग प्लेटफॉर्म, ग्राहक अधिग्रहण प्रक्रिया, SaaS और CRM सिस्टम तथा बड़े स्तर पर डिजिटल अपनाने का गहरा अनुभव मिला।
शिक्षा की बात करें तो उन्होंने ICFAI फाउंडेशन फॉर हायर एजुकेशन से मार्केटिंग में MBA और PGPM किया है, जबकि लखनऊ विश्वविद्यालय से इंटरनेशनल बिजनेस में BBA किया है। यह शैक्षणिक पृष्ठभूमि उन्हें सख्त नियामकीय माहौल में प्रभावी डिजिटल प्रोडक्ट तैयार करने की मजबूत समझ देती है।
सवाल: आपकी औपचारिक शिक्षा (MBA, PGPM, BBA) ने बैंकिंग जैसे कड़े नियामकीय सेक्टर में प्रोडक्ट स्ट्रैटेजी और निर्णय लेने की सोच को कैसे प्रभावित किया? उन छात्रों को क्या सलाह देंगे जो मानते हैं कि डिग्री ही टेक और फिनटेक में सफलता की गारंटी है?
- मेरी शिक्षा ने निश्चित रूप से एक मजबूत आधार दिया, लेकिन यह कभी भी अकेला अंतर पैदा करने वाला फैक्टर नहीं रही। BBA से मुझे ग्लोबल लेवल पर बिजनेस की समझ मिली, जबकि MBA और PGPM ने उपभोक्ता व्यवहार, रणनीति और निर्णय लेने की क्षमता को और मजबूत किया। बैंकिंग जैसे रेगुलेटेड सेक्टर में यह संरचित सोच काफी मदद करती है, जहां ग्रोथ, कस्टमर एक्सपीरियंस और कंप्लायंस के बीच संतुलन बनाना पड़ता है।
लेकिन करियर की शुरुआत में ही मुझे यह समझ आ गया था कि डिग्रियां आपको असल दुनिया की जटिलताओं के लिए पूरी तरह तैयार नहीं करतीं। क्लासरूम यह नहीं सिखाता कि अधूरी जरूरतों, स्टेकहोल्डर के दबाव या अचानक आने वाले नियामकीय बदलावों को कैसे संभालना है। यह सब अनुभव से ही आता है। जो छात्र मानते हैं कि डिग्री ही सफलता की गारंटी है, उनसे मैं कहूंगा कि डिग्री आपको मौके तक पहुंचा सकती है, लेकिन वहां टिके रहना आपकी सीखने की गति, अनुकूलन क्षमता और काम करने के तरीके पर निर्भर करता है।
सवाल: सीमित संसाधनों में, जब आप वेब, मोबाइल, CRM और लेंडिंग जैसे कई डिजिटल प्लेटफॉर्म संभालते हैं, तो निवेश को कैसे प्राथमिकता देते हैं? मौजूदा फीचर्स सुधारने और नए फीचर लॉन्च करने के बीच कैसे फैसला करते हैं?
- जब संसाधन सीमित होते हैं, तो मैं सबसे पहले यह देखता हूं कि ग्राहक या बिजनेस की सबसे बड़ी समस्या कहां है। इसके लिए डेटा अहम भूमिका निभाता है—जैसे हाई ट्रैफिक जर्नी, ड्रॉप-ऑफ पॉइंट्स और वे प्लेटफॉर्म जो सीधे रेवेन्यू या कंप्लायंस से जुड़े हों। अगर कोई मौजूदा फीचर किसी जरूरी प्रक्रिया में बाधा बन रहा है, तो पहले उसे सुधारना मेरी प्राथमिकता होती है।
मेरे फैसले के मानदंड साफ होते हैं—ग्राहक पर प्रभाव, बिजनेस वैल्यू, नियामकीय जरूरत और मेहनत के मुकाबले मिलने वाला फायदा। बैंकिंग जैसे सेक्टर में मौजूदा जर्नी को बेहतर बनाना अक्सर कम जोखिम के साथ जल्दी परिणाम देता है, जबकि नए फीचर तभी लाए जाते हैं जब वे नया रेवेन्यू, कंप्लायंस समाधान या स्पष्ट प्रतिस्पर्धात्मक बढ़त दें।
सवाल: मैनेजमेंट एजुकेशन और आज के डिजिटल प्रोडक्ट लीडर्स से इंडस्ट्री की अपेक्षाओं के बीच आपको क्या अंतर नजर आता है?
- मैनेजमेंट एजुकेशन फ्रेमवर्क और संरचित सोच सिखाने में अच्छा काम करती है, लेकिन इंडस्ट्री आज ऐसे प्रोडक्ट लीडर्स चाहती है जो अनिश्चित परिस्थितियों में भी परिणाम दे सकें। वास्तविक दुनिया में प्राथमिकताएं तेजी से बदलती हैं और अक्सर अधूरी जानकारी के साथ फैसले लेने पड़ते हैं। एक बड़ा अंतर तकनीकी समझ का भी है। प्रोडक्ट लीडर्स को कोडिंग आना जरूरी नहीं है, लेकिन सिस्टम, APIs और प्लेटफॉर्म की समझ होना जरूरी है ताकि वे इंजीनियरिंग टीम के साथ व्यावहारिक निर्णय ले सकें। इसके अलावा, स्टेकहोल्डर मैनेजमेंट और एग्जीक्यूशन स्किल्स—जहां बिजनेस, टेक, UX, कंप्लायंस और टाइमलाइन का संतुलन बनाना पड़ता है—ये चीजें क्लासरूम से ज्यादा फील्ड एक्सपीरियंस से आती हैं।
सवाल: डिजिटल लेंडिंग या बैंकिंग प्रोडक्ट में आप पूरे लाइफसाइकिल के दौरान किन KPIs को ट्रैक करते हैं और उनका इस्तेमाल कैसे करते हैं?
- मैं KPIs को सिर्फ रिपोर्टिंग के लिए नहीं, बल्कि यह समझने के लिए देखता हूं कि ग्राहक प्रोडक्ट में कहां अटक रहा है। अधिग्रहण चरण में ट्रैफिक क्वालिटी, CTR और लीड से एप्लिकेशन रेशियो पर नजर रहती है। ऑनबोर्डिंग में हर स्टेप पर ड्रॉप-ऑफ, प्रक्रिया पूरी करने में लगा समय और STP रेट अहम होते हैं। एंगेजमेंट के लिए एक्टिव यूजर्स, फीचर यूसेज और जर्नी कम्प्लीशन देखी जाती है। रिटेंशन में रीपीट यूसेज और रिटर्न रेट्स से भरोसे और जुड़ाव का अंदाजा मिलता है। मोनिटाइजेशन में फंडेड अकाउंट या लोन कन्वर्जन, प्रति ग्राहक रेवेन्यू और क्रॉस-सेल पर फोकस रहता है। इन मेट्रिक्स के आधार पर बैकलॉग को प्राथमिकता दी जाती है, ड्रॉप-ऑफ पॉइंट्स सुधारे जाते हैं और UX या मैसेजिंग में बदलाव किए जाते हैं।
सवाल: आपके क्षेत्र में निरंतर सीखने की कितनी अहमियत है और यूनिवर्सिटीज को छात्रों को डिजिटल भविष्य के लिए कैसे तैयार करना चाहिए?
- फिनटेक और बैंकिंग में निरंतर सीखना बेहद जरूरी है क्योंकि तकनीक, नियम और ग्राहक की उम्मीदें लगातार बदलती रहती हैं। जो आज काम करता है, वह कुछ सालों में अप्रासंगिक हो सकता है। यूनिवर्सिटीज को चाहिए कि वे खास टूल्स सिखाने के बजाय समस्या समाधान, आलोचनात्मक सोच और अनिश्चितता के साथ काम करने की क्षमता विकसित करें। रियल वर्ल्ड प्रोजेक्ट्स, इंडस्ट्री केस स्टडी और इंटर्नशिप से छात्रों को तेजी से बदलते डिजिटल इकोसिस्टम की बेहतर समझ मिल सकती है। लक्ष्य यह होना चाहिए कि छात्र सीखते रहना सीखें, न कि डिग्री के साथ सीखने की प्रक्रिया खत्म मान लें।
करियर, कोर्स, कॉलेज और भविष्य—सब कुछ जरूरी लगता है, सब कुछ स्थायी लगता है। रैंकिंग, वायरल सक्सेस स्टोरीज़, सोशल मीडिया की सलाह और अंतहीन तुलना के बीच आज के छात्र विकल्पों की कमी से नहीं, बल्कि स्पष्टता की कमी से जूझ रहे हैं।
एडइनबॉक्स (Edinbox) की Voices That Educate सीरीज़ के इस संस्करण में Edinbox की वर्टिकल हेड–PR और कम्युनिकेशंस, पूजा खन्ना, BCM स्कूल, लुधियाना की फाउंडर प्रिंसिपल वंदना शाही के साथ एक विचारपूर्ण संवाद करती हैं। वंदना शाही राष्ट्रीय पुरस्कार (2022) से सम्मानित हैं और CBSE डिस्ट्रिक्ट ट्रेनिंग कोऑर्डिनेटर भी हैं। छात्र-केंद्रित सोच के लिए जानी जाने वाली वंदना शाही नेतृत्व को करुणा, यथार्थ और विवेक के साथ जोड़ती हैं।
प्रश्न 1: आज एक सफल करियर बनाने को लेकर छात्रों की सबसे बड़ी गलतफहमी क्या है?
- कई छात्र मानते हैं कि किसी प्रतिष्ठित संस्थान में दाख़िला या किसी “ट्रेंडिंग” स्ट्रीम का चुनाव सफलता की गारंटी है। लेकिन सच्चाई इससे कहीं अधिक जटिल है। आज करियर लचीले, अनिश्चित और पूरी तरह कौशल-आधारित हैं। अब दुनिया केवल डिग्री पर नहीं, बल्कि सोच की फुर्ती, गहरी दक्षता, भावनात्मक बुद्धिमत्ता, समस्या-समाधान क्षमता और लगातार सीखने की भूख पर भरोसा करती है।
आज नियोक्ता डिग्री और पदनाम से आगे देखकर ऐसे लोगों को तलाशते हैं जो स्वतंत्र रूप से सोच सकें, तेज़ी से ढल सकें, सार्थक सहयोग करें और वास्तविक समय में मूल्य जोड़ें। इस बदलते परिदृश्य में सफलता उन्हें मिलती है जो व्यापक अनुभव के साथ किसी एक क्षेत्र में गहरी महारत विकसित करते हैं—जो अलग-अलग विषयों को जोड़ पाते हैं और विशेषज्ञता की मजबूत नींव पर खड़े रहते हैं। अंततः सार्थक करियर शुरुआती लेबल या सीधी रेखाओं से नहीं, बल्कि उद्देश्य, निरंतर प्रयास, नैतिक आधार और बदलाव के साथ आगे बढ़ने के साहस से बनता है।
प्रश्न 2: शिक्षा को “इंडस्ट्री-ड्रिवन” कहा जाता है, फिर भी कई ग्रेजुएट खुद को तैयार क्यों नहीं मानते?
- असल डिसकनेक्ट इरादों में नहीं, बल्कि क्रियान्वयन में है। शिक्षा को भले ही इंडस्ट्री-ड्रिवन कहा जाए, पर अक्सर जोर कंटेंट मिलान पर रहता है, क्षमता विकास पर नहीं। सिलेबस उद्योग के ट्रेंड दिखा सकता है, लेकिन कक्षा में अब भी रटने, सही जवाब और परीक्षा प्रदर्शन को प्राथमिकता मिलती है—जबकि कार्यस्थल पर क्रिटिकल थिंकिंग, सहयोग, निर्णय-क्षमता, अनुकूलन और जिम्मेदारी की मांग होती है।
शिक्षा आज छात्रों को परीक्षाएँ पास कराने के लिए तैयार करती है, अस्पष्ट परिस्थितियों से निपटने के लिए नहीं। दूसरी ओर इंडस्ट्री अनिश्चितता में काम करती है, जहाँ समस्याएँ स्पष्ट नहीं होतीं, समाधान विकसित होते रहते हैं और जवाबदेही सबसे अहम होती है। बदलाव की तेज़ रफ्तार इस अंतर को और बढ़ा देती है, क्योंकि स्थिर सिलेबस गतिशील पेशेवर वास्तविकताओं के साथ कदम नहीं मिला पाते।
वास्तविक तालमेल तब बनेगा जब शिक्षा परीक्षा-केंद्रित से अनुभव-केंद्रित बने—जब सीखने में अनुप्रयोग, चिंतन, मेंटरशिप, नैतिक विवेक और भावनात्मक बुद्धिमत्ता पर जोर होगा। तभी ग्रेजुएट खुद को कमजोर नहीं, बल्कि सीखने, अनसीखने और आत्मविश्वास के साथ नेतृत्व करने के लिए सशक्त महसूस करेंगे।
प्रश्न 3: छात्र परिणाम बेहतर करने के लिए सिस्टम में कौन-से बदलाव तात्कालिक हैं?
- सबसे पहले, अंकों-केंद्रित सोच से सीखने-केंद्रित संस्कृति की ओर बढ़ना होगा। जब सफलता की परिभाषा केवल परीक्षा तय करती है, तो समझ, रचनात्मकता, जिज्ञासा और वास्तविक जीवन में उपयोग पीछे छूट जाते हैं। आकलन का उद्देश्य रैंकिंग नहीं, बल्कि विकास और आत्ममंथन होना चाहिए।
दूसरा, शिक्षकों का सशक्तिकरण और सतत पेशेवर विकास अनिवार्य है। 21वीं सदी के परिणाम पुराने प्रशिक्षण से नहीं मिल सकते। शिक्षकों को समय, भरोसा, स्वायत्तता और सीखने-सहयोग-नवाचार के अवसर चाहिए—सशक्त शिक्षक ही छात्रों को गहराई से जोड़ते हैं।
अंत में, अनुभवात्मक सीख, इंटरडिसिप्लिनरी सोच और जरूरी जीवन कौशल को मुख्य पाठ्यक्रम में शामिल करना होगा। छात्रों को सिर्फ परीक्षा या नौकरी के लिए नहीं, बल्कि जटिलता, अनिश्चितता और आजीवन सीखने के लिए तैयार किया जाए। यही बदलाव शिक्षा को कठोर ढांचे से उत्तरदायी इकोसिस्टम में बदलेंगे।
प्रश्न 4: AI और डिजिटल टूल्स के दौर में कौन-से मानवीय कौशल और महत्वपूर्ण होंगे?
- जब बुद्धिमत्ता को ऑटोमेट किया जा सकता है, तब शिक्षा का पैमाना “क्या जानते हैं” से “कैसे सोचते हैं और क्या बनते हैं” पर आ जाता है। AI के युग में क्रिटिकल थिंकिंग और नैतिक विवेक सबसे जरूरी होंगे—ताकि सत्य पहचाना जा सके, एल्गोरिदम पर सवाल उठाए जा सकें और मूल्य-आधारित निर्णय लिए जा सकें।
रचनात्मकता और मौलिक सोच नवाचार को परिभाषित करेंगी, क्योंकि मशीनें पैटर्न दोहरा सकती हैं, उद्देश्य नहीं। साथ ही भावनात्मक बुद्धिमत्ता, सहानुभूति और प्रभावी संचार नेतृत्व, सहयोग और भरोसे की बुनियाद हैं। बदलाव सामान्य होगा, तो अनुकूलन क्षमता, लचीलापन और आत्म-जागरूकता दीर्घकालिक प्रासंगिकता तय करेंगे। तकनीक क्षमता बढ़ा सकती है, दिशा इंसानी विवेक और जिज्ञासा ही देती है।
प्रश्न 5: शिक्षा में ईमानदार संवाद कितना जरूरी है और Edinbox जैसी प्लेटफॉर्म्स विश्वसनीयता कैसे बनाए रखें?
- ईमानदार संवाद वैकल्पिक नहीं, बल्कि भरोसे और सार्थक सीख की नींव है। जानकारी की भरमार में स्पष्टता दावों से ज्यादा अहम है। पारदर्शी संवाद अपेक्षाओं को वास्तविकता से जोड़ता है—वरना शिक्षा लेन-देन बनकर रह जाती है।
एडइनबॉक्स (Edinbox) जैसे प्लेटफॉर्म्स सीखने वालों और संस्थानों के बीच नैतिक मध्यस्थ की भूमिका निभाते हैं। सटीकता, संपादकीय ईमानदारी और छात्र-केंद्रित कंटेंट को प्राथमिकता देकर ही विश्वसनीयता बनी रहती है। सत्यापित जानकारी, संतुलित दृष्टिकोण और उद्देश्यपूर्ण सामग्री के साथ संस्थागत सहयोग संभव है। ईमानदार और मूल्य-आधारित संवाद शिक्षा संस्कृति को ऊंचा उठाता है।
प्रश्न 6: विकल्पों और रैंकिंग की भीड़ में छात्रों को क्या फ़िल्टर करना चाहिए?
- आज सबसे बड़ा कौशल है—विवेक। रैंकिंग और सलाह मार्गदर्शन दे सकती हैं, पर आत्म-चिंतन का विकल्प नहीं बननी चाहिए। छात्रों को पूछना चाहिए—“क्या लोकप्रिय है?” नहीं, बल्कि “क्या मेरी ताकत, मूल्यों और दीर्घकालिक विकास से मेल खाता है?”
जो ध्यान के योग्य है, वह गहराई बनाता है—ऐसे प्रोग्राम, मेंटर्स और अनुभव जो सोच, लचीलापन, नैतिकता और ट्रांसफरेबल स्किल्स विकसित करें। रैंकिंग एक समय की प्रतिष्ठा दिखाती है, व्यक्तिगत फिट या बदलाव की तैयारी नहीं। शोर में स्पष्टता भीतर से आती है।
प्रश्न 7: महिला लीडर के रूप में आपके सामने कौन-सी सूक्ष्म चुनौतियाँ रहीं?
- कई चुनौतियाँ खुली नहीं थीं—अदृश्य अपेक्षाएँ और खामोश समझौते। बार-बार योग्यता साबित करने का दबाव, सहानुभूति और अधिकार का संतुलन, बिना मान्यता के भावनात्मक श्रम—ये सब यात्रा को आकार देते हैं। कभी महत्वाकांक्षा को आक्रामकता समझा गया, तो संयम को सहमति।
मैंने रणनीतिक आत्म-जागरूकता और आंतरिक लचीलापन विकसित किया—कब दृढ़ बोलना है, कब परिणामों को बोलने देना है; अपराधबोध के बिना सीमाएँ तय करना; संदेह के बिना महत्वाकांक्षा बनाए रखना। मेंटरशिप, चिंतन और मजबूत मूल्य-प्रणाली मेरे सहारे बने। प्रभावी नेतृत्व पुराने ढाँचों में फिट होने से नहीं, बल्कि सोच-समझकर उन्हें नया रूप देने से आता है।
प्रश्न 8: स्टोरीटेलिंग और वास्तविक अनुभव छात्रों के फैसलों में कैसे मदद करते हैं?
- कहानियाँ अमूर्त विचारों और वास्तविक जीवन के बीच पुल बनाती हैं। डेटा और रैंकिंग जानकारी देते हैं, लेकिन कहानियाँ मानवीय पहलू दिखाती हैं—सफलता, असफलता और पुनर्निर्माण की जटिलताएँ। इससे छात्र समझते हैं कि करियर अक्सर सीधी राह पर नहीं चलते।
कहानियाँ भावनात्मक जुड़ाव और आत्म-चिंतन पैदा करती हैं, पारंपरिक मानकों से आगे संभावनाएँ दिखाती हैं और उन जटिलताओं से परिचित कराती हैं जिन्हें कोई सिलेबस पूरी तरह नहीं सिखा सकता। वास्तविक यात्राओं से जुड़कर छात्र विवेक, लचीलापन और आत्म-जागरूकता विकसित करते हैं—यह प्रेरणा ही नहीं, अंतर्ज्ञान की शिक्षा है।
प्रश्न 9: शिक्षा मीडिया पोर्टल्स को आगे किस तरह की बातचीत का नेतृत्व करना चाहिए?
- सूचना देने से आगे बढ़कर शिक्षा मीडिया को विवेक का क्यूरेटर और सार्थक संवाद का उत्प्रेरक बनना होगा। उन्हें यह सवाल उठाने चाहिए कि छात्र क्या सीखते हैं ही नहीं, क्यों और किस उद्देश्य से।
ऑटोमेशन, असमानता और तेज़ सामाजिक बदलाव के दौर में शिक्षा के उद्देश्य, तकनीक के नैतिक उपयोग, मानसिक स्वास्थ्य, समान अवसर, आजीवन सीख और भविष्य के काम पर चर्चा जरूरी है। सनसनी या रैंकिंग-ड्रिवन नैरेटिव्स के बजाय साक्ष्य-आधारित विमर्श को बढ़ावा दिया जाए। ऐसा मीडिया ट्रेंड्स रिपोर्ट नहीं करता—संस्कृति गढ़ता है।
प्रश्न 10: छात्रों के लिए वह सलाह जो कम सुनते हैं, पर सबसे जरूरी है?
- उपलब्धियों और तेज़ी के शोर में यह याद नहीं दिलाया जाता कि प्रगति से पहले उद्देश्य आता है। हर कोई जल्दी नहीं खिलता, हर योगदान तुरंत दिखाई नहीं देता। विकास अक्सर खामोशी में परिपक्व होता है—चिंतन, सीखने योग्य गलतियों और शांत दृढ़ता से।
स्थायी सफलता तब आती है जब योग्यता, मूल्य और प्रयास एक दिशा में हों—बिना जल्दबाज़ी। सच्ची सफलता केवल व्यक्तिगत उपलब्धि नहीं, बल्कि अपनी क्षमताओं से अर्थ, प्रभाव और भलाई रचना है। करुणा, ईमानदारी और सेवा-भाव से जुड़ी महत्वाकांक्षा न सिर्फ करियर बनाती है, बल्कि एक अधिक संवेदनशील, जिम्मेदार और आशावादी दुनिया का निर्माण करती है।
भारत में शिक्षा केवल किताबों और कक्षाओं का विषय नहीं है, बल्कि यह सामाजिक समानता, आर्थिक अवसर और देश के भविष्य से सीधे जुड़ा मुद्दा है। ऐसे में 6 मई को जारी की गई ‘स्कूल मैनेजमेंट कमेटी (SMC) गाइडलाइंस 2026’ को केवल एक प्रशासनिक दस्तावेज मानना बड़ी भूल होगी। यह दरअसल उस गहरी चिंता का जवाब है, जो पिछले कई वर्षों से सरकारी स्कूलों की गिरती स्थिति को लेकर लगातार बढ़ रही थी।
केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान द्वारा जारी इन गाइडलाइंस में पहली बार अभिभावकों को स्कूल प्रबंधन के केंद्र में लाने की स्पष्ट कोशिश दिखाई देती है। स्कूल प्रबंधन समितियों में 75 प्रतिशत अभिभावकों की भागीदारी, महिलाओं को आधी हिस्सेदारी, मासिक बैठक, सामाजिक ऑडिट और तीन साल का विकास प्लान जैसे प्रावधान इस बात का संकेत हैं कि सरकार अब यह समझ चुकी है कि केवल ऊपर से योजनाएं बनाकर सरकारी स्कूलों की हालत नहीं सुधारी जा सकती।
असल सवाल यह है कि क्या सरकारी स्कूलों की मौजूदा स्थिति इतनी खराब हो चुकी है कि अब सरकार को समुदाय आधारित निगरानी की जरूरत महसूस हुई? जवाब है — हां।
देश में करोड़ों गरीब और ग्रामीण परिवार आज भी सरकारी स्कूलों पर निर्भर हैं। लेकिन विडंबना यह है कि जिन स्कूलों को सामाजिक न्याय और समान अवसर का माध्यम होना चाहिए था, वही धीरे-धीरे लोगों का भरोसा खोते गए। शिक्षा मंत्रालय के आंकड़े बताते हैं कि भारत में लगभग 14.7 लाख स्कूल हैं, जिनमें से 10 लाख से अधिक सरकारी या सरकारी सहायता प्राप्त संस्थान हैं। इतने बड़े ढांचे के बावजूद शिक्षा की गुणवत्ता लगातार सवालों के घेरे में रही है।
ग्रामीण भारत की तस्वीर सबसे अधिक चिंताजनक है। कई गांवों में स्कूल भवन जर्जर हैं, शिक्षकों की भारी कमी है और पढ़ाई का स्तर बेहद कमजोर हो चुका है। एक शिक्षक कई कक्षाओं को संभाल रहा है। ऊपर से गैर-शैक्षणिक कार्यों का बोझ अलग। नतीजा यह हुआ कि सरकारी स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चों का सीखने का स्तर लगातार गिरता गया।
इसका सबसे बड़ा सामाजिक असर यह हुआ कि गरीब परिवार भी अब सरकारी स्कूलों से दूरी बनाने लगे। पहले निजी स्कूल शहरों तक सीमित थे, लेकिन अब गांवों और छोटे कस्बों में भी अंग्रेजी माध्यम और तथाकथित पब्लिक स्कूलों की बाढ़ दिखाई देती है। यह अलग बात है कि इनमें से कई निजी स्कूल खुद गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में सक्षम नहीं हैं, फिर भी अभिभावकों को वे सरकारी स्कूलों से बेहतर लगते हैं। कारण साफ है — जवाबदेही।
निजी स्कूलों में अभिभावक सीधे सवाल पूछते हैं। फीस देने वाला परिवार स्कूल से परिणाम चाहता है। वहीं सरकारी स्कूलों में लंबे समय तक अभिभावकों की भूमिका लगभग औपचारिक बनी रही। स्कूल प्रबंधन समितियां कागजों तक सीमित रहीं या स्थानीय राजनीति का हिस्सा बन गईं। ऐसे में नई SMC गाइडलाइंस एक महत्वपूर्ण सुधार की शुरुआत हो सकती हैं।
हालांकि केवल समितियां बना देने से शिक्षा व्यवस्था नहीं बदल जाएगी। असली चुनौती इन समितियों को सक्रिय, स्वतंत्र और प्रभावी बनाने की होगी। यदि अभिभावकों को केवल हस्ताक्षर करने तक सीमित रखा गया, तो यह पहल भी पुराने ढर्रे पर चली जाएगी। सरकार को यह सुनिश्चित करना होगा कि समितियों को वास्तविक अधिकार मिलें, उनकी नियमित ट्रेनिंग हो और उनकी रिपोर्ट पर कार्रवाई भी हो।
महिलाओं की 50 प्रतिशत भागीदारी का प्रावधान विशेष रूप से महत्वपूर्ण है। ग्रामीण समाज में बच्चों की शिक्षा को लेकर माताओं की भूमिका बेहद अहम होती है। यदि उन्हें स्कूल प्रबंधन में प्रभावी स्थान मिलता है, तो स्कूलों की उपस्थिति, स्वच्छता, सुरक्षा और पढ़ाई के माहौल में सकारात्मक बदलाव आ सकता है।
कोविड महामारी ने भी सरकारी और निजी शिक्षा के बीच की खाई को और गहरा कर दिया। ऑनलाइन शिक्षा के दौर में सरकारी स्कूलों के लाखों बच्चे डिजिटल संसाधनों से दूर रह गए, जबकि निजी स्कूलों ने अपेक्षाकृत तेजी से खुद को ढाल लिया। इस अनुभव ने लोगों के मन में सरकारी स्कूलों को लेकर असुरक्षा और बढ़ा दी।
ऐसे समय में SMC गाइडलाइंस 2026 केवल एक नीति नहीं, बल्कि सरकारी स्कूलों में जनता का भरोसा लौटाने की कोशिश है। लेकिन यह भरोसा तभी लौटेगा जब स्कूलों में शिक्षक होंगे, नियमित पढ़ाई होगी, जवाबदेही तय होगी और अभिभावकों की आवाज वास्तव में सुनी जाएगी।
भारत जैसे विशाल देश में शिक्षा सुधार केवल मंत्रालयों के आदेश से संभव नहीं है। इसके लिए समाज, अभिभावकों, शिक्षकों और स्थानीय समुदाय की साझेदारी जरूरी है। यदि नई स्कूल मैनेजमेंट कमेटियां इस साझेदारी को मजबूत कर पाती हैं, तो यह सरकारी स्कूलों के लिए नई शुरुआत साबित हो सकती है। लेकिन अगर यह पहल भी केवल फाइलों और बैठकों तक सीमित रह गई, तो सरकारी स्कूलों से लोगों का टूटता भरोसा वापस लाना और मुश्किल हो जाएगा।
भारत में शिक्षा हमेशा केवल पढ़ाई का माध्यम नहीं रही, बल्कि सामाजिक बदलाव और आर्थिक प्रगति की सबसे बड़ी ताकत मानी गई है। किसी भी देश का भविष्य उसकी शिक्षा व्यवस्था से तय होता है। लेकिन आज भारत के स्कूली शिक्षा सिस्टम में जो बदलाव दिखाई दे रहा है, वह केवल आंकड़ों का बदलाव नहीं, बल्कि समाज की सोच और भरोसे में आए बड़े परिवर्तन का संकेत है।
नीति आयोग की हालिया रिपोर्ट बताती है कि पिछले दो दशकों में सरकारी स्कूलों से लोगों का भरोसा तेजी से कम हुआ है। वर्ष 2005 में जहां देश के 71 प्रतिशत बच्चे सरकारी स्कूलों में पढ़ते थे, वहीं अब यह संख्या घटकर करीब 49 प्रतिशत रह गई है। दूसरी ओर प्राइवेट स्कूलों का दायरा लगातार बढ़ रहा है। यह बदलाव केवल शिक्षा का नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक और आर्थिक ढांचे का भी बड़ा संकेत है।
असल सवाल यह है कि क्या लोग सरकारी स्कूलों को छोड़ रहे हैं या वे बेहतर भविष्य खरीदने की कोशिश कर रहे हैं?
आज एक मध्यम वर्गीय परिवार के लिए बच्चे की शिक्षा सबसे बड़ा निवेश बन चुकी है। अभिभावकों को लगता है कि प्राइवेट स्कूल अंग्रेजी माध्यम, बेहतर अनुशासन और नौकरी के ज्यादा अवसर देंगे। यही वजह है कि कम आय वाले परिवार भी अपनी जरूरतों में कटौती करके बच्चों को प्राइवेट स्कूल भेजना पसंद कर रहे हैं। लेकिन समस्या यह है कि शिक्षा अब धीरे-धीरे “सेवा” से ज्यादा “ब्रांड” बनती जा रही है।
रिपोर्ट का सबसे चिंताजनक हिस्सा यह है कि कम फीस वाले कई प्राइवेट स्कूल भी गुणवत्तापूर्ण शिक्षा देने में पीछे हैं। अगर कक्षा 5 का बच्चा कक्षा 2 की किताब नहीं पढ़ पा रहा और साधारण गणित हल नहीं कर पा रहा, तो यह केवल सरकारी स्कूलों की विफलता नहीं, बल्कि पूरे शिक्षा मॉडल पर सवाल है।
आज देश में हजारों ऐसे प्राइवेट स्कूल हैं जहां न तो पर्याप्त शिक्षक हैं, न खेल का मैदान, न साफ पीने का पानी और न ही बच्चों के लिए सुरक्षित माहौल। कई जगह शिक्षकों को बेहद कम वेतन पर रखा जाता है। बिना ट्रेनिंग और नौकरी की सुरक्षा के पढ़ाने वाले शिक्षक आखिर बच्चों को कितनी बेहतर शिक्षा दे पाएंगे?
सरकारी स्कूलों की स्थिति भी कई जगह गंभीर बनी हुई है। रिपोर्ट के मुताबिक, देश में एक लाख से ज्यादा स्कूल ऐसे हैं जहां केवल एक शिक्षक पूरे स्कूल को संभाल रहा है। सोचिए, एक ही शिक्षक अलग-अलग कक्षाओं के बच्चों को कैसे गुणवत्तापूर्ण पढ़ाई दे सकता है? यह केवल संसाधनों की कमी नहीं, बल्कि नीति और प्रबंधन की भी कमजोरी है।
शिक्षा व्यवस्था की एक और बड़ी चुनौती “समान अवसर” की है। शहरों और गांवों, अमीर और गरीब, डिजिटल और गैर-डिजिटल भारत के बीच की दूरी स्कूलों में साफ दिखाई देती है। जहां बड़े शहरों के निजी स्कूल एआई और स्मार्ट क्लासरूम की बात कर रहे हैं, वहीं कई ग्रामीण स्कूलों में आज भी स्थायी शिक्षक और बुनियादी सुविधाएं नहीं हैं।
सरकार अब कक्षा 3 से आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और कंप्यूटेशनल थिंकिंग पढ़ाने की तैयारी कर रही है। यह कदम भविष्य की जरूरतों को देखते हुए जरूरी भी है। लेकिन सवाल यह है कि क्या हमारे स्कूल इसके लिए तैयार हैं? जिन स्कूलों में बिजली, इंटरनेट और प्रशिक्षित शिक्षक तक नहीं हैं, वहां एआई शिक्षा लागू करना आसान नहीं होगा।
भारत की शिक्षा व्यवस्था को केवल नए विषयों की नहीं, बल्कि मजबूत नींव की जरूरत है। अगर शुरुआती कक्षाओं में बच्चे पढ़ना, लिखना और समझना ही ठीक से नहीं सीख पाएंगे, तो तकनीकी शिक्षा का फायदा सीमित रह जाएगा।
यह भी सच है कि केवल सरकारी या प्राइवेट स्कूल की बहस से समस्या हल नहीं होगी। असली मुद्दा गुणवत्ता, जवाबदेही और समान अवसर का है। शिक्षा को बाजार के भरोसे छोड़ देना भी खतरनाक हो सकता है और सरकारी सिस्टम को बिना सुधार के चलाना भी।
आज जरूरत इस बात की है कि सरकार सरकारी स्कूलों की गुणवत्ता सुधारने पर गंभीरता से काम करे। शिक्षकों की भर्ती, ट्रेनिंग, डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर और स्कूल प्रबंधन में बड़े सुधार की जरूरत है। साथ ही प्राइवेट स्कूलों के लिए भी मजबूत रेगुलेशन जरूरी है, ताकि शिक्षा केवल कमाई का साधन न बन जाए।
भारत दुनिया की सबसे युवा आबादी वाला देश बनने की ओर बढ़ रहा है। ऐसे में स्कूलों की गुणवत्ता केवल शिक्षा का मुद्दा नहीं, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था, रोजगार और सामाजिक बराबरी का भी सवाल है। अगर आज शिक्षा की बुनियाद मजबूत नहीं की गई, तो आने वाले वर्षों में इसका असर पूरे देश के विकास पर दिखाई देगा।
भारत में लड़कियों की शिक्षा को लेकर दशकों से जो बहस चलती रही—“बराबरी कब आएगी?”—उसका जवाब अब धीरे-धीरे सामने आने लगा है। राष्ट्रीय सांख्यिकी कार्यालय (NSO) की हालिया रिपोर्ट “Women and Men in India 2025” सिर्फ आंकड़ों का दस्तावेज नहीं, बल्कि बदलते भारत की एक सामाजिक कहानी भी है। यह कहानी बताती है कि पढ़ाई के मैदान में बेटियां अब सिर्फ बराबरी नहीं कर रहीं, बल्कि कई मोर्चों पर आगे निकल चुकी हैं।
स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक लड़कियों की बढ़ती मौजूदगी इस बदलाव का सबसे बड़ा संकेत है। प्राथमिक से लेकर उच्च माध्यमिक स्तर तक नामांकन में लड़कियां लड़कों से आगे हैं। यह बदलाव अचानक नहीं आया है। इसमें नई शिक्षा नीति, सरकारी योजनाओं और समाज की बदलती सोच—तीनों की भूमिका है। खास बात यह है कि सिर्फ दाखिले ही नहीं बढ़े, बल्कि ड्रॉपआउट दर में भी गिरावट आई है। यानी बेटियां अब स्कूल तक पहुंच ही नहीं रहीं, बल्कि पढ़ाई जारी भी रख रही हैं।
लेकिन इस कहानी का एक और अहम पहलू है—पीढ़ी का फर्क। जहां कुल साक्षरता में अभी भी पुरुषों और महिलाओं के बीच लगभग 14 प्रतिशत का अंतर है, वहीं 15 से 24 साल की उम्र के युवाओं में यह अंतर घटकर महज 3.8 प्रतिशत रह गया है। इसका मतलब साफ है कि नई पीढ़ी में लैंगिक असमानता तेजी से कम हो रही है। 1981 में जहां महिला साक्षरता 30 प्रतिशत के आसपास थी, आज वह 70 प्रतिशत से ऊपर पहुंच चुकी है। यह सिर्फ प्रगति नहीं, बल्कि एक सामाजिक बदलाव का संकेत है।
उच्च शिक्षा में भी तस्वीर उत्साहजनक है। कॉलेजों और विश्वविद्यालयों में लड़कियों का ग्रॉस एनरोलमेंट रेशियो लड़कों से ज्यादा हो गया है। कुल पास होने वाले छात्रों में आधे से अधिक महिलाएं हैं, और एमफिल जैसे उच्च स्तर पर तो उनकी हिस्सेदारी 70 प्रतिशत से भी ज्यादा है। यह दिखाता है कि अब लड़कियां सिर्फ पढ़ाई कर ही नहीं रहीं, बल्कि उसमें उत्कृष्ट प्रदर्शन भी कर रही हैं।
फिर भी, यह बदलाव पूरी तरह संतुलित नहीं है। विषयों के चयन में अब भी एक स्पष्ट अंतर दिखता है। आर्ट्स, साइंस, सोशल साइंस और मेडिकल क्षेत्रों में लड़कियों की भागीदारी अधिक है, लेकिन इंजीनियरिंग, टेक्नोलॉजी, आईटी और मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में लड़के अभी भी आगे हैं। यह अंतर केवल पसंद का नहीं, बल्कि सामाजिक धारणा और अवसरों की असमानता का भी परिणाम है।
इसके अलावा, पढ़ाई के औसत वर्षों और खर्च में भी फर्क बना हुआ है। लड़कियों की औसत पढ़ाई लड़कों से एक साल कम है और उन पर खर्च भी कम किया जाता है। यह बताता है कि जमीनी स्तर पर अभी भी कई परिवारों में बेटियों की शिक्षा को लेकर प्राथमिकता उतनी मजबूत नहीं है जितनी होनी चाहिए।
यही वह बिंदु है जहां हमें ठहरकर सोचने की जरूरत है। क्या हम सिर्फ आंकड़ों से संतुष्ट हो सकते हैं? या हमें इस बदलाव को और गहरा और स्थायी बनाने की दिशा में काम करना होगा?
आज जब भारत तेजी से डिजिटल और तकनीकी अर्थव्यवस्था की ओर बढ़ रहा है, तब यह जरूरी है कि लड़कियां भी उन क्षेत्रों में बराबरी से भागीदारी करें जो भविष्य को तय करेंगे। अगर इंजीनियरिंग, एआई, डेटा साइंस और टेक्नोलॉजी जैसे क्षेत्रों में उनकी हिस्सेदारी नहीं बढ़ती, तो यह प्रगति अधूरी रह जाएगी।
सकारात्मक पक्ष यह है कि दिशा सही है। समाज की सोच बदल रही है, नीतियां असर दिखा रही हैं और बेटियां खुद अपनी पहचान बना रही हैं। लेकिन असली चुनौती अब इस रफ्तार को बनाए रखने और इसे हर वर्ग, हर क्षेत्र और हर विषय तक पहुंचाने की है।
यह बदलाव सिर्फ शिक्षा का नहीं, बल्कि भारत के सामाजिक और आर्थिक भविष्य का भी है। क्योंकि जब बेटियां पढ़ती हैं, तो सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि पूरा समाज आगे बढ़ता है।
भारत में ऑनलाइन उच्च शिक्षा का तेजी से बढ़ता दायरा केवल एक शैक्षणिक बदलाव नहीं, बल्कि सामाजिक और आर्थिक परिवर्तन का संकेत भी है। ट्रेनिंग्स कार्ट (TrainingsKart) के हालिया आकलन के अनुसार, यह क्षेत्र 2030 तक तेज़ रफ्तार से विस्तार करेगा। लेकिन असली सवाल यह है कि क्या यह विस्तार गुणवत्ता, भरोसे और समान अवसरों के साथ आगे बढ़ पाएगा?
पिछले कुछ वर्षों में शिक्षा के प्रति भारतीयों का नजरिया बदला है। अब डिग्री केवल कागज का प्रमाण नहीं, बल्कि रोजगार और कौशल से जुड़ी जरूरत बन गई है। हिमांशु राय जैसे शिक्षाविद मानते हैं कि उच्च शिक्षा एक संरचनात्मक बदलाव से गुजर रही है, जहां ऑनलाइन डिग्री की मांग लगातार बढ़ रही है। यह मांग इस बात का प्रमाण है कि छात्र और पेशेवर अब पारंपरिक कक्षा की सीमाओं से बाहर निकलना चाहते हैं।
इस बदलाव को मजबूती देने में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी University Grants Commission (UGC) की भूमिका अहम रही है। ऑनलाइन डिग्री को पारंपरिक डिग्री के बराबर मान्यता देने से छात्रों का भरोसा बढ़ा है। लेकिन केवल मान्यता देना ही पर्याप्त नहीं है। असली चुनौती यह सुनिश्चित करने की है कि ऑनलाइन माध्यम में शिक्षा की गुणवत्ता और मूल्यांकन की सख्ती बनी रहे।
यहां एक बड़ा सवाल उभरता है—क्या सभी संस्थान इस बदलाव के लिए तैयार हैं? पंकज मित्तल का कहना है कि देश में कुछ संस्थान डिजिटल शिक्षा में आगे हैं, लेकिन पूरे सिस्टम में समान तैयारी नहीं है। यह असमानता आने वाले समय में शिक्षा की गुणवत्ता को प्रभावित कर सकती है।
ऑनलाइन MBA जैसे कोर्सेज की बढ़ती लोकप्रियता यह दिखाती है कि छात्र अब सीधे करियर से जुड़े विकल्पों को प्राथमिकता दे रहे हैं। बेंगलुरु, दिल्ली और मुंबई जैसे शहरों में काम करने वाले पेशेवर, जो तेज़ प्रतिस्पर्धा में खुद को बनाए रखना चाहते हैं, ऑनलाइन डिग्री को एक व्यावहारिक समाधान के रूप में देख रहे हैं।
ऑनलाइन शिक्षा का सबसे बड़ा लाभ इसका लचीलापन और कम लागत है। यह उन लोगों के लिए नए दरवाजे खोल रही है जो पारंपरिक शिक्षा से दूर रह जाते थे—जैसे छोटे शहरों के छात्र, गृहिणियां या मिड-करियर प्रोफेशनल्स। यह पहलू राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (National Education Policy 2020) के उस लक्ष्य से मेल खाता है, जिसमें शिक्षा को अधिक समावेशी और कौशल-आधारित बनाने की बात कही गई है।
लेकिन इस तस्वीर का दूसरा पहलू भी उतना ही महत्वपूर्ण है। डिजिटल डिवाइड आज भी एक बड़ी चुनौती है। ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट और उपकरणों की कमी के कारण ऑनलाइन शिक्षा का लाभ सभी तक समान रूप से नहीं पहुंच पा रहा। इसके अलावा, कोर्स की गुणवत्ता में असमानता और मूल्यांकन की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठते रहे हैं।
एक और चिंता यह है कि कहीं ऑनलाइन शिक्षा केवल ‘आसान डिग्री’ का माध्यम बनकर न रह जाए। अगर मूल्यांकन में सख्ती नहीं रही, तो डिग्री की विश्वसनीयता प्रभावित हो सकती है। ऐसे में विश्वविद्यालयों और नियामक संस्थाओं को तकनीक का उपयोग करते हुए पारदर्शी और मजबूत मूल्यांकन प्रणाली विकसित करनी होगी।
यह भी साफ है कि ऑनलाइन शिक्षा का भविष्य केवल तकनीक पर निर्भर नहीं करेगा। असली चुनौती शिक्षण पद्धति को बदलने की है। केवल डिजिटल प्लेटफॉर्म अपनाना काफी नहीं, बल्कि यह समझना जरूरी है कि ऑनलाइन माध्यम में छात्रों को प्रभावी तरीके से कैसे पढ़ाया जाए और उनसे जुड़ाव कैसे बनाए रखा जाए।
भारत का ऑनलाइन उच्च शिक्षा क्षेत्र एक महत्वपूर्ण मोड़ पर खड़ा है। यह न केवल शिक्षा के अवसरों को बढ़ा रहा है, बल्कि कौशल-आधारित सीखने की दिशा में भी देश को आगे ले जा रहा है।
लेकिन इस बदलाव को सफल बनाने के लिए संतुलन जरूरी है—तेजी और गुणवत्ता के बीच, पहुंच और विश्वसनीयता के बीच। अगर यह संतुलन साध लिया गया, तो ऑनलाइन शिक्षा भारत के भविष्य को नई दिशा दे सकती है।
क्यों युद्ध, गर्मी, आर्थिक दबाव, प्रवासन, मानसिक तनाव और एआई भारत की उच्च शिक्षा को नया आकार दे रहे हैं
एक समय था जब लोगों को लगता था कि विश्वविद्यालय इतिहास की हलचल से कुछ ऊपर खड़े होते हैं। बाहर आर्थिक मंदी हो, चुनावी लहर हो या सामाजिक अशांति—फिर भी यह कल्पना की जाती थी कि कैंपस के भीतर जीवन अपने शांत और नियमित ढंग से चलता रहेगा। छात्र बैग लेकर कक्षाओं की ओर जाएंगे, प्रोफेसर विचारों पर बहस करेंगे, पुस्तकालय खुले रहेंगे, प्रयोगशालाएँ काम करती रहेंगी और हॉस्टल देर रात तक करियर, सिनेमा, राजनीति और प्रेम पर चर्चाओं से भरे रहेंगे।
यह तस्वीर आज भी विश्वविद्यालयों के ब्रोशर में दिखाई देती है, लेकिन वास्तविकता अब काफी बदल चुकी है।
आज उच्च शिक्षा उस दौर से गुजर रही है जिसे कई विद्वान “पॉलीक्राइसिस” यानी बहु-संकट का समय कहते हैं। इसका मतलब है कि एक नहीं, बल्कि कई संकट एक साथ आ रहे हैं और एक-दूसरे को प्रभावित कर रहे हैं। युद्ध छात्र गतिशीलता को बाधित करता है, वीज़ा प्रतिबंध विश्वविद्यालयों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करते हैं, जलवायु संकट कैंपस बंद करा देता है या कक्षाओं का समय बदल देता है। आवास संकट अंतरराष्ट्रीय शिक्षा नीतियों को प्रभावित करता है, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस पढ़ाने और मूल्यांकन की पारंपरिक पद्धतियों को चुनौती देता है, और मानसिक स्वास्थ्य की समस्याएँ सीखने की क्षमता को धीरे-धीरे कमजोर करती हैं।
अब ये समस्याएँ अलग-अलग नहीं आतीं। वे टकराती हैं, एक-दूसरे को बढ़ाती हैं और कई बार ऐसी प्रतिक्रियाएँ पैदा करती हैं जिनकी पहले कल्पना भी नहीं की गई थी।
इसी कारण आज उच्च शिक्षा का संकट पहले के संकटों से अलग है। यह सिर्फ पाठ्यक्रम, मान्यता, शिक्षण पद्धति या शिक्षकों की संख्या का मुद्दा नहीं रह गया है। आज के बड़े झटके अक्सर कक्षा के बाहर से आते हैं—वे भू-राजनीतिक, जलवायु, तकनीकी, आर्थिक और मनोवैज्ञानिक होते हैं।
यूरोप में युद्ध कोलकाता के एक मेडिकल छात्र के भविष्य को प्रभावित कर सकता है। पश्चिम एशिया में अस्थिरता लंदन में पढ़ रहे छात्र की हैदराबाद वापसी को महँगा बना सकती है। कनाडा में आवास संकट हजारों भारतीय परिवारों के विदेश में पढ़ाई के सपनों को सीमित कर सकता है। ओडिशा की गर्मी कक्षाओं का समय दोपहर से सुबह करवा सकती है।
भारत के लिए यह कोई दूर की कहानी नहीं है। भारत दुनिया की सबसे बड़ी उच्च शिक्षा प्रणालियों में से एक है। यहाँ युवा आबादी विशाल है और शिक्षा को सामाजिक सम्मान और आगे बढ़ने का प्रमुख रास्ता माना जाता है। साथ ही भारत का संबंध वैश्विक प्रवासन, खाड़ी देशों से आने वाले धन, पश्चिमी शिक्षा बाजार, जलवायु संकट और डिजिटल परिवर्तन से गहराई से जुड़ा है। इसलिए जब दुनिया अस्थिर होती है, तो भारतीय उच्च शिक्षा उससे अछूती नहीं रहती—उसके झटके तुरंत महसूस होते हैं।
अब वह समय आ गया है जब कक्षा दुनिया से अलग एक सुरक्षित जगह नहीं रही। बल्कि यह वह स्थान बनती जा रही है जहाँ दुनिया की बड़ी दरारें साफ दिखाई देती हैं।
आइवरी टावर का भ्रम टूट चुका है
“आइवरी टावर” शब्द लंबे समय तक विश्वविद्यालयों के लिए इस्तेमाल होता रहा। इसका मतलब था कि विश्वविद्यालय सामान्य जीवन की हलचल से कुछ दूर होते हैं। लेकिन बीसवीं सदी के अधिकांश समय तक विश्वविद्यालयों को वास्तव में एक तरह का संरक्षण मिला हुआ था। सरकारें बदलती थीं, बाजार ऊपर-नीचे होते थे, लेकिन विश्वविद्यालयों को लंबे समय तक स्थिर संस्थान माना जाता था।
आज यह सुरक्षा काफी हद तक खत्म हो चुकी है।
अब विश्वविद्यालय अंतरराष्ट्रीय छात्रों की फीस पर निर्भर हैं, वैश्विक उड़ानों पर छात्रों की आवाजाही निर्भर करती है, डिजिटल प्लेटफॉर्म पढ़ाई को जारी रखते हैं और अंतरराष्ट्रीय राजनीति वीज़ा नीतियों को तय करती है। ऐसे में विश्वविद्यालय सिर्फ एक कैंपस नहीं, बल्कि एक बड़े और अस्थिर वैश्विक नेटवर्क का हिस्सा बन चुके हैं।
इसलिए जब यह नेटवर्क हिलता है, तो विश्वविद्यालय भी हिलते हैं।
जब युद्ध शुरू होता है, तो छात्र भागते हैं
उच्च शिक्षा की असुरक्षा को युद्ध जितनी स्पष्टता से शायद ही कोई और चीज दिखाती हो।
रूस-यूक्रेन युद्ध इसका बड़ा उदाहरण है। युद्ध से पहले यूक्रेन कम लागत में मेडिकल शिक्षा के लिए एक लोकप्रिय गंतव्य बन चुका था। भारत के कई परिवारों के लिए, जो देश में निजी मेडिकल शिक्षा का खर्च नहीं उठा सकते थे, यूक्रेन डॉक्टर बनने का एक वास्तविक रास्ता था।
लेकिन युद्ध शुरू होते ही यह रास्ता अचानक बंद हो गया।
लेक्चर हॉल बंकर बन गए, लैब बंद हो गईं और छात्र सुरक्षित रास्तों की तलाश में सीमाओं की ओर निकल पड़े। भारत के ऑपरेशन गंगा के तहत 22,000 से अधिक भारतीयों को वापस लाया गया, लेकिन असली सवाल उसके बाद शुरू हुआ—जब पढ़ाई का भविष्य ही अनिश्चित हो गया।
पश्चिम बंगाल सहित कई राज्यों ने लौटे छात्रों के लिए वैकल्पिक व्यवस्था करने की कोशिश की। कुछ छात्रों को राज्य के मेडिकल कॉलेजों में अस्थायी रूप से समायोजित किया गया, जबकि अन्य को इंटर्नशिप या प्रैक्टिकल प्रशिक्षण की सुविधा दी गई। लेकिन इस घटना ने एक कठोर सच्चाई सामने रखी—शिक्षा का सपना भी एक नाजुक व्यवस्था पर टिका होता है, जिसे भू-राजनीतिक संकट कभी भी तोड़ सकता है।
जब आसमान बंद होता है, तो शिक्षा के रास्ते भी बंद हो जाते हैं
पश्चिम एशिया में अस्थिरता उच्च शिक्षा को दूसरे तरीके से प्रभावित करती है। यह क्षेत्र वैश्विक विमानन मार्गों और श्रम प्रवासन का प्रमुख केंद्र है।
कई भारतीय छात्र विदेश जाते समय खाड़ी देशों के एयर हब से होकर गुजरते हैं। लेकिन यदि क्षेत्र में सैन्य तनाव बढ़ता है तो उड़ानों को लंबा रास्ता लेना पड़ता है। इससे टिकट की कीमतें अचानक कई गुना बढ़ सकती हैं। कभी 45 हजार रुपये में होने वाली यात्रा 2 लाख रुपये से अधिक की हो सकती है।
इसके अलावा खाड़ी देश भारत के लिए इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि यहाँ से बड़ी मात्रा में धन भारत आता है। भारत हर साल लगभग 130 से 140 अरब डॉलर का रेमिटेंस प्राप्त करता है, जिसका बड़ा हिस्सा खाड़ी देशों से आता है। यह पैसा सिर्फ घर चलाने के लिए नहीं, बल्कि बच्चों की शिक्षा के लिए भी खर्च होता है।
इसलिए अगर खाड़ी देशों में आर्थिक संकट आता है, तो उसका असर सीधे भारत में शिक्षा पर पड़ सकता है।
पश्चिम अब हमेशा स्थिर विकल्प नहीं रहा
लंबे समय तक भारतीय मध्यम वर्ग के लिए विदेश में पढ़ाई का मतलब अमेरिका, ब्रिटेन, कनाडा या ऑस्ट्रेलिया था। इन देशों को स्थिर और प्रतिष्ठित माना जाता था।
लेकिन अब यह स्थिति बदल रही है।
ब्रेक्सिट के बाद ब्रिटेन में यूरोपीय छात्रों की संख्या घटी। कनाडा ने आवास संकट के कारण अंतरराष्ट्रीय छात्रों पर सीमा लगा दी। अमेरिका में कम जन्म दर के कारण कॉलेजों को घरेलू छात्रों की संख्या घटने का सामना करना पड़ रहा है।
इन बदलावों ने भारतीय परिवारों को यह एहसास कराया है कि विदेश में पढ़ाई का सपना अब पहले जितना स्थिर नहीं रहा।
जलवायु परिवर्तन अब टाइमटेबल तय कर रहा है
कई सालों तक जलवायु परिवर्तन विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का विषय था। अब यह संचालन की वास्तविक चुनौती बन चुका है।
2024 में यूनिसेफ के अनुसार जलवायु से जुड़ी घटनाओं के कारण दुनिया भर में 24 करोड़ से अधिक छात्रों की पढ़ाई प्रभावित हुई। भारत में भी इसका असर साफ दिख रहा है।
ओडिशा जैसे राज्यों में भीषण गर्मी के कारण संस्थानों को कक्षाओं और परीक्षाओं का समय सुबह करने के निर्देश दिए गए। यह सिर्फ प्रशासनिक बदलाव नहीं है, बल्कि संकेत है कि पर्यावरण अब शिक्षा की संरचना को प्रभावित कर रहा है।
सबसे शांत संकट: मानसिक स्वास्थ्य
कुछ संकट विस्फोट के साथ आते हैं, जबकि कुछ चुपचाप फैलते हैं। मानसिक स्वास्थ्य ऐसा ही संकट है।
कई छात्र आर्थिक दबाव, सोशल मीडिया तुलना, नौकरी की अनिश्चितता और जलवायु चिंता जैसे कई तनावों के साथ विश्वविद्यालय में प्रवेश करते हैं। महामारी के बाद यह दबाव और बढ़ गया है।
जब छात्र और शिक्षक दोनों ही मानसिक दबाव में होते हैं, तो इसका असर सीखने की गुणवत्ता पर पड़ता है। ध्यान कम होता है, आत्मविश्वास घटता है और पढ़ाई की गहराई प्रभावित होती है।
इसलिए मानसिक स्वास्थ्य अब शिक्षा की गुणवत्ता से अलग विषय नहीं रहा।
कक्षा के भीतर एआई का तूफान
इसी बीच आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस ने उच्च शिक्षा को एक नई चुनौती दी है।
अगर कोई टूल कुछ सेकंड में निबंध, कोड या शोध का मसौदा लिख सकता है, तो असाइनमेंट का मूल्यांकन कैसे किया जाए? क्या यह ज्ञान की परीक्षा है, लेखन कौशल की या तकनीक के उपयोग की?
भारत जैसे बड़े शिक्षा तंत्र में यह सवाल और भी जटिल हो जाता है। हालांकि एआई खतरे के साथ अवसर भी लाता है—जैसे अनुवाद, व्यक्तिगत सीखने में सहायता और बड़े पैमाने पर शिक्षण समर्थन।
लेकिन इसके लिए शिक्षण पद्धतियों को तेजी से बदलना होगा।
भारत के सामने अवसर और परीक्षा
दुनिया में उच्च शिक्षा का नक्शा बदल रहा है। कई पश्चिमी देशों में छात्र संख्या घट रही है, जबकि भारत के पास बड़ी युवा आबादी है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 भारत को अधिक अंतरराष्ट्रीय और बहुविषयक शिक्षा प्रणाली बनाने की कल्पना करती है। भारत 2030 तक अधिक विदेशी छात्रों को आकर्षित करना चाहता है।
लेकिन इसके लिए सिर्फ महत्वाकांक्षा काफी नहीं है। विश्वविद्यालयों को संकट के समय भी भरोसेमंद साबित होना होगा—चाहे वह जलवायु संकट हो, युद्ध हो या तकनीकी बदलाव।
भविष्य का विश्वविद्यालय
इस दशक का सबसे बड़ा सबक स्पष्ट है—भविष्य का विश्वविद्यालय सिर्फ सामान्य परिस्थितियों के लिए नहीं बनाया जा सकता। उसे बाधाओं और संकटों के बीच भी काम करने के लिए तैयार होना होगा।
ऐसा विश्वविद्यालय जिसे संकट के समय भी पढ़ाई जारी रखने की क्षमता हो, मजबूत डिजिटल प्रणाली हो, मानसिक स्वास्थ्य समर्थन हो, जलवायु-सुरक्षित बुनियादी ढाँचा हो और एआई के उपयोग के लिए स्पष्ट नीति हो।
सबसे महत्वपूर्ण बात—विश्वास।
आज छात्र और अभिभावक सिर्फ रैंकिंग नहीं देखते, बल्कि यह भी देखते हैं कि संकट के समय संस्थान कैसा व्यवहार करता है।
अंतिम सच्चाई
आज उच्च शिक्षा का संकट एक कहानी नहीं है, बल्कि कई कहानियों का संगम है।
यह यूक्रेन में पढ़ रहे भारतीय छात्रों की कहानी है, यह खाड़ी देशों से आने वाले पैसे पर निर्भर परिवारों की कहानी है, यह कनाडा के आवास संकट से बदलते छात्र विकल्पों की कहानी है, यह ओडिशा की गर्मी से बदलते टाइमटेबल की कहानी है, और यह उस छात्र की कहानी है जो कक्षा में शांत दिखता है लेकिन भीतर से संघर्ष कर रहा होता है।
आज विश्वविद्यालय इतिहास से बाहर नहीं हैं। वे उसी के बीच खड़े हैं।
और अब उच्च शिक्षा की असली परीक्षा यह नहीं है कि वह शांति के समय कितनी चमकती है, बल्कि यह है कि उथल-पुथल के समय भी क्या वह सीखने की रोशनी जलाए रख सकती है।
(लेखक एडइनबॉक्स के चीफ मेंटर हैं और कोलकाता स्थित टेक्नो इंडिया ग्रुप के साथ निदेशक के रूप में कार्यरत हैं, साथ ही समूह की कोलकाता आधारित यूनिवर्सिटी के प्रमुख सलाहकार भी हैं।)
भारत की उच्च शिक्षा व्यवस्था लंबे समय से एक बड़े बदलाव के दौर से गुजर रही है। नई नीतियां, डिजिटल शिक्षा का विस्तार और अंतरराष्ट्रीय सहयोग—ये सभी संकेत देते हैं कि भारत अब अपनी शिक्षा प्रणाली को वैश्विक स्तर पर स्थापित करने की दिशा में गंभीरता से आगे बढ़ रहा है। हाल ही में केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने जिस तरह भारतीय उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण पर जोर दिया है, उससे यह बहस और तेज हो गई है कि क्या भारत सचमुच वैश्विक ज्ञान व्यवस्था में एक बड़ी भूमिका निभाने के लिए तैयार है।
भारत की शिक्षा परंपरा सदियों पुरानी है। नालंदा यूनिवर्सिटी और तक्षशिला जैसे संस्थानों ने कभी दुनिया भर के छात्रों को आकर्षित किया था। लेकिन आधुनिक दौर में वैश्विक शिक्षा के मंच पर भारत की उपस्थिति उतनी प्रभावशाली नहीं रही। अब सरकार और शिक्षा जगत यह मानने लगे हैं कि समय आ गया है जब भारत को अपनी अकादमिक ताकत, शोध क्षमता और ज्ञान परंपरा को अंतरराष्ट्रीय मंच पर मजबूती से पेश करना चाहिए।
शिक्षा मंत्री का तर्क है कि यह लक्ष्य केवल तकनीकी या वैज्ञानिक शोध से हासिल नहीं होगा। भारत को ज्ञान महाशक्ति बनने के लिए विज्ञान और समाज विज्ञान दोनों को साथ लेकर चलना होगा। अक्सर यह देखा गया है कि वैज्ञानिक शोध जब समाज की वास्तविक जरूरतों से जुड़ता है, तभी उसका असर व्यापक होता है। तकनीकी नवाचार और सामाजिक समझ के बीच तालमेल ही किसी देश को स्थायी प्रगति की ओर ले जाता है।
दिलचस्प बात यह है कि दुनिया के कई प्रतिष्ठित विश्वविद्यालय अब भारत को केवल आईटी या तकनीक के नजरिये से नहीं देख रहे। वे भारतीय समाज, लोकतंत्र, इतिहास और अर्थव्यवस्था को समझने में भी गहरी दिलचस्पी दिखा रहे हैं। दुनिया की सबसे बड़ी आबादी और तेजी से उभरती अर्थव्यवस्था होने के कारण भारत वैश्विक शोध के लिए एक बड़ा विषय बन चुका है। ऐसे में भारतीय समाज विज्ञान की भूमिका और भी अहम हो जाती है।
इसी संदर्भ में Tata Institute of Social Sciences द्वारा प्रस्तावित ‘TISS-Global’ जैसी पहल को महत्वपूर्ण माना जा रहा है। इसका उद्देश्य दुनिया भर के उन विद्वानों को एक मंच पर लाना है जो भारत से जुड़े विषयों पर शोध कर रहे हैं। यह पहल अगर सही दिशा में आगे बढ़ती है तो भारतीय समाज, अर्थव्यवस्था और विकास मॉडल पर अधिक संतुलित और व्यापक विमर्श को बढ़ावा मिल सकता है।
हालांकि अंतरराष्ट्रीयकरण की इस प्रक्रिया के साथ कुछ चुनौतियां भी जुड़ी हैं। भारत में विदेशी विश्वविद्यालयों के लिए दरवाजे खोलने की चर्चा लंबे समय से चल रही है। इससे भारतीय छात्रों को वैश्विक स्तर की शिक्षा और शोध का अवसर मिल सकता है। लेकिन यह भी जरूरी है कि इस प्रक्रिया में भारतीय विश्वविद्यालयों की पहचान और स्वायत्तता कमजोर न पड़े। अंतरराष्ट्रीय सहयोग तभी सार्थक होगा, जब वह बराबरी और ज्ञान के साझे आदान-प्रदान पर आधारित हो।
एक और अहम सवाल यह भी है कि क्या भारत केवल विदेशी विश्वविद्यालयों को अपने यहां बुलाने तक सीमित रहेगा, या फिर खुद भी वैश्विक शिक्षा के विस्तार की दिशा में कदम बढ़ाएगा। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका जैसे क्षेत्रों में अपने शिक्षा संस्थान स्थापित करने चाहिए। इससे भारतीय ज्ञान परंपरा और शोध दृष्टिकोण को वैश्विक मंच पर नई पहचान मिल सकती है।
आज की दुनिया में प्रतिस्पर्धा केवल आर्थिक ताकत की नहीं है। ज्ञान, विचार और शोध की दुनिया में भी देशों के बीच एक तरह की वैचारिक प्रतिस्पर्धा चल रही है। हर देश चाहता है कि उसकी विकास यात्रा और अनुभव वैश्विक विमर्श का हिस्सा बनें। भारत भी अब उसी दिशा में आगे बढ़ रहा है।
भारत की युवा आबादी इसकी सबसे बड़ी ताकत है। अगर उन्हें गुणवत्तापूर्ण शिक्षा, बेहतर शोध सुविधाएं और अंतरराष्ट्रीय एक्सपोज़र मिलता है, तो भारत आने वाले वर्षों में ज्ञान और नवाचार की दुनिया में एक मजबूत स्थान बना सकता है। लेकिन इसके लिए केवल नीतिगत घोषणाएं पर्याप्त नहीं होंगी। विश्वविद्यालयों की गुणवत्ता, शोध संस्कृति और अकादमिक स्वतंत्रता को भी उतनी ही गंभीरता से मजबूत करना होगा।
भारतीय उच्च शिक्षा के अंतरराष्ट्रीयकरण की चर्चा दरअसल एक बड़े सवाल से जुड़ी है—क्या भारत दुनिया को केवल तकनीकी कौशल ही देगा, या फिर विचार, ज्ञान और बौद्धिक विमर्श का भी एक महत्वपूर्ण केंद्र बनेगा। अगर यह संतुलन बन पाया, तो आने वाले वर्षों में भारत सचमुच वैश्विक ज्ञान शक्ति के रूप में उभर सकता है।
भारत में लंबे समय तक छात्रों के बीच यह धारणा बनी रही कि उन्हें पढ़ाई के दौरान दो अलग-अलग रास्तों में से एक चुनना होगा — बायोलॉजी या टेक्नोलॉजी। 10वीं के बाद PCB (फिजिक्स, केमिस्ट्री, बायोलॉजी) लेने वाले छात्रों के लिए आमतौर पर डॉक्टर, डेंटिस्ट, फार्मासिस्ट या रिसर्चर बनने का रास्ता ही सबसे उपयुक्त माना जाता था। वहीं, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) और कोडिंग को केवल इंजीनियरिंग या कंप्यूटर साइंस के छात्रों का क्षेत्र समझा जाता था।
हालांकि अब यह सोच तेजी से बदल रही है। आज AI और हेल्थकेयर का मेल दुनिया के सबसे तेजी से बढ़ते करियर क्षेत्रों में शामिल हो चुका है। अस्पताल, रिसर्च संस्थान, फार्मा कंपनियां और हेल्थ स्टार्टअप्स अब बीमारी की पहचान, मेडिकल इमेजिंग, मरीजों की देखभाल, दवा खोज और रोगों की भविष्यवाणी जैसे कामों में AI का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में छात्रों के सामने बड़ा सवाल है कि क्या बायोलॉजी के छात्र AI और हेल्थकेयर दोनों क्षेत्रों में आगे बढ़ सकते हैं?
इसका जवाब है — हां। और ऐसे प्रोफेशनल्स की मांग तेजी से बढ़ रही है।
क्यों बढ़ रहा है AI और हेल्थकेयर का कनेक्शन
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस अब केवल रोबोट या कोडिंग तक सीमित नहीं रह गया है। हेल्थकेयर सेक्टर में AI डॉक्टरों को मेडिकल स्कैन समझने, बीमारियों की पहचान करने, मरीजों के रिकॉर्ड व्यवस्थित करने और रिसर्च में मदद करने में सहायक बन रहा है।
आज AI आधारित तकनीकों का इस्तेमाल इन क्षेत्रों में हो रहा है:
- मेडिकल इमेजिंग
- कैंसर डिटेक्शन
- दवा विकास
- हॉस्पिटल मैनेजमेंट
- डिजिटल हेल्थ मॉनिटरिंग
- प्रेडिक्टिव हेल्थकेयर सिस्टम
जैसे-जैसे अस्पताल और हेल्थकेयर संस्थान डिजिटल तकनीकों को अपना रहे हैं, वैसे-वैसे ऐसे प्रोफेशनल्स की जरूरत बढ़ रही है जो हेल्थकेयर और टेक्नोलॉजी दोनों की समझ रखते हों।
बायोलॉजी के छात्रों के लिए यह खास अवसर है, क्योंकि उन्हें पहले से ही मानव शरीर, बीमारियों, हेल्थ सिस्टम और मेडिकल टर्मिनोलॉजी की जानकारी होती है। यदि इसके साथ तकनीकी स्किल्स भी जुड़ जाएं, तो वे हेल्थ टेक इंडस्ट्री में मजबूत करियर बना सकते हैं।
क्या PCB छात्र AI सीख सकते हैं?
भारतीय छात्रों के बीच एक बड़ी गलतफहमी यह है कि AI केवल वही छात्र सीख सकते हैं जिनकी गणित या कंप्यूटर साइंस में मजबूत पकड़ हो। जबकि आज कई बायोलॉजी छात्र भी हेल्थ टेक्नोलॉजी और AI आधारित क्षेत्रों में सफल करियर बना रहे हैं।
वर्तमान में कई यूनिवर्सिटी और ऑनलाइन प्लेटफॉर्म हेल्थकेयर एनालिटिक्स, बायोइन्फॉर्मेटिक्स, डिजिटल हेल्थ और मेडिकल AI एप्लिकेशन जैसे कोर्स ऑफर कर रहे हैं। इनमें छात्रों को बेसिक डेटा एनालिसिस, हेल्थकेयर सॉफ्टवेयर और शुरुआती प्रोग्रामिंग कॉन्सेप्ट्स सिखाए जाते हैं।
इसका मतलब यह नहीं कि हर छात्र को सॉफ्टवेयर इंजीनियर बनना होगा। बल्कि छात्रों को यह समझाया जाता है कि तकनीक का इस्तेमाल हेल्थ से जुड़ी समस्याओं को बेहतर तरीके से हल करने में कैसे किया जा सकता है।
कैसे बदल रहे हैं AI और हेल्थकेयर करियर
AI और हेल्थकेयर का मेल ऐसे नए करियर विकल्प तैयार कर रहा है, जो कुछ साल पहले तक लगभग मौजूद ही नहीं थे। अब हेल्थकेयर कंपनियों को ऐसे लोगों की जरूरत है जो मरीजों की देखभाल के साथ डिजिटल हेल्थ सिस्टम को भी समझते हों।
उभरते करियर क्षेत्र
हेल्थकेयर एनालिटिक्स: मरीजों और अस्पताल के डेटा का विश्लेषण कर बेहतर फैसले लेने में मदद करता है।
बायोइन्फॉर्मेटिक्स: बायोलॉजी को डेटा और कंप्यूटेशनल एनालिसिस के साथ जोड़ता है।
AI-असिस्टेड डायग्नोस्टिक्स: बीमारी की पहचान और मेडिकल इमेजिंग में सहायता करता है।
डिजिटल हेल्थकेयर: तकनीक के जरिए हेल्थ सिस्टम को अधिक बेहतर और प्रभावी बनाता है।
यह बदलाव छात्रों की सोच को भी प्रभावित कर रहा है। पहले कई बायोलॉजी छात्रों को लगता था कि डॉक्टर बनना ही सबसे सम्मानजनक करियर विकल्प है। लेकिन अब टेक्नोलॉजी की मदद से मेडिकल सेक्टर में नए और आधुनिक करियर तेजी से उभर रहे हैं।
भारतीय छात्र क्यों दिखा रहे हैं रुचि
आज के छात्र ऐसे करियर चाहते हैं जिनमें भविष्य की संभावनाएं, इनोवेशन, लचीलापन और समाज पर सकारात्मक प्रभाव हो। AI और हेल्थकेयर का क्षेत्र इन सभी पहलुओं को साथ लेकर चलता है।
कई छात्रों के लिए यह ऐसा मौका है जहां वे हेल्थ सेक्टर से जुड़े रहते हुए नई टेक्नोलॉजी आधारित नौकरियों में भी आगे बढ़ सकते हैं। यह साइंस, हेल्थकेयर, रिसर्च और प्रॉब्लम सॉल्विंग का आधुनिक मिश्रण बन चुका है।
शैक्षणिक संस्थान भी अब इंटरडिसिप्लिनरी हेल्थकेयर प्रोग्राम्स पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं, क्योंकि हेल्थ सिस्टम तेजी से टेक्नोलॉजी आधारित बनते जा रहे हैं।
भारत में AI और हेल्थकेयर का भविष्य
आने वाले समय में भारत का हेल्थकेयर सिस्टम और अधिक डिजिटल होने वाला है। अस्पतालों, फार्मा कंपनियों, डायग्नोस्टिक सेंटरों और हेल्थ स्टार्टअप्स में AI आधारित तकनीकों का इस्तेमाल लगातार बढ़ रहा है।
जैसे-जैसे यह बदलाव आगे बढ़ेगा, वैसे-वैसे ऐसे प्रोफेशनल्स की मांग भी बढ़ेगी जो हेल्थकेयर और टेक्नोलॉजी दोनों की समझ रखते हों। भविष्य का हेल्थकेयर केवल मेडिकल ज्ञान पर नहीं, बल्कि तकनीक के जरिए मरीजों तक बेहतर सेवाएं पहुंचाने की क्षमता पर भी निर्भर करेगा।
यह धारणा अब धीरे-धीरे पुरानी हो रही है कि बायोलॉजी के छात्र टेक्नोलॉजी आधारित करियर नहीं बना सकते।
आज हेल्थकेयर, मेडिकल साइंस, डेटा, रिसर्च और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस एक-दूसरे से तेजी से जुड़ रहे हैं। इससे उन छात्रों के लिए नए अवसर बन रहे हैं जो हेल्थकेयर ज्ञान के साथ तकनीकी स्किल्स सीखना चाहते हैं।
भारत के छात्रों के लिए भविष्य अब केवल बायोलॉजी या टेक्नोलॉजी में से एक चुनने तक सीमित नहीं रह गया है। कई बेहतरीन करियर विकल्प अब इन दोनों क्षेत्रों के मेल से तैयार हो रहे हैं।
अगर कभी आपको ऐसा लगा हो कि किसी डिजाइन और उसके कंटेंट का उद्देश्य एक-दूसरे से मेल नहीं खा रहे हैं, तो संभव है कि कम्युनिकेशन डिजाइन आपके लिए सही करियर विकल्प हो। विजुअल्स और मैसेज के बीच सही तालमेल बनाना ही कम्युनिकेशन डिजाइन का मुख्य उद्देश्य होता है।
आज के समय में “What is Communication Design” सर्च करने वाले छात्र केवल किसी क्रिएटिव कोर्स की जानकारी नहीं चाहते, बल्कि वे यह जानना चाहते हैं कि क्या 12वीं के बाद कम्युनिकेशन डिजाइन एक भविष्य सुरक्षित करियर बन सकता है। भारत में डिजिटल मीडिया, ब्रांडिंग, विज्ञापन और ऑनलाइन बिजनेस के तेजी से बढ़ने के साथ 2026 में कम्युनिकेशन डिजाइन सबसे तेजी से उभरते क्रिएटिव करियर विकल्पों में शामिल हो चुका है।
कम्युनिकेशन डिजाइन में क्रिएटिविटी, स्ट्रैटेजी, टेक्नोलॉजी और स्टोरीटेलिंग का मेल होता है। इसका उद्देश्य केवल डिजाइन को आकर्षक बनाना नहीं होता, बल्कि ऐसे विजुअल्स तैयार करना होता है जो किसी ब्रांड का संदेश स्पष्ट तरीके से लोगों तक पहुंचाएं, ऑडियंस को प्रभावित करें और वास्तविक कम्युनिकेशन समस्याओं का समाधान करें।
आसान भाषा में समझें कम्युनिकेशन डिजाइन क्या है
कम्युनिकेशन डिजाइन एक ऐसी प्रक्रिया है जिसमें विजुअल एलिमेंट्स की मदद से किसी संदेश को प्रभावी तरीके से प्रस्तुत किया जाता है। इसमें कई चीजें शामिल होती हैं जैसे:
- ग्राफिक्स
- टाइपोग्राफी
- इलस्ट्रेशन
- ब्रांडिंग
- विज्ञापन कैंपेन
- वेबसाइट डिजाइन
- पैकेजिंग
- डिजिटल कंटेंट
इसका मुख्य उद्देश्य जानकारी को आसान, स्पष्ट और विजुअली आकर्षक बनाना होता है।
एक अच्छा कम्युनिकेशन डिजाइनर बिना उद्देश्य के डिजाइन नहीं बनाता। डिजाइन में इस्तेमाल होने वाला हर रंग, फॉन्ट, इमेज और लेआउट एक खास मकसद के साथ चुना जाता है ताकि वह सही संदेश दे सके। मजबूत कम्युनिकेशन डिजाइन किसी बिजनेस की पहचान बनाने, ग्राहकों को आकर्षित करने और ऑडियंस के साथ भावनात्मक जुड़ाव बनाने में मदद करता है।
कम्युनिकेशन डिजाइन के महत्वपूर्ण तत्व
एक सफल कम्युनिकेशन डिजाइन प्रोजेक्ट में आमतौर पर चार महत्वपूर्ण स्किल्स की जरूरत होती है।
स्ट्रैटेजिक थिंकिंग
डिजाइन तैयार करने से पहले डिजाइनर को ऑडियंस के व्यवहार और कम्युनिकेशन के उद्देश्य को समझना होता है।
क्रिएटिविटी और डिजाइन स्किल्स
क्रिएटिविटी की मदद से विचारों को आकर्षक और अर्थपूर्ण विजुअल कॉन्सेप्ट में बदला जाता है।
प्रॉब्लम सॉल्विंग एबिलिटी
कम्युनिकेशन डिजाइन केवल कला तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य बिजनेस और कम्युनिकेशन से जुड़ी समस्याओं का समाधान करना भी होता है।
टेक्निकल नॉलेज
डिजाइनर प्रोफेशनल डिजाइन तैयार करने के लिए Adobe Photoshop, Illustrator, InDesign, Figma और Motion Graphics जैसे टूल्स का इस्तेमाल करते हैं।
कम्युनिकेशन डिजाइन के प्रकार
कम्युनिकेशन डिजाइन एक बड़ा क्षेत्र है जिसमें कई स्पेशलाइजेशन मौजूद हैं। छात्र अपनी रुचि के अनुसार अलग-अलग करियर विकल्प चुन सकते हैं।
ग्राफिक डिजाइन
इसमें पोस्टर, सोशल मीडिया क्रिएटिव, पैकेजिंग, वेबसाइट और विजुअल लेआउट डिजाइन किए जाते हैं। यह कम्युनिकेशन डिजाइन का सबसे लोकप्रिय हिस्सा माना जाता है।
टाइपोग्राफी और टाइप डिजाइन
इसमें अक्षरों की स्टाइल और उनकी व्यवस्था पर काम किया जाता है। अच्छी टाइपोग्राफी डिजाइन को अधिक प्रभावशाली और पढ़ने में आसान बनाती है।
ब्रांडिंग और आइडेंटिटी डिजाइन
ब्रांडिंग डिजाइनर लोगो, कलर पैलेट, विजुअल गाइडलाइन और पूरी ब्रांड आइडेंटिटी तैयार करते हैं ताकि कंपनी की अलग पहचान बन सके।
एडवरटाइजिंग डिजाइन
इसमें डिजिटल विज्ञापन, प्रिंट मीडिया, बिलबोर्ड और प्रमोशनल कैंपेन के विजुअल्स तैयार किए जाते हैं।
इलस्ट्रेशन और विजुअल आर्ट
इलस्ट्रेटर पब्लिशिंग, स्टोरीटेलिंग, ब्रांडिंग और एंटरटेनमेंट इंडस्ट्री के लिए कस्टम आर्टवर्क तैयार करते हैं।
भारत में क्यों बढ़ रही है कम्युनिकेशन डिजाइन की मांग
आज लगभग हर उद्योग विजुअल कम्युनिकेशन पर निर्भर हो चुका है। स्टार्टअप्स, फैशन ब्रांड्स, मीडिया कंपनियां और टेक्नोलॉजी फर्म्स सभी को मजबूत विजुअल ब्रांडिंग की जरूरत होती है। यही कारण है कि कम्युनिकेशन डिजाइन प्रोफेशनल्स की मांग तेजी से बढ़ रही है।
कम्युनिकेशन डिजाइन ग्रेजुएट्स इन पदों पर काम कर सकते हैं:
- ग्राफिक डिजाइनर
- ब्रांड स्ट्रैटेजिस्ट
- आर्ट डायरेक्टर
- सोशल मीडिया डिजाइनर
- एडवरटाइजिंग डिजाइनर
- विजुअल कम्युनिकेशन स्पेशलिस्ट
डिजिटल प्लेटफॉर्म्स के विस्तार के साथ आने वाले वर्षों में इस क्षेत्र में और ज्यादा अवसर बनने की संभावना है।
कम्युनिकेशन डिजाइन में सैलरी और करियर स्कोप
आज कई छात्र कम्युनिकेशन डिजाइन कोर्स इसलिए चुन रहे हैं क्योंकि इसमें करियर के कई विकल्प मौजूद हैं। डिजाइनर विज्ञापन एजेंसियों, डिजाइन स्टूडियो, मीडिया हाउस, स्टार्टअप्स, आईटी कंपनियों, फैशन ब्रांड्स और फ्रीलांस इंडस्ट्री में काम कर सकते हैं।
सैलरी कई बातों पर निर्भर करती है जैसे डिजाइन स्किल्स, पोर्टफोलियो, सॉफ्टवेयर एक्सपर्टीज, डिजाइन थिंकिंग और इंडस्ट्री अनुभव। ब्रांडिंग, एडवरटाइजिंग और क्रिएटिव डायरेक्शन में अनुभवी डिजाइनर्स को बेहतर सैलरी के साथ अंतरराष्ट्रीय अवसर भी मिलते हैं।
सही कम्युनिकेशन डिजाइन कोर्स कैसे चुनें
12वीं के बाद कम्युनिकेशन डिजाइन कोर्स करने की योजना बना रहे छात्रों को एडमिशन लेने से पहले कोर्स स्ट्रक्चर की अच्छी तरह जांच करनी चाहिए।
एक अच्छे कम्युनिकेशन डिजाइन कोर्स में आमतौर पर ये विषय शामिल होते हैं:
- ग्राफिक डिजाइन
- टाइपोग्राफी
- ब्रांडिंग
- मोशन ग्राफिक्स
- इलस्ट्रेशन
- डिजिटल डिजाइन
- पोर्टफोलियो डेवलपमेंट
- इंडस्ट्री प्रोजेक्ट्स
इसके अलावा पोर्टफोलियो डेवलपमेंट बेहद महत्वपूर्ण होता है क्योंकि क्रिएटिव इंडस्ट्री में केवल मार्क्स नहीं बल्कि प्रैक्टिकल स्किल्स को ज्यादा महत्व दिया जाता है।
कम्युनिकेशन डिजाइन के लिए जरूरी स्किल्स
कम्युनिकेशन डिजाइन में करियर बनाने के इच्छुक छात्रों को समय के साथ बदलती डिजाइन स्किल्स सीखनी चाहिए। जिस क्षेत्र में आपकी रुचि हो, जैसे फैशन, मीडिया या डिजिटल डिजाइन, उससे जुड़ी स्किल्स पर रिसर्च करें और उसी के अनुसार कोर्स और प्रैक्टिस करें।
इस क्षेत्र में सफल होने के लिए क्रिएटिविटी, विजुअल स्टोरीटेलिंग, कम्युनिकेशन स्किल्स, ऑब्जर्वेशन स्किल्स और बदलते डिजाइन ट्रेंड्स के अनुसार खुद को ढालने की क्षमता बेहद जरूरी होती है। एक मजबूत कम्युनिकेशन डिजाइनर कला और बिजनेस समझ दोनों का संतुलन बनाकर किसी भी ब्रांड की पहचान को आकर्षक बना सकता है।
कम्युनिकेशन डिजाइन का भविष्य
डिजिटल कम्युनिकेशन और ऑनलाइन ब्रांडिंग के बढ़ते दौर में कम्युनिकेशन डिजाइन का महत्व लगातार बढ़ रहा है। अब यह क्षेत्र केवल प्रिंट मीडिया या विज्ञापन एजेंसियों तक सीमित नहीं रह गया है।
आज कम्युनिकेशन डिजाइनर मोबाइल ऐप्स, वेबसाइट्स, सोशल मीडिया कैंपेन, डिजिटल एक्सपीरियंस और ब्रांड स्टोरीटेलिंग के जरिए वैश्विक ऑडियंस तक पहुंच बना रहे हैं।
अगर आप ऐसा करियर चाहते हैं जिसमें क्रिएटिविटी, टेक्नोलॉजी और स्ट्रैटेजी का बेहतरीन मेल हो और भविष्य में लगातार ग्रोथ के अवसर मिलें, तो कम्युनिकेशन डिजाइन भारत के सबसे आकर्षक करियर विकल्पों में से एक बन चुका है। देश की टॉप डिजाइन यूनिवर्सिटीज में AIDAT एंट्रेंस एग्जाम के जरिए एडमिशन लेकर इस क्षेत्र में मजबूत शुरुआत की जा सकती है। फ्री करियर काउंसलिंग के लिए 08035018542 पर संपर्क किया जा सकता है।
भारत में हर साल MBA कोर्स से जुड़ी सर्च और एडमिशन की संख्या यह दिखाती है कि यह आज भी छात्रों के बीच सबसे लोकप्रिय पोस्टग्रेजुएट डिग्री प्रोग्राम में शामिल है। बेहतर सैलरी पैकेज, मैनेजमेंट पदों पर नौकरी, करियर ग्रोथ और बिजनेस सेक्टर में बढ़ते अवसरों के कारण 2026 में भी MBA की मांग तेजी से बढ़ रही है। यही वजह है कि छात्र और कामकाजी प्रोफेशनल्स लगातार यह जानना चाहते हैं कि “क्या 2026 में MBA करना फायदेमंद है?”, “सबसे बेहतर MBA स्पेशलाइजेशन कौन-से हैं?” और “MBA के बाद कितनी सैलरी मिल सकती है?”
MBA यानी Master of Business Administration एक ऐसा प्रोफेशनल कोर्स है, जो छात्रों को बिजनेस मैनेजमेंट, लीडरशिप और रणनीतिक निर्णय लेने की समझ देता है। यह पोस्टग्रेजुएट प्रोग्राम छात्रों को विभिन्न इंडस्ट्री में मैनेजमेंट से जुड़े रोल के लिए तैयार करता है। आज कंपनियों को ऐसे प्रोफेशनल्स की जरूरत है जो बिजनेस स्ट्रेटजी, फाइनेंस, ऑपरेशंस, डेटा एनालिटिक्स और टीम मैनेजमेंट को समझते हों।
MBA कोर्स आमतौर पर दो साल का होता है और इसे फुल टाइम, ऑनलाइन, एग्जीक्यूटिव और डिस्टेंस मोड में किया जा सकता है। इस दौरान छात्रों को केवल थ्योरी नहीं पढ़ाई जाती, बल्कि इंटर्नशिप, प्रोजेक्ट, केस स्टडी और इंडस्ट्री एक्सपोजर के जरिए प्रैक्टिकल अनुभव भी दिया जाता है।
2026 में MBA की बढ़ती लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण करियर ग्रोथ माना जा रहा है। कंपनियां अब उच्च पदों के लिए ऐसे उम्मीदवारों को प्राथमिकता देती हैं जिनके पास मैनेजमेंट और लीडरशिप स्किल हो। MBA ग्रेजुएट्स को मैनेजर, बिजनेस ऑपरेशंस हेड, स्ट्रेटजिक प्लानर, टीम लीडर और क्लाइंट मैनेजमेंट जैसी भूमिकाओं में नौकरी के अवसर मिलते हैं।
इसके अलावा MBA छात्रों की कम्युनिकेशन स्किल, समस्या समाधान क्षमता, विश्लेषणात्मक सोच और निर्णय लेने की क्षमता को भी मजबूत करता है। कई कामकाजी प्रोफेशनल्स तेजी से प्रमोशन और बेहतर सैलरी पाने के लिए भी MBA करना पसंद करते हैं।
सैलरी की बात करें तो भारत में MBA ग्रेजुएट्स की औसत वार्षिक सैलरी लगभग 5 लाख रुपये से 25 लाख रुपये तक हो सकती है। हालांकि यह कॉलेज, स्पेशलाइजेशन, स्किल, अनुभव और प्लेसमेंट पर निर्भर करता है। टॉप बिजनेस स्कूलों से MBA करने वाले छात्रों को इससे भी ज्यादा पैकेज मिल सकते हैं।
MBA के बाद छात्रों के लिए बैंकिंग, फाइनेंस, मार्केटिंग, कंसल्टिंग, हेल्थकेयर, ह्यूमन रिसोर्स, आईटी, ऑपरेशंस और बिजनेस एनालिटिक्स जैसे क्षेत्रों में रोजगार के अच्छे अवसर मौजूद हैं।
भारत में सबसे लोकप्रिय MBA स्पेशलाइजेशन में MBA Finance, MBA Marketing Management, MBA Human Resource Management, MBA Business Analytics, MBA Healthcare Management, MBA International Business, MBA Operations Management, MBA Entrepreneurship और MBA Supply Chain Management शामिल हैं। इनमें बिजनेस एनालिटिक्स, फाइनेंस और मार्केटिंग की मांग सबसे ज्यादा बनी हुई है।
MBA केवल डिग्री तक सीमित नहीं माना जाता, बल्कि यह नेटवर्किंग और इंडस्ट्री कनेक्शन बनाने का भी बड़ा प्लेटफॉर्म है। पढ़ाई के दौरान छात्र इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स, बिजनेस लीडर्स, स्टार्टअप फाउंडर्स और अलग-अलग सेक्टर के प्रोफेशनल्स से जुड़ते हैं। इससे उनका आत्मविश्वास बढ़ता है और प्रोफेशनल नेटवर्क मजबूत होता है।
MBA में प्रवेश के लिए भारत में CAT, XAT, MAT और CMAT जैसी परीक्षाएं लोकप्रिय हैं। हालांकि अब कई छात्र ऐसे एंट्रेंस एग्जाम की तलाश भी कर रहे हैं, जिनमें ज्यादा लचीलापन और आसान प्रक्रिया हो। इसी वजह से Global Management Common Aptitude Test यानी GMCAT छात्रों के बीच एक नया विकल्प बनकर उभर रहा है।
GMCAT एक ऑनलाइन मैनेजमेंट एंट्रेंस एग्जाम है, जिसे BBA और MBA प्रोग्राम में एडमिशन के लिए आयोजित किया जाता है। इसकी सबसे बड़ी खासियत यह है कि छात्र इसे मोबाइल, लैपटॉप या डेस्कटॉप से घर बैठे दे सकते हैं। यह परीक्षा हर महीने आयोजित होती है, जिससे छात्रों को कई मौके मिलते हैं।
परीक्षा में मैनेजमेंट एप्टीट्यूड, लॉजिकल रीजनिंग, वर्बल एबिलिटी और बिजनेस अवेयरनेस से जुड़े प्रश्न पूछे जाते हैं। छात्र-हितैषी पैटर्न के तहत इसमें नेगेटिव मार्किंग नहीं रखी गई है।
विशेषज्ञों का मानना है कि 2026 में भी MBA उन छात्रों के लिए एक मजबूत करियर विकल्प बना रहेगा, जो बिजनेस मैनेजमेंट, लीडरशिप और प्रोफेशनल ग्रोथ के क्षेत्र में आगे बढ़ना चाहते हैं। हालांकि छात्रों को केवल ट्रेंड देखकर MBA नहीं चुनना चाहिए, बल्कि अपनी रुचि, करियर लक्ष्य और सही स्पेशलाइजेशन को ध्यान में रखकर फैसला लेना चाहिए।
तकनीक, AI, डेटा एनालिटिक्स और डिजिटल ट्रांसफॉर्मेशन के तेजी से बढ़ते दौर में मजबूत बिजनेस समझ रखने वाले मैनेजमेंट प्रोफेशनल्स की मांग आने वाले वर्षों में भी बनी रहने की उम्मीद है।
आज के समय में साइबर क्राइम, डिजिटल फ्रॉड और अपराध जांच से जुड़े मामलों में तेजी से बढ़ोतरी हो रही है। ऐसे में फॉरेंसिक साइंस और साइबर फॉरेंसिक जैसे क्षेत्रों में करियर बनाने वाले छात्रों की मांग भी लगातार बढ़ रही है। 12वीं के बाद बड़ी संख्या में छात्र यह जानना चाहते हैं कि फॉरेंसिक साइंस क्या है और AIFSET परीक्षा कैसे दी जाती है।
All India Forensic Science Entrance Test 2026 यानी AIFSET 2026 एक राष्ट्रीय स्तर की ऑनलाइन प्रवेश परीक्षा है। यह परीक्षा उन छात्रों के लिए आयोजित की जाती है जो देशभर की पार्टनर यूनिवर्सिटीज में फॉरेंसिक साइंस और साइबर फॉरेंसिक से जुड़े कोर्स में दाखिला लेना चाहते हैं।
AIFSET के जरिए छात्र बीएससी और एमएससी स्तर के कई प्रोफेशनल कोर्स में प्रवेश ले सकते हैं। इनमें B.Sc. Forensic Science, B.Sc. Cyber Forensic, M.Sc. Forensic Science, M.Sc. Cyber Forensic, M.Sc. DNA Fingerprinting & Profiling, M.Sc. Forensic Psychology और M.Sc. Digital & Cyber Forensic जैसे कोर्स शामिल हैं।
यह परीक्षा पूरी तरह ऑनलाइन मोड में आयोजित की जाती है और इसकी अवधि 60 मिनट होती है। परीक्षा का उद्देश्य छात्रों की साइंस और लॉजिकल समझ को परखना होता है।
AIFSET 2026 के लिए आवेदन करने वाले छात्रों को कुछ बुनियादी योग्यता शर्तें पूरी करनी होंगी। अंडरग्रेजुएट फॉरेंसिक साइंस कोर्स के लिए 12वीं पास या 12वीं की परीक्षा दे रहे छात्र आवेदन कर सकते हैं। वहीं पोस्टग्रेजुएट कोर्स के लिए ग्रेजुएशन पूरा कर चुके छात्र पात्र होंगे।
यह परीक्षा खासतौर पर उन छात्रों के लिए उपयोगी मानी जाती है जो फॉरेंसिक साइंस, साइबर क्राइम इन्वेस्टिगेशन, डिजिटल फॉरेंसिक और क्रिमिनल इन्वेस्टिगेशन जैसे क्षेत्रों में करियर बनाना चाहते हैं।
AIFSET 2026 की महत्वपूर्ण तारीखों की बात करें तो ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन की अंतिम तिथि 5 मई 2026 तय की गई है। परीक्षा 6 मई 2026 को आयोजित होगी, जबकि परिणाम 8 मई 2026 को जारी किए जाएंगे। 2026-27 शैक्षणिक सत्र के लिए आवेदन प्रक्रिया फिलहाल जारी है।
परीक्षा के लिए आवेदन प्रक्रिया पूरी तरह ऑनलाइन रखी गई है। छात्रों को पहले ऑनलाइन रजिस्ट्रेशन करना होगा, फिर घर बैठे ऑनलाइन परीक्षा देनी होगी। इसके बाद रिजल्ट, काउंसलिंग और एडमिशन प्रक्रिया भी ऑनलाइन माध्यम से पूरी की जाएगी। परीक्षा शुल्क से जुड़ी जानकारी के लिए छात्रों को आधिकारिक पोर्टल पर जाकर नवीनतम अपडेट देखने की सलाह दी गई है।
फॉरेंसिक साइंस में करियर की संभावनाएं भी तेजी से बढ़ रही हैं। AIFSET के जरिए चयनित छात्र फॉरेंसिक लैब, साइबर क्राइम यूनिट, डिजिटल फॉरेंसिक कंपनियों, इंटेलिजेंस एजेंसियों, रिसर्च संस्थानों और जांच एजेंसियों में करियर बना सकते हैं। साइबर अपराधों में बढ़ोतरी के कारण देश में फॉरेंसिक एक्सपर्ट्स और डिजिटल इन्वेस्टिगेशन प्रोफेशनल्स की मांग लगातार बढ़ रही है।
परीक्षा की तैयारी कर रहे छात्रों को साइंस के बेसिक कॉन्सेप्ट, लॉजिकल रीजनिंग, मॉक टेस्ट और नियमित रिवीजन पर ज्यादा ध्यान देने की सलाह दी जाती है। विशेषज्ञों के अनुसार, रटने की बजाय कॉन्सेप्ट की मजबूत समझ फॉरेंसिक साइंस प्रवेश परीक्षाओं में ज्यादा मददगार साबित होती है।
AIFSET स्कोर को भारत की 150 से ज्यादा यूनिवर्सिटीज स्वीकार करती हैं। इनमें Vivekananda Global University, IILM University, Silver Oak University, Aurora Deemed to be University और Sandip University जैसे कई संस्थान शामिल हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि आने वाले वर्षों में फॉरेंसिक साइंस और साइबर इन्वेस्टिगेशन का क्षेत्र भारत में तेजी से बढ़ेगा। ऐसे में यह कोर्स उन छात्रों के लिए बेहतर विकल्प बन सकता है जो टेक्नोलॉजी, साइंस और अपराध जांच से जुड़े क्षेत्र में करियर बनाना चाहते हैं।
इस साल कंप्यूटर साइंस एंट्रेंस परीक्षा की तैयारी कर रहे हजारों छात्र एक जैसी गलती कर रहे हैं। वे पुराने पैटर्न के अनुसार तैयारी कर रहे हैं, जबकि विश्वविद्यालय अब अपनी अपेक्षाओं को धीरे-धीरे बदल रहे हैं। आज केवल रटने और तेजी से सवाल हल करने से काम नहीं चलता, बल्कि यह देखा जा रहा है कि छात्र कितना समझते हैं और उसे कैसे लागू करते हैं।
डेटा साइंस (Data Science) जैसे क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा के कारण अब एडमिशन प्रक्रिया भी बदल रही है। भारत और विदेश के कई विश्वविद्यालय अब सिर्फ अंक (Marks) नहीं, बल्कि विश्लेषण क्षमता (Analytical Ability), तार्किक सोच (Logical Reasoning) और समस्या को समझकर हल करने की क्षमता को भी महत्व दे रहे हैं। यह बदलाव 2026 के नए शिक्षा रुझानों का हिस्सा है, जहां तकनीकी शिक्षा को ज्यादा व्यावहारिक बनाया जा रहा है।
तैयारी के तरीके में बदलाव जरूरी
डेटा साइंस एक ऐसा क्षेत्र है, जिसमें गणित, सांख्यिकी (Statistics), प्रोग्रामिंग (Programming) और विश्लेषण—सभी का मेल होता है। इसलिए इसकी तैयारी भी अलग तरीके से करनी होती है।
अब सिर्फ पढ़ना काफी नहीं है। छात्रों को यह समझना होगा कि वे जो पढ़ रहे हैं, उसे दबाव में भी सही तरीके से कैसे लागू करें। यही कौशल आज की परीक्षाओं में फर्क पैदा करता है।
गणित अब भी सबसे मजबूत आधार
कई छात्र शुरुआत में ही कोडिंग पर ज्यादा ध्यान देने लगते हैं, लेकिन विशेषज्ञ मानते हैं कि गणित ही इस क्षेत्र की असली नींव है।
खास तौर पर इन विषयों पर मजबूत पकड़ जरूरी है:
प्रायिकता (Probability) और सांख्यिकी (Statistics), बीजगणित (Algebra), फंक्शन (Functions), तार्किक क्षमता (Logical Reasoning) और डेटा व्याख्या (Data Interpretation)।
ये विषय न केवल एंट्रेंस परीक्षा में काम आते हैं, बल्कि आगे की पढ़ाई और करियर में भी मदद करते हैं। मजबूत गणितीय आधार छात्रों को समस्याओं को बेहतर तरीके से समझने में सक्षम बनाता है।
प्रोग्रामिंग की बुनियादी समझ जरूरी
हालांकि हर परीक्षा में कोडिंग सीधे नहीं पूछी जाती, लेकिन इसकी बुनियादी जानकारी अब काफी महत्वपूर्ण हो गई है।
छात्रों को Python जैसी भाषा से शुरुआत करनी चाहिए। इसके साथ लूप (Loops), कंडीशनल स्टेटमेंट (Conditional Statements) और बेसिक डेटा स्ट्रक्चर (Data Structures) की समझ बनानी चाहिए।
Python आज डेटा साइंस, मशीन लर्निंग (Machine Learning) और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (Artificial Intelligence) में सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाली भाषाओं में से एक है।
मॉक टेस्ट को नजरअंदाज न करें
तैयारी के दौरान सबसे बड़ी गलती होती है मॉक टेस्ट (Mock Tests) को आखिरी समय तक टालना। नियमित मॉक टेस्ट देने से समय प्रबंधन बेहतर होता है, प्रश्नों का पैटर्न समझ आता है और कमजोरियां सामने आती हैं।
जो छात्र हर टेस्ट के बाद अपनी गलतियों को समझते हैं, उनकी तैयारी लगातार बेहतर होती जाती है। इससे परीक्षा के दौरान घबराहट भी कम होती है।
विश्लेषण क्षमता बन रही है सबसे बड़ा हथियार
आज के समय में सिर्फ जानकारी होना काफी नहीं है। कंपनियां और संस्थान ऐसे छात्रों की तलाश में हैं जो नई समस्याओं को समझकर उनका हल निकाल सकें।
इसी वजह से अब एंट्रेंस परीक्षाओं में भी सवालों का स्वरूप बदल रहा है। अब सवाल ज्यादा समझ, तर्क और उपयोग पर आधारित होते जा रहे हैं, न कि केवल याद करने पर।
इन गलतियों से बचें
कई छात्र ज्यादा समय सिर्फ थ्योरी पढ़ने में लगा देते हैं और प्रैक्टिस कम करते हैं। कुछ छात्र गणित और सांख्यिकी को नजरअंदाज कर सिर्फ कोडिंग पर ध्यान देते हैं। वहीं कुछ कम अंक आने के डर से मॉक टेस्ट नहीं देते।
पुराने तरीके से तैयारी करना भी एक बड़ी गलती है। आज संतुलित तैयारी—जहां थ्योरी, प्रैक्टिस और समझ तीनों शामिल हों—सबसे ज्यादा असरदार मानी जाती है।
क्या समझें छात्र
डेटा साइंस तेजी से लोकप्रिय करियर विकल्प बन रहा है और इसके साथ एंट्रेंस परीक्षाओं का तरीका भी बदल रहा है।
2026 में इस क्षेत्र में प्रवेश की तैयारी कर रहे छात्रों के लिए जरूरी है कि वे गणित, तार्किक सोच, प्रोग्रामिंग की बुनियाद और नियमित अभ्यास—इन सभी पर बराबर ध्यान दें।
आज सफलता सिर्फ अच्छे अंक लाने पर निर्भर नहीं है, बल्कि इस पर भी है कि छात्र अपने ज्ञान को कितनी अच्छी तरह इस्तेमाल कर पाते हैं। यही वह बदलाव है, जिसे विश्वविद्यालय अब प्राथमिकता दे रहे हैं।
भारत की करीब ₹50 लाख करोड़ की कृषि अर्थव्यवस्था में तेजी से मौके बढ़ रहे हैं, और इसी वजह से 12वीं के बाद Agriculture Certificate Courses की मांग भी लगातार बढ़ रही है। “agriculture certificate course entrance exam 2026”, “short term agriculture courses after 12th” और “best agri certificate courses India” जैसे सर्च ट्रेंड इस बात का संकेत देते हैं कि ग्रामीण युवाओं, करियर बदलने वालों और किसान परिवारों में इन कोर्सेस को लेकर रुचि बढ़ रही है।
3 से 12 महीने के ये कोर्स ऑर्गेनिक फार्मिंग, हाइड्रोपोनिक्स और एग्री-बिजनेस जैसे क्षेत्रों में प्रैक्टिकल स्किल्स देते हैं, जो पारंपरिक 4 साल के B.Sc Agriculture की तुलना में कम समय में नौकरी के लिए तैयार करते हैं। यहां 2026 के लिए पूरी जानकारी दी जा रही है।
क्या हैं Agriculture Certificate Courses?
ये छोटे और स्किल-आधारित कोर्स होते हैं, जिन्हें Indira Gandhi National Open University, Indian Council of Agricultural Research के संस्थान, Krishi Vigyan Kendras (KVKs) और राज्य कृषि विश्वविद्यालय जैसे Tamil Nadu Agricultural University और Punjab Agricultural University संचालित करते हैं।
इनमें प्रमुख स्पेशलाइजेशन शामिल हैं—ऑर्गेनिक फार्मिंग सर्टिफिकेट, हाइड्रोपोनिक्स एवं प्रिसीजन फार्मिंग, वर्मी-कम्पोस्टिंग और मृदा स्वास्थ्य, एग्री-ड्रोन ऑपरेशन और डिजिटल फार्मिंग। यह उन छात्रों के लिए बेहतर विकल्प है जो 12वीं के बाद बिना लंबी पढ़ाई के जल्दी स्किल हासिल करना चाहते हैं।
Agriculture Certificate Entrance Exams 2026: जरूरी जानकारी
इन कोर्सेस के लिए CUET जैसा कोई राष्ट्रीय स्तर का एग्जाम नहीं होता। अधिकतर एडमिशन मेरिट या इंटरव्यू के आधार पर होते हैं।
Krishi Vigyan Kendras में फरवरी से मई के बीच आवेदन होते हैं और मई से जुलाई तक इंटरव्यू या स्क्रीनिंग होती है, जिसमें 10वीं या 12वीं के अंकों के साथ बेसिक एग्रीकल्चर ज्ञान पर सवाल पूछे जाते हैं। ICAR के शॉर्ट कोर्स के लिए मार्च से जून के बीच क्विज आयोजित होती है, जिसमें बेसिक साइंस और सरकारी योजनाओं पर MCQ आते हैं। IGNOU और National Institute of Agricultural Extension Management द्वारा ऑनलाइन टेस्ट जनवरी से मई के बीच होता है, जिसमें एप्टीट्यूड और एग्री अवेयरनेस शामिल होती है। वहीं राज्य स्तर पर TNAU, MPKV और PAU जैसे संस्थान फरवरी से जून के बीच सरल MCQ आधारित परीक्षा लेते हैं।
योग्यता की बात करें तो उम्मीदवार का 10वीं या 12वीं पास होना जरूरी है, जिसमें कम से कम 40% अंक होने चाहिए और न्यूनतम आयु 18 वर्ष होती है। अधिकांश कोर्स जुलाई-अगस्त 2026 से शुरू होते हैं।
Agriculture Certificate Courses 2026 की तैयारी कैसे करें
तैयारी के लिए रोजाना कृषि से जुड़े अखबार और मैगजीन पढ़ना फायदेमंद रहता है। Krishi Jagran और Down To Earth जैसे स्रोतों से अपडेट रहना चाहिए। सरकारी योजनाओं जैसे PM-KISAN और Soil Health Card की जानकारी जरूरी है।
छात्रों को बेसिक बायोलॉजी, वर्तमान कृषि समाचार और राज्य की योजनाओं पर फोकस करना चाहिए। KVK पोर्टल और ऑनलाइन मॉक टेस्ट भी तैयारी में मदद करते हैं।
Agriculture Certificate Courses के फायदे
ये कोर्स उन छात्रों के लिए काफी फायदेमंद हैं जो जल्दी रोजगार चाहते हैं। 6 महीने का सर्टिफिकेट करने के बाद FPOs, एग्री-स्टार्टअप या ऑर्गेनिक फार्म में ₹20,000 से ₹40,000 प्रति माह तक की शुरुआती आय मिल सकती है। फीस भी कम होती है—₹5,000 से ₹25,000 तक—जो B.Sc Agriculture के ₹2-5 लाख खर्च की तुलना में काफी सस्ती है।
इनमें प्रैक्टिकल ट्रेनिंग मिलती है जैसे कीट प्रबंधन, मृदा परीक्षण और वैल्यू एडिशन, जो सीधे खेत या बिजनेस में काम आती है। इसके अलावा National Bank for Agriculture and Rural Development जैसी संस्थाओं से लोन और सरकारी सब्सिडी का भी लाभ मिलता है। ऑनलाइन या हाइब्रिड मोड के कारण यह काम कर रहे किसानों के लिए भी सुविधाजनक है।
Agriculture Certificate Courses की सीमाएं
हालांकि, ये कोर्स हर किसी के लिए सही नहीं हैं। इनमें गहराई की कमी होती है और यह UPSC या IFS जैसी परीक्षाओं के लिए पात्रता नहीं देते। नौकरी के शुरुआती स्तर तक ही सीमित रहते हैं और प्रमोशन के लिए अक्सर B.Sc Agriculture डिग्री को प्राथमिकता दी जाती है।
कुछ प्राइवेट कोर्स ICAR से मान्यता प्राप्त नहीं होते, जिससे उनकी वैल्यू कम हो सकती है। ग्रामीण क्षेत्रों में शुरुआती वेतन कम हो सकता है और कई जगह मार्केट में प्रतिस्पर्धा भी ज्यादा है। इसके अलावा डिग्री कोर्स की तुलना में अवसर सीमित होते हैं।
क्या यह कोर्स आपके लिए सही है?
अगर आप 12वीं के बाद कम समय में स्किल सीखकर तुरंत काम शुरू करना चाहते हैं, तो Agriculture Certificate Courses 2026 एक अच्छा विकल्प हैं। भारत के बढ़ते एग्री-एक्सपोर्ट सेक्टर (₹1.5 लाख करोड़ लक्ष्य) के बीच इनकी उपयोगिता और बढ़ रही है।
हालांकि, अगर आप लंबे समय में बेहतर पद और ग्रोथ चाहते हैं, तो सर्टिफिकेट कोर्स के साथ डिग्री लेना ज्यादा फायदेमंद रहेगा। शुरुआत के लिए IGNOU का ऑर्गेनिक फार्मिंग सर्टिफिकेट कोर्स एक सुरक्षित और कम जोखिम वाला विकल्प माना जाता है।
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'सिटी ऑफ जॉय' कहे जाने वाले कोलकाता शहर में 16 अप्रैल का दिन वाकई उत्साह से भरा रहा, जब 'एडइनबॉक्स' ने अपना विस्तार करते हुए यहाँ के लोगों के लिए अपनी नई ब्रांच का शुभारम्भ किया। ख़ास बात यह रही कि इस मौके पर इटली से आये मेहमानों के साथ 'एडइनबॉक्स' की पूरी टीम मौजूद थी। पश्चिम बंगाल के कोलकाता में उदघाटित इस कार्यालय से पूर्व 'एडइनबॉक्स' की शाखाएं दिल्ली, भुवनेश्वर, लखनऊ और बैंगलोर जैसे शहरों में पहले से कार्य कर रही हैं।
कोलकाता में एडइनबॉक्स की नयी ब्रांच के उद्घाटन कार्यक्रम में इटली के यूनिमार्कोनी यूनिवर्सिटी के प्रतिनिधिमंडल की गरिमामयी उपस्थिति ने इस अवसर को तो ख़ास बनाया ही, सहयोग और साझेदारी की भावना को भी इससे बल मिला। विशिष्ट अतिथियों आर्टुरो लावेल, लियो डोनाटो और डारिना चेशेवा ने 'एडइनबॉक्स' के एडिटर उज्ज्वल अनु चौधरी, बिजनेस और कंप्यूटर साइंस के डोमेन लीडर डॉ. नवीन दास, ग्लोबल मीडिया एजुकेशन काउंसिल डोमेन को लीड कर रहीं मनुश्री मैती और एडिटोरियल कोऑर्डिनेटर समन्वयक शताक्षी गांगुली के नेतृत्व में कोलकाता टीम के साथ हाथ मिलाया।
समारोह की शुरुआत अतिथियों का गर्मजोशी के साथ स्वागत से हुई। तत्पश्चात दोनों पक्षों के बीच विचारों और दृष्टिकोणों का सकारात्मक आदान-प्रदान हुआ। डारिना ने पारम्परिक तरीके से रिबन काटकर आधिकारिक तौर पर कार्यालय का उद्घाटन किया और इस मौके को आपसी सहयोग के प्रयासों की दिशा में एक नए अध्याय की शुरुआत बताया। बाकायदा इस दौरान यूनिमार्कोनी विश्वविद्यालय के प्रतिनिधिमंडल और EdInbox.com टीम के बीच एक साझेदारी समझौते पर हस्ताक्षर भी हुआ। यह पहल शिक्षा के क्षेत्र में नवाचार और प्रगति के लिए साझा प्रतिबद्धता को दर्शाता है, साथ ही भविष्य में अधिक से अधिक छात्रों का नेतृत्व कर इस पहल से उन्हें सशक्त बनाया जा सकता है ताकि वे वैश्विक मंचों पर सफलता के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर सकें।
समारोह के समापन की वेला पर दोनों पक्षों द्वारा एक दूसरे को स्मारिकाएं भेंट की गयीं। 'एडइनबॉक्स' की नई ब्रांच के उद्घाटन के साथ इस आदान-प्रदान की औपचारिकता से दोनों टीमों के बीच मित्रता और सहयोग के बंधन भी उदघाटित हुए।अंततः वक़्त मेहमानों को अलविदा कहने का था, 'एडइनबॉक्स' की कोलकाता टीम ने अतिथियों को विदा तो किया मगर इस भरोसे और प्रण के साथ कि यह नयी पहल भविष्य में संबंधों की प्रगाढ़ता और विकास के नए ठौर तक पहुंचेगी।
भारत ने स्वास्थ्य और कृषि के बीच मौजूद दशकों पुरानी दूरी को कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम उठाते हुए आज मिशन SEHAT की शुरुआत कर दी है। जेपी नड्डा और शिवराज सिंह चौहान ने नई दिल्ली में इस महत्वाकांक्षी कार्यक्रम का औपचारिक शुभारंभ किया।
यह मिशन कृषि, पोषण और स्वास्थ्य—तीनों को एक ही नीति ढांचे में लाने का प्रयास है, ताकि देश कुपोषण और बढ़ते गैर-संचारी रोगों की दोहरी चुनौती से एक साथ निपट सके।
मिशन का नेतृत्व दो प्रमुख राष्ट्रीय संस्थाएं कर रही हैं—
- भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR)
- भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR)
दोनों संस्थाओं का एक मंच पर आना इसे देश के सबसे वैज्ञानिक और समन्वित स्वास्थ्य-कृषि कार्यक्रमों में शामिल कर देता है।
कृषि अब सिर्फ उत्पादन नहीं, पोषण और स्वास्थ्य का आधार
कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने कहा कि यह मिशन “आधुनिक विज्ञान और भारत की प्राचीन आहार परंपराओं” का अनोखा मेल है। उन्होंने इसे केवल सरकारी कार्यक्रम नहीं बल्कि “खाद्य से स्वास्थ्य” तक की राष्ट्रीय सोच का बड़ा कदम बताया।
उन्होंने बताया कि प्रधानमंत्री के नेतृत्व में देश का खाद्यान्न उत्पादन 252 मिलियन टन से बढ़कर 357 मिलियन टन तक पहुंच चुका है। अब चुनौती केवल उत्पादन की नहीं, बल्कि स्वास्थ्यवर्धक और पोषक भोजन लोगों तक पहुंचाने की है।
दोहरे संकट से निपटने का प्रयास
स्वास्थ्य मंत्री जेपी नड्डा ने कहा कि भारत आज दो प्रमुख स्वास्थ्य चुनौतियों—कुपोषण और गैर-संचारी रोगों (मधुमेह, उच्च रक्तचाप, मोटापा) —से जूझ रहा है। इन समस्याओं का हल सिर्फ दवाओं या अस्पतालों में नहीं, बल्कि संतुलित पोषण, वैज्ञानिक कृषि और स्वस्थ जीवनशैली में है।
उन्होंने स्पष्ट किया कि सरकार वन हेल्थ और होल-ऑफ-गवर्नमेंट दृष्टिकोण के तहत मानव, पशु और पर्यावरण स्वास्थ्य को एक दूसरे से जोड़कर देख रही है।
ICMR के महानिदेशक राजीव बहल ने कहा कि अब समय आ गया है कि कृषि को “सिर्फ उत्पादन नहीं, बल्कि स्वास्थ्य और समग्र कल्याण की प्रणाली” के रूप में समझा जाए।
मिशन का फोकस: मोटे अनाज, बायो-फोर्टिफिकेशन और प्राकृतिक खेती
मिशन SEHAT ज्वार, बाजरा, रागी जैसे पोषक और पारंपरिक अनाजों को फिर से मुख्यधारा में लाने पर जोर देगा। इसके साथ-साथ बायो-फोर्टिफाइड फसलों के विकास और प्रसार को गति दी जाएगी, ताकि आम लोगों के भोजन में आवश्यक विटामिन और खनिज स्वाभाविक रूप से शामिल हो सकें।
ICAR के महानिदेशक डॉ. मांगी लाल जाट ने कहा कि यह मिशन उस वैश्विक सोच को आगे बढ़ाता है जिसमें भोजन को ही “प्राकृतिक औषधि” माना गया है। उनके अनुसार ICAR–ICMR का सहयोग एक ऐसी वैज्ञानिक प्रणाली विकसित करेगा जो कुपोषण और जीवनशैली संबंधी बीमारियों, दोनों से लड़ने में सक्षम होगी।
मिशन में छोटे किसानों के लिए इंटीग्रेटेड फार्मिंग सिस्टम, जैविक व प्राकृतिक कृषि और स्थानीय स्तर पर पोषक खाद्य उपलब्ध कराने पर विशेष ध्यान दिया जाएगा।
अनुसंधान का लाभ सीधे किसानों और नागरिकों तक
कृषि मंत्री ने कहा कि अनुसंधान सिर्फ प्रयोगशालाओं तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उनका जोर था कि इसके लाभ समय पर किसानों और आम लोगों तक पहुंचें। उन्होंने यह भी बताया कि किसानों का स्वास्थ्य और सुरक्षित कार्य-परिसर भी इस मिशन का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है।
मिशन SEHAT की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यह इलाज-केंद्रित मॉडल के बजाय रोकथाम और दीर्घकालिक स्वास्थ्य सुरक्षा पर ध्यान देता है। इसी कारण इसे आने वाले वर्षों में भारत की स्वास्थ्य और पोषण रणनीति का महत्वपूर्ण स्तंभ माना जा रहा है।
करीब 15 साल तक छात्रों की जिंदगी एक तय ढर्रे पर चलती है। सुबह स्कूल जाना, होमवर्क करना, परीक्षा की तैयारी करना और फिर अगली कक्षा में पहुंच जाना। यह सफर भले ही चुनौतीपूर्ण हो, लेकिन इसकी दिशा साफ होती है। लेकिन 12वीं के बाद अचानक एक सवाल हर छात्र का पीछा करने लगता है—“अब आगे क्या?”
बोर्ड परीक्षा के नतीजे, प्रवेश परीक्षाएं और कॉलेज एडमिशन के बीच छात्र धीरे-धीरे यह महसूस करने लगते हैं कि अब उन्हें ऐसा फैसला लेना है, जो उनके पूरे भविष्य को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि भारत में हर साल “12वीं के बाद कौन-सा करियर चुनें” सबसे ज्यादा खोजे जाने वाले शिक्षा विषयों में शामिल रहता है।
असल में ज्यादातर छात्र अपने सपनों को लेकर भ्रमित नहीं होते, बल्कि उन्हें सही दिशा की तलाश होती है।
आज करियर चुनना इतना मुश्किल क्यों हो गया है?
पहले करियर के विकल्प सीमित थे। इंजीनियरिंग, मेडिकल, सरकारी नौकरी, टीचिंग या पारिवारिक व्यवसाय जैसे कुछ ही रास्ते होते थे। लोग इन करियर को समझते भी थे और समाज में इनके बारे में स्पष्ट सोच थी।
लेकिन आज स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है। बढ़ती प्रतिस्पर्धा, बदलती जीवनशैली, तकनीक का तेजी से विकास और महंगाई ने छात्रों के सामने करियर के अनगिनत विकल्प खोल दिए हैं। अब सिर्फ एक स्थिर नौकरी काफी नहीं मानी जाती, इसलिए छात्र ऐसे क्षेत्रों की ओर आकर्षित हो रहे हैं जहां बेहतर आय और विकास की संभावना हो।
आज आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डेटा साइंस, फॉरेंसिक साइंस, डिजिटल मार्केटिंग, साइकोलॉजी, बायोटेक्नोलॉजी, हेल्थकेयर एनालिटिक्स, डिजाइन और कंटेंट क्रिएशन जैसे कई नए करियर तेजी से लोकप्रिय हो रहे हैं। इनमें से कई ऐसे क्षेत्र हैं, जिनके बारे में कुछ साल पहले तक बहुत कम लोग जानते थे।
इंटरनेट ने अवसर बढ़ाए हैं, लेकिन साथ ही भ्रम भी बढ़ाया है। हर कोर्स ऑनलाइन शानदार दिखाई देता है, हर करियर वीडियो कुछ सेकंड में जिंदगी बदलने का दावा करता है। ऐसे माहौल में छात्र एक जरूरी सवाल का जवाब तलाश रहे होते हैं—“मैं वास्तव में कैसी जिंदगी चाहता हूं?”
12वीं के बाद छात्र सबसे बड़ी गलती क्या करते हैं?
कई छात्र अपनी रुचि और क्षमता के बजाय ट्रेंड देखकर करियर चुन लेते हैं। कोई कोर्स सोशल मीडिया पर लोकप्रिय हो जाता है, कोई दोस्त उसमें एडमिशन ले लेता है या कोई यूट्यूबर उसे “फ्यूचर-प्रूफ” बता देता है, और छात्र बिना पूरी जानकारी के उसी दिशा में बढ़ने लगते हैं।
समस्या यह नहीं कि छात्र मेहनत नहीं कर रहे, बल्कि समस्या यह है कि उन्हें जो दिखाया जा रहा है, वे उसी को सच मान लेते हैं। बाद में यही कारण बनता है कि कई छात्र कॉलेज पहुंचने के बाद अपने चुने हुए कोर्स से जुड़ाव महसूस नहीं कर पाते।
एक अच्छा करियर फैसला केवल सैलरी या सामाजिक प्रतिष्ठा पर आधारित नहीं होता। इसमें रुचि, योग्यता, व्यक्तित्व, आर्थिक स्थिति और लंबे समय तक उस क्षेत्र में काम करने की क्षमता जैसे कई पहलू शामिल होते हैं।
तेजी से बदल रहे हैं करियर विकल्प
उच्च शिक्षा के क्षेत्र में सबसे बड़ा बदलाव यह है कि अब स्पेशलाइज्ड और इंटरडिसिप्लिनरी करियर की मांग तेजी से बढ़ रही है। अब साइंस, कॉमर्स और आर्ट्स की सीमाएं पहले जैसी सख्त नहीं रहीं।
आज बायोलॉजी का छात्र हेल्थ टेक्नोलॉजी में जा सकता है, कॉमर्स का छात्र बिजनेस एनालिटिक्स में करियर बना सकता है और आर्ट्स का छात्र एआई साइकोलॉजी, मीडिया, यूएक्स डिजाइन या पब्लिक पॉलिसी जैसे क्षेत्रों में आगे बढ़ सकता है।
इसी तरह पारंपरिक करियर भी नए रूप ले रहे हैं। इंजीनियरिंग अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और रोबोटिक्स से जुड़ रही है। पत्रकारिता डिजिटल मीडिया और कंटेंट स्ट्रेटेजी की ओर बढ़ रही है, जबकि साइंस रिसर्च अब साइबर फॉरेंसिक और फॉरेंसिक साइंस जैसे क्षेत्रों से जुड़ चुकी है।
छात्रों को दबाव नहीं, स्पष्ट दिशा की जरूरत
भारत में अक्सर करियर सलाह दबाव का रूप ले लेती है। परिवार की अपेक्षाएं, समाज में तुलना, प्रतिष्ठा और भविष्य का डर कई बार छात्रों को ऐसे फैसले लेने पर मजबूर कर देता है जो वास्तव में उनके अपने नहीं होते।
लेकिन केवल तनाव या दबाव में चुना गया करियर लंबे समय तक संतुष्टि नहीं देता। इसलिए आज करियर काउंसलिंग, इंडस्ट्री एक्सपोजर और प्रवेश परीक्षाओं की सही जानकारी पहले से कहीं ज्यादा जरूरी हो गई है।
आज के छात्रों को केवल मोटिवेशन नहीं, बल्कि स्पष्ट दिशा की जरूरत है।
प्रवेश परीक्षाओं की बदलती भूमिका
भारत में उच्च शिक्षा अब काफी हद तक प्रवेश परीक्षाओं पर आधारित हो चुकी है। इंजीनियरिंग, लॉ, डिजाइन, मैनेजमेंट और फॉरेंसिक साइंस जैसे क्षेत्रों में प्रवेश के लिए छात्र प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी कर रहे हैं।
दिलचस्प बात यह है कि नई प्रवेश परीक्षाएं अब केवल रटने की क्षमता पर नहीं, बल्कि एप्टीट्यूड, एनालिटिकल स्किल और समस्या समाधान क्षमता पर ज्यादा ध्यान दे रही हैं। यह बदलाव दिखाता है कि भविष्य की नौकरियों में केवल याददाश्त नहीं, बल्कि रचनात्मक सोच और अनुकूलन क्षमता ज्यादा महत्वपूर्ण होगी।
करियर चुनते समय छात्रों को खुद से कौन-से सवाल पूछने चाहिए?
अक्सर छात्र केवल यह सोचते हैं कि किस कोर्स में अच्छा पैकेज मिलेगा या किस क्षेत्र में ज्यादा नौकरी है। ये सवाल जरूरी हैं, लेकिन केवल यही पर्याप्त नहीं हैं।
छात्रों को खुद से यह भी पूछना चाहिए कि क्या वे उस विषय को लंबे समय तक पढ़ना पसंद करेंगे? क्या वे उस करियर से जुड़ी कार्यशैली में सहज रह पाएंगे? क्या उनका व्यक्तित्व उस क्षेत्र के अनुकूल है? और सबसे जरूरी, क्या वे सच में वह करियर चाहते हैं या केवल उसे खो देने के डर से उसकी ओर बढ़ रहे हैं?
इन्हीं सवालों के जवाब भविष्य की स्पष्ट तस्वीर तैयार करते हैं।
तेजी से बदल रही है उच्च शिक्षा की दुनिया
आने वाले वर्षों में शिक्षा और रोजगार की दुनिया आज से काफी अलग हो सकती है। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस कई उद्योगों को बदल रहा है। लगभग हर क्षेत्र में डिजिटल स्किल्स की मांग बढ़ रही है। विश्वविद्यालय अब इंडस्ट्री पार्टनरशिप, स्टार्टअप इनक्यूबेशन और स्किल आधारित लर्निंग मॉडल पर जोर दे रहे हैं।
ऐसे समय में वही छात्र बेहतर करेंगे जो लगातार सीखने के लिए तैयार रहेंगे और बदलाव को अपनाएंगे। केवल “सुरक्षित” माने जाने वाले करियर के पीछे भागना हमेशा सही रणनीति नहीं होती, क्योंकि समय के साथ सबसे सुरक्षित नौकरियां भी बदल सकती हैं।
आखिर छात्रों को क्या समझना चाहिए?
12वीं के बाद करियर चुनना कोई परफेक्ट विकल्प ढूंढने की प्रक्रिया नहीं है। बहुत कम लोग इतनी कम उम्र में सब कुछ पूरी तरह समझ पाते हैं। सबसे जरूरी बात यह है कि फैसला सोच-समझकर लिया जाए, न कि जल्दबाजी या डर में।
अक्सर वही छात्र आगे चलकर बेहतर और संतुलित करियर बनाते हैं जो खुद को ईमानदारी से समझते हैं, सीखने के लिए खुले रहते हैं और जागरूक होकर फैसले लेते हैं। उच्च शिक्षा एक पेशा तय कर सकती है, लेकिन किसी छात्र की सोच ही उसकी जिंदगी की दिशा तय करती है।
भारत में उच्च शिक्षा का स्वरूप तेजी से बदल रहा है। अब विश्वविद्यालय केवल डिग्री देने वाले संस्थान नहीं रह गए हैं, बल्कि वे रिसर्च, इनोवेशन और नई तकनीकों के विकास के केंद्र बनते जा रहे हैं। यही कारण है कि आज उच्च शिक्षा में “Research Culture” यानी शोध संस्कृति को बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी विश्वविद्यालय की गुणवत्ता केवल उसके पाठ्यक्रम से नहीं, बल्कि वहां होने वाले रिसर्च और इनोवेशन से तय होती है। मजबूत रिसर्च कल्चर न केवल छात्रों को बेहतर सीखने का अवसर देता है, बल्कि देश की वैज्ञानिक, तकनीकी और आर्थिक प्रगति में भी अहम भूमिका निभाता है।
क्या होता है शोध संस्कृति?
शोध संस्कृति का मतलब केवल रिसर्च पेपर प्रकाशित करना नहीं है। इसका अर्थ है ऐसा शैक्षणिक वातावरण तैयार करना जहां छात्र और शिक्षक नए विचारों पर काम करें, समस्याओं का समाधान खोजें और समाज से जुड़े मुद्दों पर अध्ययन करें।
जब किसी विश्वविद्यालय में रिसर्च को बढ़ावा दिया जाता है, तो वहां छात्रों को प्रयोग करने, डेटा विश्लेषण करने और नई खोजों पर काम करने के अवसर मिलते हैं। इससे उनकी सोचने और समझने की क्षमता मजबूत होती है।
छात्रों के करियर में कैसे मदद करता है रिसर्च?
आज नौकरी का बाजार तेजी से बदल रहा है। कंपनियां अब केवल डिग्री नहीं, बल्कि समस्या समाधान क्षमता, विश्लेषणात्मक सोच और इनोवेशन स्किल्स को महत्व दे रही हैं। रिसर्च आधारित शिक्षा छात्रों में यही गुण विकसित करती है।
जो छात्र रिसर्च प्रोजेक्ट्स, इंटरनैशनल कॉन्फ्रेंस या इनोवेशन गतिविधियों में भाग लेते हैं, उन्हें करियर में अधिक अवसर मिलते हैं। खासतौर पर AI, डेटा साइंस, हेल्थकेयर, इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट जैसे क्षेत्रों में रिसर्च अनुभव को बड़ी प्राथमिकता दी जा रही है।
विश्वविद्यालयों की वैश्विक पहचान में बढ़ती भूमिका
विश्व स्तर पर किसी भी विश्वविद्यालय की रैंकिंग में रिसर्च आउटपुट और इनोवेशन का बड़ा योगदान होता है। रिसर्च पेपर्स, पेटेंट, वैज्ञानिक खोज और इंडस्ट्री सहयोग विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा को मजबूत करते हैं।
भारत के कई संस्थान अब इंटरडिसिप्लिनरी रिसर्च और ग्लोबल अकादमिक सहयोग पर ध्यान दे रहे हैं ताकि वे अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी पहचान बना सकें। यही वजह है कि IITs, IIMs और कई निजी विश्वविद्यालय रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर पर बड़े स्तर पर निवेश कर रहे हैं।
नई शिक्षा नीति में भी रिसर्च पर जोर
विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी University Grants Commission और राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में भी रिसर्च और इनोवेशन को उच्च शिक्षा का महत्वपूर्ण हिस्सा बताया गया है। नीति का उद्देश्य भारत में ऐसा शिक्षा तंत्र विकसित करना है जो केवल परीक्षा आधारित न होकर रिसर्च और स्किल डेवलपमेंट पर आधारित हो।
इसके तहत विश्वविद्यालयों को रिसर्च लैब, स्टार्टअप इकोसिस्टम और इंडस्ट्री सहयोग को बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित किया जा रहा है।
रिसर्च से समाज को भी होता है फायदा
रिसर्च केवल विश्वविद्यालयों तक सीमित नहीं रहती। इसका सीधा असर समाज और उद्योगों पर भी पड़ता है। हेल्थकेयर, कृषि, पर्यावरण, टेक्नोलॉजी और शिक्षा जैसे क्षेत्रों में नई रिसर्च लोगों की जिंदगी बेहतर बनाने में मदद करती है।
उदाहरण के तौर पर AI आधारित हेल्थ टेक्नोलॉजी, स्मार्ट कृषि समाधान और क्लीन एनर्जी रिसर्च आज समाज की बड़ी जरूरत बन चुके हैं।
भारत में रिसर्च कल्चर को और मजबूत करने की जरूरत
हालांकि भारत में रिसर्च गतिविधियां तेजी से बढ़ रही हैं, लेकिन अभी भी कई विश्वविद्यालयों में फंडिंग, रिसर्च इंफ्रास्ट्रक्चर और इंडस्ट्री सहयोग की कमी देखी जाती है। विशेषज्ञ मानते हैं कि अगर विश्वविद्यालयों में रिसर्च को शुरुआती स्तर से बढ़ावा दिया जाए, तो भारत वैश्विक शिक्षा और इनोवेशन हब बनने की दिशा में तेजी से आगे बढ़ सकता है।
उच्च शिक्षा (Higher Education) में मजबूत शोध संस्कृति (Research Culture) केवल अकादमिक विकास तक सीमित नहीं है, बल्कि यह छात्रों के बेहतर भविष्य, विश्वविद्यालयों की वैश्विक पहचान और देश की प्रगति से भी सीधे जुड़ा हुआ है। आने वाले समय में वही संस्थान आगे बढ़ेंगे जो शिक्षा के साथ रिसर्च और इनोवेशन को बराबर महत्व देंगे।
मैथ्स और साइंस को छात्रों के लिए आसान और दिलचस्प बनाने की दिशा में सुपर-30 के संस्थापक और पद्मश्री से सम्मानित आनंद कुमार (Anand Kumar) ने नया डिजिटल एजुकेशन प्लेटफॉर्म ‘Super Infinity’ लॉन्च करने की घोषणा की है। दिल्ली के द्वारका में आयोजित एक प्रेस वार्ता में उन्होंने इस नए मंच की जानकारी साझा करते हुए कहा कि इसका उद्देश्य पढ़ाई को सिर्फ किताबों और फार्मूलों तक सीमित रखना नहीं, बल्कि उसे समझने और महसूस करने का अनुभव बनाना है।
आनंद कुमार ने बताया कि यह प्लेटफॉर्म पारंपरिक ऑनलाइन क्लास से अलग होगा। यहां मैथ्स और साइंस जैसे विषयों को कहानियों, एनीमेशन, संगीत और रियल लाइफ उदाहरणों के जरिए समझाया जाएगा, ताकि छात्र कठिन विषयों को आसानी से समझ सकें और उनमें रुचि विकसित हो।
सुपर-30 से आगे बढ़कर लाखों छात्रों तक पहुंचने की कोशिश
सुपर-30 के जरिए वर्षों से आर्थिक रूप से कमजोर लेकिन प्रतिभाशाली छात्रों को IIT जैसी परीक्षाओं की तैयारी करवाई जाती रही है। हालांकि हर साल सीमित सीटों के कारण केवल 30 छात्रों का ही चयन हो पाता था। इसी अनुभव को साझा करते हुए आनंद कुमार ने कहा कि उनके मन में हमेशा यह सवाल रहता था कि उन लाखों छात्रों तक बेहतर शिक्षा कैसे पहुंचाई जाए, जिन्हें अवसर नहीं मिल पाता।
उन्होंने कहा कि ‘Super Infinity’ इसी सोच का परिणाम है। यह प्लेटफॉर्म देशभर के छात्रों तक गुणवत्तापूर्ण शिक्षा पहुंचाने का प्रयास करेगा, ताकि कोई भी छात्र संसाधनों की कमी की वजह से सीखने से वंचित न रहे।
कहानी, संगीत और एनीमेशन से बदलेगा पढ़ाई का तरीका
आनंद कुमार के मुताबिक इस मंच पर छात्रों को केवल सवाल हल करना या फार्मूले याद करना नहीं सिखाया जाएगा। कोशिश यह रहेगी कि वे यह समझ सकें कि मैथ्स और साइंस का हमारे रोजमर्रा के जीवन, प्रकृति, संगीत और ब्रह्मांड से क्या संबंध है।
उन्होंने कहा कि जब छात्र किसी विषय को महसूस करके सीखते हैं, तो वह लंबे समय तक याद रहता है। इसी वजह से प्लेटफॉर्म पर एनीमेशन, विजुअल कंटेंट और वास्तविक जीवन के उदाहरणों का इस्तेमाल किया जाएगा, जिससे पढ़ाई अधिक रोचक और इंटरैक्टिव बन सके।
छात्रों के साथ शिक्षकों और अभिभावकों को भी मिलेगा फायदा
आनंद कुमार ने बताया कि यह प्लेटफॉर्म सिर्फ छात्रों के लिए ही नहीं होगा, बल्कि शिक्षकों, अभिभावकों और मैथ्स में रुचि रखने वाले लोगों के लिए भी उपयोगी साबित हो सकता है। उनका कहना है कि आसान भाषा और रचनात्मक तरीके से पढ़ाने का यह मॉडल सीखने की प्रक्रिया को अधिक प्रभावी बनाएगा।
उन्होंने जानकारी दी कि 12 जून से कोई भी व्यक्ति इंटरनेट पर ‘Super Infinity’ सर्च करके इस डिजिटल प्लेटफॉर्म से जुड़ सकेगा। माना जा रहा है कि यह पहल डिजिटल एजुकेशन सेक्टर में एक नया प्रयोग साबित हो सकती है, खासकर उन छात्रों के लिए जो मैथ्स और साइंस को कठिन मानते हैं।
पश्चिम बंगाल, केरल, तमिलनाडु, असम और केंद्र शासित प्रदेश पुडुचेरी में विधानसभा चुनावों की मतगणना के बाद तमिल सिनेमा के सुपरस्टार से नेता बने थलपति विजय (Thalapathy Vijay) एक बार फिर सुर्खियों में हैं। उनकी पार्टी के प्रदर्शन को लेकर चर्चाएं तेज हैं और इसी के साथ लोग उनके निजी जीवन, खासकर शिक्षा और राजनीतिक सफर के बारे में भी जानना चाह रहे हैं।
थलपति विजय, जिनका पूरा नाम जोसेफ विजय चंद्रशेखर (Joseph Vijay Chandrasekhar) है, तमिल फिल्म इंडस्ट्री के बड़े सितारों में गिने जाते हैं। फिल्मों में उनकी लोकप्रियता लंबे समय से कायम है और अब राजनीति में उनकी सक्रियता ने उन्हें नए सिरे से चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
कहां तक पढ़े हैं थलपति विजय?
विजय की शुरुआती पढ़ाई चेन्नई में हुई। स्कूल शिक्षा पूरी करने के बाद उन्होंने लोयोला कॉलेज (Loyola College Chennai) में दाखिला लिया, जहां उन्होंने विजुअल कम्युनिकेशन कोर्स चुना। हालांकि, अभिनय के प्रति बढ़ते रुझान के चलते उन्होंने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और पूरी तरह फिल्मों की ओर रुख कर लिया।
कम औपचारिक शिक्षा के बावजूद विजय ने अपने अभिनय करियर में बड़ी सफलता हासिल की। अब वे उसी लोकप्रियता को राजनीति में भी बदलने की कोशिश कर रहे हैं।
किस पार्टी के अध्यक्ष हैं विजय?
थलपति विजय तमिलगा वेत्री कझगम यानी Tamilaga Vettri Kazhagam (TVK) के संस्थापक और अध्यक्ष हैं। इस राजनीतिक दल की स्थापना 2 फरवरी 2024 को हुई थी। पार्टी मुख्य रूप से तमिलनाडु और पुडुचेरी में सक्रिय है और हाल के चुनावों में इसके प्रदर्शन पर सभी की नजरें टिकी हुई हैं।
राजनीति में एंट्री और बढ़ती उम्मीदें
विजय का राजनीति में आना भारतीय राजनीति के उस ट्रेंड का हिस्सा है, जहां फिल्मी दुनिया से जुड़े कई चेहरे सार्वजनिक जीवन में सक्रिय हो चुके हैं। हालांकि, हर नेता की तरह उनकी भी असली परीक्षा चुनावी नतीजों से ही तय होगी।
इस बार के चुनावों में उनकी पार्टी का प्रदर्शन यह संकेत देगा कि जनता उन्हें एक नेता के रूप में कितना स्वीकार करती है। खासकर तमिलनाडु की राजनीति में उनका प्रभाव आने वाले समय में किस दिशा में जाता है, यह मतगणना के नतीजों से साफ होगा।
फिलहाल, थलपति विजय न सिर्फ एक सफल अभिनेता के रूप में बल्कि एक उभरते राजनीतिक चेहरे के तौर पर भी लोगों की नजर में हैं।
शादी एक ऐसा शब्द है जो उत्साह, भावनाएं और नई शुरुआत का एहसास एक साथ दिलाता है। पहले जहां शादी का मतलब अपने शहर में एक बड़े समारोह, पारंपरिक रस्मों और सैकड़ों मेहमानों तक सीमित होता था, वहीं अब तस्वीर तेजी से बदल रही है। आजकल परिवार और कपल्स अपनी शादी को खास और यादगार बनाने के लिए दूसरे शहरों और देशों तक का सफर कर रहे हैं। महलों, बीच रिसॉर्ट्स, हिल स्टेशनों और हेरिटेज होटलों में होने वाली डेस्टिनेशन वेडिंग अब सिर्फ अमीरों या फिल्मी सितारों तक सीमित नहीं रह गई है। यही बदलता ट्रेंड अब “वेडिंग टूरिज्म” के रूप में एक बड़ी ग्लोबल इंडस्ट्री बन चुका है।
राजस्थान के शाही महलों से लेकर बाली के बीच वेडिंग तक, लोग अब ऐसी शादी चाहते हैं जो केवल एक रस्म न होकर एक यादगार अनुभव बने। आज शादी को ट्रैवल, फैमिली टाइम और सेलिब्रेशन के मिश्रण के तौर पर देखा जा रहा है।
क्या है वेडिंग टूरिज्म?
आसान शब्दों में समझें तो जब लोग शादी के लिए किसी दूसरे शहर या पर्यटन स्थल पर जाते हैं, तो उसे वेडिंग टूरिज्म कहा जाता है। इसमें प्री-वेडिंग फंक्शन, शादी, रिसेप्शन और कई बार हनीमून तक शामिल होता है। यह सिर्फ शादी तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके साथ ट्रैवल, होटल इंडस्ट्री, फैशन, इवेंट मैनेजमेंट और लोकल बिजनेस भी जुड़े होते हैं।
मान लीजिए कोई कपल उदयपुर में पैलेस वेडिंग या मसूरी में रिसॉर्ट वेडिंग प्लान करता है, तो इससे होटल, कैटरिंग, मेकअप आर्टिस्ट, ट्रांसपोर्ट, फोटोग्राफर, डेकोरेशन और लोकल टूरिज्म से जुड़े कई लोगों को काम मिलता है। कई पर्यटन शहरों में शादी का सीजन अब बड़ी कमाई का जरिया बन चुका है।
क्यों तेजी से बढ़ रही हैं डेस्टिनेशन वेडिंग?
डेस्टिनेशन वेडिंग के बढ़ते ट्रेंड के पीछे सोशल मीडिया की बड़ी भूमिका है। इंस्टाग्राम और यूट्यूब जैसे प्लेटफॉर्म ने लोगों की सोच और उम्मीदों को काफी बदल दिया है। आज के युवा कपल्स खूबसूरत लोकेशन, सिनेमैटिक फोटोशूट और अलग तरह के अनुभव चाहते हैं।
इसके अलावा अब कई लोग भीड़भाड़ वाली पारंपरिक शादियों की बजाय छोटे लेकिन खास समारोह पसंद कर रहे हैं। ऐसे में परिवार शादी और ट्रैवल दोनों को एक साथ जोड़कर खर्च और अनुभव दोनों को बेहतर बनाना चाहते हैं।
होटल और टूरिज्म इंडस्ट्री ने भी इस बदलाव को तेजी से अपनाया है। अब लक्जरी होटल, हेरिटेज प्रॉपर्टी और बीच रिसॉर्ट्स खास तौर पर डेस्टिनेशन वेडिंग पैकेज ऑफर कर रहे हैं, जिनमें संस्कृति, आराम और व्यक्तिगत अनुभव पर फोकस किया जाता है।
भारत क्यों बन रहा है वेडिंग टूरिज्म का बड़ा केंद्र?
भारत अपनी संस्कृति, परंपरा, मौसम और खूबसूरत लोकेशनों के कारण वेडिंग टूरिज्म का बड़ा केंद्र बनता जा रहा है। यहां महलों, किलों, समुद्र तटों और पहाड़ी इलाकों की भरमार है, जो शादी के लिए खास माहौल तैयार करते हैं।
जयपुर, उदयपुर और गोवा जैसे शहर खास तौर पर डेस्टिनेशन वेडिंग के लिए लोकप्रिय हैं। यहां शाही अनुभव, भारतीय परंपरा और लक्जरी सुविधाएं एक साथ मिलती हैं। विदेशों से आने वाले कपल्स भी भारतीय संस्कृति और भव्य शादी के अनुभव के लिए भारत का रुख कर रहे हैं। वहीं कई एनआरआई परिवार भी अपनी ड्रीम वेडिंग के लिए भारत लौट रहे हैं।
बदल रही है भारतीय शादी की सोच
विशेषज्ञों का मानना है कि डेस्टिनेशन वेडिंग नई पीढ़ी के शादी मनाने के तरीके को बदल रही है। पहले जहां शादी बड़े सामाजिक आयोजन के रूप में देखी जाती थी, वहीं अब लोग निजी और यादगार अनुभवों पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं।
आज शादी केवल रस्मों तक सीमित नहीं रह गई है। लोग इसे लाइफटाइम मेमोरी और फैमिली एक्सपीरियंस के रूप में देख रहे हैं। यही वजह है कि आने वाले वर्षों में वेडिंग टूरिज्म इंडस्ट्री के और तेजी से बढ़ने की संभावना जताई जा रही है।
वेडिंग टूरिज्म में करियर की बढ़ती संभावनाएं
वेडिंग टूरिज्म के बढ़ते ट्रेंड के साथ इस क्षेत्र में करियर के नए अवसर भी तेजी से बढ़ रहे हैं। छात्र वेडिंग प्लानिंग, लक्जरी हॉस्पिटैलिटी, इवेंट मैनेजमेंट, ट्रैवल कोऑर्डिनेशन, फोटोग्राफी, डिजिटल कंटेंट क्रिएशन और टूरिज्म मार्केटिंग जैसे क्षेत्रों में करियर बना सकते हैं।
कुछ साल पहले तक हॉस्पिटैलिटी और टूरिज्म से जुड़े छात्रों के लिए नौकरी के सीमित विकल्प माने जाते थे। लेकिन अब डेस्टिनेशन वेडिंग ने इस इंडस्ट्री को नया आयाम दिया है। यह क्षेत्र उन युवाओं को आकर्षित कर रहा है जो क्रिएटिविटी, ट्रैवल और लोगों के साथ काम करने में रुचि रखते हैं।
इस क्षेत्र में किन स्किल्स की जरूरत होती है?
वेडिंग टूरिज्म केवल सजावट और बड़े आयोजनों तक सीमित नहीं है। इसमें कम्युनिकेशन, प्लानिंग, टीमवर्क, बजट मैनेजमेंट और गेस्ट हैंडलिंग जैसी स्किल्स बेहद जरूरी होती हैं।
इस क्षेत्र में सफल होने के लिए छात्रों को इवेंट कोऑर्डिनेशन, हॉस्पिटैलिटी मैनेजमेंट, सोशल मीडिया की समझ, पब्लिक कम्युनिकेशन और समस्या समाधान जैसी क्षमताएं विकसित करनी चाहिए। क्योंकि डेस्टिनेशन वेडिंग में यात्रा, होटल, मेहमान, लोकल कल्चर और अलग-अलग सेवाओं का बेहतर तालमेल जरूरी होता है।
शिक्षा संस्थान भी दे रहे हैं महत्व
भारत में डेस्टिनेशन वेडिंग के बढ़ते बाजार को देखते हुए कई हॉस्पिटैलिटी और टूरिज्म संस्थान अब वेडिंग टूरिज्म को एक उभरते क्षेत्र के रूप में शामिल कर रहे हैं। छात्रों के बीच भी इस सेक्टर को लेकर रुचि बढ़ रही है, क्योंकि इसमें ट्रैवल, मैनेजमेंट और क्रिएटिविटी का अनोखा मिश्रण देखने को मिलता है।
भविष्य में और बढ़ेगा वेडिंग टूरिज्म
कई लोग अब भी वेडिंग टूरिज्म को केवल सोशल मीडिया से जुड़ा ट्रेंड मानते हैं, लेकिन इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स का कहना है कि आने वाले समय में यह सेक्टर और तेजी से बढ़ेगा। आज लोग पारंपरिक समारोहों की बजाय अनुभवों को ज्यादा महत्व दे रहे हैं।
लक्जरी ट्रैवल, कस्टमाइज्ड इवेंट्स और खास डेस्टिनेशन की बढ़ती मांग के साथ वेडिंग टूरिज्म में प्रोफेशनल्स की जरूरत लगातार बढ़ेगी। यही वजह है कि यह क्षेत्र अब हॉस्पिटैलिटी और टूरिज्म इंडस्ट्री का एक मजबूत हिस्सा बनता जा रहा है।
वेडिंग टूरिज्म का भविष्य
आज लोग केवल शादी नहीं, बल्कि यादगार अनुभव चाहते हैं। परिवार ऐसी शादी की तलाश में हैं जो जिंदगीभर की खूबसूरत याद बन सके। इसी वजह से वेडिंग टूरिज्म तेजी से लोकप्रिय हो रहा है।
विशेषज्ञ मानते हैं कि आने वाले वर्षों में पर्यटन, लक्जरी हॉस्पिटैलिटी और डिजिटल संस्कृति के विस्तार के साथ यह इंडस्ट्री और बड़ी होगी। हॉस्पिटैलिटी, ट्रैवल, लक्जरी मैनेजमेंट और इवेंट प्लानिंग में रुचि रखने वाले छात्रों के लिए वेडिंग टूरिज्म अब एक आकर्षक और भविष्य वाला करियर विकल्प बनकर उभर रहा है।
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आज की तेज भागती-दौड़ती दुनिया में शिक्षा जगत की नवीनतम जानकारियों और ताजा गतिविधियों से परिचित रहना शिक्षकों, इस क्षेत्र के प्रशासकों, छात्रों और अभिभावकों सभी के लिए समान रूप से महत्वपूर्ण है। शिक्षा के बढ़ते दायरे के साथ स्वयं को इसके अनुकूल बनाने और प्रगति के पथ पर आगे बढ़ने के लिए इससे संबंधित रुझानों, नीतियों और नवाचारों से अवगत रहना भी आवश्यक है। एडइनबॉक्स जैसा मंच शिक्षा जगत से जुड़ी हर खबर के लिए 'वन-स्टॉप डेस्टिनेशन' उपलब्ध कराता है यानी एक मंच पर सारी जरूरी जानकारियां। एडइनबॉक्स यह सुनिश्चित करता है कि आप मीडिया व शिक्षा जगत की हर हलचल, हर खबर से बाखबर रहें।
क्यों महत्वपूर्ण हैं शिक्षा जगत की खबरें?
शिक्षा जगत की खबरों से तात्पर्य इस क्षेत्र से जुड़े विविध विषयों की एक विस्तृत श्रृंखला है, पाठ्यक्रम और शिक्षण पद्धतियों में बदलाव से लेकर शैक्षिक नीतियों और सुधारों पर अपडेट तक। इसमें स्कूलों, विश्वविद्यालयों, शिक्षा प्रौद्योगिकी और शिक्षाशास्त्र में प्रगति संबंधी गतिविधियां भी शामिल हैं। शिक्षा जगत से संबंधित समाचारों से अपडेट रहना इससे जुड़े लोगों को ठोस निर्णय लेने, सर्वोत्तम विधाओं को लागू करने और शिक्षा क्षेत्र के सामने आने वाली चुनौतियों का सामना करने में मददगार साबित होता है।
मीडिया-शिक्षा की भूमिका
लेख, वीडियो, पॉडकास्ट और इन्फोग्राफिक्स सहित मीडिया-शिक्षा, शिक्षा जगत से जुड़े लोगों के बीच सूचना के प्रसार और महत्वपूर्ण विमर्शों को आगे बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। चाहे वह नवीन शिक्षण पद्धतियां की खोज हो, सफलता की गाथाओं को लोगों के समक्ष लाना हो, या फिर शिक्षकों के सामने आने वाली चुनौतियों पर चर्चा की बात हो, मीडिया-शिक्षा शिक्षण और सीखने के अनुभवों को बढ़ाने के लिए मूल्यवान अंतर्दृष्टि और संसाधन मुहैया कराती है।
एडइनबॉक्स: शैक्षिक समाचारों का भरोसेमंद स्रोत
एडइनबॉक्स शिक्षा जगत की खबरों की व्यापक कवरेज को समर्पित एक अग्रणी मंच है। यह आपके लिए एक जरूरी साधन है, जो आपके लक्ष्यों के संधान में आपकी मदद करता है क्योंकि यहां आपके लिए है:
विविधतापूर्ण सामग्री: एडइनबॉक्स दुनियाभर से शिक्षा के तमाम पहलुओं का समावेश करते हुए लेख, साक्षात्कार, वीडियो और पॉडकास्ट सहित विविध प्रकार की सामग्री उपलब्ध कराता है। चाहे आपकी रुचि के विषयों में के-12 शिक्षा, उच्च शिक्षा, एडटेक, या शैक्षिक नीतियां शामिल हों, एडइनबॉक्स पर आपको इससे संबंधित प्रासंगिक और महत्वपूर्ण सामग्री मिलेगी।
समय पर अपडेट: शिक्षा तेज गति से विकास कर रहा क्षेत्र है, जहां की नवीनतम गतिविधियों से अपडेट रहना हर किसी के लिए जरूरी है। और, एडइनबॉक्स वह मंच है जो शिक्षा जगत की हर नवीन जानकारियों को समय पर आप तक पहुंचाकर आपको अपडेट करता है। यह सुनिश्चित करता है कि आप इस क्षेत्र की हर गतिविधि को लेकर जागरूक रहें। चाहे वह ब्रेकिंग न्यूज हो या इसका गहन विश्लेषण, आप खुद को अपडेट रखने के लिए एडइनबॉक्स पर भरोसा कर सकते हैं।
विशेषज्ञ अंतदृष्टि: एडइनबॉक्स का संबंध शिक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञों और विचारवान प्रणेताओं से है। ख्यात शिक्षकों और शोधकर्ताओं से लेकर नीति निर्माताओं और उद्योग के पेशेवरों तक, आप इस मंच पर मूल्यवान अंतदृष्टि और दृष्टिकोण से परिचित होंगे जो आपको न सिर्फ जागरूक करता है बल्कि आपके निर्णय लेने की प्रक्रिया को भी धारदार बनाता है।
इंटरएक्टिव समुदाय: एडइनबॉक्स पर आप शिक्षकों, प्रशासकों, छात्रों और अभिभावकों के एक सक्रिय व जीवंत समूह के साथ जुड़ सकते हैं। इस मंच पर आप अपने विचार साझा करें, प्रश्न पूछें, और उन विषयों पर चर्चा में भाग लें जो आपके लिए महत्वपूर्ण हैं। समान विचारधारा वाले व्यक्तियों से जुड़ें और अपने पेशेवर नेटवर्क का भी विस्तार करें।
यूजर्स के अनुकूल इंटरफेस: एडइनबॉक्स की खासियत है, यूजर्स के अनुकूल इंटरफेस। यह आपकी रुचि की सामग्री को नेविगेट करना और खोजना आसान बनाता है। चाहे आप लेख पढ़ना, वीडियो देखना या पॉडकास्ट सुनना पसंद करते हों, आप एडइनबॉक्स पर सब कुछ मूल रूप से एक्सेस कर सकते हैं।
तेजी से बदलते शैक्षिक परिदृश्य में, इस क्षेत्र की हर गतिविधि से परिचित होना निहायत जरूरी है। एडइनबॉक्स एक व्यापक मंच प्रदान करता है जहां आप शिक्षा जगत के नवीनतम समाचारों तक अपनी पहुंच बना सकते हैं, विशेषज्ञों और समूहों के साथ जुड़ सकते हैं और शिक्षा के भविष्य को आकार देने वाली नई पहल को लेकर अपडेट रह सकते हैं। चाहे आप एक शिक्षक हों जो नवीन शिक्षण पद्धतियों की तलाश में हों, नीतियों में बदलाव पर नजर रखने वाले व्यवस्थापक हों, या आपके बच्चों की शिक्षा को लेकर चिंतित माता-पिता, एडइनबॉक्स ने हर किसी की चिंताओं-आवश्यकताओं को समझते हुए इस मंच को तैयार किया है। आज ही एडिनबॉक्स पर जाएं और शिक्षा पर एक वैश्विक विमर्श में शामिल हों!
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