Edinbox Hindi

आधी आबादी की उपलब्धि : शोध के क्षेत्र में भारतीय महिलाओं का बढ़ता प्रतिनिधित्व

हाल ही में वैज्ञानिक सूचना प्रसारक एल्सेवियर की ‘शोध और नवाचार में लैंगिक समानता की दिशा में प्रगति – 2024 की समीक्षा’ शीर्षक से एक रिपोर्ट आयी है। इस रिपोर्ट में यह खुलासा किया गया है कि भारत में महिला शोधकर्ताओं की संख्या तेजी से बढ़ रही है और इस वृद्धि में भारत दुनिया में तीसरे स्थान पर है। हालांकि रिपोर्ट में साथ  ही यह भी कहा गया है कि इसके बावजूद शोध क्षेत्र में वैश्विक स्तर पर लैंगिक असमानता के चलते पुरुषों के मुकाबले अधिक चुनौतियों का सामना करना पड़ता है।  

जाहिर है कि भारत में महिला शोधकर्ताओं की संख्या में तेजी से वृद्धि लैंगिक समानता के लिए चल रहे प्रयासों को उजागर करती है और यह वास्तव में उत्साहजनक है। इसे सकारात्मक माना जाना चाहिए। खासकर इसे देखते हुए और भी कि शोध जैसे क्षेत्र में पुरुषों का हमेशा से दबदबा रहा है। ऐसे में भारत के सन्दर्भ में यह प्रगति तो और भी उल्लेखनीय है। साफ़ है कि हमने अधिक समावेशी शैक्षणिक वातावरण बनाने में महत्वपूर्ण प्रगति की है, लेकिन चुनौतियां अभी भी शेष हैं। 

दरअसल, भारत में पिछले 10 वर्षों में सक्रिय महिला शोधकर्ताओं की संख्या प्रति वर्ष 2 फीसदी की दर से बढ़ रही है। इस अवधि के दौरान केवल मिस्र और नीदरलैंड्स में महिला शोधकर्ताओं की संख्या में तेजी से वृद्धि देखी गई है। एल्सेवियर रिपोर्ट में 20 वर्षों में कई विषयों और भौगोलिक क्षेत्रों में समावेश और विविधता का विश्लेषण करते हुए पाया गया कि भारत में अब महिलाएं सक्रिय शोधकर्ताओं का 33 प्रतिशत हिस्सा हैं। वहीं, जापान में यह 22 प्रतिशत और मिस्र में 30 प्रतिशत है। इसमें कहा गया है कि भारत अब दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा शोध उत्पादक देश है।

जैसा कि ऊपर ज़िक्र किया गया है कि भारत के सन्दर्भ में यह उपलब्धि और भी ख़ास है। जहाँ स्त्री शिक्षा ही अब तक चुनौती बानी हुई है, वहां स्वास्थ्य विज्ञान के क्षेत्र में भारत में 2022 में शोधकर्ताओं की संख्या में पुरुषों और महिलाओं की संख्या लगभग समान हो जाना बड़ी बात है। रिपोर्ट में बताया गया है कि भारत में सभी सक्रिय शोधकर्ताओं में से 41 प्रतिशत महिलाएं थीं। यह 40-60 प्रतिशत के बीच का संतुलन या लिंग समानता के तौर पर माना जाता है। वहीं, देश में जीवन विज्ञान के शोध क्षेत्र में लैंगिक समानता 2021 में हासिल कर ली गई थी। जीवन विज्ञान में 2022 तक महिला शोधकर्ताओं ने सक्रिय शोधकर्ताओं के 43 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व किया। उधर, वैश्विक स्तर पर स्वास्थ्य विज्ञान शोध के क्षेत्र में 2022 तक सक्रिय शोधकर्ताओं में महिला शोधकर्ताओं का हिस्सा 41 रहा। यह महिलाओं का स्वास्थ्य विज्ञान में मजबूत प्रतिनिधित्व था। यानी भारत अब वैश्विक स्तर पर मामले में अन्य देशों के साथ कदमताल कर रहा है। 

रिपोर्ट बताती है कि महिलाओं ने पुरुषों के मुकाबले बहुत कम पेटेंट आवेदन भी दायर किए हैं। साल 2022 तक किए पेटेंट आवेदनों में से तीन-चौथाई या तो अकेले पुरुषों ने या केवल पुरुषों वाली टीमों ने दायर किए हैं। लगभग सभी पेटेंट दाखिल करने वाली टीमों (97 प्रतिशत) में कम से कम एक पुरुष है। इसके उलट, 2022 तक केवल तीन प्रतिशत पेटेंट आवेदन केवल महिलाओं वाली टीमों ने दायर किए हैं।

रिपोर्ट में कहा गया है कि संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों पर काम करने वाले सक्रिय शोधकर्ताओं में महिलाओं की संख्या सबसे अधिक है। वैश्विक स्तर पर जटिल चुनौतियों को हल करने के लिए महत्वपूर्ण माने जाने वाले बहु-विषयक शोध में पुरुषों के मुकाबले में महिलाओं की संख्या थोड़ी अधिक है।

रिपोर्ट बताती हैं कि बीते दो दशकों में महिलाओं ने शोध के क्षेत्र में प्रगति की है, लेकिन सभी क्षेत्रों में समान नहीं रही है। उदाहरण के लिए, भौतिक विज्ञान में सक्रिय शोधकर्ताओं में महिलाओं की संख्या महज 33 प्रतिशत ही है। रिपोर्ट कहती है कि वर्तमान दर पर वैश्विक स्तर पर शोध में लैंगिक समानता अभी दूर की कौड़ी है। हालांकि अनुमान लगाया गया है कि शोध के क्षेत्र गणित, इंजीनियरिंग और कंप्यूटर विज्ञान में महिला शोधकर्ताओं की संख्या बढ़ रही है। ऐसे में उम्मीद की जानी चाहिए कि आने वाले वर्षों में पूरी तरह से लैंगिक समानता की ओर हम भारत को बढ़ते देख सकते हैं।

 

Asmita Sarkar

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed