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शिक्षा व्यवस्था को कमजोर कर रही हैं परीक्षाएं

एक के बाद एक परीक्षाओं की विश्वसनीयता को लेकर उठने वाले सवालों से दरअसल परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसी पर नहीं, बल्कि देश की शिक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े हो रहे हैं। परीक्षा में अक्सर छात्र-छात्राएं फेल-पास होते हैं। सबसे बड़ा सच तो यह है कि परीक्षा में खुद परीक्षा फेल हो जाती है। परीक्षा में छात्रों के अलावा अन्य कारकों पर ध्यान ही नहीं दिया जाता। तात्पर्य यह कि परीक्षा में केवल छात्र-छात्राएं फेल नहीं होते, उनके साथ पाठ्यक्रम, पाठ्यपुस्तक, शिक्षा-प्रणाली, शिक्षा-प्रशिक्षण, शिक्षा-व्यवस्था और अभिभावक की चेतना भी फेल होती है। अक्सर छात्रों के फेल-पास का तो मूल्यांकन होता है, मगर उक्त कारकों का या तो मूल्यांकन होता नहीं, या होता भी हो तो उसे प्रकट नहीं किया जाता।

20वीं सदी की शुरुआत में रूस के महान क्रांतिकारी पीटर क्रोपोटकिन ने उन नौजवानों के लिए एक छोटी सी पुस्तिका लिखी थी, जो अपनी स्कूली पढ़ाई खत्म करने के बाद कोई करियर अपनाना चाहते हैं। क्रोपोटकिन इसमें बताते हैं कि जो डॉक्टर बनना चाहते हैं, उनकी सोच क्या होनी चाहिए और जो इंजीनियर-प्रोफेसर वगैरह बनना चाहते हैं, उनका जज्बा कैसा होना चाहिए? क्रोपोटकिन यह मानकर चल रहे थे कि जो बच्चे स्कूली शिक्षा पूरी चुके हैं, उन्होंने बहुत कुछ सीख-जान लिया होगा, इसके बाद असल सवाल उनकी सोच व जज्बे का ही बच जाता है। इससे ही अच्छे प्रोफेशनल तैयार हो सकते हैं, बाकी का ज्ञान तो वे जिस संस्थान में जाएंगे, वहां उनको मिल ही जाएगा। 

करियर अपनाने के लिए नीट, जेईई, नेट जैसी परीक्षाओं वाले हमारे समाज में सोच और जज्बा ही वे दो चीजें हैं, जिनको अब कोई नहीं पूछता। अक्सर कहा जाता रहा है कि भारत में शिक्षा व्यवस्था तो दरअसल है ही नहीं। बस एक परीक्षा व्यवस्था है। इसे जो पास कर लेता है, वह योग्य व विद्वान मान लिया जाता है। कुछ पढ़ा-नहीं पढ़ा, कुछ सीखा नहीं सीखा इससे मतलब नहीं रह जाता। ज्ञान की असल कसौटी प्रश्न-पत्र में छपे कुछ सवाल हैं। किसी भी जुगत से उनको हल करने वाला हर बाधा को पार कर जाता है। क्या जाना, क्या समझा, क्या गुना, क्या सीखा इसके आगे ये सब निरर्थक हैं। 

पूरी पीढ़ी के अच्छे भविष्य की बाधा जब परीक्षा ही है, तो व्यवसाय के इस युग में इसे पार कराने के बहुत से कारोबार भी शुरू हो गए हैं। कोचिंग है, ट्यूशन है, गाइड बुक हैं और अब तो ऑनलाइन व्यवस्थाएं भी हैं। बाकी कई कारोबार की तरह इस सारे कारोबार की निचले तल पर एक स्याह दुनिया भी है, जहां नियमित रूप से पेपर लीक होते हैं। कीमत दीजिए, प्रश्न-पत्र परीक्षा से पहले ही हासिल कर लीजिए। फिर भी अगर दिक्कत है, तो सॉल्वर गैंग है, वह आप तक प्रश्नों के जवाब पहुंचा देगा। यहां तक कि मोटी रकम लेकर आपकी जगह परीक्षा देने वाले भी मिल जाएंगे।

परीक्षाएं स्कूल-व्यवस्था की खोज का परिणाम हैं। स्वदेशी स्कूलों को मिटा कर जब मैकाले मॉडल की शिक्षा लागू की गई, तो परीक्षा भी स्कूलों, कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और संस्थानों में भर्ती हो गई। परीक्षा शुरू होने से आज तक परीक्षाएं विवाद में रहीं, कभी पास-फेल की नीति को लेकर, कभी दबाव या तनाव के मनोविज्ञान को लेकर, कभी अंक-श्रेणी प्रणाली को लेकर, कभी साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक परीक्षण और त्रैमासिक, अर्द्धवार्षिक, वार्षिक प्रारूप को लेकर, तो कभी परीक्षा को योग्यता अर्जित करने, न करने के मापदंड को लेकर। गुणवत्ता के नाम पर कभी एमएलएल यानी न्यूनतम अधिगम स्तर को लेकर, यानी एक इकाई में जो निर्धारित है, उसे निश्चित अवधि में सौ प्रतिशत सीखने की दक्षता हासिल कर लेना।

हमारे स्कूल भी बहुत हद तक कोचिंग संस्थानों सा काम करते हैं। उनका लक्ष्य भी बच्चों को परीक्षा पास कराना भर होता है। परीक्षा कक्षावार प्रोन्नति की पद्धति है। वह श्रेष्ठ, कम श्रेष्ठ, अश्रेष्ठ में विभाजन करती है। गांव-शहर, सरकारी-निजी, उच्च कॉरपोरेट घराने और शिशु मंदिर, गरीबों की बस्तियों के उपेक्षित स्कूल, मदरसे, विशेष बच्चों के स्कूल, अल्पसंख्यक स्कूल तो स्कूलों की वर्तमान परिभाषा में शामिल हैं, लेकिन कोचिंग कक्षाएं स्कूल न होकर पास कराने की गारंटी देती दुकानें हैं। परीक्षा प्रतियोगिता पैदा करती है और प्रतियोगिता तनाव पैदा करती है। एक-दो अंकों, विषयों में कम-ज्यादा नंबर या श्रेणियों या पास-फेल के कारण जब बच्चे आत्महत्या करते या अवैधानिक तरीकों का इस्तेमाल करते हैं, या परीक्षा बोर्ड तरह-तरह के घोटाले और भ्रष्टाचार करते हैं, तो लगता है, परीक्षाएं तो शिक्षा के साथ, बच्चों के साथ, समाज के साथ एक प्रकार का धोखा है।

इन दिनों लगभग हर दूसरी या तीसरी परीक्षा के पर्चे लीक हो रहे हैं और उनमें से कई को मजबूरीवश रद्द भी करना पड़ रहा है। नीट और नेट के मामले में जो सीबीआई की जांच चल रही हैं, उम्मीद है कि वे अंजाम तक पहुंचेंगी और दोषियों को सजा भी मिलेगी। मगर शायद समस्या इससे खत्म नहीं होगी। अगर ऐसा होता, तो हम न जाने कब अपराधमुक्त समाज बन चुके होते। वैसे भी शिक्षा की समस्याएं फौजदारी से हल होने वाली चीज नहीं हैं। इसके लिए लंबे विमर्श की जरूरत है। जब तक तीन घंटे में प्रश्न-पत्र को हल करने की व्यवस्था बौद्धिकता व योग्यता का पैमाना बनी रहेंगी, इससे जुड़ी समस्याएं बढ़ती रहेंगी। इसलिए विकल्प खोजते समय उस सोच व जज्बे की जरूरत का भी ध्यान रखना होगा, जिसकी बात पीटर क्रोपोटकिन ने की थी।

परीक्षा को लेकर कुछ विकल्प भी तलाशे गए। वार्षिक परीक्षा के बजाय सेमेस्टर प्रणाली लागू कर हर छह माह में परीक्षा और निर्धारित टेस्टों को आजमाया गया। कॉलेजों में सेमिनार-प्रणाली से पेपर रीडिंग का प्रावधान किया गया, लेकिन सेमेस्टर प्रणाली का यह परिणाम निकला कि उस प्रणाली का ही विरोध शुरू हो गया। तर्क यह है कि इस प्रणाली से पाठ्यक्रम पूरा नहीं होता। यह तर्क आंशिक सच हो सकता है। जिस प्रमाण-पत्रीकरण को लेकर परीक्षा की आलोचना शिक्षा आयोगों और राममूर्ति और यशपाल समितियो ने की थी, वह परीक्षा प्रमाणीकरण से मुक्त नहीं हो सकी, क्योंकि अब तो परीक्षा एक विभाग है और बोर्डों के अफसरों, कर्मचारियों, उत्तर पुस्तक जांचने और प्रश्नपत्र बनाने वालों की रोजी-रोटी है।

Asmita Sarkar

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