
जोड़-तोड़ की सरकार अब भरोसे के लायक भी नहीं बची है। युवाओं के साथ खेल इस तरह से खेला जा रहा है कि परीक्षार्थी अब सुनहरे सपने के बजाय आज़ादी के अमृत काल में विषपान को विवश हो रहे हैं। दुर्दांत अपराधी हैं, जो युवाओं के वर्तमान और भविष्य के साथ खेल रहे हैं, लेकिन उस रहनुमाई व्यवस्था को लेकर क्या कहा जाए जो दावा तो आज़ादी के अमृतकाल और अच्छे दिनों का करती है? ऐसे में कहां गए उसके वो दावे और वादे, जिसकी बिसात पर सत्ता की मद में आमद होकर सियासतदानों ने एक दशक के क़रीब करोड़ों-अरबों रुपए बना लिए, लेकिन युवाओं को मिला तो सिर्फ़ खोखले वादे और पेपर लीक वाली सरकारी व्यवस्था! पेपर लीक किसी एक सरकार में उपजी कोई फौरी समस्या नहीं है, लेकिन बनी-बनाई व्यवस्था की धज्जियाँ उड़ाने का काम आज़ादी के अमृतकाल के नाम पर हो, तो शोक सभा व्यवस्था और व्यवस्थापक दोनों के नाम पर होना चाहिए। शब्दों का मायाजाल थोड़ा चुभने वाला हो सकता है, लेकिन परीक्षा का जो भ्रमजाल बनाकर युवाओं का भविष्य, उनका वर्तमान, उनका समय और उनका परीक्षा फॉर्म के नाम पर पैसा बर्बाद किया जा रहा उससे कहीं कम है सरकारी तंत्र के लिए इन शब्दों की चुभन। दर्द जब बेइंतहा उठने लगें तो उसकी वेदना में सरकार और उसका सरकारी तंत्र दोनों बेईमानी लगता है।
वर्तमान समय का आलम कुछ यूं ही है। सरकारी तंत्र ने नेट की परीक्षा रद्द करने का एक फरमान जारी किया है। वह भी आज़ादी के अमृतकाल वाले लैटर हैड पर। अब ज़रा सोचिए आज़ादी का ये कैसा अमृत महोत्सव है? जहां युवाओं को पिलाया ज़हर का घूंट जा रहा। निःसन्देह युवाओं की वेदना, पीड़ा और रुदन किसी विष का पान करने से कम नहीं है। पहले नीट की परीक्षा में धांधली और अब नेट की परीक्षा रद्द। उसके बाद लगातार राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं जैसे सीआईएसआर नेट का स्थगित होना। ये साबित करता है कि देश में सरकारी पात्रता परीक्षाओं का हाल ऐसा है, जैसे किसी मुहल्ले के स्कूल की परीक्षा। सच पूछिए तो इतनी धांधली तो राज्यस्तरीय परीक्षाओं में नहीं होती। जितना अब राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाओं में धांधली हो रही है। नीट परीक्षा का आलम यह हुआ कि औने-पौने हिसाब से नंबर बांट दिया गया। नीट परीक्षा में नंबर इस तरह से प्रसाद में बांटे गए जैसे किसी सत्यनारायण कथा के बाद प्रसाद। वैसे महंगाई के इस दौर में प्रसाद भी सोच-समझकर बांटा और बनवाया जाता है, लेकिन एक हमारे देश की शिक्षा-व्यवस्था है। जहां सोच-समझकर लगता है कोई काम नहीं हो रहा। परीक्षा फॉर्म के नाम पर करोड़ों-अरबों रुपए बार-बार वसूले जाते हैं। साल-दो साल के भीतर परीक्षा फॉर्म के लिए लगने वाली फ़ीस बढ़ा दी जाती है, लेकिन युवाओं के जीवन में परीक्षा के बाद कोई सार्थक परिवर्तन देखने को नहीं मिलता। तभी तो युवाओं का भविष्य अंधकार में है और मजबूत और सुरक्षित हाथों में जिसके देश की सरकार है। वो नेट जैसी परीक्षा को रद्द करवाकर जांच सीबीआई को सौंपकर ही भारत माता भाग्य विधाता की धुन में मदमस्त है।
राजस्थान, मध्यप्रदेश जैसे तमाम राज्य हैं जहां की प्रादेशिक परीक्षाओं में धांधली और पेपर लीक जैसी समस्याएं आम बात रही हैं। लेकिन अब राष्ट्रीय स्तर की परीक्षाएं और एनटीए जैसा बड़ा संगठन अगर परीक्षाएं बेहतर तरीके से नहीं करवा पा रहा है, तो उसकी प्रसांगिकता पर सवाल उठना लाज़िमी है। वैसे भी नेट की परीक्षा केवल सरकारी खजाना भरने के अलावा ज्यादा महत्व रखता नहीं, क्योंकि हर छह महीने में 10 लाख के क़रीब अभियार्थी फॉर्म भरते हैं और परीक्षा के बाद का लब्बोलुआब सिर्फ़ एक सर्टिफिकेट होता है। जिसके बाद न तो पीएचडी में एडमिशन मिलता और न ही अस्सिस्टेंट प्रोफेसर के रूप में नियुक्ति। ऐसे में रहनुमाई व्यवस्था और उनके सिपह-सालारों से सवाल यही है कि क्या उनके बच्चों के भविष्य के साथ ऐसे खिलवाड़ होता तो उनके आंखों का पानी मरा रह पाता? सवाल बहुतेरे हैं, लेकिन जवाब देने से अब सत्ता और सत्ताधीश डरते नहीं या देना चाहते नहीं हैं। तभी तो कई मर्तबा अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर भी सवाल उठता है। वैसे अब बात सिर्फ़ अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता नहीं, जीवन जीने की स्वतंत्रता और जीवन में सफल होने की चुनौती बहुत बड़ी हो चली है, क्योंकि सरकारी नौकरी ही आज की सामाजिक व्यवस्था में सर्वस्वीकार्य है और उसके लिए आयोजित परीक्षाएं ही धांधली की शिकार है। सियासतदां, युवाओं का दर्द समझ नहीं सकते, क्योंकि उनके बच्चे या तो बड़े राजनीतिक पद पर हैं या बिज़नेस में हैं। वरना विदेश में नेताजी की कमाई से उच्च गुणवत्ता की शिक्षा अर्जित कर रहे हैं। ऐसे में एक कहावत याद आती है कि, जाके पाँव न फटी बिवाई, वो क्या जाने पीर पराई! – सोनम लववंशी
(ये लेखक के अपने विचार हैं)




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