
मद्रास हाईकोर्ट ने तमिलनाडु सरकार से राज्य के सभी सरकारी स्कूलों से जाति/समुदाय के नाम हटाने को कहा है। हाईकोर्ट ने इस संबंध में मुख्य सचिव को उचित कार्रवाई शुरू करने के निर्देश दिए हैं।
न्यायमूर्ति एसएम सुब्रमण्यम और न्यायमूर्ति सी कुमारप्पन की खंडपीठ कल्लाकुरिची जहरीली शराब त्रासदी के बाद स्वत: शुरू की गई कार्यवाही पर आगे अंतरिम आदेश पारित कर रही थी। पीठ ने कहा कि उसके संज्ञान में लाया गया है कि उस इलाके (कलवरायण पहाड़ियों) में ‘‘सरकारी आदिवासी आवासीय विद्यालय’’ के नाम से सरकारी स्कूल संचालित हो रहे हैं। सरकारी स्कूल के नाम के साथ ‘आदिवासी’ शब्द का इस्तेमाल उचित नहीं है।
पीठ ने कहा कि स्कूल के नाम में इस तरह के इस्तेमाल से निस्संदेह वहां पढ़ने वाले बच्चों पर इसका असर पड़ेगा। उन्हें लगेगा कि वे ‘आदिवासी स्कूल’ में पढ़ रहे हैं और ऐसे संस्थान में नहीं पढ़ रहे जहां आस-पास के अन्य बच्चे पढ़ रहे हैं। किसी भी परिस्थिति में बच्चों को कलंकित करने को अदालतों और सरकार द्वारा मंजूरी नहीं दी जानी चाहिए। पीठ ने कहा कि यह दुखद है कि 21वीं सदी में भी सरकार उसके द्वारा संचालित स्कूलों में ऐसे शब्दों के इस्तेमाल की अनुमति दे रही है जो जनता के पैसे से संचालित हो रहे हैं।
पीठ ने कहा कि जहां भी ऐसे नामों का इस्तेमाल किसी विशेष समुदाय/जाति को इंगित करने के लिए किया जाता है, उन्हें हटा दिया जाना चाहिए और संस्थानों का नाम ‘सरकारी स्कूल’ रखा जाना चाहिए। उस इलाके में रहने वाले बच्चों को अपनी शिक्षा जारी रखने के लिए वहां प्रवेश दिया जाना चाहिए।
पीठ ने कहा कि सामाजिक न्याय में अग्रणी राज्य होने के नाते तमिलनाडु, सरकारी स्कूलों या किसी भी सरकारी संस्थान के नाम में ‘उपसर्ग’ या ‘प्रत्यय’ जैसे कलंकपूर्ण शब्दों को जोड़ने की अनुमति नहीं दे सकता है। इस संबंध में तमिलनाडु सरकार के मुख्य सचिव को उचित कार्रवाई शुरू करनी होगी।




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