
बंबई उच्च न्यायालय ने उच्च शिक्षण संस्थानों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों द्वारा खुदकुशी करने की बढ़ती घटनाओं को ‘चिंताजनक’ बताते हुए अधिकारियों से तत्काल कदम उठाने को कहा है। बॉम्बे उच्च न्यायालय ने एक याचिका पर सुनवाई करते हुए उक्त बातें कहीं। मुख्य न्यायाधीश डी.के. उपाध्याय और न्यायमूर्ति अमित बोरकर की खंडपीठ ने यह भी कहा कि एक विद्यार्थी के लिए मानसिक और शारीरिक तंदरुस्ती बेहद जरूरी है।
दरअसल, बॉम्बे हाई कोर्ट में बाल अधिकार कार्यकर्ता शोभा पंचमुख द्वारा छात्रों में आत्महत्या की बढ़ती दर पर चिंता व्यक्त करते हुए एक याचिका दायर की गई थी। इस याचिका में उच्च न्यायालय से मुंबई विश्वविद्यालय (एमयू) को छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य से निपटने के लिए परामर्शदाताओं को शामिल करने के लिए सभी संबद्ध/संबद्ध कॉलेजों को एक परिपत्र जारी करने का निर्देश देने का आग्रह किया गया था। इस जनहित याचिका में उच्च शिक्षा प्राप्त छात्रों में आत्महत्या की प्रवृत्ति को रोकने के लिए अपर्याप्त उपायों पर प्रकाश डाला गया।
पीठ ने कहा, “ऐसी स्थिति चिंताजनक है और सभी संबंधित पक्षों द्वारा तत्काल उपाय किए जाने की आवश्यकता है। महाराष्ट्र विश्वविद्यालय अधिनियम के तहत कॉलेजों, विश्वविद्यालयों और संस्थानों में स्वस्थ माहौल को बढ़ावा देने और छात्रों के कल्याण को सुनिश्चित करने के लिए विश्वविद्यालय कानूनी रूप से बाध्य हैं।” अदालत ने कहा, “हमारी राय में, विश्वविद्यालय का यह कर्तव्य है कि वह कॉलेज और संस्थानों में ऐसा माहौल बनाने के लिए कदम उठाए, जहां आत्महत्या की घटनाएं न हों।”
पीठ ने याचिकाकर्ता को निर्देश दिया कि वह याचिका में प्रतिवादी के रूप में विश्वविद्यालय अनुदान आयोग को शामिल करे, क्योंकि कई कॉलेज अब स्वायत्त हो रहे हैं। उच्च न्यायालय ने महाराष्ट्र सरकार, एमयू और उच्च एवं तकनीकी शिक्षा विभाग को तीन सप्ताह के भीतर हलफनामा दाखिल करने को कहा।




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