
आज लाठी उठाई है, अगर बात नहीं बनी तो हथियार उठाने के लिए तैयार हैं। यह शेख हसीना को तय करना है कि वह पद से हटेंगी या पद पर बने रहने के लिए रक्तपात का सहारा लेंगी। यह अल्टीमेटम दिया था ढाका विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले नाहिद इस्लाम ने। और इत्तेफ़ाक़ देखिये कि यह अल्टीमेटम रविवार को दिया गया और इसके महज दूसरे दिन ही यानी सोमवार को बांग्लादेश की सत्ता पर पिछले दो दशकों से काबिज प्रधानमंत्री शेख हसीना को न सिर्फ अपने पद से इस्तीफ़ा देना पड़ा बल्कि देश छोड़ कर भागने को भी वे मजबूर हो गयीं। 15 साल के उनके अनवरत शासन पर विराम लग गया।
आश्चर्यजनक है कि महज एक महीने पहले शुरू हुए एक छात्र आंदोलन ने शेख हसीना की सत्ता को ज़मीन पर ला दिया। आरक्षण विरोधी इस आंदोलन की शुरुआत मात्र तीन छात्रों से हुई थी। नाहिद इस्लाम उनमें से एक हैं। दो अन्य छात्र- आसिफ महमूद और अबू बकर मजूमदार भी ढाका विश्वविद्यालय के ही स्टूडेंट हैं जिन्होंने इस आरक्षण विरोधी आंदोलन की नींव रखी थी। वह आंदोलन जिसने पूरे देश को सड़कों पर ला कर खड़ा कर दिया। और परिणाम एक सत्ता की समाप्ति हुई।
विश्वविद्यालय के कैंपस से आंदोलन शुरू कर इन तीन छात्र नेताओं ने हसीना को सत्ता की कुर्सी से उतारकर देश छोड़ने पर मजबूर कर दिया। निःसंदेह इस आंदोलन का सबसे बड़ा चेहरा नाहिद इस्लाम और उनके सहयोगी आसिफ महमूद और अबू बकर मजूमदार हैं, लेकिन इसने इस बात की भी तस्दीक की है कि छात्र शक्ति के आगे बड़ी बड़ी ताकतें कैसे नतमस्तक हो जाया करती हैं। आइये, यहाँ आंदोलन के इन तीन मुख्य चेहरों या कहें इन तीन छात्रों के बारे में कुछ ज़रूरी ज़िक्र के साथ आंदोलन की पृष्ठभूमि और इसके प्रभाव की टोह लेने की कोशिश करते हैं।
नाहिद इस्लाम, आसिफ महमूद और अबू बकर मजूमदार ढाका विश्वविद्यालय में पढ़ाई कर रहे हैं। इन तीनों छात्रों ने स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन मूवमेंट का नेतृत्व किया था और सरकार से मांग की थी कि नई कोटा प्रणाली में बदलाव किया जाए। जब बदलाव करने से सरकार ने मना कर दिया तो इन्हीं तीनों छात्रों की अगुवाई में आंदोलन शुरु हुआ। 19 जुलाई को इन तीनों छात्रों को अगवा कर लिया गया था। इस दौरान इनके साथ मारपीट भी की गई लेकिन बाद में इन्हें छोड़ दिया गया। छुटने के बाद इन तीनों छात्रों ने फिर से आंदोलन की कमान संभाली और इसके महज 10 दिनों में ही शेख हसीना को देश छोड़ना पड़ा।
नाहिद इस्लाम
ढाका विश्वविद्यालय में अर्थशास्त्र की पढ़ाई करने वाले नाहिद को पुलिस ने 20 जुलाई की सुबह जबरन हिरासत में ले लिया था। उसके गायब होने के 24 घंटे बाद वह एक पुल के नीचे बेहोशी की हालत में मिला। नाहिद का दावा था कि उसे लोहे की रॉड से पीट-पीटकर बेहोश कर दिया गया। 26 जुलाई को डिटेक्टिव ब्रांच ने सुरक्षा का हवाला देते हुए नाहिद को अस्पताल से हिरासत में लिया। पिटाई के बाद वाले नाहिद के चेहरे ने आंदोलन को नया रंग दिया और प्रदर्शनकारियों को भड़का दिया था।
आसिफ महमूद
दूसरा बड़ा चेहरा रहे आसिफ महमूद ढाका विवि में लैंग्वेज स्टडीज के छात्र हैं। वे जून में आरक्षण के खिलाफ देशव्यापी आंदोलन से जुड़े। 26 जुलाई को डिटेक्टिव ब्रांच ने उन्हें भी हिरासत में लिया। सोशल मीडिया पर वायरल वीडियो के मुताबिक, आसिफ को भी तगड़ी प्रताड़ना सहनी पड़ी। इन लोगों को एक इंजेक्शन लगाया गया, जिससे ये कई दिनों तक बेहोश रहे। 28 जुलाई को उसके परिवार वालों ने उनसे मिलने की अनुमति मांगी, लेकिन उन्हें मिलने नहीं दिया गया। 3 अगस्त को आसिफ ने फेसबुक पर पोस्ट करते हुए छात्रों से घर पर न रहने और नजदीकी प्रदर्शनों में शामिल होने की अपील की थी जिसके बाद बवाल बढ़ता चला गया.
अबु बकर मजूमदार
तीसरे छात्र नेता अबु बकर मजूमदार नागरिक अधिकार और मानवाधिकारों को लेकर काम करते हैं और ढाका विश्वविद्यालय में भूगोल के छात्र हैं। अबु को पुलिस ने कमरे में बंद कर आंदोलन वापस लेने का दबाव बनाया था। मना करने पर पीटा गया। पांच जून को आए हाईकोर्ट के आरक्षण वाले फैसले के बाद अबु ने दोस्तों के साथ स्टूडेंट्स अगेंस्ट डिस्क्रिमिनेशन मूवमेंट की शुरुआत की थी। अबु को 19 जुलाई की शाम धानमंडी इलाके से कुछ लोग अपने साथ ले गए थे, जिसके बाद कई दिनों तक वह लापता रहा।




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