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जेएनयू को निजी हाथों में सौंपने की तैयारी !

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय यानी जेएनयू (JNU)। राजधानी दिल्ली में लगभग 1020 एकड़ भूभाग में फैला देश के सबसे नामी विश्वविद्यालयों में से एक। गर अनगिन ख्यातियाँ इसके नाम दर्ज हैं, तो गाहे-बगाहे कुख्याति भी जुड़ी है इसके साथ। इन दिनों यह अपनी आर्थिक बदहाली को लेकर चर्चा में है, जिसकी वजह से इसकी कई प्रमुख सम्पत्तियों को बेचे जाने की तैयारी चल रही है। कई प्रॉपर्टियां किराये पर उठाने की योजना बनाई गयी है। हालांकि इस सारी कवायद के पीछे मकसद विश्वविद्यालय को आर्थिक संकट से उबारना बताया जा रहा है लेकिन आरोप लग रहे हैं कि यह दरअसल  निजीकरण गेम प्लान का एक हिस्सा है। और यही वजह है कि इसके खिलाफ विरोध के स्वर भी मुखर हो रहे हैं।  

जेएनयू छात्र संघ ने इस योजना का कड़ा विरोध किया है जिसके तहत JNU ने अपनी दो प्रॉपर्टी- गोमती गेस्ट हाउस और 35 फिरोज शाह रोड वाली बिल्डिंग- को पुनर्विकसित या पट्टे पर देने की योजना बनाई है। इसके अलावा, कैंपस में संचालित 12 राष्ट्रीय संस्थानों से किराया वसूलने का प्‍लान बनाया है। पिछले 10 दिनों से छात्रसंघ के नेता बाकायदा इसके खिलाफ अनशन पर हैं। उन्होंने इसके लिए जेएनयू छात्रों से भी आगे आकर विरोध करने की अपील की है। 

जेएनयू छात्रसंघ का साफ़ कहना है कि केंद्र सरकार ने हज़ारों करोड़ रुपया बड़े उद्योगपतियों अंबानी और अदानी का माफ कर दिया, जबकि यह राशि इस देश में अगले 12 वर्षों के लिए उच्च शिक्षा बजट की पूर्ति करने के लिए पर्याप्त है। और अब जेएनयू की वीसी विश्वविद्यालय को चलाने के लिए पैसे का रोना रो रही हैं और उसके बदले में विश्वविद्यालय की संपत्ति को बेचना चाहती हैं, यह एक साजिश है। प्रशासन परिसर को चलाने के लिए धन जुटाने हेतु गोमती गेस्ट हाउस को बेचने की योजना बना रहा है। 

गौरतलब है कि जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (JNU) की वाइस-चांसलर शांतिश्री डी पंडित ने स्वयं यह बात कही थी कि केंद्र सरकार से मिलने वाली आर्थिक मदद कम होने के चलते यूनिवर्सिटी को आर्थिक तंगी का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में यूनिवर्सिटी अपनी दो प्रॉपर्टी बेचने या किराये पर देने की योजना बना रही है। इनमें गोमती गेस्ट हाउस और 35 फिरोज शाह रोड वाली बिल्डिंग शामिल हैं। साथ ही यूनिवर्सिटी अपने कैंपस में बिना किराये के चल रहे 12 राष्ट्रीय संस्थानों से किराया वसूलने के लिए भी शिक्षा मंत्रालय से गुजारिश करने वाली है। इससे यूनिवर्सिटी का मेंटेनेंस का खर्च कम होगा, जो अभी बहुत ज्‍यादा है। 

विदित हो कि गोमती गेस्ट हाउस, जो FICCI बिल्डिंग के पास है, उस इमारत में स्थित है जहाँ जेएनयू ने इंडियन स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज के साथ अपना संचालन शुरू किया था। विजिटिंग प्रोफेसरों और प्रतिनिधियों को अक्सर इस विरासत भवन में ठहराया जाता है।  छात्रसंघ का कहना है कि एक बार जब गोमती बिक जाएगी, तो कनॉट प्लेस क्षेत्र में प्रतिनिधियों को ठहराने के लिए जेएनयू को अत्यधिक कीमत चुकाने के लिए मजबूर होना पड़ेगा। लेकिन, हमारी वीसी ने उस पर चुप रहना ही बेहतर समझा। यह उसी पुराने निजीकरण गेम प्लान का हिस्सा है, जहां सरकारें एक बार में नहीं, बल्कि टुकड़ों में संपत्ति बेचती हैं। इसके बाद, वे व्यावसायिक उद्देश्यों के लिए जेएनयू के अन्य हिस्सों को किराए पर दे सकते हैं। 

बहरहाल, यूनिवर्सिटी के कदम की वकालत करने वालों का कहना है कि फीस बढ़ोतरी पर प्रतिबंधों के कारण जेएनयू के पास धन जुटाने के सीमित विकल्प हैं। ऐसे में प्रॉपर्टियों को पट्टे पर देने और कैंपस में बिना किराये के चल रहे राष्ट्रीय संस्थानों से किराया वसूलने की योजना से यूनिवर्सिटी के लिए आय का एक नियमित स्रोत बन सकता है। इससे उसकी आर्थिक परेशानियां कम हो जाएंगी। 

गौरतलब है कि बिजली के बिलों का भार कम करने के लिए जेएनयू अपने कैंपस में सोलर पैनल लगाने जैसे कदम भी उठा रही है। यह यूनिवर्सिटी का सबसे बड़ा खर्च है। जेएनयू को उम्मीद है कि ‘इंस्टिट्यूट ऑफ एमिनेंस’ का दर्जा मिलने से उसे अच्छी आर्थिक मदद मिलेगी और यह भी उसकी आर्थिक परेशानियां कम करने में मददगार साबित होंगी। यह अलग बात कि इसका विरोध कर रहे जेएनयू छात्रसंघ ने छात्र समुदाय से गोमती गेस्ट हाउस के निजीकरण के खिलाफ खड़े होने की अपील की है और धन की कमी के इस घिसे-पीटे बहाने को खारिज करने को कहा है। उसका कहना है कि अगर सरकार देश की अधिकांश संपदा पर कुंडली मारे बैठे धन्नासेठों को लाखों करोड़ रुपये की सब्सिडी दे सकती है तो उसे उच्च शिक्षा के लिए फंड कम करने का कोई अधिकार नहीं है। 

दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के हिंदू कॉलेज में इतिहास के एसोसिएट प्रोफेसर रतन लाल इस पूरे मामले पर कहते हैं कि ‘डीयू, जेएनयू, आदि बिकेंगे तब तो निजी कॉलेज और विश्वविद्यालय खुलेंगे। यही है न्यू एजुकेशन पॉलिसी? अगर वीसी सरकार से फंड नहीं ले पा रही हैं तो उन्हें नैतिक आधार पर इस्तीफा दे देना चाहिए। उन्हें कह देना चाहिए कि मैं विश्वविद्यालय चलाने में सक्षम नहीं हूं। क्या जरूरत है वीसी बने रहने की?’

यहां उल्लेखनीय है कि जहां दूसरे देशों में शिक्षा के बजट को साल दर साल बढ़ाया जाता है, वहीं भारत में शिक्षा का बजट घटा है। 2014 में कुल बजट का 3.82 प्रतिशत हिस्सा शिक्षा के लिए था, वहीं, 2024 में यह घटकर 2.5 प्रतिशत रह गया है। केंद्र सरकार ने पिछले साल के मुकाबले इस साल के शिक्षा बजट में करीब 17 प्रतिशत की कटौती कर दी है। इस वर्ष, मोदी सरकार ने उच्च शिक्षा बजट को 2023-24 के 57,244 करोड़ रु. से घटाकर 47,620 करोड़ रु. कर दिया है।  

जेएनयू शिक्षक संघ के कार्यकारी सदस्य डॉ. अविनाश कहते हैं, ‘जहां तक विश्वविद्यालय के वित्तीय संकट की बात है तो यह सरकार की वजह से है। सरकार ने वित्तीय संकट पैदा किया है। वीसी ने वित्तीय संकट पैदा किया है। यह वित्तीय संकट नहीं है। यह सोची समझी रणनीति है। यह पब्लिक फंडेड एजुकेशन पर हमला है।  सरकार बजट बढ़ा नहीं रही है तो क्या होगा? विश्वविद्यालय की आर्थिक हालत खराब होगी ही। सरकार पहले ही शोध अनुदान और लाइब्रेरी फंड आदि में कटौती कर चुकी है। सरकार का कहना है कि टैक्स वसूली और जीएसटी वसूली बढ़ गई है, फिर ये पैसे जा कहां रहे हैं?’

रईस अहमद 'लाली'

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