
इंफोसिस के सह-संस्थापक नारायण मूर्ति ने शिक्षा में कोचिंग व्यवस्था की आलोचना की है। उनका कहना है कि कोचिंग कक्षाएं छात्रों के लिए परीक्षा पास करने का सही तरीका नहीं है। उन्होंने कहा कि सिर्फ ऐसे बच्चों को कोचिंग की जरूरत होती है, जो क्लास में टीचर की बातों पर पूरा ध्यान नहीं देते। नारायण मूर्ति बेंगलुरु में पॉल हेविट की किताब कॉन्सेप्चुअल फिजिक्स के 13वें एडिशन के विमोचन में शिरकत कर रहे थे।
मूर्ति ने कार्यक्रम में उपस्थित लोगों से कहा, “कोचिंग कक्षाएं बच्चों को परीक्षा पास करने में मदद करने का गलत तरीका है। बच्चों को कोचिंग क्लास जाने की जरूरत नहीं है। केवल उन्हीं छात्रों को कोचिंग की जरूरत महसूस होती है जो नियमित स्कूली कक्षाओं में ध्यान नहीं दे पाते हैं। शिक्षा का वास्तविक लक्ष्य रटकर परीक्षा की तैयारी करना नहीं, बल्कि आलोचनात्मक सोच को बढ़ावा देना है।”
नारायण मूर्ति ने पेरेंट्स को भी इस मौके पर बड़ी नसीहत दी। उन्होंने कहा कि बच्चों की पढ़ाई के लिए अनुशासन का माहौल बनाने की जिम्मेदारी माता-पिता की है। उन्होंने कहा कि माता-पिता खुद बैठकर फिल्में देखें और बच्चों को पढ़ने के लिए कहें, ऐसा नहीं हो सकता। माता-पिता, जो अक्सर अपने बच्चों की पढ़ाई में मदद करने में असमर्थ होते हैं, कोचिंग सेंटर को ही एकमात्र समाधान मानते हैं।
उन्होंने तेजी से बढ़ते कोचिंग उद्योग के बारे में चिंता व्यक्त की, जो सालाना 58,000 करोड़ रुपये से अधिक हो गया है और हर साल 19-20% की दर से बढ़ रहा है। मूर्ति ने कहा कि यह भारत की शिक्षा प्रणाली में एक गहरी समस्या की ओर इशारा करता है, जहां रटने की आदत अक्सर वास्तविक सीखने पर हावी हो जाती है।
उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा का ध्यान अवलोकन, विश्लेषण और परिकल्पना परीक्षण पर होना चाहिए – ये कौशल वास्तविक दुनिया की समस्याओं को हल करने के लिए महत्वपूर्ण हैं। मूर्ति ने टिप्पणी की, “शिक्षा का उद्देश्य यह सीखना है कि कैसे सीखना है”, उन्होंने दोहराया कि समझ और आलोचनात्मक सोच, न कि रटना, बच्चे की शिक्षा का मूल होना चाहिए।




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