Classical Languages Centres: भारत सरकार ने देश की पांच शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन, शोध और संरक्षण के लिए पांच उत्कृष्टता केंद्र (Centres of Excellence) स्थापित करने को मंजूरी दी है। शिक्षा मंत्रालय के उच्च शिक्षा विभाग की ओर से जारी आदेश के मुताबिक ये केंद्र शास्त्रीय असमिया, शास्त्रीय बंगाली, शास्त्रीय मराठी, शास्त्रीय पाली और शास्त्रीय प्राकृत के लिए बनाए जाएंगे।
इन केंद्रों का मुख्य फोकस संबंधित भाषाओं पर उच्च स्तर के अकादमिक शोध, साहित्यिक और भाषाई सामग्री के संरक्षण व डिजिटलीकरण तथा इन भाषाओं से जुड़ी ज्ञान परंपरा को व्यापक स्तर तक पहुंचाने पर होगा। पांचों केंद्र असम, पश्चिम बंगाल, महाराष्ट्र, ओडिशा और गुजरात में स्थापित किए जाएंगे।
यह फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि असमिया, बंगाली, मराठी, पाली और प्राकृत को अक्टूबर 2024 में शास्त्रीय भाषा का दर्जा दिया गया था। इसके बाद इन भाषाओं के लिए समर्पित संस्थागत ढांचा विकसित करने की दिशा में यह एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
किस भाषा के लिए कौन-सा संस्थान चुना गया?
शिक्षा मंत्रालय के अनुसार पांचों उत्कृष्टता केंद्र अलग-अलग उच्च शिक्षण संस्थानों में स्थापित किए जाएंगे। इनमें शास्त्रीय असमिया के लिए तेजपुर विश्वविद्यालय, शास्त्रीय बंगाली के लिए विश्व भारती विश्वविद्यालय, शास्त्रीय मराठी के लिए डेक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट, शास्त्रीय पाली के लिए केंद्रीय ओडिशा विश्वविद्यालय और शास्त्रीय प्राकृत के लिए केंद्रीय गुजरात विश्वविद्यालय को चुना गया है।
| शास्त्रीय भाषा | उत्कृष्टता केंद्र | स्थान |
| शास्त्रीय असमिया | तेजपुर विश्वविद्यालय | असम |
| शास्त्रीय बंगाली | विश्व भारती विश्वविद्यालय | पश्चिम बंगाल |
| शास्त्रीय मराठी | डेक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट | पुणे, महाराष्ट्र |
| शास्त्रीय पाली | केंद्रीय ओडिशा विश्वविद्यालय | सुनाबेड़ा, ओडिशा |
| शास्त्रीय प्राकृत | केंद्रीय गुजरात विश्वविद्यालय | कुंडहेला, वडोदरा, गुजरात |
शिक्षा मंत्रालय की आधिकारिक विज्ञप्ति में डेक्कन कॉलेज पोस्ट-ग्रेजुएट एंड रिसर्च इंस्टीट्यूट को Deemed to be University के रूप में उल्लेखित किया गया है।
इन उत्कृष्टता केंद्रों में क्या काम होगा?
इन केंद्रों को केवल भाषा पढ़ाने तक सीमित नहीं रखा जाएगा। मंत्रालय के अनुसार इनके जरिए संबंधित भाषाओं में उच्च स्तरीय शोध और अकादमिक कार्य को बढ़ावा दिया जाएगा। शोधकर्ताओं और शिक्षाविदों को इन भाषाओं के साहित्य, इतिहास और ज्ञान परंपराओं के अध्ययन के लिए संस्थागत मंच उपलब्ध कराया जाएगा।
दूसरा बड़ा क्षेत्र संरक्षण और डिजिटलीकरण है। पुरानी भाषाई और साहित्यिक सामग्री को दस्तावेज के रूप में सुरक्षित करने और उसे डिजिटल रूप में संरक्षित करने पर काम किया जाएगा। इससे दुर्लभ साहित्यिक सामग्री और भाषाई विरासत को लंबे समय तक सुरक्षित रखने में मदद मिल सकती है।
इसके अलावा इन भाषाओं से जुड़ी साहित्यिक और ज्ञान परंपराओं को ज्यादा लोगों तक पहुंचाने पर भी जोर रहेगा। पांच राज्यों में केंद्र स्थापित होने से संबंधित क्षेत्रों में शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन और शोध का अकादमिक आधार भी मजबूत होने की उम्मीद है।
पाली के लिए ओडिशा में केंद्र, मुख्यमंत्री ने जताई खुशी
शास्त्रीय पाली के लिए केंद्रीय ओडिशा विश्वविद्यालय, सुनाबेड़ा को चुना गया है। ओडिशा के मुख्यमंत्री मोहन चरण माझी ने इस फैसले का स्वागत किया है। उन्होंने इसे राज्य के लिए गर्व का क्षण बताते हुए भारत की भाषाई विरासत को संरक्षित करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम बताया।
मुख्यमंत्री ने कहा कि शास्त्रीय पाली के लिए उत्कृष्टता केंद्र बनने से पाली के अध्ययन, संरक्षण और प्रचार को मजबूती मिलेगी। उन्होंने पाली को भारत की बौद्धिक, आध्यात्मिक और सांस्कृतिक परंपराओं से गहराई से जुड़ी भाषा बताया। उनके अनुसार, यह केंद्र भारत की सभ्यतागत ज्ञान परंपरा और भाषाई विरासत को सुरक्षित रखने में ओडिशा के योगदान को और मजबूत करेगा। उन्होंने केंद्रीय ओडिशा विश्वविद्यालय और इस पहल से जुड़े लोगों को बधाई भी दी।
पांच भाषाओं को 2024 में मिला था शास्त्रीय भाषा का दर्जा
इन पांच भाषाओं के लिए केंद्र स्थापित करने का फैसला 2024 में मिले शास्त्रीय भाषा के दर्जे के बाद आया है। अक्टूबर 2024 में केंद्रीय मंत्रिमंडल ने मराठी, पाली, प्राकृत, असमिया और बंगाली को शास्त्रीय भाषाओं की सूची में शामिल करने को मंजूरी दी थी। इसके साथ भारत में शास्त्रीय भाषाओं की कुल संख्या 11 हो गई थी।
इससे पहले तमिल, संस्कृत, तेलुगु, कन्नड़, मलयालम और ओड़िया को शास्त्रीय भाषा का दर्जा मिल चुका था। शास्त्रीय भाषा के दर्जे का उद्देश्य प्राचीन साहित्य, ऐतिहासिक भाषाई परंपराओं और उनसे जुड़ी ज्ञान विरासत के अध्ययन व संरक्षण को बढ़ावा देना है।
आदेश कब जारी हुआ और किसने हस्ताक्षर किए?
शिक्षा मंत्रालय के इस फैसले की जानकारी 1 अक्टूबर 2026 को जारी कार्यालय ज्ञापन के जरिए दी गई। ज्ञापन उच्च शिक्षा विभाग की Language Division की ओर से जारी किया गया और इसे संबंधित विश्वविद्यालयों के कुलपतियों तथा संस्थानों के प्रमुखों को भेजा गया। इस पर भारत सरकार के उप सचिव श्रेयांश मोहन के हस्ताक्षर हैं।
मंत्रालय की 3 अक्टूबर की आधिकारिक विज्ञप्ति के मुताबिक, इन पांच केंद्रों की स्थापना भारत की शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन, शोध और संरक्षण के लिए संस्थागत व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में की जा रही है।
भारत की भाषाई विरासत के लिए क्यों अहम है यह कदम?
भारत की कई भाषाओं में सदियों पुराना साहित्य, पांडुलिपियां, धार्मिक और दार्शनिक ग्रंथ तथा अलग-अलग ज्ञान परंपराएं मौजूद हैं। ऐसे में शोध, दस्तावेजीकरण और डिजिटलीकरण के लिए समर्पित संस्थानों की स्थापना से इन विरासतों के व्यवस्थित अध्ययन और संरक्षण को संस्थागत आधार मिल सकता है।
खास बात यह है कि ये केंद्र अलग-अलग राज्यों में स्थापित किए जा रहे हैं। इससे शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन को केवल कुछ चुनिंदा संस्थानों तक सीमित रखने के बजाय क्षेत्रीय विश्वविद्यालयों और शोधकर्ताओं के लिए भी नए अवसर बनने की संभावना है।




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