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रूस में MBBS कर रहे भारतीय छात्रों के लिए बदलेगा मेडिकल प्रशिक्षण, NMC के पाठ्यक्रम के अनुरूप होगी परीक्षा की तैयारी

रूस की मेडिकल यूनिवर्सिटियां अब अपने शिक्षण कार्यक्रमों को भारत के नेशनल मेडिकल कमीशन (NMC) के दक्षता-आधारित मेडिकल पाठ्यक्रम के अनुरूप तैयार कर रही हैं। इसके साथ ही भारतीय छात्रों के लिए लाइसेंसिंग परीक्षा की तैयारी को भी मेडिकल शिक्षा के नियमित अकादमिक कार्यक्रम में शामिल किया जा रहा है। इसका उद्देश्य विदेश में MBBS की पढ़ाई करने वाले भारतीय छात्रों को भारत लौटने के बाद लाइसेंसिंग परीक्षा और क्लिनिकल प्रैक्टिस के लिए बेहतर तरीके से तैयार करना है।

नई दिल्ली में भारतीय छात्रों के रूस रवाना होने से पहले आयोजित कार्यक्रम Sobraniye 2026 के दौरान रूस एजुकेशन के तकनीकी सलाहकार और सेवानिवृत्त एयर मार्शल (डॉ.) पवन कपूर ने यह जानकारी दी।

उन्होंने कहा कि रूस के मेडिकल कैंपस में भारतीय क्लिनिकल फैकल्टी को भी लाया जा रहा है, ताकि उन विषयों की पढ़ाई कराई जा सके जिनका लाइसेंसिंग परीक्षा में महत्वपूर्ण योगदान है। इसके अलावा रूसी विश्वविद्यालय भारत में क्लिनिकल ऑब्जर्वर प्रोग्राम भी शुरू कर रहे हैं। इसका उद्देश्य छात्रों को भारत में पाए जाने वाले रोगों के स्वरूप और सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़ी चुनौतियों से परिचित कराना है।

विदेश से मेडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्रों की क्लिनिकल तैयारी का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि भारत में Foreign Medical Graduate Examination (FMGE) में विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट्स के प्रदर्शन को लेकर लगातार चिंता बनी हुई है। कई छात्रों को विदेश से मेडिकल डिग्री हासिल करने के बाद भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था में काम करने के लिए आवश्यक प्रक्रियाओं के अनुरूप खुद को तैयार करने में कठिनाई होती है।

FMGE जून 2026 सत्र में केवल 12.38% उम्मीदवार ही परीक्षा पास कर पाए। इस अनिवार्य लाइसेंसिंग परीक्षा के लिए कुल 37,448 उम्मीदवारों ने पंजीकरण कराया था, जिनमें से सिर्फ 4,635 उम्मीदवार सफल हुए। दिसंबर 2025 में FMGE की पास प्रतिशत 23.9% और दिसंबर 2024 में 29.62% थी। इस तरह जून 2026 में सफलता दर में काफी गिरावट दर्ज की गई।

डॉ. पवन कपूर के अनुसार, रूस के साझेदार मेडिकल संस्थानों ने छात्रों की तैयारी के लिए तीन स्तरों पर काम शुरू किया है। इसमें NMC के अनुरूप पाठ्यक्रम, विश्वविद्यालय स्तर पर लाइसेंसिंग परीक्षा की तैयारी और भारत में क्लिनिकल अनुभव शामिल हैं।

FMGE में बार-बार असफल छात्रों के लिए वैकल्पिक मूल्यांकन का प्रस्ताव

डॉ. कपूर ने उन उम्मीदवारों के लिए एक वैकल्पिक मूल्यांकन व्यवस्था का प्रस्ताव भी रखा है, जो कई बार FMGE में असफल होते हैं। उनके अनुसार, ऐसे उम्मीदवारों को मान्यता प्राप्त जिला अस्पतालों में एक वर्ष की निगरानी वाली क्लिनिकल रेजिडेंसी पूरी करने का अवसर दिया जा सकता है। इसके बाद निर्धारित मेडिकल कॉलेजों में उनकी व्यावहारिक और मरीज के सामने क्लिनिकल क्षमता की परीक्षा ली जा सकती है।

उन्होंने स्पष्ट किया कि यह केवल एक वैकल्पिक मूल्यांकन मॉडल का प्रस्ताव है, जिसे संबंधित अधिकारियों के सामने रखा गया है। यह फिलहाल कोई मौजूदा नियामकीय व्यवस्था नहीं है।

डॉ. कपूर ने कहा कि जो उम्मीदवार लगातार पांच वर्षों तक थ्योरी परीक्षा पास नहीं कर पाते, उनके लिए केवल लिखित परीक्षा के माध्यम से योग्यता साबित करना मुश्किल हो सकता है। ऐसे मेडिकल ग्रेजुएट्स को एक साल के लिए मान्यता प्राप्त जिला अस्पतालों में मुख्य चिकित्सा अधिकारियों की निगरानी में क्लिनिकल रेजिडेंसी कराई जा सकती है। इसके बाद उनकी क्षमता का आकलन व्यावहारिक क्लिनिकल परीक्षा के जरिए किया जा सकता है।

रूस की छह साल की मेडिकल पढ़ाई में इंटर्नशिप को लेकर NMC को प्रस्ताव

रूस के मेडिकल शिक्षा मॉडल में शामिल इंटर्नशिप को भारत में मान्यता देने का प्रस्ताव भी NMC को दिया गया है।

डॉ. कपूर ने बताया कि रूस में छह साल के मेडिकल कार्यक्रम में क्लिनिकल इंटर्नशिप शामिल होती है। यदि NMC यह मानता है कि रूस में दी जा रही ट्रेनिंग भारत के इंटर्नशिप मानकों के अनुरूप है, तो छात्रों को भारत लौटने के बाद अतिरिक्त एक साल की इंटर्नशिप से राहत मिल सकती है। हालांकि, यह प्रस्ताव अभी नियामकीय विचार के अधीन है।

क्लिनिकल ट्रेनिंग में अंतर बड़ी चुनौती

मेडिकल शिक्षकों का मानना है कि केवल पाठ्यक्रम को NMC के अनुरूप करने से विदेश से भारत लौटने वाले मेडिकल ग्रेजुएट्स की सभी क्लिनिकल चुनौतियां दूर नहीं होंगी।

अमृता इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, फरीदाबाद के मेडिकल डायरेक्टर डॉ. संजीव के. सिंह ने कहा कि भारत और रूस तथा पूर्वी यूरोप के देशों में मरीजों और बीमारियों के स्वरूप में काफी अंतर है। इसलिए छात्रों को मिलने वाला क्लिनिकल अनुभव भी अलग होता है।

उन्होंने कहा कि भारत में मलेरिया, डेंगू, चिकनगुनिया और लेप्टोस्पायरोसिस जैसी संक्रामक बीमारियों का बोझ काफी अधिक है। इसके अलावा डायबिटीज और हाई ब्लड प्रेशर से पीड़ित कई मरीज गंभीर या एक से अधिक स्वास्थ्य समस्याओं के साथ बड़े अस्पतालों में पहुंचते हैं।

डॉ. सिंह के अनुसार, ऐसे मरीजों का इलाज करने के लिए डॉक्टरों में अलग तरह की जांच और बीमारी पहचानने की क्षमता विकसित होना जरूरी है। भारत में मरीजों की बड़ी संख्या और अलग-अलग तरह के मामलों को देखते हुए देश में व्यवस्थित क्लिनिकल और बेडसाइड ट्रेनिंग के जरिए इस अंतर को कम किया जा सकता है।

उन्होंने कहा कि लाइसेंसिंग परीक्षा में सुधार पर विचार करते समय मरीजों की सुरक्षा सबसे महत्वपूर्ण रहनी चाहिए। हालांकि, विदेश में मेडिकल की पढ़ाई करने वाला कोई छात्र छह साल का समय और परिवार की बड़ी आर्थिक राशि खर्च करता है। ऐसे में यदि उस समूह के करीब 75% छात्र आगे इसका व्यावहारिक लाभ नहीं उठा पाते हैं तो यह मानव संसाधन का बड़ा नुकसान है।

डॉ. सिंह ने कहा कि मरीजों की सुरक्षा से समझौता किए बिना मूल्यांकन प्रक्रिया को सरल और व्यवस्थित करने के लिए एक संतुलित रास्ता तलाशना जरूरी है।

विदेश में पढ़ने वाले छात्रों के लिए भारत में क्लिनिकल ब्रिज प्रोग्राम

विदेश में मेडिकल की पढ़ाई करने वाले छात्रों को डिग्री पूरी करने से पहले ही भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था से परिचित कराने के लिए कुछ हेल्थकेयर नेटवर्क भी विशेष कार्यक्रम विकसित कर रहे हैं।

मैक्स हेल्थकेयर के मैक्स इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल एक्सीलेंस की एसोसिएट वाइस प्रेसिडेंट डॉ. वनिता मित्तल ने बताया कि उनकी संस्था विदेश में मेडिकल डिग्री की पढ़ाई करने वाले छात्रों के लिए ब्रिज प्रोग्राम तैयार कर रही है।

उन्होंने कहा कि छात्र विदेश में अपनी MBBS की पढ़ाई जारी रखते हुए सालाना छुट्टियों के दौरान भारत में ट्रेनिंग ले सकते हैं। इससे उन्हें भारतीय क्लिनिकल प्रोटोकॉल और अस्पताल के वातावरण को समझने का अवसर मिलेगा। डॉ. मित्तल के अनुसार, इन कार्यक्रमों को खास तौर पर ऐसे छात्रों को मुख्यधारा की भारतीय स्वास्थ्य व्यवस्था से जोड़ने के उद्देश्य से तैयार किया गया है।

भारत में सरकारी मेडिकल सीटों की कमी भी बड़ा कारण

विदेश में मेडिकल की पढ़ाई की बढ़ती मांग का एक प्रमुख कारण भारत में सरकारी मेडिकल कॉलेजों में उपलब्ध सीमित सीटें भी हैं।

कोलकाता के 17 वर्षीय मेडिकल aspirant सुहानुर रहमान रूस में MBBS करने की योजना बना रहे हैं। उन्होंने कहा कि उनके फैसले के पीछे निजी मेडिकल कॉलेजों की फीस से ज्यादा महत्वपूर्ण कारण सरकारी मेडिकल सीटों की कमी है।

रहमान के अनुसार, लगातार दो या तीन साल ड्रॉप लेकर केवल मेडिकल प्रवेश परीक्षा में सफलता हासिल करने की कोशिश करने के बजाय उन्होंने आठ से नौ साल के एक निश्चित शैक्षणिक सफर को चुनना बेहतर समझा।

उन्होंने कहा कि उन्हें पता है कि विदेश से मेडिकल की पढ़ाई करने का रास्ता लंबा है और इसमें डिग्री के साथ लाइसेंसिंग परीक्षा की तैयारी भी करनी होती है। इसके बावजूद वह बार-बार प्रवेश परीक्षा देने के बजाय मेडिकल शिक्षा में आगे बढ़ना पसंद करते हैं।

Sobraniye 2026 में 300 से अधिक भारतीय छात्र शामिल

रूस में मेडिकल शिक्षा के लिए जाने वाले भारतीय छात्रों के लिए Sobraniye 2026 कार्यक्रम 1 अक्टूबर को नई दिल्ली स्थित रूसी विज्ञान एवं संस्कृति केंद्र में आयोजित किया गया। इसमें 300 से अधिक भारतीय छात्रों ने हिस्सा लिया।

कार्यक्रम में रूस की मेडिकल यूनिवर्सिटियों में दाखिला लेने की तैयारी कर रहे छात्रों, उनके परिवारों और मेडिकल शिक्षा से जुड़े प्रतिनिधियों ने भाग लिया। यह आयोजन 2026-27 के अकादमिक सत्र से पहले छात्रों और उनके परिवारों को रूस में मेडिकल शिक्षा से जुड़ी जानकारी देने के उद्देश्य से किया गया।

Raish Ahmed

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