Edinbox Hindi

दिल्ली यूनिवर्सिटी में इतिहास के 20 पेपर हटाने पर विवाद, बहाली की मांग को लेकर छात्रों का प्रदर्शन

दिल्ली यूनिवर्सिटी के इतिहास विभाग में सिलेबस से पेपर हटाए जाने को लेकर विवाद बढ़ गया है। छात्रों का आरोप है कि पढ़ाई के लिए प्रस्तावित 43 पेपरों में से केवल 23 को मंजूरी दी गई, जिससे उन्हें अपनी पसंद के विषय चुनने के कम अवसर मिलेंगे। 9 अक्टूबर 2026 को छात्रों ने विभाग में प्रदर्शन कर सभी प्रस्तावित पेपरों को बहाल करने की मांग की।

इस फैसले को लेकर शिक्षकों और छात्रों ने पाठ्यक्रम तैयार करने की प्रक्रिया, विभाग की अकादमिक स्वतंत्रता और इतिहास के अलग-अलग पहलुओं को पढ़ाने के अवसरों पर सवाल उठाए हैं। प्रदर्शनकारियों ने आरोप लगाया कि जाति, जेंडर, आदिवासी समाज, मजदूरों और मध्यकालीन भारत के इतिहास से जुड़े विषयों को पर्याप्त जगह नहीं दी गई। कुछ शिक्षकों और छात्रों ने इसे पाठ्यक्रम के कथित वैचारिक बदलाव से भी जोड़ा है। ये आरोप प्रदर्शनकारियों और संबंधित शिक्षकों के हैं; इन्हें विश्वविद्यालय की ओर से प्रमाणित निष्कर्ष नहीं माना जाना चाहिए।

DU के इतिहास विभाग में क्या है पूरा मामला?

प्रदर्शन कर रहे छात्रों के मुताबिक, इतिहास विभाग ने पढ़ाई के लिए 43 पेपर प्रस्तावित किए थे, लेकिन अंतिम मंजूरी के बाद इनमें से 23 ही पढ़ाए जाने के लिए रखे गए। छात्रों का कहना है कि इस तरह 20 पेपरों के हटने से विषय चुनने के विकल्प सीमित हो गए हैं। उन्होंने मांग की है कि विभाग की ओर से तैयार किए गए सभी प्रस्तावित पेपरों को बहाल किया जाए।

यह विवाद ऐसे समय सामने आया है, जब दिल्ली यूनिवर्सिटी के इतिहास के स्नातकोत्तर पाठ्यक्रम में भी बदलावों को लेकर सवाल उठे हैं। द इंडियन एक्सप्रेस की अगस्त 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, एमए इतिहास के तीसरे सेमेस्टर के नए पाठ्यक्रम में दिल्ली सल्तनत सहित कई पुराने पेपर शामिल नहीं किए गए। विभाग की ओर से प्रस्तावित 38 वैकल्पिक पेपरों में से 16 को उस सेमेस्टर की अंतिम अधिसूचना में जगह मिली थी।

ध्यान देने वाली बात है कि 43 में से 23 पेपर और 38 में से 16 पेपर के आंकड़े अलग-अलग पाठ्यक्रम संबंधी विवरणों से जुड़े हैं। इन्हें एक ही सूची या एक ही मंजूरी प्रक्रिया का आंकड़ा मानना सही नहीं होगा। उपलब्ध रिपोर्टों से हटाए गए सभी 20 पेपरों की एक पूरी और आधिकारिक सूची की पुष्टि नहीं होती है।

जाति, जेंडर और मजदूरों के इतिहास से जुड़े विषयों पर सवाल

छात्रों का कहना है कि हटाए गए या अंतिम पाठ्यक्रम में जगह नहीं पाने वाले पेपरों में इतिहास के कई ऐसे विषय शामिल हैं, जिनसे समाज की विविधता और अलग-अलग समुदायों के अनुभवों को समझने में मदद मिलती है। इनमें जाति व्यवस्था, महिलाओं और जेंडर का इतिहास, आदिवासी समाज, मजदूरों का इतिहास और मध्यकालीन भारत से जुड़े विषय शामिल हैं। छात्रों को आशंका है कि इन विषयों के विकल्प घटने से इतिहास को कई नजरियों से समझने का अवसर सीमित हो सकता है।

छात्रों और कुछ शिक्षकों ने पाठ्यक्रम में बदलाव को लेकर ‘सिलेबस के भगवाकरण’ का आरोप भी लगाया है। उनका कहना है कि इतिहास की पढ़ाई में अलग-अलग विचारों, सामाजिक समूहों और ऐतिहासिक व्याख्याओं को जगह मिलनी चाहिए। हालांकि, पाठ्यक्रम में बदलाव के पीछे विश्वविद्यालय का आधिकारिक पक्ष और प्रत्येक पेपर को हटाने के कारण सामने आना भी जरूरी है, ताकि इस विवाद का आकलन सभी तथ्यों के आधार पर किया जा सके।

शिक्षकों ने अकादमिक स्वतंत्रता पर उठाए सवाल

इतिहास विभाग के पूर्व अध्यक्ष प्रो. प्रभु मोहापात्रा ने शिक्षकों को उनके विशेषज्ञता वाले विषय पढ़ाने से रोकने पर आपत्ति जताई है। उनके मुताबिक, शिक्षकों के शोध और विशेषज्ञता से जुड़े विषयों को पाठ्यक्रम में शामिल करने का अवसर मिलना चाहिए।

दिल्ली यूनिवर्सिटी की शिक्षिका और अकादमिक काउंसिल की सदस्य प्रो. माया जॉन ने भी पाठ्यक्रमों की समीक्षा और मंजूरी की प्रक्रिया पर सवाल उठाए हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि अकादमिक काउंसिल की बैठकों में विभागाध्यक्ष को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर नहीं मिला। उन्होंने यह भी सवाल किया कि पाठ्यक्रमों की समीक्षा करने वाली समिति में इतिहास के विशेषज्ञ प्रोफेसर शामिल थे या नहीं। ये उनके द्वारा उठाए गए सवाल और आरोप हैं; इनकी स्वतंत्र पुष्टि उपलब्ध रिपोर्टों से नहीं होती।

इतिहास के प्रोफेसर और अकादमिक काउंसिल के सदस्य प्रो. जितेंद्र मीणा ने भी उच्च शिक्षा में वैचारिक हस्तक्षेप को लेकर चिंता जताई। उन्होंने डॉ. बीआर आंबेडकर की पुस्तक Annihilation of Caste और शोधकर्ता शर्मिला रेगे की रचनाओं का उल्लेख करते हुए सवाल उठाया कि जाति और सामाजिक असमानता जैसे विषयों पर आधारित विचारों को विश्वविद्यालयों में पढ़ाने की जगह कितनी मिल रही है।

छात्रों की क्या हैं मांगें?

प्रदर्शन कर रहे छात्र चाहते हैं कि इतिहास विभाग की ओर से प्रस्तावित सभी 43 पेपरों को पढ़ाई में शामिल किया जाए। उनकी प्रमुख मांगें हैं कि हटाए गए पेपरों की समीक्षा हो, जाति, जेंडर, आदिवासी समाज और मजदूरों के इतिहास जैसे विषयों को उचित जगह मिले और पाठ्यक्रम में बदलाव करने की प्रक्रिया पारदर्शी हो।

छात्रों ने विभाग की अकादमिक स्वायत्तता सुरक्षित रखने और पाठ्यक्रम तय करते समय संबंधित शिक्षकों की विशेषज्ञता का सम्मान करने की मांग भी की है। उन्होंने पर्याप्त कक्षाओं और शैक्षणिक सुविधाओं की जरूरत पर भी जोर दिया है, क्योंकि उनके अनुसार छात्रों की बढ़ती संख्या के मुकाबले संसाधन पर्याप्त नहीं हैं।

पाठ्यक्रम में बदलाव का छात्रों पर क्या असर पड़ सकता है?

विश्वविद्यालय के पाठ्यक्रम में पेपरों की संख्या और विषयों का चयन केवल प्रशासनिक फैसला नहीं है। इससे यह तय होता है कि छात्रों को किन ऐतिहासिक घटनाओं, सामाजिक समूहों और विचारों को पढ़ने का अवसर मिलेगा। यदि किसी विषय को हटाया जाता है, तो छात्रों के लिए उस क्षेत्र में आगे अध्ययन या शोध करने के विकल्प भी प्रभावित हो सकते हैं।

हालांकि, किसी पेपर को हटाने का अर्थ अपने आप यह नहीं है कि उससे जुड़ा पूरा विषय इतिहास की पढ़ाई से बाहर हो गया है। यह जानने के लिए अंतिम सिलेबस, दूसरे पेपरों में शामिल विषयों और हटाए गए पाठ्यक्रमों के आधिकारिक विवरण की तुलना करना जरूरी है।

दिल्ली यूनिवर्सिटी के इस विवाद में अब सबसे अहम सवाल यही है कि पाठ्यक्रम में बदलाव किन शैक्षणिक आधारों पर किए गए और क्या विभाग के शिक्षकों को अपनी बात रखने का पर्याप्त अवसर मिला। विश्वविद्यालय की ओर से विस्तृत स्पष्टीकरण और हटाए गए पेपरों की पूरी सूची सामने आने पर मामले की तस्वीर अधिक साफ हो सकेगी।

Raish Ahmed

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed