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UNESCO Report 2026: गांवों में 100 लड़कों के मुकाबले सिर्फ 59 लड़कियां पूरी कर पा रहीं 12वीं की पढ़ाई

UNESCO Report on Girls’ Education: भारत में लड़कियों की शिक्षा को बढ़ावा देने के लिए पिछले 25 वर्षों में काफी प्रगति हुई है। स्कूलों तक पहुंच बढ़ी है और लड़के-लड़कियों के बीच शिक्षा का अंतर भी कम हुआ है। इसके बावजूद ग्रामीण भारत में लड़कियों के लिए 12वीं तक की पढ़ाई पूरी करना अब भी बड़ी चुनौती बना हुआ है। यूनेस्को की 2026 की रिपोर्ट के अनुसार, ग्रामीण क्षेत्रों में हर 100 लड़कों के उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के मुकाबले केवल 59 लड़कियां इस स्तर तक पहुंच पाती हैं। वहीं, शहरी क्षेत्रों में लड़के और लड़कियां इस मामले में बराबरी पर हैं। 

यूनेस्को की Global Education Monitoring (GEM) Report 2026 के साथ जारी रिपोर्ट Gender Equity in Access to Education में 31 निम्न और मध्यम आय वाले देशों में शिक्षा तक पहुंच और उसे पूरा करने के मामले में लैंगिक अंतर का अध्ययन किया गया है। रिपोर्ट बताती है कि भारत ने लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में उल्लेखनीय सुधार किया है, लेकिन इस प्रगति का लाभ सभी क्षेत्रों और आर्थिक वर्गों तक समान रूप से नहीं पहुंचा है। 

ग्रामीण भारत में लड़कियों की शिक्षा अब भी चिंता का विषय

रिपोर्ट के अनुसार, भारत में उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के मामले में समायोजित लैंगिक समानता सूचकांक (Adjusted Gender Parity Index) 0.89 है। ग्रामीण क्षेत्रों में यह 0.59, जबकि शहरी क्षेत्रों में 1.0 दर्ज किया गया है। 

इस सूचकांक को आसान भाषा में समझें तो 1 का अर्थ लड़के और लड़कियों के बीच बराबरी है। राष्ट्रीय स्तर पर 0.89 का आंकड़ा बताता है कि उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के मामले में लड़कियां अभी लड़कों के बराबर नहीं पहुंची हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में यह अंतर और अधिक है। इसके उलट, शहरों में लड़कियां लड़कों के बराबर स्तर पर पहुंच चुकी हैं।

यह अंतर दिखाता है कि केवल राष्ट्रीय आंकड़ों के आधार पर लड़कियों की शिक्षा की पूरी तस्वीर नहीं समझी जा सकती। ग्रामीण क्षेत्रों में स्कूल की दूरी, परिवार की आर्थिक स्थिति और किशोरावस्था में पढ़ाई जारी रखने से जुड़ी चुनौतियां लड़कियों की शिक्षा को प्रभावित कर सकती हैं। हालांकि, इन सभी कारणों का प्रभाव अलग-अलग क्षेत्रों में अलग हो सकता है।

25 वर्षों में भारत ने कितनी प्रगति की?

यूनेस्को की रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2000 में भारत उन 47 देशों में शामिल था, जहां लड़कों की तुलना में लड़कियों के स्कूल से बाहर रहने की समस्या अधिक गंभीर थी। इसके बाद भारत ने शिक्षा में लैंगिक अंतर कम करने की दिशा में तेजी से प्रगति की। रिपोर्ट के मुताबिक, भारत ने उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के मामले में पिछले दो दशकों के दौरान शुरुआती लैंगिक अंतर का 65 प्रतिशत से अधिक हिस्सा कम किया है। 

यह सुधार बताता है कि लड़कियों को शिक्षा से जोड़ने के प्रयासों का सकारात्मक असर हुआ है। लेकिन ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों के बीच मौजूद अंतर यह भी बताता है कि केवल स्कूल में दाखिला दिलाना पर्याप्त नहीं है। लड़कियों को माध्यमिक और उच्च माध्यमिक स्तर तक पढ़ाई जारी रखने और उसे पूरा करने के लिए जरूरी सहायता भी मिलनी चाहिए।

किशोरावस्था में लड़कियों का स्कूल छूटना अब भी चुनौती

ग्रामीण भारत में बड़ी उम्र के बच्चों, खासकर किशोरियों को स्कूल में बनाए रखना एक महत्वपूर्ण चुनौती है। प्रथम एजुकेशन फाउंडेशन की Annual Status of Education Report (ASER) 2024 के अनुसार, ग्रामीण भारत में 15 से 16 वर्ष की 8.1 प्रतिशत लड़कियां स्कूल में नामांकित नहीं थीं। वर्ष 2022 में यह आंकड़ा 7.9 प्रतिशत था। 

यह आंकड़ा 12वीं की पढ़ाई पूरी करने वाली लड़कियों का प्रतिशत नहीं है, बल्कि स्कूल में नामांकन की स्थिति बताता है। फिर भी यह संकेत देता है कि किशोरावस्था के दौरान कुछ लड़कियां शिक्षा से बाहर रह जाती हैं।

ASER 2024 के अनुसार, उत्तर प्रदेश में 15 से 16 वर्ष की 15 प्रतिशत लड़कियां स्कूल में नामांकित नहीं थीं। मध्य प्रदेश में यह आंकड़ा 16.1 प्रतिशत और राजस्थान में 12.7 प्रतिशत था। इन आंकड़ों से पता चलता है कि अलग-अलग राज्यों में किशोरियों की शिक्षा से जुड़ी चुनौतियां अलग स्तर पर मौजूद हैं। 

परिवार की आर्थिक स्थिति भी बढ़ाती है शिक्षा का अंतर

लड़कियों की शिक्षा में लैंगिक अंतर को समझने के लिए परिवार की आर्थिक स्थिति पर ध्यान देना भी जरूरी है। यूनेस्को की रिपोर्ट बताती है कि शिक्षा में वंचित लड़कियों वाले देशों में सबसे गरीब परिवारों के बीच लैंगिक समानता सूचकांक का औसत 0.60 था, जबकि सबसे अमीर 20 प्रतिशत परिवारों में यह 0.92 था। 

यह आंकड़ा बताता है कि आर्थिक स्थिति और लैंगिक असमानता एक-दूसरे से जुड़ी हो सकती हैं। कम आय वाले परिवारों में शिक्षा का खर्च, घर की जिम्मेदारियां और दूसरे सामाजिक कारण बच्चों की पढ़ाई को प्रभावित कर सकते हैं। इसलिए लड़कियों की शिक्षा में समानता लाने के लिए स्कूलों तक पहुंच बढ़ाने के साथ आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों को सहायता देना भी जरूरी है।

पांच साल की उम्र में ही कक्षा 1 में दाखिला लेने का मुद्दा

यूनेस्को की 2026 की ग्लोबल एजुकेशन मॉनिटरिंग रिपोर्ट में छोटे बच्चों की शिक्षा से जुड़ा एक अन्य महत्वपूर्ण मुद्दा भी सामने आया है। रिपोर्ट के अनुसार, भारत में पांच वर्ष की उम्र के 51 प्रतिशत बच्चे प्री-प्राइमरी शिक्षा के बजाय सीधे प्राथमिक कक्षा में दाखिला ले रहे हैं। इसे कम उम्र में औपचारिक स्कूली शिक्षा में प्रवेश से जुड़ी चुनौती के रूप में देखा गया है। 

राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 में कक्षा 1 में प्रवेश के लिए छह वर्ष की उम्र को आधार बनाया गया है। प्री-प्राइमरी शिक्षा में बच्चों को खेल, गतिविधियों और शुरुआती सीखने के अनुभवों के माध्यम से स्कूल के लिए तैयार किया जाता है। ऐसे में बच्चों की उम्र और उनकी शुरुआती सीखने की जरूरतों के अनुसार शिक्षा की व्यवस्था करना महत्वपूर्ण है।

हालांकि, दाखिले की उम्र और प्री-प्राइमरी शिक्षा से जुड़े नियमों का पालन राज्यों और संबंधित संस्थानों के निर्देशों के अनुसार जांचा जाना चाहिए। केवल कम उम्र में कक्षा 1 में प्रवेश को देखकर बच्चे की सीखने की क्षमता या भविष्य के शैक्षणिक प्रदर्शन के बारे में निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।

लड़कियों की शिक्षा में बराबरी के लिए आगे क्या जरूरी?

यूनेस्को की रिपोर्ट का व्यापक संदेश यह है कि शिक्षा तक पहुंच बढ़ाने के साथ-साथ यह सुनिश्चित करना भी जरूरी है कि विद्यार्थी पढ़ाई पूरी कर सकें। भारत में लड़कियों की शिक्षा के क्षेत्र में पिछले दो दशकों में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में उच्च माध्यमिक स्तर पर बना अंतर अभी भी ध्यान देने की मांग करता है।

लड़कियों को 12वीं तक पढ़ाई पूरी करने में मदद देने के लिए स्कूलों तक सुरक्षित पहुंच, आर्थिक सहायता, परिवारों में शिक्षा के प्रति जागरूकता और किशोरियों के लिए अनुकूल शैक्षणिक माहौल महत्वपूर्ण हो सकते हैं। साथ ही, राज्यों और जिलों के स्तर पर आंकड़ों की नियमित समीक्षा करके उन क्षेत्रों की पहचान करनी होगी, जहां लड़कियों के स्कूल छोड़ने की समस्या अधिक है।

भारत के लिए अगली चुनौती केवल लड़कियों का स्कूल में नामांकन बढ़ाना नहीं, बल्कि यह सुनिश्चित करना भी है कि ग्रामीण और आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों की लड़कियों को भी उच्च माध्यमिक शिक्षा पूरी करने के समान अवसर मिलें।

Raish Ahmed

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