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बदलते दौर में यूनिवर्सिटी की डिग्री कितनी उपयोगी? छात्रों को नौकरी के साथ सीखने और बदलाव के लिए भी होना होगा तैयार

पीढ़ियों से विश्वविद्यालय की डिग्री को बेहतर करियर की दिशा में एक अहम कदम माना जाता रहा है। धारणा रही है कि तीन या चार साल पढ़ाई में लगाने के बाद छात्रों को सफल करियर की मजबूत नींव मिल जाती है। लेकिन तकनीक के बढ़ते इस्तेमाल, नए पेशों के उभरने और कामकाज की जरूरतों में बदलाव के साथ अब किसी डिग्री की उपयोगिता को केवल इस आधार पर नहीं आंका जा सकता कि उससे पहली नौकरी मिलने में कितनी मदद मिली।

यह सवाल छात्रों, परिवारों और विश्वविद्यालयों के लिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि जब भविष्य में करियर के रास्तों का अनुमान लगाना लगातार मुश्किल हो रहा है, तो उच्च शिक्षा से छात्रों को क्या मिलना चाहिए?

विश्व आर्थिक मंच (World Economic Forum) की Future of Jobs Report 2025 के अनुसार, वर्ष 2030 तक हर 100 में से 59 कर्मचारियों को अपने मौजूदा कौशल को बेहतर बनाने या नए कौशल सीखने की जरूरत होगी। यह अनुमान बताता है कि विश्वविद्यालयों की जिम्मेदारी केवल छात्रों को नौकरी के लिए तैयार करना नहीं है। उन्हें ऐसे करियर के लिए भी तैयार करना होगा, जिनमें काम के दौरान कई बार नई चीजें सीखने और अपनी क्षमताएं विकसित करने की जरूरत पड़ सकती है।

पहली नौकरी से आगे भी है डिग्री की अहमियत

विश्वविद्यालय की डिग्री का लंबे समय तक बना रहने वाला महत्व इस बात में है कि वह छात्रों को विषय का ज्ञान देने के साथ नई परिस्थितियों के अनुसार खुद को ढालने और स्वतंत्र रूप से सही निर्णय लेने की क्षमता विकसित करने में मदद करती है।

उदाहरण के लिए, मनोविज्ञान की पढ़ाई करने वाला छात्र केवल इसी विषय में करियर बनाने तक सीमित नहीं रहता। वह अपनी योग्यता और अतिरिक्त कौशल के आधार पर यूजर एक्सपीरियंस रिसर्च, उपभोक्ताओं के व्यवहार का अध्ययन, संगठन के विकास और मार्केटिंग जैसे क्षेत्रों में भी अवसर तलाश सकता है। मनोविज्ञान की पढ़ाई लोगों के व्यवहार को समझने, तथ्यों के आधार पर निष्कर्ष निकालने और यह जानने में मदद करती है कि लोग किसी स्थिति में किस तरह सोचते और काम करते हैं।

हालांकि, अलग-अलग विषयों को जोड़कर पढ़ने का मतलब यह नहीं होना चाहिए कि किसी एक विषय की गहरी समझ को नजरअंदाज कर दिया जाए। छात्रों के लिए अपने चुने हुए विषय की मजबूत बुनियाद जरूरी है। इससे वे उस विषय की अवधारणाओं, तरीकों और सीमाओं को समझ पाते हैं। विषय की गहरी जानकारी उन्हें गलत धारणाओं पर सवाल उठाने, भरोसेमंद तथ्यों और कमजोर तर्कों के बीच अंतर करने तथा अधूरे निष्कर्षों को पहचानने में मदद करती है।

इसके साथ ही जलवायु परिवर्तन जैसी जटिल समस्याओं को समझने के लिए केवल एक विषय का ज्ञान पर्याप्त नहीं है। इसके लिए विज्ञान के साथ अर्थशास्त्र, सरकारी नीतियों, मनोविज्ञान और सामूहिक जिम्मेदारी को समझना भी जरूरी है। इसलिए विश्वविद्यालयों को विषय की गहरी पढ़ाई और अलग-अलग क्षेत्रों के ज्ञान को जोड़ने के बीच संतुलन बनाना चाहिए।

AI के दौर में आलोचनात्मक सोच क्यों जरूरी?

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) का इस्तेमाल बढ़ने के साथ जानकारी को परखने और स्वतंत्र रूप से निर्णय लेने की क्षमता का महत्व भी बढ़ रहा है। AI टूल्स जानकारी का सार तैयार कर सकते हैं, नए विचार सुझा सकते हैं और जटिल कामों में सहायता दे सकते हैं। लेकिन किसी सवाल का जवाब तैयार कर देना और यह तय करना कि जवाब सही, भरोसेमंद और उस परिस्थिति के लिए उपयुक्त है या नहीं—दो अलग बातें हैं।

छात्रों को यह सीखना जरूरी है कि वे मिली हुई जानकारी की जांच कैसे करें, उसमें छिपी धारणाओं को कैसे पहचानें, किन तथ्यों की कमी है और गलत निष्कर्ष के क्या परिणाम हो सकते हैं। केवल तकनीक का इस्तेमाल करना सीख लेने से ये क्षमताएं विकसित नहीं होतीं। इसके लिए विषय का ज्ञान, रचनात्मक सोच, नैतिक समझ और ऐसे जवाबों पर सवाल उठाने का आत्मविश्वास जरूरी है, जो पहली नजर में सही लगते हैं।

जैसे-जैसे AI कई नियमित और विश्लेषण से जुड़े काम करने में सक्षम हो रहा है, शिक्षा की भूमिका भी बदलनी चाहिए। विश्वविद्यालयों का उद्देश्य केवल छात्रों को ऐसे काम सिखाना नहीं होना चाहिए जिन्हें मशीनें तेजी से कर सकती हैं। उन्हें छात्रों में ऐसी समझ और निर्णय लेने की क्षमता विकसित करनी चाहिए, जिससे वे तकनीक का जिम्मेदारी से इस्तेमाल कर सकें और सोच-समझकर फैसले लें।

विश्वविद्यालयों में पढ़ाई का तरीका बदलने की जरूरत

विश्वविद्यालयों को पढ़ाई के तरीकों पर दोबारा विचार करना होगा, लेकिन इसके साथ शिक्षा के स्तर और विषयों की गंभीरता से समझौता नहीं होना चाहिए। पढ़ाई केवल जानकारी याद करने तक सीमित रहने के बजाय तथ्यों को समझने, अवधारणाओं को व्यवहार में लागू करने और अपने तर्कों को सही आधार के साथ प्रस्तुत करने पर केंद्रित होनी चाहिए।

परीक्षा और मूल्यांकन के तरीकों में भी स्वतंत्र सोच और तर्क क्षमता को महत्व दिया जाना चाहिए। छात्रों को केवल पढ़ी हुई सामग्री दोहराने के लिए अंक देने के बजाय यह परखना जरूरी है कि वे किसी विषय को कितना समझते हैं और उसका इस्तेमाल कैसे कर सकते हैं।

व्यावहारिक अनुभव भी उच्च शिक्षा का अहम हिस्सा होना चाहिए। रिसर्च प्रोजेक्ट, इंटर्नशिप, सिमुलेशन और वास्तविक जीवन की समस्याओं पर काम करने से छात्रों को कक्षा में सीखी गई बातों को कामकाज की परिस्थितियों से जोड़ने का मौका मिलता है।

ऐसे अनुभव छात्रों में मिलकर काम करने, समस्याओं का समाधान खोजने और अनिश्चित परिस्थितियों में रास्ता निकालने की क्षमता विकसित करते हैं। इससे उन्हें यह समझने में भी मदद मिलती है कि उनकी रुचियां और क्षमताएं किन-किन करियर विकल्पों के लिए उपयोगी हो सकती हैं।

उच्च शिक्षा में अलग-अलग विषयों को जोड़कर सीखने की व्यवस्था भी महत्वपूर्ण है। जब छात्र किसी समस्या को अलग-अलग नजरियों से समझते हैं और कई विषयों के ज्ञान का इस्तेमाल करते हैं, तो उनकी समझ अधिक व्यापक बनती है। इसके साथ संवाद करने, दूसरों के साथ मिलकर काम करने और नैतिक आधार पर फैसले लेने की क्षमता भी जरूरी है। पेशेवर जीवन में सफलता केवल तकनीकी ज्ञान पर निर्भर नहीं करती, बल्कि इस बात पर भी निर्भर करती है कि व्यक्ति दूसरों के साथ किस तरह काम करता है।

डिग्री मिलने के बाद भी सीखना क्यों जरूरी?

विश्वविद्यालय की डिग्री छात्रों को ज्ञान की मजबूत बुनियाद दे सकती है, लेकिन यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि तीन या चार साल की पढ़ाई अगले तीन-चार दशकों में करियर के लिए जरूरी हर कौशल सिखा देगी। उद्योगों और तकनीकों में बदलाव के साथ कामकाजी लोगों को नई क्षमताएं सीखने, पुरानी धारणाओं पर दोबारा विचार करने और अपनी समझ को समय के अनुसार विकसित करने के लिए तैयार रहना होगा।

विश्वविद्यालयों को छात्रों में जीवनभर सीखते रहने की आदत विकसित करनी चाहिए। डिग्री मिलना ज्ञान हासिल करने की प्रक्रिया का अंत नहीं, बल्कि आगे सीखते रहने की शुरुआत होनी चाहिए।

हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि हर डिग्री का महत्व समान है या कोई भी डिग्री नौकरी की गारंटी देती है। पढ़ाई की गुणवत्ता, पाठ्यक्रम की उपयोगिता, व्यावहारिक अनुभव के अवसर और छात्रों के करियर लक्ष्य से उसका मेल भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

छात्रों और उनके परिवारों को उच्च शिक्षा पर होने वाले खर्च और उससे मिलने वाले संभावित अवसरों का भी आकलन करना चाहिए। किसी कोर्स में दाखिला लेने से पहले यह समझना जरूरी है कि वह पढ़ाई छात्र के लक्ष्य, रुचि और भविष्य की योजनाओं के लिए कितनी उपयोगी है।

विश्व विद्यार्थी दिवस पर इसलिए सवाल केवल यह नहीं है कि विश्वविद्यालय की डिग्री लेना आज भी फायदेमंद है या नहीं। असली सवाल यह है कि छात्रों को इस डिग्री से क्या उम्मीद करनी चाहिए।

डिग्री किसी को करियर की गारंटी नहीं दे सकती और न ही यह तय कर सकती है कि भविष्य में उसका पेशा किस दिशा में जाएगा। लेकिन इससे छात्र को करियर शुरू करने के लिए जरूरी ज्ञान, सवाल पूछने की स्वतंत्रता, नई परिस्थितियों में निर्णय लेने की समझ और लगातार सीखते रहने की क्षमता जरूर मिलनी चाहिए।

डिग्री का असली महत्व कई बार पढ़ाई पूरी होने के वर्षों बाद सामने आता है, जब उद्योगों में बदलाव आ चुका होता है, कामकाज की अपेक्षाएं बदल चुकी होती हैं और करियर के नए रास्ते खुल चुके होते हैं।

बदलती दुनिया में उच्च शिक्षा का उद्देश्य केवल छात्रों को उन नौकरियों के लिए तैयार करना नहीं होना चाहिए, जो भविष्य में खत्म भी हो सकती हैं। उसे छात्रों को ऐसी क्षमता देनी चाहिए कि वे अपने पूरे करियर में सीखते रहें, जिज्ञासु बने रहें और बदलती जरूरतों के अनुसार उपयोगी बने रह सकें।

Raish Ahmed

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