एक समय था, जब किसी छात्र को शिकायत होती थी तो वह सबसे पहले शिक्षक से बात करता था, लिखित शिकायत देता था या कॉलेज प्रशासन से सवाल पूछता था। लेकिन आज कई बार किसी शिकायत के सामने आने से लेकर उसके कैंपस विवाद बनने, सोशल मीडिया पर वीडियो वायरल होने और देशव्यापी बहस छिड़ने तक में ज्यादा समय नहीं लगता। कई बार ऐसा होने तक मामले के सभी तथ्य भी सामने नहीं आए होते।
ऐसे में सवाल उठता है कि क्या आज के छात्र छोटी-छोटी बातों पर विरोध करने लगे हैं, या शिक्षा व्यवस्था उन्हें यह भरोसा नहीं दिला पा रही कि उनकी बात उचित माध्यम से भी सुनी जा सकती है? क्या संस्थान खुद अपनी जिम्मेदारी निभाने में पीछे रह गए हैं?
विरोध आखिरी रास्ता क्यों नहीं रह गया?
भारत में परीक्षाओं, कथित पेपर लीक और संस्थानों की जवाबदेही को लेकर होने वाले छात्र प्रदर्शनों ने शिक्षा व्यवस्था पर भरोसे से जुड़े कई सवाल खड़े किए हैं। प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में छात्र कई साल, पैसा और मेहनत लगाते हैं। ऐसे में अगर उन्हें लगता है कि किसी गड़बड़ी के कारण उनके अवसर प्रभावित हो रहे हैं, तो केवल शांत रहने और जवाब का इंतजार करने की सलाह उनके लिए पर्याप्त नहीं हो सकती।
हालांकि, गुस्सा अपने आप में किसी आरोप को सच साबित नहीं करता। सोशल मीडिया पर वायरल होने वाले हर आरोप की पुष्टि नहीं होती और प्रशासन की हर गलती जानबूझकर की गई लापरवाही नहीं होती। इसी तरह, विरोध कर रही भीड़ की आवाज को सभी छात्रों की राय भी नहीं माना जा सकता।
इसलिए जरूरी है कि छात्रों की शिकायतों को गंभीरता से सुना जाए और साथ ही किसी भी आरोप पर निष्कर्ष निकालने से पहले तथ्यों की जांच की जाए।
सोशल मीडिया के दौर में बदल गया है विरोध का तरीका
आज विरोध केवल कैंपस या सड़क तक सीमित नहीं है। उसका एक रूप जमीन पर दिखाई देता है, तो दूसरा सोशल मीडिया पर। प्रदर्शन के दौरान हुई झड़प, आंसू गैस का इस्तेमाल, हिरासत में लिए जाने या पुलिस की कथित ज्यादती जैसी घटनाओं के वीडियो कुछ ही समय में बड़ी संख्या में लोगों तक पहुंच सकते हैं।
ह्यूमन राइट्स वॉच जैसे मानवाधिकार संगठन भारत में प्रदर्शनकारियों के साथ हिंसा और उनके अधिकारों से जुड़े मामलों पर चिंता जता चुके हैं। हालांकि, किसी खास घटना के बारे में निष्कर्ष निकालने से पहले उससे जुड़े तथ्यों और उपलब्ध सबूतों की पुष्टि करना जरूरी है।
सोशल मीडिया ने विरोध के तरीके और उसके असर को भी बदल दिया है। किसी जटिल मुद्दे को कुछ सेकंड के वीडियो में दिखाया जा सकता है। कई बार भावनाएं और गुस्सा पूरी जानकारी से ज्यादा तेजी से फैलते हैं। ऐसे में बहस का केंद्र मूल शिकायत से हटकर वायरल वीडियो, टकराव और आरोप-प्रत्यारोप बन सकता है।
इस प्रक्रिया में वह सवाल पीछे छूट जाता है, जिसके कारण विरोध शुरू हुआ था।
समस्या गुस्सा नहीं, उसके बाद क्या होता है यह है
छात्रों को सवाल पूछने, जवाब मांगने और संस्थानों को उनकी जिम्मेदारी याद दिलाने का अधिकार है। शांतिपूर्ण विरोध अपने आप में इस बात का सबूत नहीं है कि संवाद की प्रक्रिया पूरी तरह नाकाम हो गई है। कई बार जब शिकायतों को सुनने के सामान्य रास्ते काम नहीं करते, तब विरोध अपनी बात सामने रखने का जरूरी माध्यम बन जाता है।
लेकिन किसी मांग को लोकप्रिय समर्थन मिलने से धमकी देना, तोड़फोड़ करना या शारीरिक हिंसा करना सही नहीं हो जाता। दूसरी ओर, प्रशासन भी वैध शिकायतों को नजरअंदाज नहीं कर सकता और न ही असहमति को दबाने के लिए जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग को उचित ठहराया जा सकता है।
नियम और नैतिकता सभी पर समान रूप से लागू होने चाहिए, चाहे कार्रवाई करने वाला पक्ष ताकतवर हो या विरोध करने वाला।
असल सवाल यह नहीं है कि छात्र हर मुद्दे पर विरोध क्यों करते दिखाई देते हैं। सवाल यह है कि इतनी सारी शिकायतें सार्थक बातचीत शुरू होने से पहले ही टकराव में क्यों बदल जाती हैं।
छात्रों को निष्पक्ष सुनवाई पाने के लिए अपनी शिकायत को सोशल मीडिया पर वायरल करने के लिए मजबूर नहीं होना चाहिए। इसी तरह, किसी संस्थान को केवल इसलिए किसी जायज शिकायत से मुंह नहीं मोड़ना चाहिए कि उस समय जनता में गुस्सा है या मामला विवाद का रूप ले चुका है।
एक स्वस्थ लोकतंत्र के लिए विरोध करने का साहस और दूसरों की बात सुनने की इच्छा, दोनों जरूरी हैं। अगर विरोध की आवाज को जगह नहीं मिलेगी, तो संवाद का अवसर भी कमजोर होगा। और जब संवाद नहीं होगा, तो असहमति के हर मामले के टकराव में बदलने का खतरा बढ़ जाएगा।




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