स्टॉकहोम से आने वाली एक फोन कॉल किसी वैज्ञानिक को नोबेल पुरस्कार मिलने की खबर दे सकती है, लेकिन जिस विज्ञान के लिए यह सम्मान दिया जाता है, उसकी शुरुआत अक्सर कई दशक पहले किसी प्रयोगशाला में ऐसे सवालों से होती है, जिन्हें उस समय बहुत कम लोग जरूरी मानते हैं।
वर्ष 2026 के विज्ञान से जुड़े नोबेल पुरस्कारों में प्रकाश की मदद से तंत्रिका कोशिकाओं को नियंत्रित करने, अंटार्कटिका की बर्फ के नीचे उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रिनो का पता लगाने और रासायनिक प्रतिक्रियाओं में एक प्रकार के दर्पण-प्रतिबिंब अणु को दूसरे की तुलना में अधिक बनाने से जुड़ी खोजों को सम्मानित किया गया। इन सभी उपलब्धियों के पीछे दशकों का शोध था।
इन खोजों से एक महत्वपूर्ण बात सामने आती है: विज्ञान में समय लगता है और वैज्ञानिक बनने के लिए केवल असाधारण प्रतिभा होना काफी नहीं है। इसके लिए धैर्य, लगातार मेहनत और ऐसे संस्थानों की जरूरत होती है, जो किसी विचार के व्यावहारिक नतीजे सामने आने से बहुत पहले ही जिज्ञासा और शोध को बढ़ावा दें।
चिकित्सा या शरीर विज्ञान का 2026 का नोबेल पुरस्कार कार्ल डाइसेरोथ, पीटर हेगेमैन और जॉर्ज नागेल को ऑप्टोजेनेटिक्स पर उनके काम के लिए दिया गया। यह ऐसी तकनीक है, जिसमें प्रकाश की मदद से तंत्रिका कोशिकाओं की गतिविधि को नियंत्रित किया जाता है।
भौतिकी का नोबेल पुरस्कार फ्रांसिस हल्जेन को दक्षिणी ध्रुव पर आइसक्यूब वेधशाला विकसित करने में उनके नेतृत्व के लिए मिला। यह वेधशाला सौरमंडल से बाहर के स्रोतों से आने वाले उच्च ऊर्जा वाले न्यूट्रिनो का पता लगाती है।
रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार हेनरी कागन और केन्सो सोआई को मिला। उनके शोध ने यह समझने में मदद की कि कुछ रासायनिक प्रतिक्रियाओं में किसी अणु के एक दर्पण-प्रतिबिंब रूप को दूसरे रूप की तुलना में अधिक मात्रा में कैसे बनाया जा सकता है और यह बढ़त कैसे और मजबूत हो सकती है।
धैर्य और लगातार मेहनत की अहम भूमिका
इन वैज्ञानिकों की उपलब्धियों की कहानी में यह भी महत्वपूर्ण है कि उन्हें पहचान मिलने से पहले कितना लंबा समय बीता।
1930 में जन्मे हेनरी कागन ने असममित संश्लेषण में गैर-रेखीय प्रभाव पर अपना शोध 1986 में प्रकाशित किया था। वर्ष 2001 में जब असममित उत्प्रेरण से जुड़े काम के लिए रसायन विज्ञान का नोबेल पुरस्कार दिया गया, तब पुरस्कार पाने वालों में उनका नाम नहीं था।
1950 में हिरोशिमा में जन्मे केन्सो सोआई ने 1995 में अपनी ऐसी रासायनिक प्रतिक्रिया का वर्णन किया, जिसमें प्रतिक्रिया खुद अपने प्रभाव को बढ़ाती है। 2003 में उन्होंने इसका लगभग पूर्ण रूप सामने रखा।
फ्रांसिस हल्जेन ने 1972 में यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन–मैडिसन में काम शुरू किया। उन्होंने 1988 में ही बर्फ के भीतर न्यूट्रिनो का पता लगाने वाली दूरबीन बनाने का विचार पेश कर दिया था।
अंटार्कटिका की एक घन किलोमीटर बर्फ में फैली आइसक्यूब वेधशाला में प्रकाश सेंसर लगाए गए हैं। हालांकि, यह परियोजना 2011 में जाकर पूरी हुई।
पीटर हेगेमैन 1980 के दशक से ही प्रकाश की ओर प्रतिक्रिया करने वाले एक सूक्ष्म शैवाल का अध्ययन कर रहे थे। 2000 के शुरुआती वर्षों में उन्होंने जॉर्ज नागेल के साथ मिलकर चैनल रोडोप्सिन नाम के प्रकाश-संवेदनशील प्रोटीन की पहचान की। इसके बाद स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में कार्ल डाइसेरोथ और उनके छात्रों ने 2005 में दिखाया कि प्रकाश के प्रति संवेदनशील प्रोटीन की मदद से चूहे की तंत्रिका कोशिका को सक्रिय किया जा सकता है। 2007 में उन्होंने जीवित चूहे के तंत्रिका तंत्र के एक हिस्से को नियंत्रित करने का तरीका भी प्रदर्शित किया।
इन सभी कहानियों में वैज्ञानिकों को सम्मान उस समय मिला, जब उनके काम की शुरुआत हुए कई साल बीत चुके थे। कई बार ऐसा भी हुआ कि जब उन्होंने शोध शुरू किया, तब उस विषय में बहुत कम लोगों की दिलचस्पी थी।
भारतीय परंपरा में इस तरह के प्रयास के लिए एक शब्द है—‘तपस्या’। इसका अर्थ केवल प्रतिभा या तेजी से काम करना नहीं है। यह लंबे समय तक एकाग्रता, अनुशासन और धैर्य के साथ किसी लक्ष्य की दिशा में जुटे रहना है।
2026 के नोबेल पुरस्कार विजेताओं ने ऐसे विषयों पर काम करते हुए यही तपस्या की। उनके शोध के केंद्र में एक कोशिका वाला शैवाल, पदार्थ के साथ बहुत कम प्रतिक्रिया करने वाला एक सूक्ष्म कण और लुई पाश्चर के समय से चला आ रहा यह सवाल था कि जीवन से जुड़े अणुओं में एक खास तरह की दर्पण-प्रतिबिंब संरचना क्यों पाई जाती है।
इनमें से किसी भी शोध की शुरुआत किसी राष्ट्रीय अभियान के रूप में नहीं हुई थी। इनके व्यावहारिक उपयोग बाद में सामने आए। तंत्रिका तंत्र के अध्ययन से याददाश्त और मनोदशा को समझने के नए रास्ते खुले। दृष्टि बहाल करने के संभावित तरीकों पर शोध को बढ़ावा मिला। दवाओं के निर्माण में एक खास प्रकार के अणु को अधिक शुद्धता के साथ तैयार करने की संभावनाएं सामने आईं। वहीं, आइसक्यूब ने ब्रह्मांड की अत्यधिक ऊर्जा वाली घटनाओं का अध्ययन करने के लिए एक नई खिड़की खोली।
यह क्रम महत्वपूर्ण है। व्यावहारिक उपयोग शोध का परिणाम थे, उसकी शुरुआत का कारण नहीं।
विश्वविद्यालयों की भूमिका: जहां बड़ी खोजों की नींव रखी गई
इन खोजों के पीछे उन विश्वविद्यालयों और शोध संस्थानों की भूमिका को देखना भी जरूरी है, जहां वैज्ञानिकों को लंबे समय तक काम करने का अवसर मिला।
नोबेल विजेताओं के शोध की जड़ें विश्वविद्यालयों या विश्वविद्यालय स्तर के शोध संस्थानों में थीं। हेगेमैन और नागेल ने जर्मनी के शोध संस्थानों, जिनमें मैक्स प्लैंक संस्थान भी शामिल हैं, में अपने सम्मानित शोध का महत्वपूर्ण हिस्सा किया। बाद में दोनों ने विश्वविद्यालयों में वरिष्ठ अकादमिक पदों पर काम किया। हेगेमैन ने तंत्रिका विज्ञान और नागेल ने पादप शरीर विज्ञान के क्षेत्र में अपनी विशेषज्ञता विकसित की।
कार्ल डाइसेरोथ स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी में मनोचिकित्सक और जैव-अभियांत्रिकी विशेषज्ञ हैं। फ्रांसिस हल्जेन पांच दशक से अधिक समय से यूनिवर्सिटी ऑफ विस्कॉन्सिन–मैडिसन से जुड़े रहे हैं।
हेनरी कागन ने अपने करियर का बड़ा हिस्सा पेरिस-सूद यूनिवर्सिटी में बिताया, जबकि केन्सो सोआई ने टोक्यो यूनिवर्सिटी ऑफ साइंस में काम किया।
इन वैज्ञानिकों की जीवन यात्रा यह धारणा कमजोर करती है कि कोई महान वैज्ञानिक अकेले काम करते हुए अचानक प्रसिद्ध हो जाता है। इसके बजाय, इन कहानियों में एक स्थायी अकादमिक पद, लंबे समय तक मिलने वाली शोध सहायता और कठिन समस्याओं पर काम करने वाली प्रयोगशाला की भूमिका सामने आती है।
कार्ल डाइसेरोथ की 2005 की खोज में उनके शोध समूह के प्रमुख के साथ छात्रों की भी अहम भूमिका थी। उनके दो छात्र, फेंग झांग और एडवर्ड बॉयडेन, आगे चलकर इस क्षेत्र की महत्वपूर्ण हस्तियों में शामिल हुए।
इससे पता चलता है कि इन वैज्ञानिकों के लिए पढ़ाना शोध से अलग कोई काम नहीं था। छात्रों के साथ शोध करना और उन्हें आगे बढ़ाना ही वैज्ञानिक ज्ञान को अगली पीढ़ी तक पहुंचाने का एक तरीका था।
फ्रांसिस हल्जेन के लिए धैर्य की परीक्षा अलग तरह की थी। उन्होंने दक्षिणी ध्रुव पर बर्फ में गहराई तक छेद करके वैज्ञानिक उपकरण स्थापित करने वाली अंतरराष्ट्रीय परियोजना को आगे बढ़ाया। इस परियोजना में लगभग 27.9 करोड़ डॉलर का खर्च आया, जिसका बड़ा हिस्सा सार्वजनिक धन से जुटाया गया।
हल्जेन के अनुसार, यह परियोजना इतनी महत्वाकांक्षी थी कि उन्हें खुद भी कभी-कभी इसके सफल होने पर संदेह होता था। नोबेल पुरस्कार में उनके वैज्ञानिक नेतृत्व और लगातार प्रयासों को मान्यता दी गई। यहां नेतृत्व का अर्थ केवल विचार देना नहीं था, बल्कि कठिनाइयों के बावजूद परियोजना को आगे बढ़ाते रहना भी था।
देश को वैज्ञानिक शोध में निवेश क्यों बढ़ाना चाहिए?
एक देश के रूप में हमें इन नोबेल पुरस्कारों को केवल महान वैज्ञानिकों की उपलब्धियों के रूप में नहीं, बल्कि अपने शैक्षणिक संस्थानों की स्थिति पर विचार करने के अवसर के रूप में भी देखना चाहिए।
भारत में तेजी से विश्वविद्यालय बनाए जा रहे हैं। उनसे उम्मीद की जाती है कि वे छात्रों को रोजगार के योग्य बनाएं, स्टार्टअप को बढ़ावा दें और राष्ट्रीय जरूरतों से जुड़े काम में योगदान दें। ये सभी उद्देश्य महत्वपूर्ण हैं, लेकिन विश्वविद्यालयों की भूमिका केवल इतनी ही नहीं होनी चाहिए।
जॉन हेनरी न्यूमैन की पुस्तक द आइडिया ऑफ ए यूनिवर्सिटी में उच्च शिक्षा को अपने आप में महत्वपूर्ण माना गया है। इसमें कहा गया है कि शिक्षा का उद्देश्य केवल रोजगार के लिए कौशल देना नहीं, बल्कि सोचने-समझने की क्षमता, आलोचनात्मक दृष्टि और ज्ञान की अलग-अलग शाखाओं को जोड़कर समझने की क्षमता विकसित करना भी है।
राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 भी विश्वविद्यालयों की व्यापक भूमिका को स्वीकार करती है। विश्वविद्यालयों को समाज और देश की जरूरतों में योगदान देना चाहिए, लेकिन इसके साथ ही उन्हें स्वतंत्र जिज्ञासा और बुनियादी शोध के लिए भी जगह बनानी होगी।
अगर किसी विश्वविद्यालय के पास दाखिले, प्लेसमेंट और पेटेंट के आंकड़े तो हों, लेकिन वह ऐसे शोध समूह का उदाहरण न दे सके, जिसे किसी शैवाल या बर्फ की परत का बीस साल तक अध्ययन करने की स्वतंत्रता मिली हो, तो वहां इस स्तर का मौलिक विज्ञान विकसित करना मुश्किल होगा।
2026 के नोबेल पुरस्कारों में जिन उपलब्धियों को सम्मानित किया गया, वे प्रशंसा के योग्य हैं, लेकिन उन्हें विकसित करने के लिए समय और पर्याप्त संसाधनों की जरूरत थी। आइसक्यूब इसका स्पष्ट उदाहरण है कि बड़े वैज्ञानिक शोध के लिए कितने बड़े निवेश की आवश्यकता हो सकती है। रसायन विज्ञान के शोध में शायद उतना खर्च नहीं हुआ, लेकिन वहां भी ऐसे वैज्ञानिकों और संस्थानों की जरूरत थी, जो एक सदी पुराने वैज्ञानिक सवाल पर लगातार काम करने के लिए तैयार हों।
भारत के विश्वविद्यालयों के लिए तीन अहम सबक
पहला, विश्वविद्यालयों में ऐसे स्थायी पद और शोध का माहौल होना चाहिए, जहां वैज्ञानिकों को लंबे समय तक काम करने का अवसर मिले। किसी विचार को शुरू में गलत या अव्यावहारिक माना जा सकता है, लेकिन समय और लगातार प्रयास से वही विचार किसी उपयोगी उपकरण या नई तकनीक का आधार बन सकता है।
दूसरा, सार्वजनिक धन से ऐसे शोध को भी सहायता मिलनी चाहिए, जिसके व्यावहारिक उपयोग या लाभार्थियों की पहचान शुरुआत में स्पष्ट न हो। इसका अर्थ है कि सरकार और शोध संस्थान केवल उन परियोजनाओं को प्राथमिकता न दें, जिनसे तुरंत कोई उत्पाद या आर्थिक लाभ मिलने की उम्मीद हो। शैवाल का अध्ययन करने वाली प्रयोगशाला और दवाएं विकसित करने वाली प्रयोगशाला, दोनों को शोध के लिए उचित अवसर मिलने चाहिए।
तीसरा, पढ़ाने को केवल पहले से तय पाठ्यक्रम पूरा कराने तक सीमित नहीं समझना चाहिए। शिक्षा का एक महत्वपूर्ण उद्देश्य छात्रों को ऐसे सवालों से जोड़ना है, जिनके जवाब अभी पूरी तरह उपलब्ध नहीं हैं।
आधुनिक प्रयोगशाला में गुरु-शिष्य संबंध साझा काम, साझा सवाल और असफलताओं से सीखने के अनुभव से बनता है। यदि विश्वविद्यालय शोध करने वाले वैज्ञानिकों और पढ़ाने वाले शिक्षकों को एक-दूसरे से अलग कर देंगे, तो वे आज की खोजों और कल के वैज्ञानिकों, दोनों को विकसित करने का अवसर खो सकते हैं।
नोबेल पुरस्कार के बाद भी जारी रहती है वैज्ञानिक तपस्या
हेनरी कागन की उम्र 95 वर्ष है। केन्सो सोआई को जब उनके पुरस्कार की खबर मिली, तब वह टहलने निकले हुए थे। उन्होंने कहा कि वह अपना काम जारी रखेंगे।
फ्रांसिस हल्जेन की आइसक्यूब वेधशाला अब भी आंकड़े जुटा रही है। वैज्ञानिक तपस्या नोबेल पुरस्कार मिलने के साथ समाप्त नहीं होती।
अगर यह कभी समाप्त होती है, तो शायद तब, जब अगली पीढ़ी के किसी वैज्ञानिक को यह समझाने की जरूरत न रहे कि दर्पण-प्रतिबिंब वाले अणु, मुश्किल से पकड़े जा सकने वाले सूक्ष्म कण और तालाबों में पाए जाने वाले शैवाल भी ऐसे गंभीर वैज्ञानिक विषय हैं, जिनके अध्ययन में कोई अपना पूरा जीवन लगा सकता है।




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