कोई भाषा हाथ से लिखी पांडुलिपियों, सुरक्षित रखी गई किताबों या विश्वविद्यालयों के अभिलेखागार में जीवित रह सकती है। लेकिन उसका भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि नई पीढ़ी उसे पढ़ती है या नहीं, उसके अर्थ को समझती है या नहीं और उसके साहित्य में अपने लिए कुछ उपयोगी खोज पाती है या नहीं।
यही असली कसौटी शिक्षा मंत्रालय की ओर से 3 अक्टूबर 2026 को मंजूर किए गए पांच नए उत्कृष्टता केंद्रों के सामने है। ये केंद्र अलग-अलग विश्वविद्यालयों में शास्त्रीय असमिया, बंगाली, मराठी, पाली और प्राकृत भाषाओं पर काम करेंगे। इनका उद्देश्य इन भाषाओं में उच्चस्तरीय शोध को बढ़ावा देना और उनकी भाषाई व साहित्यिक विरासत को सुरक्षित रखना है।
यह पहल भारत के विश्वविद्यालयों को शास्त्रीय भाषाओं की पढ़ाई के तरीकों और उनकी पहुंच पर नए सिरे से विचार करने का अवसर देती है। भाषाई विविधता वाले देश में इन भाषाओं की विरासत को बचाने का काम नई पीढ़ी के शोधकर्ताओं को तैयार करने के प्रयासों के साथ चलना चाहिए। संरक्षण जरूरी है, लेकिन इसका वास्तविक लाभ तब सामने आएगा, जब शोध से मिलने वाली नई जानकारी अधिक से अधिक लोगों तक पहुंचेगी।
शास्त्रीय भाषाओं को शोधकर्ताओं के साथ नए पाठकों की भी जरूरत
स्कूलों में पढ़ने वाले ज्यादातर विद्यार्थियों के लिए शास्त्रीय भाषाओं का अध्ययन उनकी रोजमर्रा की पढ़ाई से कुछ दूर नजर आ सकता है। किसी विद्यार्थी के मन में यह सवाल उठ सकता है कि पुराने ग्रंथों और व्याकरण के नियमों को पढ़ने से इतिहास को समझने में क्या मदद मिलेगी या उसकी शिक्षा में इसका क्या योगदान होगा। विज्ञान, तकनीक, पत्रकारिता या ग्राफिक डिजाइन जैसे क्षेत्रों में करियर बनाने की इच्छा रखने वाले विद्यार्थियों को भी ये विषय अपने भविष्य से जुड़े हुए नहीं लग सकते।
विश्वविद्यालय इन भाषाओं के अध्ययन से जुड़े अलग-अलग सवालों और संभावनाओं से विद्यार्थियों को परिचित कराकर उनकी उपयोगिता समझा सकते हैं। उदाहरण के लिए, पुरानी पांडुलिपियों पर काम करने से यह समझने का अवसर मिलता है कि समय के साथ कहानियां सुनाने के तरीके कैसे बदले, विचारों में क्या बदलाव आए और मनुष्य के अनुभवों को अलग-अलग दौर में किस तरह देखा गया।
इसके अलावा, शोधकर्ता लिपियों के विकास की तुलना कर सकते हैं, यह अध्ययन कर सकते हैं कि पुराने साहित्यकारों का बाद की साहित्यिक परंपराओं पर क्या प्रभाव पड़ा और शिलालेखों के अध्ययन यानी अभिलेख-विज्ञान के जरिए इतिहास के नए पहलुओं को समझ सकते हैं।
किसी विषय के प्रति बौद्धिक जिज्ञासा विद्यार्थियों को सीखने के लिए प्रेरित करती है। पाठ का विश्लेषण करने और उसे आलोचनात्मक नजरिये से पढ़ने की क्षमता विकसित करने वाले विद्यार्थी इन कौशलों का उपयोग नौकरी, उच्च शिक्षा और आगे के शोध में भी कर सकते हैं।
इन बदलावों में पांचों नए केंद्रों की अहम भूमिका हो सकती है। उनकी सफलता इस बात पर भी निर्भर करेगी कि वे नई पीढ़ी के विद्यार्थियों के बीच इन भाषाओं के अध्ययन को कितना प्रासंगिक बना पाते हैं।
डिजिटलीकरण से ज्ञान तक पहुंच आसान बनाना जरूरी
किसी पांडुलिपि को इंटरनेट पर उपलब्ध कराने से उसे सुरक्षित रखने और अधिक लोगों तक पहुंचाने में मदद मिलती है। उसकी डिजिटल प्रति तैयार होने से मूल दस्तावेज को बार-बार संभालने की जरूरत कम हो सकती है और हजारों लोग उसकी सामग्री तक पहुंच सकते हैं। लेकिन केवल पांडुलिपि की तस्वीर ऑनलाइन डाल देना पर्याप्त नहीं है।
सवाल यह है कि क्या उस दस्तावेज को समझना भी आसान है? क्या कोई शोधकर्ता पुरानी और कठिन लिपि को पढ़ सकता है, उसके अर्थ को समझ सकता है और उस समय की सामाजिक व ऐतिहासिक परिस्थितियों को ध्यान में रखकर उसका महत्व तय कर सकता है?
नए केंद्रों को केवल पांडुलिपियों और ग्रंथों को सुरक्षित रखने तक सीमित नहीं रहना चाहिए। उन्हें इन भाषाओं के अध्ययन को अधिक आसान और उपयोगी बनाने पर भी काम करना चाहिए। पुराने दस्तावेजों का डिजिटलीकरण करने के साथ-साथ ऐसे इलेक्ट्रॉनिक संग्रह और डेटाबेस तैयार किए जा सकते हैं, जिनसे भाषा और साहित्य पर शोध करना आसान हो।
दो भाषाओं में उपलब्ध संस्करण, आसानी से इस्तेमाल किए जा सकने वाले ऑनलाइन संसाधन, सामान्य पाठकों के लिए तैयार पाठ और ऑडियोबुक जैसे साधन शोधकर्ताओं, विद्यार्थियों तथा आम लोगों को भारत की भाषाई और साहित्यिक विरासत से जोड़ सकते हैं।
पुरानी पांडुलिपियों को डिजिटल रूप में बदलने के लिए ऑप्टिकल कैरेक्टर रिकग्निशन (OCR) और दूसरी तकनीकों की मदद ली जा सकती है। OCR ऐसी तकनीक है, जो तस्वीरों या स्कैन किए गए दस्तावेजों में मौजूद अक्षरों को पहचानकर उन्हें डिजिटल पाठ में बदलने में मदद करती है। हालांकि, पुरानी, अधूरी या कठिन लिपि में लिखे दस्तावेजों को पढ़ने के दौरान मानवीय जांच जरूरी है। तकनीक का इस्तेमाल शोध की गुणवत्ता को बेहतर बनाने के लिए होना चाहिए, न कि उसे शोध का विकल्प बना देना चाहिए।
इन परियोजनाओं का एक लक्ष्य यह भी हो सकता है कि देश के किसी दूरदराज इलाके में बैठा विद्यार्थी किसी दूसरे विश्वविद्यालय में रखे प्राचीन ग्रंथ का अध्ययन कर सके। ज्ञान का महत्व तभी बढ़ता है, जब उसकी उपलब्धता किसी खास जगह या संस्थान तक सीमित न रहे।
जिज्ञासा से उच्च शिक्षा और शोध तक का रास्ता बनाएं विश्वविद्यालय
नए केंद्र अपने राज्यों के दूसरे विश्वविद्यालयों, पुस्तकालयों और स्थानीय सांस्कृतिक आयोजनों के साथ मिलकर काम कर सकते हैं। इस तरह की भागीदारी का प्रभाव शुरुआती कार्यक्रमों में शामिल लोगों से कहीं अधिक व्यापक हो सकता है।
इसकी शुरुआत इतिहास में स्नातक कर रहे विद्यार्थियों के लिए व्याख्यान आयोजित करने से हो सकती है, ताकि वे भारत की साहित्यिक परंपराओं की समृद्धि को समझ सकें। इसके बाद उन्हें शोध से जुड़ी गतिविधियों में शामिल किया जा सकता है। दूसरे विषयों के विद्यार्थी पांडुलिपियां पढ़ने की कार्यशालाओं में हिस्सा ले सकते हैं या भाषा से जुड़े शोध में टीम के साथ काम कर सकते हैं।
इतिहास के विद्यार्थी यह अध्ययन कर सकते हैं कि किसी खास दौर की सामाजिक और राजनीतिक परिस्थितियों में घटनाओं या विचारों को किस तरह प्रस्तुत किया गया। भाषाविज्ञान के विद्यार्थी शब्दों के विकास का रिकॉर्ड तैयार कर सकते हैं। वहीं, कंप्यूटर विज्ञान के विद्यार्थी किसी खास भाषा के लिए डिजिटल साधन और डेटाबेस बनाने में आने वाली तकनीकी चुनौतियों पर काम कर सकते हैं।
इन गतिविधियों से विद्यार्थियों को भारत की भाषाई और साहित्यिक विरासत के अध्ययन का शुरुआती अनुभव मिलेगा। इससे नए केंद्रों के शैक्षणिक कार्यक्रमों के लिए विद्यार्थियों की रुचि भी बढ़ सकती है। हालांकि, उनका मुख्य उद्देश्य केवल अपने पाठ्यक्रमों के लिए विद्यार्थी जुटाना नहीं, बल्कि सभी प्रतिभागियों की शैक्षणिक समझ का विस्तार करना होना चाहिए। इस प्रक्रिया में शिक्षकों की भी महत्वपूर्ण भूमिका होगी।
स्कूलों के स्तर पर आसान अध्ययन सामग्री, चुने हुए पुराने ग्रंथों के संक्षिप्त संग्रह और कक्षा में कराई जाने वाली गतिविधियों के जरिए विद्यार्थियों को इन साहित्यिक परंपराओं से परिचित कराया जा सकता है। इसके लिए शिक्षकों का संबंधित शास्त्रीय भाषा का विशेषज्ञ होना जरूरी नहीं होना चाहिए।
नए केंद्र ऐसे अवसरों का विस्तार कर सकते हैं, हालांकि उनके विशिष्ट कार्यक्रमों की घोषणा अभी बाकी है। पांच केंद्रों की घोषणा से उनके व्यापक उद्देश्य सामने आए हैं। अब यह संबंधित संस्थानों पर निर्भर करेगा कि वे इन उद्देश्यों को पूरा करने के लिए किस तरह की गतिविधियां तैयार करते हैं।
अतीत की विरासत को वर्तमान से जोड़ना जरूरी
शास्त्रीय भाषाओं के अध्ययन का लाभ केवल भाषा विशेषज्ञों तक सीमित नहीं है। भाषा की संरचना और उसके विकास को समझने से विद्यार्थियों को यह जानने में मदद मिलती है कि मनुष्य एक-दूसरे के साथ और अपने आसपास के वातावरण के साथ किस तरह संवाद करता है।
इतिहासकारों को अतीत की घटनाओं को समझने के लिए पुराने दस्तावेजों और लिखित प्रमाणों का विश्लेषण करना पड़ता है। साहित्य के विद्यार्थियों के लिए भी यह जानना उपयोगी होता है कि अलग-अलग लेखकों और अनुवादकों के काम का मूल्यांकन कैसे किया जाए। इन सभी क्षेत्रों में सटीकता, संवेदनशीलता और आलोचनात्मक सोच की जरूरत होती है। सही तरीके से पढ़ाई कराई जाए, तो शास्त्रीय भाषाओं का अध्ययन इन क्षमताओं को विकसित करने में मदद कर सकता है।
इन पांच नए शोध केंद्रों में नए शोधकर्ताओं और विचारों के लिए भी जगह होनी चाहिए। शास्त्रीय भाषाओं का अध्ययन अपने आप में एक विशेष क्षेत्र है, लेकिन इसे दूसरे विषयों और नई शोध पद्धतियों से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। नए शोधकर्ता अब तक कम अध्ययन किए गए विषयों पर काम कर सकते हैं, अलग-अलग क्षेत्रों की भाषाई और साहित्यिक परंपराओं की तुलना कर सकते हैं और नए संस्करण, टीकाएं तथा व्याख्यात्मक सामग्री तैयार कर सकते हैं।
यह काम समय और लगातार प्रयास की मांग करता है। शैक्षणिक ढांचा तैयार करने और योग्य शोधकर्ताओं की नियुक्ति करने के नतीजों को केवल सालाना गतिविधियों या कार्यक्रमों की संख्या से नहीं मापा जा सकता। इन केंद्रों की दीर्घकालिक सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि वहां होने वाला शोध कितना गुणवत्तापूर्ण है और उसका शैक्षणिक व सामाजिक महत्व कितना है।
सफलता की असली कसौटी: कितने लोग पढ़ पाएंगे वे ग्रंथ, जो पहले उनकी पहुंच से दूर थे?
शास्त्रीय असमिया, बंगाली, मराठी, पाली और प्राकृत भाषाओं के अध्ययन और संरक्षण के लिए बनाए जा रहे पांच उत्कृष्टता केंद्र भारत के शैक्षणिक संस्थानों को इन भाषाओं के भविष्य में निवेश करने का अवसर देते हैं।
इन केंद्रों की सफलता केवल पुस्तकालयों में सुरक्षित रखी गई पांडुलिपियों या विश्वविद्यालयों में आयोजित व्याख्यानों की संख्या से तय नहीं होनी चाहिए। यह भी देखना जरूरी है कि उनके शैक्षणिक प्रयासों का लाभ कितने विद्यार्थियों, शिक्षकों, शोधकर्ताओं और आम पाठकों तक पहुंचता है।
विद्यार्थियों के लिए शास्त्रीय भाषाओं का अध्ययन साहित्य, इतिहास, भाषा तकनीक और शोध जैसे कई क्षेत्रों में करियर का रास्ता खोल सकता है। इसके साथ ही, यह अलग-अलग विषयों के बीच ज्ञान को समझने, उसका मूल्यांकन करने और उसे दूसरों तक पहुंचाने की क्षमता भी विकसित कर सकता है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि भारत की भाषाई और साहित्यिक विरासत तभी बेहतर तरीके से सुरक्षित रह सकती है, जब सीखने की इच्छा रखने वाले लोगों को उस तक पहुंचने का अवसर मिले। इन केंद्रों का वास्तविक महत्व इस बात से सामने आएगा कि वे कितने नए शोधकर्ताओं को तैयार करते हैं और वे शोधकर्ता अतीत को समझने के लिए कितने नए सवाल उठाते हैं।




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