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यूरोप और एशिया में युवा आंदोलनों से कैसे बदल रही है राजनीति?

प्रो. उज्ज्वल के. चौधरी

छात्र शिक्षा की बढ़ती लागत के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं, किरायेदार अपने लिए घर का खर्च उठाने की मुश्किल से जूझ रहे हैं और युवा नागरिक सरकारी संस्थानों की निष्पक्षता पर सवाल कर रहे हैं। इन आंदोलनों में 2030 तक राजनीति को बदलने की क्षमता है, लेकिन इनकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ये कितने व्यापक गठबंधन बना पाते हैं, सरकारें कितने भरोसेमंद सुधार करती हैं और प्रदर्शन खत्म होने के बाद आंदोलन कितना प्रभाव बनाए रखते हैं।

एक ऐसा स्कूल जहां पर्याप्त शिक्षक नहीं हैं, एक ऐसा किराये का घर जो अब आमदनी से बाहर हो चुका है, एक ऐसी परीक्षा जिसकी निष्पक्षता पर सवाल उठने लगे हैं और एक ऐसा मतदाता जिसका नाम मतदाता सूची से गायब हो जाए—ये सभी अलग-अलग समस्याएं हैं। लेकिन इन सबके पीछे एक साझा चिंता है कि भविष्य अब पहले जितना भरोसेमंद नहीं रह गया है।

यूरोप और एशिया में युवा इन समस्याओं को सार्वजनिक बहस का हिस्सा बना रहे हैं। प्रदर्शनों के पीछे एक साझा मांग है: आम लोगों की मेहनत से उन्हें सम्मानजनक और सुरक्षित जीवन जीने का उचित अवसर मिलना चाहिए और राजनीति में उनकी आवाज भी सुनी जानी चाहिए।

हालांकि, इन सभी आंदोलनों को एक जैसी कहानी के रूप में देखना सही नहीं होगा। फ्रांस और फ्रेंच भाषी बेल्जियम में शिक्षा को लेकर विरोध प्रदर्शन हो रहे हैं। स्पेन में घरों के बढ़ते किराये और बेदखली के खिलाफ आंदोलन में युवा किरायेदारों के साथ बुजुर्ग भी शामिल हैं। भारत में कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) ने परीक्षा की निष्पक्षता से जुड़े मुद्दों से आगे बढ़कर चुनावी प्रक्रिया की जवाबदेही का सवाल उठाया है। इन आंदोलनों के विरोधी, बातचीत के रास्ते और राजनीतिक सत्ता पर प्रभाव डालने की संभावनाएं एक-दूसरे से काफी अलग हैं।

जब लोगों की आर्थिक परेशानियों के साथ यह भावना जुड़ जाती है कि सरकारी संस्थान उनकी समस्याओं को नजरअंदाज कर रहे हैं या उनके साथ निष्पक्ष व्यवहार नहीं हो रहा, तो असंतोष राजनीतिक आंदोलन का रूप ले सकता है। यदि सरकारें सामाजिक समस्याओं का जवाब मुख्य रूप से पुलिस कार्रवाई से देती हैं, तो स्थिति और बिगड़ सकती है।

2030 तक यूरोप और एशिया में एक ही बड़ा जनविद्रोह होने के बजाय बार-बार विरोध प्रदर्शनों और सुधारों को लेकर संघर्ष की संभावना अधिक दिखाई देती है। हालांकि, यदि आर्थिक संकट, हिंसक दमन और राजनीतिक अलगाव एक साथ बढ़ते हैं, तो हालात का आकलन बदल सकता है।

शिक्षा और वयस्क जीवन का भविष्य असुरक्षित क्यों लग रहा है?

जनता का गुस्सा अक्सर सरकारी वादों और वास्तविक अनुभवों के बीच बढ़ती दूरी से पैदा होता है। परिवार शिक्षा पर पैसा खर्च करते हैं क्योंकि उन्हें उम्मीद होती है कि डिग्री और योग्यताएं बेहतर अवसर दिलाएंगी। युवा नौकरी की शुरुआत में अस्थिरता स्वीकार करते हैं क्योंकि उन्हें उम्मीद रहती है कि आगे चलकर आर्थिक स्थिति मजबूत होगी। लोकतंत्र से भी यही अपेक्षा की जाती है कि जब व्यवस्था लोगों की उम्मीदों पर खरी न उतरे, तो वे अपनी आवाज के जरिए बदलाव ला सकें। जब ये सभी रास्ते एक साथ बंद होते दिखाई देते हैं, तो आंदोलन को समर्थन मिलने लगता है।

यूरोपीय संघ के सांख्यिकीय कार्यालय यूरोस्टैट के अगस्त 2026 के आंकड़ों के अनुसार, यूरोपीय संघ में बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत थी, जबकि रोजगार की तलाश कर रहे 25 वर्ष से कम उम्र के युवाओं में यह दर 15.4 प्रतिशत थी। फ्रांस में युवाओं की बेरोजगारी दर 20.6 प्रतिशत और स्पेन में 22.7 प्रतिशत दर्ज की गई।

यह ध्यान रखना जरूरी है कि ये आंकड़े उन युवाओं से संबंधित हैं जो काम करने के लिए उपलब्ध हैं और रोजगार की तलाश कर रहे हैं। पढ़ाई कर रहे कई युवा इस श्रेणी में शामिल नहीं होते। इसके बावजूद आंकड़े बताते हैं कि युवाओं के लिए पढ़ाई से रोजगार तक का सफर कितना कठिन बना हुआ है।

भारत में रोजगार की समस्या का स्वरूप अलग है। अंतरराष्ट्रीय श्रम संगठन (आईएलओ) और मानव विकास संस्थान की इंडिया एम्प्लॉयमेंट रिपोर्ट 2024 के अनुसार, युवा स्नातकों में बेरोजगारी दर 2022 में 29.1 प्रतिशत और 2023 में 28.4 प्रतिशत थी। ये पिछले वर्षों के आंकड़े हैं और इनकी तुलना सीधे यूरोप के मौजूदा आंकड़ों से नहीं की जा सकती। फिर भी ये उस चिंता को समझने में मदद करते हैं जिसमें युवाओं को लगता है कि वर्षों की मेहनत और शिक्षा पर भारी खर्च के बावजूद उन्हें अपनी योग्यता के अनुरूप नौकरी मिलने की गारंटी नहीं है।

यूरोप में मौजूदा विवादों का संबंध सरकारी खर्च पर दबाव के बीच सामाजिक सुरक्षा और सार्वजनिक सेवाओं को बनाए रखने से है। कोरोना महामारी के दौरान आई बाधाओं और उसके बाद बढ़ी कीमतों ने इन समस्याओं को और गंभीर बनाया। महंगाई की दर घटने के बाद भी पहले से बढ़ चुके खर्च का बोझ परिवारों पर बना रह सकता है। एशिया के कई देशों में अवसरों के लिए बढ़ती प्रतिस्पर्धा के साथ भ्रष्टाचार, पक्षपात और प्रशासन पर भरोसे की कमी भी जुड़ी हुई है। वहीं, यूरोप के छात्र भी लोकतांत्रिक जवाबदेही की मांग करते हैं और एशिया के प्रदर्शनकारी भी सस्ती तथा बेहतर सार्वजनिक सेवाएं चाहते हैं।

यह संघर्ष केवल युवाओं और बुजुर्गों के बीच की लड़ाई भी नहीं है। माता-पिता सरकारी स्कूलों के लिए अधिक बजट की मांग का समर्थन कर सकते हैं, बुजुर्ग किरायेदार युवाओं के आवास आंदोलन में शामिल हो सकते हैं और शिक्षक छात्रों के साथ खड़े हो सकते हैं। एक ही पीढ़ी के लोगों के अनुभव भी अलग-अलग होते हैं। संपत्ति का मालिकाना हक, जाति, समुदाय, लिंग और परिवार की आर्थिक स्थिति तय करते हैं कि असुरक्षा का असर किस पर कितना पड़ेगा। आंदोलन तब मजबूत होता है, जब ये अंतर आपसी सहयोग की वजह बनते हैं, न कि एक-दूसरे पर अविश्वास करने का कारण।

फ्रांस: सरकारी शिक्षा व्यवस्था को लेकर बढ़ता संघर्ष

फ्रांस में सितंबर के दौरान स्कूलों में विरोध प्रदर्शन शिक्षकों की कमी, कक्षाओं में जरूरत से ज्यादा छात्रों, खराब स्कूल भवनों और शिक्षा में असमान परिस्थितियों जैसे मुद्दों पर केंद्रित रहे। स्कूलों की नाकेबंदी और कक्षाओं का बहिष्कार करके छात्रों ने इन समस्याओं को व्यापक सार्वजनिक बहस का मुद्दा बनाया। विश्वविद्यालय के छात्रों, अभिभावकों, शिक्षकों और श्रमिक संगठनों के जुड़ने से आंदोलन का दायरा बढ़ा।

इस विवाद का संबंध पारकूरसुप (Parcoursup) से भी है। यह वह ऑनलाइन व्यवस्था है जिसके जरिए विद्यार्थी स्कूल के बाद उच्च शिक्षा में प्रवेश के लिए आवेदन करते हैं। ऐसे में छात्रों को लगता है कि स्कूलों की समस्याओं के बाद उन्हें दाखिले की प्रक्रिया में भी नई बाधाओं का सामना करना पड़ता है।

फ्रांस के अखबार ले मोंद के अनुसार, गृह मंत्रालय ने 6 अक्टूबर को देशभर में 2.66 लाख प्रदर्शनकारियों का अनुमान दिया था, जबकि आयोजकों की संख्या इससे अधिक थी। प्रदर्शनकारियों की गिनती आंदोलन के आकार का संकेत देती है, लेकिन इससे यह साबित नहीं होता कि पूरे देश की जनता एक ही राय रखती है।

इस आंदोलन की राजनीतिक ताकत फ्रांस की एक पुरानी सार्वजनिक मान्यता से आती है—सरकारी शिक्षा व्यवस्था को ऐसी भूमिका निभानी चाहिए जिससे परिवार की आर्थिक और सामाजिक पृष्ठभूमि किसी बच्चे के भविष्य को तय न करे। जब स्कूलों में शिक्षक नहीं होते और पढ़ाई प्रभावित होती है, तो यह वादा कमजोर पड़ता है। आर्थिक रूप से मजबूत परिवार निजी शिक्षण या दूसरे विकल्पों का सहारा ले सकते हैं, जबकि बाकी परिवार पूरी तरह सरकारी व्यवस्था पर निर्भर रहते हैं। इसलिए शिक्षकों की कमी का सवाल धीरे-धीरे इस बड़े मुद्दे में बदल जाता है कि समाज अपने बच्चों के भविष्य के अवसरों का बंटवारा कैसे करता है।

सरकार ने कुछ मांगों पर पीछे हटने के संकेत दिए हैं। रॉयटर्स की 9 अक्टूबर की रिपोर्ट के मुताबिक, सरकार ने शिक्षकों की कमी दूर करने के लिए लगभग 3,000 योग्य शिक्षकों को तैनात करने का वादा किया। इसके बावजूद 141 स्कूल बंद थे। छात्र संगठनों ने इसे शुरुआती जीत बताया, लेकिन आंदोलन जारी रखने की बात भी कही।

अब सबसे अहम सवाल यह है कि घोषित किए गए शिक्षकों में से कितने वास्तव में उन स्कूलों तक पहुंचते हैं जहां उनकी सबसे ज्यादा जरूरत है। केवल वादे से भरोसा नहीं लौटेगा; उसका असर कक्षाओं में दिखाई देना चाहिए।

पुलिस कार्रवाई ने भी विवाद को और गंभीर बना दिया है। लेंस शहर में 15 वर्षीय एक किशोर के हाथ में गंभीर चोट लगने के बाद इन प्रदर्शनों में स्टन ग्रेनेड के इस्तेमाल पर रोक लगा दी गई। द गार्जियन ने इस रोक की खबर के साथ गृह मंत्री के उस बयान का भी उल्लेख किया जिसमें उन्होंने पुलिस की बर्बरता के आरोपों को खारिज किया था। घटना की सटीक परिस्थितियों की जांच जारी थी। किसी बच्चे को गंभीर चोट पहुंचने का मामला शिक्षा नीति से आगे बढ़कर पुलिस की जवाबदेही का प्रश्न बन जाता है।

इन प्रदर्शनों का तत्काल असर पढ़ाई में रुकावट, परिवारों की दिनचर्या में परेशानी और स्थानीय स्तर पर अव्यवस्था के रूप में दिखाई देता है। राजनीतिक रूप से सरकार को 2027 के राष्ट्रपति चुनाव से पहले शिक्षा बजट और पुलिस के आचरण, दोनों पर जवाब देना होगा। यह आंदोलन सार्वजनिक सेवाओं में निवेश बढ़ाने के समर्थकों को मजबूत कर सकता है। दूसरी ओर, यदि प्रदर्शन हिंसक होते हैं, तो कड़ी पुलिस कार्रवाई का समर्थन करने वाली पार्टियों को भी फायदा मिल सकता है।

फ्रांस में विरोध प्रदर्शन राजनीति का जाना-पहचाना हिस्सा हैं, लेकिन इससे यह तय नहीं होता कि मतदाता प्रदर्शन के हर तरीके का समर्थन करेंगे।

बेल्जियम: शिक्षा की बढ़ती लागत और सरकारी खर्च पर विवाद

बेल्जियम की प्रशासनिक व्यवस्था इस विवाद को फ्रांस से अलग बनाती है। फ्रेंच भाषी समुदाय में शिक्षा का संचालन वॉलोनिया-ब्रसेल्स फेडरेशन के माध्यम से होता है, जबकि सरकारी खर्च में कटौती से जुड़े कुछ विवाद संघीय सरकार के अधिकार क्षेत्र में आते हैं। इसलिए हर फैसले को किसी एक राष्ट्रीय शिक्षा मंत्रालय का निर्णय मानने से यह समझना मुश्किल हो सकता है कि बातचीत और समाधान किस स्तर पर होना चाहिए।

ले मोंद के मुताबिक, 2029 तक 50 करोड़ यूरो की बचत का लक्ष्य रखा गया है। इसके साथ शिक्षकों के साप्ताहिक कक्षा-कार्य को 20 घंटे से बढ़ाकर 22 घंटे करने की योजना भी विवाद का हिस्सा है। माध्यमिक विद्यालयों के छात्रों के लिए शिक्षकों के काम के घंटों में बदलाव केवल कर्मचारियों का मामला नहीं है; इसका असर उनके अपने स्कूल जीवन पर भी पड़ सकता है।

सुफियाने नाम से पहचाने गए एक छात्र ने जोर देकर कहा कि उनकी मांगें बेल्जियम की अपनी परिस्थितियों से जुड़ी हैं। फ्रांस में हुए प्रदर्शनों ने छात्रों को प्रेरणा जरूर दी, लेकिन आंदोलन की असली वजह बेल्जियम की शिक्षा नीतियां और सरकारी फैसले हैं।

विश्वविद्यालय की पढ़ाई का खर्च भी स्कूल के छात्रों और उच्च शिक्षा में पहले से पढ़ रहे विद्यार्थियों को एक साझा मुद्दे पर जोड़ रहा है। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, फ्रेंच भाषी समुदाय में अधिकांश छात्रों की ट्यूशन फीस 835 यूरो से बढ़ाकर 1,194 यूरो की जा रही थी। विश्वविद्यालय में दाखिला लेने की तैयारी कर रहे युवाओं के लिए यह बढ़ोतरी भविष्य के खर्च से जुड़ी सीधी चिंता है। शिक्षक अपने काम की परिस्थितियों को लेकर चिंतित हैं, जबकि श्रमिक संगठन बातचीत और सामूहिक सौदेबाजी का अनुभव लेकर आते हैं।

इस आंदोलन के सामने एक खतरा यह भी है कि हिंसा उसकी सबसे प्रमुख सार्वजनिक छवि बन जाए। एसोसिएटेड प्रेस (एपी) की 9 अक्टूबर की रिपोर्ट ने ब्रसेल्स में श्रमिक संगठनों के नेतृत्व में हुए बड़े पैमाने पर शांतिपूर्ण प्रदर्शन और केंद्रीय रेलवे स्टेशन के पास नकाबपोश समूहों की झड़पों के बीच अंतर किया। यह अंतर राजनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। यदि कुछ लोगों की हिंसा के लिए पूरे आंदोलन को जिम्मेदार ठहरा दिया जाए, तो वास्तविक मांगें पीछे छूट सकती हैं और आंदोलन की विश्वसनीयता कमजोर हो सकती है।

फिलहाल स्कूलों में पढ़ाई और परिवहन सेवाओं में रुकावट से प्रशासन पर दबाव बढ़ रहा है। बातचीत के जरिए फीस या नीतियों को लागू करने की समयसीमा में बदलाव संभव है। लेकिन आंदोलन का दीर्घकालीन प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि छात्र और श्रमिक संगठन सरकारी बजट के कई वर्षों के चक्र के दौरान अपना सहयोग बनाए रख पाते हैं या नहीं।

बेल्जियम की भाषाई और प्रशासनिक विविधता एक समान राष्ट्रीय आंदोलन के रास्ते में बाधा बन सकती है। फिर भी शिक्षा की लागत कम करने और सार्वजनिक सेवाओं में निवेश बढ़ाने जैसे साझा मुद्दों पर एकजुटता संभव है।

स्पेन: घर का खर्च और युवा पीढ़ी की आजादी का सवाल

स्पेन का उदाहरण बताता है कि इन आंदोलनों को केवल छात्रों के नजरिये से समझना पर्याप्त नहीं होगा। घर का खर्च उठा पाने में कठिनाई एक युवा स्नातक को, जो स्वतंत्र जीवन शुरू करना चाहता है, और एक बुजुर्ग किरायेदार को, जिसे घर से निकाले जाने का डर है, एक साथ ला सकती है।

87 वर्षीय मारिकार्मेन अबास्कल को उनके घर से निकाले जाने की घटना राष्ट्रीय स्तर पर विरोध का प्रतीक बन गई। रॉयटर्स के अनुसार, किरायेदारों ने संगठन बनाए और मैड्रिड समेत कई शहरों में युवाओं ने विरोध शिविर लगाए। एक व्यक्ति की परेशानी ने आवास संकट जैसे बड़े मुद्दे को लोगों के सामने अधिक स्पष्ट और भावनात्मक रूप से प्रभावशाली बना दिया।

इस आंदोलन का केंद्र बढ़ता किराया, अस्थिर किरायेदारी, घर से बेदखली, संपत्ति में निवेश और रोजगार के नजदीक घर उपलब्ध होने का सवाल है। मकान मालिकों, बिल्डरों, पर्यटन के लिए आवास उपलब्ध कराने वाले कारोबारों और अलग-अलग सरकारी संस्थाओं के हित हमेशा एक जैसे नहीं होते। घर को सस्ता और सुरक्षित बनाने की मांग करने वालों को बाजार की ताकत और प्रशासन की बंटी हुई जिम्मेदारियों, दोनों का सामना करना पड़ता है।

यूरोस्टैट के अनुमान के अनुसार, 2025 में स्पेन के लोग औसतन 30.2 वर्ष की उम्र में अपने माता-पिता का घर छोड़ रहे थे, जबकि यूरोपीय संघ का औसत 26.3 वर्ष था। हालांकि, इस अंतर पर संस्कृति और परिवारों की जीवनशैली का भी असर पड़ता है। इसलिए इसे केवल घरों की कीमत का पैमाना नहीं माना जा सकता। फिर भी यह आंकड़ा बताता है कि स्पेन में स्वतंत्र जीवन शुरू कर पाना अब एक राजनीतिक मुद्दा बन गया है।

इन चार देशों में स्पेन में आंदोलन का तत्काल चुनावी असर सबसे स्पष्ट दिखाई दिया है। संसद में आवास संबंधी अध्यादेशों को मंजूरी नहीं मिलने के बाद प्रधानमंत्री पेद्रो सांचेज ने 29 नवंबर को समय से पहले चुनाव कराने की घोषणा की। इसके बाद एपी ने 10 अरब यूरो के कोष सहित आवास से जुड़े 21 तत्काल उपायों को मंजूरी दिए जाने की खबर दी। हालांकि, इन उपायों को लागू करने के लिए विधायी पुष्टि की प्रक्रिया बाकी थी।

यहां तीन चरणों में अंतर समझना जरूरी है—किसी उपाय की घोषणा होना, उसे औपचारिक मंजूरी मिलना और फिर उसका जमीन पर लागू होना। इनमें से कोई भी चरण अपने आप अगले चरण की गारंटी नहीं देता।

आवास का मुद्दा अब सरकार की इस क्षमता की परीक्षा बन गया है कि वह लोगों की सहानुभूति को वास्तविक राहत में बदल सकती है या नहीं। किरायेदारों के शोषण पर रोक लगाने वाले नियम मदद कर सकते हैं, लेकिन लंबे समय तक घरों को सस्ता बनाए रखने के लिए पर्याप्त आवास, निर्माण की क्षमता और प्रभावी प्रशासन भी जरूरी हैं।

मकान मालिक सरकारी हस्तक्षेप का विरोध कर सकते हैं, जबकि किरायेदार किसी ऐसी योजना को नाकाफी मान सकते हैं जो उनकी समस्याओं का पूरा समाधान न दे। सरकार बदलने से आवास नीति की दिशा बदल सकती है, लेकिन इससे किराया तुरंत कम हो जाएगा, यह जरूरी नहीं है।

सामाजिक स्तर पर इस आंदोलन से किरायेदारों के बीच एकजुटता बढ़ी है और लोगों का ध्यान घर से बेदखली की समस्या पर गया है। इसका आर्थिक असर भी व्यापक है। महंगा आवास लोगों के लिए नौकरी के करीब रहना मुश्किल बना सकता है, उनकी आय का बड़ा हिस्सा खर्च कर सकता है और परिवार बसाने के फैसले को टाल सकता है।

राजनीतिक रूप से यही असंतोष सख्त आवास नियमों का समर्थन करने वालों या मौजूदा सरकार को विफल बताने वाले विपक्षी दलों को लाभ पहुंचा सकता है। लेकिन युवाओं की भागीदारी से यह पहले से तय नहीं हो जाता कि किस राजनीतिक दल को चुनाव में फायदा मिलेगा।

भारत: निष्पक्षता की मांग से चुनावी जवाबदेही तक

भारत में चल रहे आंदोलन में संस्थानों पर भरोसे से जुड़े दो बड़े मुद्दे एक साथ सामने आए हैं। परीक्षाओं की निष्पक्षता तय करती है कि युवाओं को सीमित शैक्षणिक अवसरों तक पहुंचने का उचित मौका मिलता है या नहीं। चुनावी प्रक्रिया की निष्पक्षता यह तय करती है कि नागरिक सरकारों से जवाब मांगने के अपने अधिकार का इस्तेमाल कर सकते हैं या नहीं। कॉकरोच जनता पार्टी (सीजेपी) का परीक्षा से जुड़े मुद्दों से आगे बढ़कर चुनावी जवाबदेही पर ध्यान देना इस आंदोलन को व्यापक राजनीतिक महत्व देता है।

इसका शुरुआती चरण राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा (नीट) के संचालन और निष्पक्षता से जुड़े सवालों पर केंद्रित था। नेशनल यूनिवर्सिटी ऑफ सिंगापुर के शोधकर्ता रोनोजॉय सेन ने दर्ज किया कि शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफा दिया और 25 जुलाई 2026 को आंदोलन वापस ले लिया गया। सेन के अनुसार, सरकार इस मुद्दे पर जनधारणा को अपने पक्ष में बनाए रखने में विफल रही थी।

शिक्षा मंत्री का इस्तीफा इस बात का संकेत था कि लगातार दबाव बनाने से युवा आंदोलन सरकार से स्पष्ट प्रतिक्रिया हासिल कर सकता है। हालांकि, शिक्षा व्यवस्था और रोजगार से जुड़े बड़े सवाल अब भी अनसुलझे थे।

अब आंदोलन का निशाना मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी एसआईआर की प्रक्रिया है। रॉयटर्स ने 9 अक्टूबर की अपनी व्याख्यात्मक रिपोर्ट में इस प्रक्रिया के दौरान लगभग 13 करोड़ नाम हटाए जाने का उल्लेख किया। विपक्षी दलों ने प्रक्रिया में पक्षपात के आरोप लगाए हैं, जबकि चुनाव आयोग और भारतीय जनता पार्टी ने इन आरोपों को खारिज किया है।

चुनाव आयोग का कहना है कि नामों को हटाने के कारणों में मृत्यु, एक से अधिक जगह नाम दर्ज होना, स्थान बदलना या संबंधित मतदाता का पता नहीं चल पाना शामिल है। आयोग ने दावे और अपील दर्ज करने की व्यवस्था का भी उल्लेख किया है।

यहां एक महत्वपूर्ण अंतर समझना जरूरी है। मतदाता सूची से 13 करोड़ नाम हटाए जाने का आंकड़ा अपने आप यह साबित नहीं करता कि 13 करोड़ पात्र नागरिकों को स्थायी रूप से मतदान के अधिकार से वंचित कर दिया गया है। इसके लिए प्रक्रिया और परिणामों की अलग से जांच जरूरी है।

असल सवाल यह हैं कि किस चरण में कितने नाम हटाए गए, प्रभावित नागरिकों को इसकी सूचना दी गई या नहीं, कितने नाम दोबारा जोड़े गए और मतदान से पहले लोग सुधार के लिए अपील कर सकते हैं या नहीं। जिन लोगों के पास स्थायी आवास नहीं है, दस्तावेज सीमित हैं या जो मौसमी रोजगार के लिए जगह बदलते रहते हैं, उनके लिए अपील की प्रक्रिया कितनी आसान है, यह भी महत्वपूर्ण है।

असमान प्रभाव के आरोपों की जांच के लिए क्षेत्र और संबंधित श्रेणियों के आधार पर आंकड़ों का विश्लेषण करना होगा। इसी तरह प्रशासन के आश्वासनों की भी जांच जरूरी है। कागज पर मौजूद समाधान तब तक पर्याप्त नहीं है, जब तक जरूरतमंद नागरिक वास्तव में उसका इस्तेमाल न कर सकें।

सीजेपी की व्यंग्यात्मक शैली और डिजिटल माध्यमों पर उसकी मौजूदगी के साथ अब छात्र संगठन, नागरिक अधिकार कार्यकर्ता और विपक्षी दल भी जुड़े हुए हैं। इन सहयोगियों से स्थानीय स्तर पर संपर्क, कानूनी मदद और संसद तक पहुंच जैसे अवसर मिल सकते हैं। लेकिन हर संगठन की अपनी राजनीतिक महत्वाकांक्षाएं भी होती हैं।

यदि कोई आंदोलन राजनीतिक दलों का समर्थन हासिल करता है, तो उसके सामने अपनी नेतृत्व व्यवस्था को जवाबदेह बनाए रखने और अपनी मांगों को केवल चुनावी प्रचार का साधन बनने से बचाने की चुनौती आती है।

पुलिस की भूमिका भी इस विवाद का हिस्सा बन गई है। पीटीआई ने 9 अक्टूबर को बताया कि दिल्ली पुलिस ने 10 अक्टूबर को जंतर-मंतर पर प्रस्तावित प्रदर्शन की अनुमति देने से इनकार कर दिया था। इस लेख की रिपोर्टिंग की अंतिम समयसीमा तक वह प्रदर्शन होना बाकी था।

प्रदर्शन पर रोक तत्काल भीड़ जुटने की संभावना कम कर सकती है, लेकिन इससे यह बहस भी तेज हो सकती है कि नागरिकों को शांतिपूर्ण तरीके से विरोध करने का प्रभावी अधिकार हासिल है या नहीं।

भारत का विशाल आकार और संघीय राजनीतिक व्यवस्था यह मान लेने की अनुमति नहीं देते कि यहां भी बांग्लादेश या नेपाल जैसी घटनाएं उसी रूप में दोहराई जाएंगी। देश में अलग-अलग राज्यों के चुनाव, क्षेत्रीय राजनीतिक व्यवस्थाएं और बातचीत के कई रास्ते मौजूद हैं। फिर भी संस्थानों पर अविश्वास किसी एक समूह तक सीमित नहीं रहता।

इसका तत्काल आर्थिक बोझ प्रभावित परिवारों, कारोबारों और परिवहन सेवाओं पर पड़ सकता है। इससे भी गहरी राजनीतिक चिंता यह है कि क्या लोगों को उनकी मेहनत और नागरिक भागीदारी के बदले निष्पक्ष व्यवहार मिल रहा है।

एशिया में राजनीतिक बदलाव के अलग-अलग रास्ते

एशिया का अनुभव इस धारणा का समर्थन नहीं करता कि हर युवा आंदोलन अंततः क्रांति में बदलता है और पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को पूरी तरह समाप्त कर देता है।

श्रीलंका में 2022 के अरागलया आंदोलन ने आर्थिक संकट के बीच राष्ट्रपति गोटाबाया राजपक्षे को सत्ता छोड़ने पर मजबूर किया। लेकिन शुरुआत में उनकी जगह एक स्थापित राजनेता ने ली। कार्नेगी के शोधकर्ता डेविड टिम्बरमैन के अनुसार, आंदोलन का दीर्घकालीन प्रभाव 2024 के चुनाव में पुरानी राजनीतिक व्यवस्था को मतदाताओं द्वारा खारिज किए जाने के रूप में अधिक स्पष्ट हुआ। इसका अर्थ है कि सड़कों पर मिली बड़ी सफलता के बाद राजनीतिक बदलाव आने में समय लग सकता है।

बांग्लादेश में 2024 का आंदोलन सरकारी नौकरियों में आरक्षण के मुद्दे से शुरू हुआ और दमन के बीच व्यापक जनविद्रोह में बदल गया। संयुक्त राष्ट्र की जांच का हवाला देते हुए यूनिसेफ ने जुलाई और अगस्त के दौरान लगभग 1,400 लोगों की मौत का अनुमान बताया था। इनमें 100 से अधिक बच्चे भी शामिल थे।

ये आंकड़े आंदोलन की भारी मानवीय कीमत दिखाते हैं। लेकिन केवल बड़ी संख्या में लोगों की मौत हो जाना अपने आप राजनीतिक मुक्ति या बेहतर शासन की गारंटी नहीं देता।

बांग्लादेश के आंदोलन के बाद एक नया राजनीतिक दल भी सामने आया। छात्रों से जुड़ी नेशनल सिटिजन पार्टी ने फरवरी 2026 के चुनाव में 30 सीटों पर चुनाव लड़ा और छह सीटें जीतीं। इसके बावजूद मतदाताओं ने स्थापित बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (बीएनपी) को अधिक समर्थन दिया। रॉयटर्स की रिपोर्ट के अनुसार, नेशनल सिटिजन पार्टी के समर्थकों में उसके गठबंधन संबंधी फैसलों को लेकर निराशा भी थी।

इससे पता चलता है कि सड़कों पर लोकप्रियता, संगठनात्मक पहुंच और चुनाव जीतने की क्षमता तीन अलग-अलग चीजें हैं।

नेपाल में राजनीतिक बदलाव का परिणाम कुछ अलग रहा। सितंबर 2025 के विद्रोह के बाद मार्च 2026 के चुनाव में राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को 275 सदस्यीय संसद में 182 सीटें मिलीं। रॉयटर्स के अनुसार, बालेंद्र शाह से जुड़ी इस नई राजनीतिक ताकत को बदले हुए राजनीतिक माहौल का लाभ मिला। यह जनादेश सुधारों का अवसर देता है, लेकिन सरकार का वास्तविक प्रदर्शन ही तय करेगा कि जनता की उम्मीदें पूरी होती हैं या नहीं।

इंडोनेशिया में 2025 के विरोध प्रदर्शनों के बाद सांसदों को मिलने वाली सुविधाओं से जुड़े एक विवादास्पद फैसले को वापस लेना पड़ा, लेकिन राष्ट्रपति सत्ता में बने रहे। रॉयटर्स ने रियायतों के साथ-साथ छात्रों की जारी मांगों और दंगों के लिए जिम्मेदार लोगों को लेकर बनी अनिश्चितता का भी उल्लेख किया।

दक्षिण कोरिया में राजनीतिक बदलाव का रास्ता अलग था। वहां संसद की महाभियोग प्रक्रिया और संवैधानिक न्यायिक समीक्षा के बाद अप्रैल 2025 में यून सुक योल को राष्ट्रपति पद से हटा दिया गया। इस मामले में जनता का आंदोलन एक सक्रिय संवैधानिक व्यवस्था के भीतर राजनीतिक बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा बना।

यूरोप में भी इसी तरह विविधता दिखाई देती है। सर्बिया में छात्रों के समर्थन से भ्रष्टाचार विरोधी आंदोलन विकसित हुआ और उसने सत्तारूढ़ राजनीतिक व्यवस्था को चुनौती देने के लिए चुनावी मोर्चा भी बनाया। एपी की रिपोर्ट के मुताबिक, यह आंदोलन केवल शिक्षा पर सरकारी खर्च का विवाद नहीं था।

दोनों महाद्वीपों के अनुभव बताते हैं कि सरकार से रियायत हासिल करना, मंत्री का इस्तीफा, चुनाव जीतना और संस्थानों में स्थायी सुधार लाना अलग-अलग परिणाम हैं। हर परिणाम के लिए अलग तरह की राजनीतिक ताकत, संगठन और रणनीति की जरूरत होती है।

मोबाइल फोन भीड़ जुटा सकता है, लेकिन आंदोलन को टिकाऊ नहीं बना सकता

डिजिटल संचार ने निजी परेशानी को सार्वजनिक आंदोलन में बदलने की प्रक्रिया तेज कर दी है। कोई छात्र भरी हुई कक्षा का वीडियो साझा करता है, कोई अभ्यर्थी परीक्षा में गड़बड़ी का अनुभव बताता है और कोई किरायेदार घर से निकाले जाने की कहानी सामने रखता है। दूसरे लोग अपनी परेशानियों को इन अनुभवों से जोड़ते हैं, प्रदर्शन की जानकारी हासिल करते हैं और आंदोलन में शामिल हो जाते हैं।

हास्य और व्यंग्य भी राजनीतिक आलोचना को ऐसे लोगों तक पहुंचा सकते हैं जो किसी पारंपरिक राजनीतिक सभा में शायद ही हिस्सा लें।

आंदोलनों के प्रतीक भी सीमाओं के पार पहुंचते हैं। नेपाल पर कार्नेगी के शोध में डिस्कॉर्ड के माध्यम से समन्वय और जापानी मंगा तथा एनीमे श्रृंखला वन पीस के समुद्री डाकू झंडे का उल्लेख है। यह झंडा इंडोनेशिया के विरोध प्रदर्शनों से भी जुड़ा रहा है। साझा सांस्कृतिक प्रतीक युवाओं को विरोध की एक परिचित भाषा देते हैं।

हालांकि, किसी दूसरे देश के आंदोलन का झंडा या प्रतीक अपनाने से यह साबित नहीं होता कि दोनों आंदोलनों की फंडिंग, नेतृत्व या राजनीतिक उद्देश्य भी एक जैसे हैं।

डिजिटल माध्यमों ने नेतृत्व और प्रभाव के स्वरूप को भी बदला है। सोशल मीडिया खातों के संचालक और प्रभावशाली लोग बिना किसी चुनाव के आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका हासिल कर सकते हैं। अलग-अलग संगठन एक ही प्रदर्शन का अर्थ अपने-अपने तरीके से पेश करने की कोशिश कर सकते हैं।

महानगरों के छात्रों के बीच लोकप्रिय संदेश ग्रामीण मजदूरों, सीमित इंटरनेट सुविधा वाले लोगों या दूसरी भाषा बोलने वाले समुदायों तक जरूरी नहीं कि पहुंचें।

समस्या तब और स्पष्ट होती है जब आंदोलन को यह तय करना पड़ता है कि सरकार की किस रियायत को स्वीकार किया जाए। बातचीत कौन करेगा? सरकार के प्रस्ताव की पुष्टि कौन करेगा? अलग-अलग जोखिमों का सामना कर रहे लोगों की ओर से कौन बोलेगा? केवल डिजिटल लोकप्रियता इन सवालों का जवाब नहीं देती।

लंबे समय तक प्रभाव बनाए रखने वाले आंदोलनों को कॉलेजों, मोहल्लों, कार्यस्थलों और सामाजिक संगठनों में भरोसेमंद संबंधों तथा पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया की जरूरत होती है।

डिजिटल मंच सनसनीखेज तस्वीरों को अधिक फैलावा दे सकते हैं, पुराने वीडियो को नए घटनाक्रम के रूप में प्रसारित कर सकते हैं और प्रदर्शनकारियों को निगरानी के जोखिम में डाल सकते हैं। दूसरी ओर, सरकारें भी हर तेजी से बढ़ते आंदोलन को विदेशी ताकतों की साजिश मानने की गलती कर सकती हैं।

न तो इंटरनेट पर किसी दावे का तेजी से फैलना उसकी सच्चाई साबित करता है और न ही सरकार का संदेह उसे झूठा सिद्ध करता है। आंदोलन की विश्वसनीयता इस बात पर निर्भर करती है कि उसके दावों की जांच कैसे होती है और सार्वजनिक ध्यान हटने के बाद भी उन्हें समझाने वाला संगठन कितना सक्षम रहता है।

पुलिस कार्रवाई कब बदल देती है आंदोलन का मुद्दा?

दमन से विरोध प्रदर्शन में भाग लेने की कीमत बढ़ सकती है और लोग पीछे हट सकते हैं। लेकिन यदि लोगों को लगता है कि पुलिस ने जरूरत से ज्यादा बल प्रयोग किया है, तो इससे आंदोलन का दायरा बढ़ भी सकता है। किसी बच्चे के घायल होने पर उसके माता-पिता आंदोलन में शामिल हो सकते हैं। शांतिपूर्ण सभा को रोकने पर पेशेवर और सामाजिक संगठन भी विरोध में उतर सकते हैं। इस तरह शुरुआत में शिक्षा, रोजगार या आवास से जुड़ा विवाद धीरे-धीरे इस सवाल में बदल सकता है कि सरकार अपनी शक्ति का इस्तेमाल किस तरह कर रही है।

कार्नेगी के विश्लेषक उसामा खिलजी एशिया के प्रदर्शनों में असमानता, सत्ता के बढ़ते केंद्रीकरण और युवाओं को निर्णय प्रक्रिया से बाहर रखने जैसी समस्याओं को बार-बार उभरने वाले कारण मानते हैं। नेपाल और बांग्लादेश की उनकी तुलना बताती है कि डिजिटल माध्यमों पर पाबंदियां और हिंसक कार्रवाई सरकार की वैधता पर उठ रहे सवालों को और गंभीर बना सकती हैं।

हालांकि, इससे यह निष्कर्ष नहीं निकलता कि सरकारों के गिरने का एकमात्र कारण दमन है। आर्थिक मुश्किलें, राजनीतिक गठबंधन और संस्थागत फैसले भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

राज्य की जिम्मेदारी है कि वह लोगों की सुरक्षा सुनिश्चित करे और हिंसा का जवाब दे। लेकिन इसके लिए शांतिपूर्ण प्रदर्शनकारियों और अपराध करने वाले व्यक्तियों के बीच अंतर करना जरूरी है। सभी प्रदर्शनकारियों के साथ एक जैसा कठोर व्यवहार संभावित मध्यस्थों को भी सरकार से दूर कर सकता है और इस धारणा को मजबूत कर सकता है कि सामान्य राजनीतिक रास्तों से समाधान संभव नहीं है।

इसके विपरीत, जवाबदेह पुलिस व्यवस्था और निष्पक्ष जांच बातचीत तथा समझौते के लिए जरूरी जगह बनाए रख सकती है।

आंदोलनों को भी अपने फैसलों के परिणामों पर विचार करना होता है। हिंसा से आम नागरिकों को नुकसान पहुंच सकता है, सहयोगी समूहों के बीच मतभेद बढ़ सकते हैं और सरकार को व्यापक प्रतिबंध लगाने का बहाना मिल सकता है।

राजनीतिक आंदोलनों पर एरिका चेनोवेथ के तुलनात्मक शोध में ऐतिहासिक रूप से मुख्यतः अहिंसक आंदोलनों की सफलता की दर अधिक पाई गई, हालांकि हाल के दशकों में उनकी प्रभावशीलता में गिरावट भी दर्ज की गई। उनका तर्क है कि केवल हिंसक कार्रवाई को ही ताकतवर और प्रभावी मानना एक गंभीर भूल है। ये निष्कर्ष विशेष ऐतिहासिक आंदोलनों पर आधारित हैं; इनसे फ्रांस, बेल्जियम, स्पेन या भारत में किसी आंदोलन की सफलता की सटीक संभावना नहीं निकाली जा सकती।

इसलिए असली राजनीतिक सवाल यह है कि बदलाव के लिए भरोसेमंद रास्ते उपलब्ध हैं या नहीं। यदि बातचीत केवल फैसले टालने का जरिया बन जाए, जांच बिना निष्कर्ष के खत्म हो जाए और लोगों को राहत देने वाली व्यवस्था तक पहुंचना मुश्किल हो, तो जनता का भरोसा बहाल करना कठिन होगा। संयम तभी विश्वसनीय बनता है जब उसके साथ मूल समस्याओं को दूर करने की कार्रवाई भी हो।

विरोध प्रदर्शनों की कीमत कौन चुकाता है?

स्कूल बंद होने से पढ़ाई का समय कम होता है और बच्चों की देखभाल की जिम्मेदारी परिवारों पर बढ़ जाती है। परिवहन सेवाएं प्रभावित होने से नौकरी पर जाने वाले लोगों, छोटे व्यापारियों और दिहाड़ी मजदूरों को परेशानी होती है। सार्वजनिक संपत्ति को नुकसान पहुंचने पर उन संस्थानों को मरम्मत का खर्च उठाना पड़ता है जिनके पास पहले से सीमित संसाधन हो सकते हैं।

लंबे समय तक बनी अनिश्चितता कारोबार के फैसलों को भी प्रभावित कर सकती है। हालांकि, आर्थिक विकास या निवेश में किसी गिरावट के लिए केवल विरोध प्रदर्शनों को जिम्मेदार ठहराने से पहले दूसरे कारणों की जांच जरूरी है।

निष्क्रियता की कीमत पर भी उतनी ही गंभीरता से विचार होना चाहिए। शिक्षकों की कमी शिक्षा को कमजोर करती है। महंगे घर लोगों के लिए नौकरी स्वीकार करने की जगह सीमित कर सकते हैं। बार-बार परीक्षा में गड़बड़ी या असफल प्रक्रिया से अभ्यर्थियों का तैयारी में लगा समय और परिवार की बचत खर्च होती है। चुनावी प्रक्रिया में सुधार के रास्ते कठिन होने पर सरकारी संस्थानों पर भरोसा कमजोर पड़ता है।

एक दिन के प्रदर्शन से हुई अव्यवस्था आसानी से दिखाई देती है, लेकिन अवसरों के वर्षों तक छिनते रहने का असर तस्वीरों में उतनी आसानी से नहीं दिखता।

सामाजिक स्तर पर सामूहिक आंदोलन छात्रों और अभिभावकों, किरायेदारों और श्रमिक संगठनों या युवा कार्यकर्ताओं और पेशेवर समूहों के बीच लंबे समय तक सहयोग पैदा कर सकता है। लेकिन यदि नेता जनता के गुस्से को किसी अल्पसंख्यक समुदाय, प्रवासियों या राजनीतिक विरोधियों के खिलाफ मोड़ दें, तो आंदोलन सामाजिक दुश्मनी भी बढ़ा सकता है।

इसलिए राजनीतिक सफलता इस बात पर भी निर्भर करती है कि असुरक्षा की समस्या को समझाने वाला कौन-सा नजरिया जनता के बीच स्वीकार किया जाता है।

कई बार आंदोलन की सबसे पहली उपलब्धि किसी मुद्दे को राजनीतिक प्राथमिकता दिलाना होती है। सरकार को उस समस्या पर जवाब देना पड़ता है जिसे पहले नजरअंदाज किया जा रहा था। विपक्ष अपनी रणनीति बदलता है और अधिकारियों के फैसलों की अधिक बारीकी से जांच होने लगती है। प्रदर्शनकारियों की संख्या घटने के बाद भी ये प्रभाव बने रह सकते हैं।

लेकिन इनकी वास्तविक अहमियत तब सामने आती है जब बजट के फैसले लागू होते हैं, लोगों को किफायती घर मिलता है या किसी अन्यायपूर्ण प्रक्रिया में सुधार किया जाता है।

आंदोलन दूसरे देशों तक कैसे फैलते हैं और हिंसक झड़पों का खतरा कब बढ़ता है?

सीमाओं के पार आंदोलनों का प्रभाव फैलने के उदाहरण पहले से दिखाई दे रहे हैं। इतालवी समाचार एजेंसी एएनएसए के अनुसार, इटली में कुछ स्कूलों पर कब्जे के दौरान फ्रांस के आंदोलन का उल्लेख किया गया और इतालवी छात्र एकजुटता दिखाने के लिए पेरिस भी गए। यह दोनों देशों के आंदोलनों के बीच वास्तविक संपर्क का संकेत है। फिर भी उनकी मांगें इटली की अपनी शिक्षा व्यवस्था और सरकारी खर्च से जुड़ी रहीं।

तीन प्रक्रियाएं इस तरह के प्रसार को तेज कर सकती हैं। पहली, लोग दूसरे आंदोलनों से विरोध करने के तरीके सीखते हैं। दूसरी, उन्हें दूसरे देशों के लोगों की परेशानियों में अपनी समस्याओं की झलक दिखाई देती है। तीसरी, जब उन्हें पता चलता है कि किसी अन्य देश में आंदोलन के बाद सरकार को रियायत देनी पड़ी, तो वे भी बदलाव की उम्मीद करने लगते हैं।

फ्रांस में शिक्षकों की तैनाती का वादा बेल्जियम में बातचीत की मांग को प्रोत्साहित कर सकता है। नेपाल में चुनाव के जरिए नए राजनीतिक विकल्प का उभरना दूसरे देशों के कार्यकर्ताओं को प्रेरित कर सकता है। लेकिन दूसरे देशों से केवल सफलता के उदाहरण ही नहीं आते; हिंसा, मौतों और निराशाजनक राजनीतिक बदलावों से पैदा होने वाला डर भी फैलता है।

इसलिए आगे और प्रदर्शन होने की संभावना, सभी देशों में एक जैसे राजनीतिक परिणाम आने की संभावना से अधिक है। भाषा, छात्र संगठन, प्रवासी समुदाय और साझा डिजिटल संस्कृति इस आदान-प्रदान को आसान बनाते हैं। लेकिन उसके बाद क्या होगा, यह स्थानीय संस्थानों और राजनीतिक परिस्थितियों पर निर्भर करता है। केवल नारे अपनाने से शिक्षा के मुद्दे पर शुरू हुआ आंदोलन चुनावी सूची के विवाद जैसा नहीं बन जाता।

हिंसक झड़पों का खतरा तब बढ़ सकता है जब बार-बार गंभीर चोटें या मौतें हों, शिकायतों के समाधान के रास्ते बंद दिखाई दें, आर्थिक मुश्किलें बढ़ती जाएं, विरोधी समूह आक्रामक हो जाएं और बातचीत कराने वाले मध्यस्थ कमजोर पड़ जाएं।

शांतिपूर्ण प्रदर्शन के साथ हिंसा हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ यह नहीं कि हिंसा में शामिल लोग पूरे आंदोलन का प्रतिनिधित्व करते हैं। राजनीतिक दल और दूसरे समूह भी अव्यवस्था का इस्तेमाल करके बहस को सार्वजनिक सेवाओं से हटाकर कानून-व्यवस्था तक सीमित करने की कोशिश कर सकते हैं।

फ्रांस में बार-बार होने वाली झड़पें और लोगों के घायल होने की घटनाएं तनाव बढ़ने का स्पष्ट जोखिम पैदा करती हैं। बेल्जियम में स्थानीय स्तर पर हुई झड़पें दिखाती हैं कि शहर के किसी हिस्से का संघर्ष सरकारी खर्च में कटौती के बड़े विवाद से जुड़ सकता है। स्पेन में आवास आंदोलन का ध्यान चुनाव और कानूनों में बदलाव पर है, लेकिन यदि समाधान रुक जाते हैं, तो निराशा बढ़ सकती है। भारत में जोखिम किसी खास क्षेत्र में टकराव बढ़ने और चुनावी संस्थानों की निष्पक्षता पर ध्रुवीकृत बहस के रूप में सामने आ सकते हैं।

ये परिस्थितियों पर आधारित गुणात्मक आकलन हैं, हिंसक दंगों की संभावना की कोई सटीक संख्यात्मक रैंकिंग नहीं। सरकार का गिरना आम तौर पर सड़कों पर अव्यवस्था से कहीं बड़ी प्रशासनिक विफलता और राजनीतिक समर्थन के क्षरण की मांग करता है।

सार्वजनिक संस्थान लंबे समय तक चलने वाले विरोध को संभाल सकते हैं। लेकिन बल प्रयोग और फैसलों में देरी से वे किसी सुलझ सकने वाले विवाद को भी गंभीर संकट में बदल सकते हैं। तनाव सबसे तेजी से वहां फैलता है जहां स्थानीय लोगों के पास पहले से ही विरोध करने की अपनी ठोस वजहें मौजूद हों।

2030 तक फ्रांस, बेल्जियम, स्पेन और भारत के सामने क्या होगा?

फ्रांस: शिक्षा सुधार और 2027 के चुनाव की चुनौती

फ्रांस में सबसे संभावित स्थिति यह है कि सरकार शिक्षा व्यवस्था में कुछ सुधार करे, लेकिन स्कूलों और बजट को लेकर विरोध बार-बार सामने आता रहे। 2027 का राष्ट्रपति चुनाव शिक्षा में असमानता को राजनीतिक दलों के घोषणापत्र और चुनावी बहस का महत्वपूर्ण मुद्दा बना सकता है।

यदि सरकार शिक्षकों की कमी दूर करने और स्कूल भवनों की स्थिति सुधारने में सफल होती है, तो प्रदर्शनों का दबाव घट सकता है, हालांकि आंदोलन का राजनीतिक प्रभाव बना रह सकता है। दूसरी ओर, बजट पर गतिरोध या किसी और गंभीर चोट की घटना से टकराव की राजनीति मजबूत हो सकती है।

यदि सत्तारूढ़ दल चुनाव हार जाता है, तो यह असंतोष का संकेत होगा। लेकिन आंदोलन की दीर्घकालीन विरासत इस बात से तय होगी कि नई सरकार सरकारी शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाती है या पुलिस कार्रवाई को प्राथमिकता देती है।

बेल्जियम: सरकारी खर्च पर लंबी बातचीत

बेल्जियम में सरकारी खर्च में बदलाव, बचत के लक्ष्यों और शिक्षा व्यवस्था को लेकर बातचीत तथा नीतियों में देरी की संभावना है। वर्ष 2029 तक बचत करने की योजना छात्रों और शिक्षकों को मौजूदा प्रदर्शनों के बाद भी सरकारी फैसलों पर नजर बनाए रखने का कारण देगी।

अलग-अलग भाषाई समुदायों में अलग समाधान निकल सकते हैं। यदि युवा और श्रमिक संगठन अपना गठबंधन मजबूत बनाए रखते हैं, तो वे सरकारी बजट की प्राथमिकताओं को बदलने में भूमिका निभा सकते हैं। लेकिन आंदोलन बिखर गया, तो प्रशासन अलग-अलग समूहों से अलग बातचीत करके दबाव को कम कर सकता है।

यहां संस्थागत व्यवस्था की असली परीक्षा यह होगी कि सरकारी फैसलों की जिम्मेदारी स्पष्ट होती है या अलग-अलग स्तर की सरकारें एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डालती रहती हैं।

स्पेन: चुनाव से आगे आवास संकट का समाधान

स्पेन में नवंबर में प्रस्तावित चुनाव तत्काल राजनीतिक मोड़ है, लेकिन आवास की समस्या का समाधान इससे कहीं अधिक समय लेगा। यदि सुधारों के समर्थन में पर्याप्त राजनीतिक बहुमत बनता है, तो किरायेदारों के अधिकार मजबूत करने और घरों की उपलब्धता बढ़ाने की दिशा में कदम उठाए जा सकते हैं।

यदि नई सरकार नियमों में ढील देने की नीति अपनाती है, तो आवास बाजार को प्रोत्साहित करने के दूसरे उपाय सामने आ सकते हैं और विरोध फिर तेज हो सकता है। गठबंधन की राजनीति में लगातार गतिरोध बना रहा, तो अस्थायी राहत योजनाएं और बार-बार होने वाले प्रदर्शन स्थायी नीति की जगह लेते रहेंगे।

2030 तक स्पेन में किराये का बोझ, घरों की वास्तविक उपलब्धता और किरायेदारों के अधिकारों को लागू करने की क्षमता ज्यादा महत्वपूर्ण होगी। यह कम महत्वपूर्ण होगा कि कौन-सी पार्टी मूल आंदोलन का श्रेय लेने का दावा करती है।

भारत: शिक्षा, मतदाता सूची और रोजगार के मुद्दों का मेल

भारत में आने वाले वर्षों में अलग-अलग मुद्दों पर अभियान जारी रहने और उनके राज्य की राजनीति तथा 2029 के संभावित आम चुनाव से जुड़ने की संभावना है।

मतदाता सूची में नाम जोड़ने और सुधारने की पारदर्शी प्रक्रिया, आसानी से इस्तेमाल की जा सकने वाली अपील व्यवस्था और स्वतंत्र जांच से संस्थानों पर अविश्वास कम हो सकता है। इसके विपरीत, मतदाता पंजीकरण, परीक्षा की निष्पक्षता और रोजगार को लेकर विवाद जारी रहे, तो छात्रों का आंदोलन श्रमिकों और ग्रामीण परिवारों की चिंताओं से भी जुड़ सकता है।

सीजेपी एक दबाव बनाने वाले मंच के रूप में बनी रह सकती है, औपचारिक पार्टी की राजनीति में प्रवेश कर सकती है या स्थापित संगठनों के मुकाबले अपना प्रभाव खो सकती है। देश में व्यापक वैधता संकट पैदा होने के लिए कहीं अधिक बड़े जनसमर्थन और संस्थागत विफलता की जरूरत होगी। केवल मौजूदा गुस्से के आधार पर ऐसे संकट की भविष्यवाणी करना उचित नहीं होगा।

इन चारों देशों में बातचीत के जरिए सुधार राजनीतिक अस्थिरता कम करने का सबसे बेहतर रास्ता है, लेकिन केवल प्रतीकात्मक रियायतें मिलने पर आंदोलन कुछ समय के लिए रुक सकता है और बाद में फिर शुरू हो सकता है।

एक दूसरा रास्ता यह है कि कार्यकर्ता जवाबदेह नेतृत्व, नीतियों की समझ और स्थानीय स्तर पर मजबूत संगठन विकसित करें, जो चुनावों के बाद भी सक्रिय रहें। तीसरा रास्ता सत्ता की अधिक कठोर प्रतिक्रिया का है, जिसमें अव्यवस्था के डर से सरकार पर प्रतिबंध बढ़ाने का दबाव बनता है। एक ही देश में ये तीनों स्थितियां अलग-अलग रूपों में साथ भी दिखाई दे सकती हैं।

प्रगति को केवल प्रदर्शनकारियों की संख्या या सोशल मीडिया पर उनके समर्थकों की गिनती से नहीं मापा जाना चाहिए। फ्रांस में सबसे अधिक शिक्षकों की कमी वाले स्कूलों में कितने शिक्षक पहुंचे, बेल्जियम में फीस और काम के घंटों में क्या बदलाव हुआ, स्पेन में कितने लोगों को किफायती घर मिले और भारत में मतदान से पहले मतदाता सूची में कितने वास्तविक सुधार पूरे हुए—ये अधिक उपयोगी पैमाने हैं।

गंभीर चोटों की जांच, शिकायतों के समाधान और विरोध की अलग-अलग लहरों के बीच संगठनों के सक्रिय बने रहने को भी महत्व देना चाहिए।

चुनाव जीतने के बाद सफल आंदोलनों के सामने एक और कठिन परीक्षा आती है। किसी मंत्री को पद से हटाना जल्दी संभव हो सकता है, लेकिन परीक्षा व्यवस्था को ठीक करने के लिए सक्षम प्रशासन चाहिए। कोई नई पार्टी चुनाव जीत सकती है, लेकिन रोजगार पैदा करने के लिए निवेश और प्रभावी नीतियों की जरूरत होती है।

सरकार में आने वाले आंदोलनों को अपनी आलोचना सहने की क्षमता बनाए रखनी होगी, असहमति के अधिकार का सम्मान करना होगा और उस पक्षपातपूर्ण व्यवस्था को दोहराने से बचना होगा जिसका उन्होंने पहले विरोध किया था। अन्यथा, आज के उत्साहित समर्थक कल फिर सड़कों पर उतर सकते हैं।

2030 के बाद संघर्ष के नए मुद्दे

कृत्रिम बुद्धिमत्ता (एआई) शुरुआती स्तर की नौकरियों को लेकर युवाओं की चिंता बढ़ा सकती है। हालांकि, सभी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर रोजगार खत्म हो जाना अभी तय नहीं है। सरकार की नीतियां यह तय करने में भूमिका निभाएंगी कि तकनीक से बढ़ने वाली उत्पादकता के लाभ व्यापक समाज तक पहुंचते हैं या कुछ लोगों तक सीमित रह जाते हैं।

बदलते रोजगार के लिए युवाओं को तैयार करने वाली शिक्षा के साथ ऐसे नियोक्ताओं की भी जरूरत है जो उन्हें अच्छी और सम्मानजनक नौकरियां दें। केवल प्रशिक्षण बढ़ाने से अवसरों की कमी दूर नहीं होगी।

जलवायु परिवर्तन से जुड़ी समस्याएं भी आज अलग-अलग दिखाई देने वाले आंदोलनों को एक साथ ला सकती हैं। अत्यधिक गर्मी से पढ़ाई प्रभावित हो सकती है, प्राकृतिक आपदाएं घरों को नुकसान पहुंचा सकती हैं और पर्यावरण के अनुकूल बदलावों का खर्च पहले से आर्थिक असुरक्षा झेल रहे परिवारों पर बोझ बढ़ा सकता है।

यदि सरकारें जलवायु संबंधी जोखिमों से निपटने के लिए निवेश करती हैं, लेकिन जरूरी सार्वजनिक सेवाओं को कमजोर होने देती हैं, तो संसाधनों के बंटवारे को लेकर विवाद बढ़ सकते हैं। युवा केवल अर्थव्यवस्था और पर्यावरण में से किसी एक को चुनने के बजाय व्यावहारिक सुरक्षा और अवसरों तक निष्पक्ष पहुंच के लिए संगठित हो सकते हैं।

यूरोप के उम्रदराज होते समाजों में अलग-अलग पीढ़ियों के बीच सरकारी खर्च के बंटवारे पर बहस जारी रहेगी। भारत के सामने चुनौती यह होगी कि वह अपनी बड़ी युवा आबादी की क्षमता को रोजगार और आर्थिक अवसरों में कितनी प्रभावी ढंग से बदल पाता है।

हालांकि, केवल जनसांख्यिकीय स्थिति किसी देश का राजनीतिक भविष्य तय नहीं करती। सरकारी निवेश, कर व्यवस्था, देखभाल की जिम्मेदारियां और संपत्ति तक पहुंच जैसे कारक तय करते हैं कि लोगों को समाज और सरकार के साथ अपना संबंध कितना न्यायपूर्ण लगता है।

डिजिटल प्रशासन भी निष्पक्षता की एक नई परीक्षा बनेगा। तकनीक सरकारी सेवाओं और राजनीतिक भागीदारी को आसान बना सकती है, लेकिन अपारदर्शी फैसलों से बड़ी संख्या में लोगों को व्यवस्था से बाहर भी किया जा सकता है। जैसे-जैसे स्वचालित प्रक्रियाओं का इस्तेमाल बढ़ेगा, वैसे-वैसे फैसलों के स्पष्ट कारण, अपील की आसान व्यवस्था और जवाबदेह मानवीय समीक्षा अधिक महत्वपूर्ण हो जाएगी।

परीक्षा या मतदाता सूची को लेकर होने वाले आज के विरोध भविष्य में इसी बड़े संघर्ष का संकेत देते हैं।

यह मानने का कोई पर्याप्त आधार नहीं है कि सार्वभौमिक बुनियादी आय, डिजिटल अधिकारों में संवैधानिक सुधार या नई पीढ़ी की राजनीतिक पार्टियों का उभार अनिवार्य है। ये संभावित राजनीतिक विकल्प हैं, जिनके लिए जनसमर्थन, संसाधन और प्रभावी संस्थागत व्यवस्था की जरूरत होगी।

2030 के बाद समाजों के बीच एक बड़ा अंतर इस बात से तय हो सकता है कि कौन-से देश लोगों को अवसर पाने के भरोसेमंद रास्ते देते हैं और कौन-से देश बार-बार धैर्य रखने की मांग तो करते हैं, लेकिन रोकी जा सकने वाली असमानताओं को दूर नहीं करते।

क्या सड़क का आंदोलन सरकार और व्यवस्था को बदल सकता है?

ये युवा आंदोलन भरोसे की उस कमी को उजागर करते हैं जिसे युवाओं को आवेगी या किसी के बहकावे में आया हुआ बताकर दूर नहीं किया जा सकता। भविष्य में इनका प्रभाव इस बात पर निर्भर करेगा कि लोगों का गुस्सा कितने मजबूत संगठनों में बदलता है और सरकारें अपनी घोषणाओं को वास्तविक परिणामों में बदल पाती हैं या नहीं।

इन आंदोलनों की सबसे बड़ी सफलता ऐसी व्यवस्था बनाना होगी जिसमें छात्र को पढ़ने का उचित अवसर मिले, काम करने वाला व्यक्ति अपनी आय में घर का खर्च उठा सके, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करने वाले अभ्यर्थी को परीक्षा की निष्पक्षता पर भरोसा हो और हर नागरिक को अपनी बात रखने तथा न्याय पाने का समान अवसर मिले।

भीड़ सरकार का ध्यान किसी मुद्दे की ओर खींच सकती है। लेकिन असली राजनीतिक चुनौती उस ध्यान को इतनी देर तक बनाए रखने की है कि उससे आम लोगों के जीवन में वास्तविक बदलाव आ सके।

यूरोप और एशिया में चल रहे युवा आंदोलन इसी बड़ी चुनौती की ओर इशारा करते हैं। इनकी सफलता केवल इस बात से तय नहीं होगी कि कितने लोग सड़कों पर उतरे या कितनी सरकारों को पीछे हटना पड़ा। असली कसौटी यह होगी कि क्या इन आंदोलनों के बाद शिक्षा, रोजगार, आवास और लोकतांत्रिक अधिकारों से जुड़ी समस्याओं का स्थायी समाधान निकला।

सड़क पर उठी आवाज तभी व्यवस्था बदलती है, जब वह भरोसेमंद नेतृत्व, ठोस नीतियों और जवाबदेह संस्थानों में बदल सके।

Raish Ahmed

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