Edinbox Hindi

DU की कार्यकारी परिषद में सरकारी प्रतिनिधित्व के प्रस्ताव की समीक्षा के लिए समिति गठित, कुलपति को सौंपेगी रिपोर्ट

दिल्ली विश्वविद्यालय यानी डीयू (DU) की कार्यकारी परिषद (EC) की सोमवार को बैठक हुई। इस बैठक में कार्यकारी परिषद (ईसी) में केंद्रीय शिक्षा मंत्रालय के प्रतिनिधि को शामिल करने के प्रस्ताव पर चर्चा हुई। कुलपति योगेश सिंह ने इस प्रस्ताव की समीक्षा करने के लिए एक समिति का गठन किया है। समिति अपनी रिपोर्ट कुलपति को सौंपेगी। कार्यकारी परिषद (ईसी) दिल्ली विश्वविद्यालय की शीर्ष निर्णय लेने वाली संस्था है। 

गौरतलब है कि दिल्ली विश्वविद्यालय अपने कार्यकारी परिषद (ईसी) में केंद्र सरकार के प्रतिनिधित्व को बढ़ाने के प्रस्ताव पर विचार कर रहा है। प्रस्ताव में ईसी में उच्च शिक्षा सचिव या शिक्षा मंत्रालय से उनके मनोनीत व्यक्ति को शामिल करना शामिल है। हालांकि, इस प्रस्ताव का कई सदस्यों द्वारा विरोध हो रहा है। विरोध करने वालों का कहना है कि शिक्षा मंत्रालय विश्वविद्यालय की ईसी में अपने प्रतिनिधि को शामिल करके डीयू की स्वायत्तता में दखल देना चाहता है जिसे स्वीकार नहीं किया जा सकता।  

दरअसल, शिक्षा मंत्रालय ने एक सर्कुलर जारी कर अपने अधीन आने वाले केंद्रीय विश्वविद्यालयों की कार्यकारी परिषद (ईसी) में शिक्षा मंत्रालय के प्रतिनिधियों को शामिल किए जाने का अनुरोध किया है। सर्कुलर में कहा गया है कि शिक्षा मंत्रालय ने अपने अधीन आने वाले केंद्रीय विश्वविद्यालयों के मौजूदा प्रशासनिक ढांचे की समीक्षा की है और इन संस्थानों की कार्यकारी परिषद (ईसी) में मंत्रालय के प्रतिनिधित्व में असमानता देखी है। 48 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में से 20 ने पहले ही अपने कार्यकारी परिषदों में मंत्रालय के प्रतिनिधि शामिल कर लिया है जबकि 28 केंद्रीय विश्वविद्यालयों में वर्तमान में ऐसा कोई प्रतिनिधित्व नहीं है। 

सर्कुलर में यह भी लिखा है कि सभी केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रशासन में एकरूपता सुनिश्चित करने के लिए यह सुझाव दिया जाता है कि (उच्च शिक्षा) शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार या उनके द्वारा नामित व्यक्ति को आपके विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद के सदस्य के रूप में शामिल किया जाए । 

ईसी में शिक्षा मंत्रालय के मनोनीत व्यक्ति को शामिल करने को लेकर कई लोगों ने चिंताएँ व्यक्त की हैं। दिल्ली विश्वविद्यालय की शैक्षणिक परिषद की सदस्य माया जॉन ने इस कदम की आलोचना करते हुए इसे सत्तारूढ़ सरकार द्वारा शैक्षणिक संस्थानों पर नियंत्रण बढ़ाने और उनकी स्वायत्तता को कम करने का प्रयास बताया है। उनका कहना है कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में पहले से ही भारत के राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति के मनोनीत व्यक्ति हैं।

वहीं, फोरम ऑफ एकेडेमिक्स फॉर सोशल जस्टिस ( शिक्षक संगठन ) ने भी इस कदम का कड़े शब्दों में विरोध किया है। फोरम के चेयरमैन डॉ. हंसराज सुमन ने कहा है कि शैक्षणिक संस्थानों के निर्णय लेने वाले निकाय जैसे कार्यकारी परिषद (ईसी) में संबंधित मंत्रालय से सरकार या नौकरशाही का प्रत्यक्ष प्रतिनिधित्व नहीं होना चाहिए। यह विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता पर सीधा हमला है। इससे विश्वविद्यालयों में राजनीतिक हस्तक्षेप होगा व कुलपति की शक्तियों को कमजोर किया जाएगा क्योंकि शिक्षा मंत्रालय द्वारा भेजे जाने वाले प्रतिनिधि सरकार की भाषा बोलेंगे और मनमानी करके अपना एजेंडा लागू करेंगे। 

 

 

Asmita Sarkar

Add comment

Recent posts

Most popular

Most discussed