
ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों को पैसे की कमी होने लगी है। और इसकी मुख्य वजह है सरकार की अंतरराष्ट्रीय छात्रों को लेकर बनाई गई नीतियां। यही वजह है कि अब विदेशी छात्र यहां कम संख्या में पढ़ने आ रहे हैं। वीजा प्रतिबंधों की वजह से भारतीय छात्रों की संख्या में भी 20.4 प्रतिशत की गिरावट आई है। इससे यहां की यूनिवर्सिटीज को आर्थिक नुकसान हो रहा है।
जी हां, भारतीय छात्र ब्रिटेन के विश्वविद्यालयों में आवेदन करने से कतरा रहे हैं। यहां के संस्थान पहले से ही सीमित बजट से जूझ रहे हैं। ऐसे में प्रवेश लेने वाले भारतीय छात्रों की संख्या के आंकड़े में इस तरह की नाटकीय गिरावट से यहां के विश्वविद्यालयों की वित्तीय परेशानियां और बढ़ गई हैं। इस बात का खुलासा इंग्लैंड में उच्च शिक्षा क्षेत्र की स्थिरता पर पेश हुई एक नई रिपोर्ट में हुआ है।
2022-23 से 2023-24 तक ब्रिटेन के प्रदाताओं द्वारा अध्ययन के लिए स्वीकृति की पुष्टि (सीएएस) पर यूके गृह कार्यालय के आंकड़ों के आधार पर जारी छात्र कार्यालय (ओएफएस) के विश्लेषण से पता चलता है कि भारतीय छात्रों की संख्या में 20.4 प्रतिशत की गिरावट आई है। आंकड़ों में यह संख्या 139,914 से घटकर 111,329 हो गई है। इस गिरावट के पीछे नौकरी की सीमित संभावनाएं और हाल ही में कुछ शहरों में आव्रजन विरोधी (anti-immigration) दंगों के बाद सुरक्षा चिंता जैसे कारण शामिल हैं।
2022 में ब्रिटेन की यूनिवर्सिटीज में 7,60,000 विदेशी छात्र पढ़ाई कर रहे थे। विदेश में पढ़ाई के मामले अमेरिका के बाद ब्रिटेन दूसरा सबसे लोकप्रिय देश रहा है। ब्रिटेन में पढ़ने आने वाले ज्यादातर छात्र भारत, चीन, बांग्लादेश और नाइजीरिया से हैं। इन देशों से लाखों छात्र ब्रिटेन में पढ़ने आ रहे थे। मगर पिछले साल से स्टूडेंट वीजा में पांच फीसदी की गिरावट देखने को मिली है। इस साल जुलाई से सितंबर के बीच, पिछले साल की इसी अवधि की तुलना में स्टूडेंट वीजा एप्लिकेशन में 16% की कमी आई है।
सरकार के शिक्षा विभाग के गैर-विभागीय सार्वजनिक निकाय, OfS की रिपोर्ट में कहा गया है कि कुछ प्रमुख स्रोत देशों में संभावित गैर-ब्रिटेन छात्रों से वीजा आवेदनों में काफी गिरावट आई है। आंकड़ों से पता चलता है कि अंतर्राष्ट्रीय छात्रों को जारी किए गए प्रायोजक स्वीकृति की कुल संख्या में 11.8 प्रतिशत की गिरावट आई है। वहीं, भारतीय और नाइजीरियाई छात्रों को जारी किए गए CAS की संख्या में क्रमशः 28,585 (20.4%) और 25,897 (44.6%) के साथ सबसे बड़ी गिरावट दर्ज की गई है।
भारत, नाइजीरिया और बांग्लादेश जैसे देशों के छात्रों पर बहुत अधिक निर्भर वित्तीय मॉडल वाले विश्वविद्यालयों पर इस गिरावट के कारण काफी असर पड़ने की संभावना है। नेशनल इंडियन स्टूडेंट्स एंड एलुमनाई यूनियन (NISAU) यूके की अध्यक्ष सनम अरोड़ा ने कहा, “कई कारण संख्या में गिरावट में योगदान करते हैं, जिसमें आश्रितों पर कंजर्वेटिव प्रतिबंध, पोस्ट-स्टडी वर्क वीजा के बारे में भ्रम, कुशल श्रमिकों के वेतन की सीमा में वृद्धि और यूके में नौकरियों की स्पष्ट कमी शामिल है।”
आईएनएसए यूके के अध्यक्ष अमित तिवारी ने कहा, “नई नीति के तहत छात्रों को अपने साथी/जीवनसाथी को यूके लाने की अनुमति नहीं है। ऐसे में यहां की आर्थिक स्थिति और हाल ही में हुई दंगों की घटनाओं को देखते हुए, जब तक सरकार इस मुद्दे को संबोधित नहीं करती, तब तक यूके के विश्वविद्यालयों के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं, क्योंकि वे भारतीय छात्रों पर बहुत अधिक निर्भर हैं।”
यूनिवर्सिटीज यूके (UUK) की अध्यक्ष सैली मैपस्टोन ने सम्मेलन में कहा, “हम सभी आर्थिक तंगी महसूस कर रहे हैं।” बजट के अंतर को पूरा करने के लिए यूनिवर्सिटीज ने और अधिक विदेशी छात्रों को एडमिशन दिया है, यहां तक कि कई तो आर्थिक रूप से उन पर निर्भर हैं। एक संसदीय रिपोर्ट के अनुसार, लंदन यूनिवर्सिटी ऑफ आर्ट्स और ब्रिटिश राजधानी के ठीक उत्तर में स्थित एक विज्ञान और इंजीनियरिंग संस्थान, क्रैनफील्ड यूनिवर्सिटी में आधे से ज्यादा छात्र विदेशी हैं।




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