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विपक्ष शासित छह राज्यों ने की यूजीसी मसौदा नियमों को वापस लेने की मांग; कहा- संघीय ढांचे का उल्लंघन 

यूजीसी (विश्वविद्यालय अनुदान आयोग) के नए मसौदा नियमों को लेकर विपक्ष शासित छह राज्यों ने कड़ी आपत्ति जताई है और केंद्र सरकार से इन्हें तुरंत वापस लेने की मांग की है। कांग्रेस ने इस मुद्दे पर केंद्र सरकार पर हमला बोलते हुए कहा कि इन नियमों को राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) 2020 के अनुपालन के नाम पर थोपा जा रहा है, जबकि ये संविधान में निहित संघीय ढांचे के खिलाफ हैं।

कर्नाटक के उच्च शिक्षा मंत्री एम.सी. सुधाकर की अध्यक्षता में बेंगलुरु में एक सम्मेलन आयोजित किया गया, जिसमें कर्नाटक, तेलंगाना, केरल, तमिलनाडु, हिमाचल प्रदेश और झारखंड के शिक्षा मंत्रियों या उनके प्रतिनिधियों ने भाग लिया। इस बैठक में “विश्वविद्यालयों और कॉलेजों में शिक्षकों और अकादमिक स्टाफ की नियुक्ति, पदोन्नति और उच्च शिक्षा के मानकों को बनाए रखने के उपाय, 2025” पर केंद्र सरकार के प्रस्तावित नियमों पर गहन चर्चा की गई।

बैठक में 15 बिंदुओं पर आधारित एक प्रस्ताव पारित किया गया, जिसमें यूजीसी नियमों को “क्रूर और असंवैधानिक” बताते हुए उन्हें तुरंत वापस लेने की मांग की गई। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने कहा, “संविधान में दिए गए संघीय ढांचे की रक्षा करना सर्वोपरि है, और उच्च शिक्षा की गुणवत्ता केंद्र सरकार की अंतिम प्राथमिकताओं में से एक होनी चाहिए। केवल NEP 2020 के नाम पर इन नियमों को लागू करना गलत है और इन्हें तुरंत निरस्त किया जाना चाहिए।”

राज्यों के मंत्रियों ने इस बात पर नाराजगी जताई कि यूजीसी के मसौदा नियमों में राज्य सरकारों को उनके सार्वजनिक विश्वविद्यालयों में उपकुलपतियों की नियुक्ति में कोई अधिकार नहीं दिया गया है। यह राज्य सरकारों के संवैधानिक अधिकारों का उल्लंघन है। मंत्रियों ने कहा, “यह नियम राज्य सरकारों को उनकी शक्ति से वंचित कर रहे हैं, विशेष रूप से उपकुलपतियों की चयन प्रक्रिया को लेकर।”

संयुक्त बयान में यह भी कहा गया कि उपकुलपतियों की नियुक्ति में गैर-शैक्षणिक व्यक्तियों को शामिल करने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए। उपकुलपति पद के लिए निर्धारित योग्यताओं, कार्यकाल और पात्रता पर पुनर्विचार करने की मांग उठाई गई, ताकि उच्च शिक्षा के मानकों को गिरने से रोका जा सके।

बैठक में शिक्षकों की नियुक्ति और मूल्यांकन प्रणाली में किए गए बदलावों पर भी असहमति जताई गई। “अकादमिक परफॉर्मेंस इंडेक्स (API) प्रणाली को हटाना और उसकी जगह नई मूल्यांकन प्रणाली लागू करना अनावश्यक विवेकाधिकार को जन्म देता है, जिसे दोबारा विचार करने की जरूरत है,” बयान में कहा गया।

इसके अलावा, सहायक प्रोफेसरों की नियुक्ति से जुड़े नियमों, जिसमें संबंधित मुख्य विषय में डिग्री की अनिवार्यता खत्म करने का प्रावधान किया गया है, पर भी पुनर्विचार की मांग की गई।

राज्यों ने संविदात्मक आधार पर शिक्षकों की नियुक्ति, गेस्ट फैकल्टी और विजिटिंग प्रोफेसरों से जुड़े प्रावधानों पर भी स्पष्टता की मांग की। उनका कहना था कि “इन नियमों को लागू करने से पहले इन्हें और अधिक विचार-विमर्श के लिए खोला जाना चाहिए, ताकि शिक्षकों और छात्रों—दोनों के हित सुरक्षित रह सकें।”

राज्यों ने इस बात पर भी चिंता व्यक्त की कि यूजीसी ने इन नियमों को अनिवार्य बना दिया है और अनुपालन न करने पर दंडात्मक कार्रवाई का प्रावधान रखा है। “इस तरह की प्रणाली संघीय ढांचे और राज्यों की स्वायत्तता के खिलाफ है। यह केंद्र सरकार का तानाशाही रवैया दर्शाता है,” संयुक्त बयान में कहा गया।

उन्होंने यह भी आरोप लगाया कि प्रस्तावित नियम और ग्रेडिंग सिस्टम निजी विश्वविद्यालयों को लाभ पहुंचाने के लिए तैयार किए गए हैं, जबकि सरकारी और सार्वजनिक विश्वविद्यालयों की अनदेखी की गई है। बुनियादी स्नातक पाठ्यक्रमों के लिए प्रवेश परीक्षा को अनिवार्य बनाने का भी विरोध किया गया, क्योंकि इससे समावेशी शिक्षा बाधित होगी।

सम्मेलन में शामिल मंत्रियों ने कहा कि “ड्राफ्ट यूजीसी नियमों को तुरंत वापस लिया जाना चाहिए और राज्यों के साथ सहयोगी एवं परामर्श प्रक्रिया अपनाई जानी चाहिए।” उनका कहना था कि केंद्र सरकार को उच्च शिक्षा सुधारों को जबरदस्ती थोपने के बजाय राज्यों के साथ मिलकर सहमति बनानी चाहिए।

Asmita Sarkar

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