
ओडिशा हाईकोर्ट ने राज्य लोक सेवा आयोग (ओपीएससी) को न्यायिक सेवा परीक्षा में उत्तर पुस्तिका के मूल्यांकन में हुई चूक के कारण एक परीक्षार्थी को एक लाख रुपये का मुआवजा देने का निर्देश दिया है। यह फैसला प्रतियोगी परीक्षाओं में निष्पक्षता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम माना जा रहा है।
इस मामले में परीक्षार्थी ज्योतिर्मयी दत्ता ने सितंबर 2023 में ओडिशा न्यायिक सेवा परीक्षा दी थी। हालांकि, वह केवल पांच अंकों के अंतर से दस्तावेज़ सत्यापन और साक्षात्कार के अगले दौर में जाने से चूक गईं।
बाद में दत्ता को पता चला कि उनके “संपत्ति कानून” विषय के पेपर में एक प्रश्न का उत्तर बिना मूल्यांकन के छोड़ दिया गया था, जबकि अन्य उत्तरों को भी अपेक्षा से कम अंक दिए गए थे। इस गलती के चलते वह अगले चरण के लिए क्वालिफाई नहीं कर सकीं।
अपनी उत्तर पुस्तिका के पुनर्मूल्यांकन की मांग को लेकर ज्योतिर्मयी दत्ता ने हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया। अदालत ने ओडिशा के तीन प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों के विशेषज्ञों द्वारा उनकी उत्तर पुस्तिका के स्वतंत्र मूल्यांकन का निर्देश दिया।
इस समीक्षा में यह पुष्टि हुई कि एक उत्तर को अनदेखा कर दिया गया था। हालांकि, पुनर्मूल्यांकन के बाद भी उनके कुल अंक अगले चरण में जाने के लिए अपर्याप्त थे।
न्यायमूर्ति संगम कुमार साहू और चित्तरंजन दाश की खंडपीठ ने माना कि मूल्यांकन की इस चूक के कारण परीक्षार्थी को मानसिक तनाव और आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा। अदालत ने कहा: “इस मामले को आगे बढ़ाने में याचिकाकर्ता द्वारा झेले गए मानसिक आघात और वित्तीय बोझ को देखते हुए, हम मुआवजे के रूप में 1 लाख रुपये देना उचित समझते हैं।”
अदालत ने ओडिशा लोक सेवा आयोग (OPSC) को निर्देश दिया कि वह हाईकोर्ट के आदेश की तारीख से 60 दिनों के भीतर परीक्षार्थी को मुआवजा राशि का भुगतान करे।
पीठ ने अपने फैसले में कहा कि प्रतियोगी परीक्षाएं उम्मीदवारों के करियर को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। इसमें वर्षों की मेहनत, वित्तीय निवेश और व्यक्तिगत बलिदान शामिल होते हैं। इसलिए, भविष्य में ऐसी चूक न हो, इसके लिए उत्तर पुस्तिका मूल्यांकन में उच्च गुणवत्ता नियंत्रण और कड़े जांच उपायों की जरूरत है।




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