
दिल्ली उच्च न्यायालय ने एक छात्रा की याचिका खारिज करते हुए स्पष्ट किया कि पेशेवर डिग्री कोर्स के दौरान छात्रों को गंभीरता और अनुशासन के साथ अध्ययन करना चाहिए। छात्रा ने न्यूनतम उपस्थिति मानदंड पूरा न करने के बावजूद एलएलबी परीक्षा में बैठने की अनुमति मांगी थी, जिसे अदालत ने अस्वीकार कर दिया।
सख्त उपस्थिति नियमों में कोई छूट नहीं
मुख्य न्यायाधीश देवेंद्र कुमार उपाध्याय और न्यायमूर्ति तुषार राव गेडेला की पीठ ने छात्रा की अपील को यह कहते हुए खारिज कर दिया कि एलएलबी जैसे पेशेवर कोर्स में अध्ययन पूरी गंभीरता और अनुशासन के साथ किया जाना चाहिए।
अदालत ने कहा कि उपस्थिति संबंधी नियमों में छूट केवल अपरिहार्य परिस्थितियों में दी जा सकती है, जैसे चिकित्सा आपातकाल, लेकिन इस मामले में छात्रा ने कोई वैध कारण प्रस्तुत नहीं किया।
70% उपस्थिति अनिवार्य, 54% उपस्थिति पर परीक्षा की अनुमति नहीं
छात्रा ने दावा किया कि वह दिल्ली विश्वविद्यालय के लॉ फैकल्टी में तीसरे सेमेस्टर की छात्रा थी। 22 दिसंबर 2024 को एक अस्थायी डिटेनी सूची जारी की गई थी, जिसमें उन छात्रों को सूचीबद्ध किया गया था जिनकी उपस्थिति न्यूनतम आवश्यक स्तर से कम थी।
4 जनवरी 2025 को अंतिम सूची प्रकाशित हुई, जिसमें छात्रा का नाम शामिल था और उसे परीक्षा के लिए प्रवेश पत्र जारी नहीं किया गया। अदालत में छात्रा ने डिटेनी सूची से अपना नाम हटाने की मांग की थी।
न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एलएलबी पाठ्यक्रम के लिए विश्वविद्यालय द्वारा 70% उपस्थिति अनिवार्य रूप से निर्धारित की गई है, जबकि छात्रा की कुल उपस्थिति केवल 54% थी।
उच्च न्यायालय: पेशेवर कोर्स में अधिक अनुशासन जरूरी
अदालत ने अपने आदेश में यह भी कहा कि एलएलबी कोर्स एक पेशेवर डिग्री है, जिसके लिए नियमित डिग्री की तुलना में अधिक गंभीरता और अनुशासन की आवश्यकता होती है।
न्यायालय ने विश्वविद्यालय द्वारा निर्धारित उपस्थिति मानकों को “अपवित्र” करार दिया और कहा कि इन नियमों में कोई छूट नहीं दी जा सकती।
बेंच ने अपने फैसले में कहा कि छात्रा पहले से ही अपनी उपस्थिति की कमी से अवगत थी, फिर भी उसने परीक्षा में बैठने की अनुमति मांगी, जो नियमों के विरुद्ध है। इसलिए, अदालत ने उसकी याचिका खारिज कर दी।




Add comment