
सुप्रीम कोर्ट ने आईआईटी और आईआईएम में आत्महत्या की बढ़ती घटनाओं को “अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण” बताया है और इन मामलों की रोकथाम और जांच के लिए एक मजबूत तंत्र विकसित करने का आश्वासन दिया है।
पिछले 14 महीनों में 18 आत्महत्याएं
न्यायमूर्ति सूर्य कांत और न्यायमूर्ति एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ को वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह ने जानकारी दी कि पिछले 14 महीनों में भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (IIT) और भारतीय प्रबंधन संस्थानों (IIM) में 18 छात्रों ने आत्महत्या की है।
कोर्ट ने कहा, “यह बेहद दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति है। हम इसे रोकने के लिए एक मजबूत तंत्र विकसित करेंगे और इस मुद्दे को तार्किक निष्कर्ष तक ले जाएंगे।”
जातिगत भेदभाव और आत्महत्या के मामले
जयसिंह ने अदालत को बताया कि शैक्षणिक संस्थान, कोर्ट के आदेशों के बावजूद, परिसरों में आत्महत्याओं का पूरा डेटा प्रस्तुत नहीं कर रहे हैं। उन्होंने जातिगत भेदभाव के कारण आत्महत्या करने वाले छात्रों, रोहित वेमुला और पायल तड़वी के मामलों का हवाला दिया।
रोहित वेमुला, हैदराबाद केंद्रीय विश्वविद्यालय के पीएचडी छात्र, की मृत्यु 17 जनवरी 2016 को हुई थी।
पायल तड़वी, टीएन टोपीवाला नेशनल मेडिकल कॉलेज की छात्रा, ने 22 मई 2019 को आत्महत्या कर ली थी। उन्होंने अपने कॉलेज के तीन डॉक्टरों पर जातिगत भेदभाव का आरोप लगाया था।
यूजीसी के मसौदा विनियमों पर बहस
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने बताया कि विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) ने नए मसौदा विनियम तैयार किए हैं, जो इस मुद्दे को संबोधित करेंगे। ये मसौदे यूजीसी की वेबसाइट पर सार्वजनिक सुझावों के लिए उपलब्ध कराए गए हैं।
हालांकि, जयसिंह ने कहा कि 40% विश्वविद्यालय और 80% कॉलेजों ने अब तक “समान अवसर प्रकोष्ठ” (Equal Opportunity Cells) स्थापित नहीं किए हैं। इस पर कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं से मसौदा विनियमों पर अपने सुझाव देने को कहा और यूजीसी को उन सुझावों पर विचार करने का निर्देश दिया।
जयसिंह ने मसौदे पर अंतिम निर्णय लेने से पहले एक सुनवाई आयोजित करने की मांग की, लेकिन सरकार ने इसका विरोध किया। सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि यदि व्यक्तिगत सुनवाई की अनुमति दी गई, तो हर कोई इसकी मांग करेगा।
सुप्रीम कोर्ट का रुख और अगली सुनवाई
कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं की चिंता को उचित मानते हुए आश्वासन दिया कि इस मुद्दे को गंभीरता से लिया जाएगा और समाधान की दिशा में काम किया जाएगा। अगली सुनवाई आठ सप्ताह बाद होगी।
कोर्ट ने यूजीसी से यह भी डेटा प्रस्तुत करने को कहा कि कितने संस्थानों ने 2012 के समानता नियमों का पालन करते हुए “समान अवसर प्रकोष्ठ” स्थापित किए हैं।
आईआईटी और उच्च शिक्षण संस्थानों में जातिगत भेदभाव का आरोप
याचिकाकर्ताओं के अनुसार, 2004 से अब तक, IIT और अन्य उच्च शिक्षण संस्थानों में 50 से अधिक छात्र (मुख्य रूप से अनुसूचित जाति/अनुसूचित जनजाति वर्ग से) ने जातिगत भेदभाव के कारण आत्महत्या की है।
20 सितंबर 2019 को सुप्रीम कोर्ट ने इस जनहित याचिका पर नोटिस जारी किया था।
याचिका में प्रमुख मांगें:
1. 2012 के नियमों को सख्ती से लागू किया जाए ताकि छात्रों को जातिगत भेदभाव से बचाया जा सके।
2. सभी उच्च शिक्षण संस्थानों में “समान अवसर प्रकोष्ठ” स्थापित किए जाएं, जिसमें SC/ST प्रतिनिधि, गैर सरकारी संगठन (NGO) और सामाजिक क्षेत्र के विशेषज्ञ शामिल हों।
3. जातिगत भेदभाव के मामलों में सख्त अनुशासनात्मक कार्रवाई की जाए और छात्रों की सुरक्षा सुनिश्चित की जाए।
सुप्रीम कोर्ट ने इस मुद्दे को संवेदनशील और गंभीर मानते हुए स्पष्ट किया कि इस मामले में ठोस कदम उठाने की जरूरत है।




Add comment