
पाकिस्तान के मदरसे दारुल उलूम हक्कानिया के परिसर में स्थित मस्जिद में हाल ही में हुए आत्मघाती हमले में छह लोगों की मौत हो गई। यह हमला रमजान के पहले दिन, शुक्रवार को हुआ। इस हमले में दारुल उलूम हक्कानिया के मुखिया हामिद उल हक की भी मौत हुई, जो तालिबान से जुड़ा हुआ था।
दारुल उलूम हक्कानिया, जो ‘यूनिवर्सिटी ऑफ जिहाद’ के नाम से भी जाना जाता है, पाकिस्तान के अकोरा खट्टक में स्थित है और इसके संबंध भारत से भी रहे हैं। इस मदरसे से तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर और कई अन्य आतंकवादी भी जुड़े रहे हैं। इस मदरसे की भूमिका और इसके इतिहास को समझने के लिए, हमें इसके प्रारंभ से लेकर वर्तमान तक के सफर को जानना जरूरी है।
दारुल उलूम हक्कानिया का इतिहास और प्रभाव
दारुल उलूम हक्कानिया की स्थापना 1947 में मौलाना शेख अब्दुल हक ने की थी। उन्होंने इस्लामिक तालीम के लिए प्रसिद्ध भारत के दारुल उलूम देवबंद से शिक्षा प्राप्त की थी। देवबंदी आंदोलन, जो 1866 में देवबंद, सहारनपुर में शुरू हुआ, ने इस्लाम के मूल सिद्धांतों को पुनर्जीवित करने की कोशिश की। भारत के विभाजन के बाद, यह विचारधारा पाकिस्तान और अफगानिस्तान में फैली, और इसके अनुयायी कई मदरसों की स्थापना करने लगे, जिनमें से दारुल उलूम हक्कानिया प्रमुख था।
इस मदरसे में इस्लाम की कठोर तालीम दी जाती थी और यह बहुत जल्द देवबंदी विचारधारा को मानने वालों का केंद्र बन गया। हालांकि, 1980 के दशक तक यह मदरसा ज्यादा प्रसिद्ध नहीं था। 1988 में, मौलाना शेख अब्दुल हक की मौत के बाद उनके बेटे सामी उल हक ने इस मदरसे की कमान संभाली और जिहाद को हर मुसलमान के लिए जरूरी बताया।
तालिबान और जिहादी शिक्षा
सामी उल हक ने दारुल उलूम हक्कानिया को तालिबान के लड़ाकों के लिए एक प्रमुख प्रशिक्षण स्थल बना दिया। 1980 के दशक में, जब अफगानिस्तान में सोवियत संघ के खिलाफ संघर्ष चल रहा था, इस मदरसे को पाकिस्तान और अमेरिका द्वारा इस्तेमाल किया गया। तालिबान के संस्थापक मुल्ला उमर, हक्कानी नेटवर्क के संस्थापक जलालुद्दीन हक्कानी और अल-कायदा के दक्षिण एशिया प्रमुख असीम उमर जैसे कुख्यात आतंकवादी भी यहां से तालीम हासिल कर चुके हैं।
आत्मघाती हमले के बाद का दौर
सोवियत संघ के अफगानिस्तान से जाने के बाद भी दारुल उलूम हक्कानिया ने तालिबान के नेताओं से अपने रिश्ते बनाए रखे। 2001 में, जब अमेरिका ने अफगानिस्तान में तालिबान की सरकार को उखाड़ फेंका, तब भी इस मदरसे से कई लड़ाके निकले और अफगानिस्तान में अमेरिकी समर्थित सरकार के खिलाफ जंग लड़ी।
सामी उल हक को उनके कट्टरपंथी विचारों के कारण ‘Father of Taliban’ कहा जाता था। 2018 में सामी उल हक की हत्या के बाद उनके बेटे हामिद उल हक ने इस मदरसे की जिम्मेदारी संभाली। अब, ताजा आत्मघाती हमले में हामिद उल हक की भी मौत हो गई।
इस हमले ने दारुल उलूम हक्कानिया के इतिहास और उसकी जिहादी शिक्षा की गंभीरता को एक बार फिर उजागर किया है। यह मदरसा, जो कभी अफगानिस्तान में सोवियत विरोधी युद्ध में शामिल था, अब आतंकवाद और कट्टरपंथी विचारधाराओं को फैलाने का प्रमुख केंद्र बन चुका है।




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