
कलकत्ता उच्च न्यायालय ने पश्चिम बंगाल के कई ईसाई स्कूलों के अल्पसंख्यक दर्जे पर सवाल उठाने वाली एक जनहित याचिका को खारिज कर दिया। न्यायालय ने यह स्पष्ट किया कि इन संस्थानों को ईसाई अल्पसंख्यक दर्जे के लिए सरकार से कोई प्रमाण पत्र लेने की आवश्यकता नहीं है।
मुख्य न्यायाधीश टीएस शिवगणनम की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने कहा कि इस विषय पर सर्वोच्च न्यायालय के कई फैसले पहले से मौजूद हैं, जिनमें स्पष्ट रूप से कहा गया है कि एक बार किसी संस्थान को अल्पसंख्यक दर्जा मिल जाए, तो वह हमेशा के लिए अल्पसंख्यक संस्थान ही रहेगा।
याचिकाकर्ता द्वारा याचिका दायर करने की सच्चाई पर संदेह व्यक्त करते हुए अदालत ने कहा कि यह स्पष्ट है कि याचिकाकर्ता सर्वोच्च न्यायालय के फैसलों से अनभिज्ञ हैं, जिनमें यह सिद्धांत स्थापित किया गया है कि किसी भी अल्पसंख्यक संस्था का दर्जा किसी नियम या आयोग द्वारा नहीं हटाया जा सकता।
सर्वोच्च न्यायालय के एक अन्य फैसले का हवाला देते हुए पीठ ने कहा कि जिन स्कूलों को पहले से अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त है, वे अपनी स्थिति में बने रहेंगे, चाहे सरकार उन्हें अल्पसंख्यक घोषित करे या नहीं। पीठ ने यह भी स्पष्ट किया कि जब सरकार किसी स्कूल को अल्पसंख्यक संस्थान के रूप में घोषित करती है, तो वह सिर्फ यह तथ्य मान्यता देती है कि उस स्कूल का संचालन और प्रबंधन अल्पसंख्यक समुदाय द्वारा किया जा रहा है।
2019 में दायर याचिका में यह दावा किया गया था कि कुछ विशेष स्कूलों को ईसाई अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान नहीं माना जा सकता क्योंकि उन्होंने पश्चिम बंगाल अल्पसंख्यक आयोग से इस आशय का कोई प्रमाण पत्र प्राप्त नहीं किया है। याचिकाकर्ता ने यह भी दलील दी कि अल्पसंख्यक शैक्षणिक संस्थान घोषित होने के लिए स्कूल को पहले राज्य सरकार के उपयुक्त प्राधिकारी से प्रमाण पत्र प्राप्त करना होगा।
इस पर प्रतिवादी स्कूलों के वकील ने तर्क दिया कि ये स्कूल 19वीं शताब्दी में स्थापित हुए थे और पहले से ही ईसाई अल्पसंख्यक दर्जा प्राप्त थे। उन्होंने यह भी कहा कि पश्चिम बंगाल अल्पसंख्यक आयोग 2010 के बाद अस्तित्व में आया और इसमें यह प्रावधान है कि यदि कोई संस्थान प्रमाण पत्र चाहता है, तो उसे आयोग के समक्ष आवेदन करना होगा।
मुख्य न्यायाधीश ने यह भी कहा कि अदालत के कई निर्णयों में यह स्पष्ट किया गया है कि किसी विशेष संस्थान को धार्मिक या भाषाई अल्पसंख्यक घोषित करने के लिए संबंधित एजेंसी पर यह दबाव नहीं डाला जा सकता कि वह हर साल सरकार के पास जाकर दर्जा नवीकरण के लिए आवेदन करे।
अंत में, पीठ ने यह निर्णय दिया कि यदि कोई संस्था अल्पसंख्यक दर्जे के लिए प्रमाण पत्र चाहती है, तो वह अल्पसंख्यक आयोग से आवेदन कर सकती है।




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