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32 डिग्रियां, 64 विषयों में मास्टर और 9 भाषाओं के ज्ञाता थे डॉ. आंबेडकर

हर वर्ष 14 अप्रैल को भारत रत्न डॉ. भीमराव रामजी आंबेडकर की जयंती मनाई जाती है, जो न केवल भारतीय संविधान के निर्माता हैं, बल्कि सामाजिक न्याय और समानता के अग्रदूत भी रहे हैं। बाबा साहेब ने अपने विचारों, संघर्षों और शिक्षा के बल पर भारत के सामाजिक ताने-बाने को नई दिशा दी।

क्यों कहा जाता है ‘संविधान निर्माता’?
डॉ. अंबेडकर को संविधान निर्माता कहा जाता है क्योंकि स्वतंत्र भारत के संविधान निर्माण में उनका अहम और ऐतिहासिक योगदान रहा। उन्होंने ऐसा संविधान तैयार किया, जो हर नागरिक को समान अधिकार देता है—बिना जाति, धर्म, लिंग या वर्ग के भेदभाव के।

एक ‘अछूत’ से विश्व के महानतम शिक्षाविद बनने की यात्रा
14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू में जन्मे बाबा साहेब एक ऐसे समुदाय से ताल्लुक रखते थे जिसे समाज ने “अछूत” कहकर हाशिए पर रखा था। लेकिन उन्होंने भेदभाव को चुनौती दी और शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया।

बाबा साहेब का विश्वास था—”शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो”। उन्होंने इसी मंत्र को लेकर दलितों, महिलाओं और श्रमिक वर्ग के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष किया।

शिक्षा के क्षेत्र में ऐतिहासिक उपलब्धियाँ
– प्रारंभिक शिक्षा मुंबई और सतारा में हुई।
– एल्फिंस्टन कॉलेज से स्नातक।
– कोलंबिया यूनिवर्सिटी (अमेरिका) से M.A. (1915) और Ph.D. (1916)।
– लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से D.Sc., ‘ग्रेज़ इन’ से कानून की पढ़ाई।
– जर्मनी के बॉन विश्वविद्यालय में भी अध्ययन।

डॉ. अंबेडकर ने 64 विषयों में मास्टरी, 9 भाषाओं में दक्षता, और कुल 32 डिग्रियों के साथ शिक्षा जगत में मिसाल कायम की। लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स में मात्र 2 साल 3 महीने में 8 साल की पढ़ाई पूरी कर उन्होंने “डॉक्टर ऑफ साइंस” की डिग्री प्राप्त की—जो आज तक किसी भारतीय के लिए एकमात्र उपलब्धि है।

दुनिया में सबसे ज्यादा मूर्तियाँ और ऐतिहासिक पहचान
– डॉ. अंबेडकर की सबसे पहली मूर्ति 1950 में कोल्हापुर में लगाई गई थी।
– वे दुनिया के ऐसे एकमात्र भारतीय हैं, जिनकी प्रतिमा लंदन संग्रहालय में कार्ल मार्क्स के साथ लगी हुई है।
– उनकी आत्मकथा “Waiting for a Visa” कोलंबिया विश्वविद्यालय में पढ़ाई जाती है।
– भारतीय ध्वज में अशोक चक्र को स्थान दिलाने का श्रेय भी उन्हीं को जाता है।

आखिरी विदाई और भारत रत्न
डॉ. अंबेडकर का निधन 6 दिसंबर 1956 को नई दिल्ली में हुआ। उन्हें बौद्ध रीति-रिवाजों के अनुसार अंतिम विदाई दी गई। 1990 में उन्हें मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान “भारत रत्न” से सम्मानित किया गया।

आज उनकी जयंती पर हम न केवल उनके योगदान को स्मरण करें, बल्कि उनके विचारों को अपने जीवन में आत्मसात कर एक समावेशी, समान और न्यायपूर्ण समाज के निर्माण में सहभागी बनें। बाबा साहेब सिर्फ एक व्यक्ति नहीं, बल्कि एक विचार हैं—जो हर पीढ़ी को प्रेरणा देते रहेंगे।

 

Asmita Sarkar

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