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स्त्री शिक्षा और सामाजिक समरसता की एक सच्ची कहानी है ‘फुले’

“सिनेमा समाज का दर्पण है”—यह वाक्य बार-बार दोहराया गया है, लेकिन जब यह दर्पण इतिहास की धूल में दबी किसी क्रांति को साफ़-साफ़ दिखाने लगे, तो उसका असर कहीं गहरा होता है। अभिनेता से निर्देशक बने अनंत नारायण महादेवन की फिल्म ‘फुले’ ऐसा ही एक सिनेमा है, जो न केवल एक सच्ची कहानी को पर्दे पर लाती है, बल्कि उसे उस संवेदनशीलता और निडरता के साथ कहती है, जिसकी आज के दौर को सख्त ज़रूरत है।

फिल्म की पृष्ठभूमि में उत्तर भारत की राजनीति में चर्चा में आए पीडीए (पिछड़ा, दलित, अल्पसंख्यक) की अवधारणा की जड़ें ज्योतिबा फुले की सोच में मिलती हैं, जिन्होंने आज़ादी से पहले ही इन तबकों को एकजुट कर समानता और शिक्षा के अधिकार की लड़ाई शुरू की थी। लेकिन अफ़सोस, ज्योतिबा फुले को देश के बहुत सारे स्कूलों में पढ़ाया नहीं जाता। अधिकांश लोगों को यह भी नहीं पता कि जब बॉम्बे प्रेसीडेंसी में महाराष्ट्र और गुजरात एक ही प्रांत थे, तब वहां के महाराजा ने उन्हें पहली बार आधिकारिक रूप से ‘महात्मा’ की उपाधि दी थी—गांधी से पहले।

फिल्म ‘फुले’ की कहानी सिर्फ़ किसी क्रांतिकारी जोड़े की बायोपिक नहीं है, यह सामाजिक न्याय, स्त्री शिक्षा और ब्राह्मणवादी व्यवस्था के खिलाफ खड़े एक आंदोलन की सिनेमाई प्रस्तुति है। फिल्म की पटकथा के केंद्र में है फूलों की खेती करने वाले एक परिवार में जन्मा लड़का—ज्योतिराव—जिसने अपने नाम के साथ ‘फुले’ उपनाम इसलिए जोड़ा क्योंकि उनके पिता को राजा से मिली जमीन पर फूलों की खेती करनी होती थी। फिल्म की खूबसूरती इस प्रतीकवाद में भी है—गेंदा फूल, जो देवताओं को चढ़ाया जाता है, संभ्रांत घरों को सजाता है, लेकिन जिसे उगाने वाले को ही पूजा-पाठ से दूर रखा जाता है।

फिल्म स्वतंत्रता संग्राम की पृष्ठभूमि में सामाजिक क्रांति की लड़ाई को दिखाती है, जहां कूड़े में छिपकर पढ़ने जाती बेटियां हैं, और एक ब्राह्मण जोड़ी अपने घर को स्कूल बनाने के लिए दे देती है। लेकिन इस प्रयास का विरोध सिर्फ़ कुछ ब्राह्मण ही नहीं, बल्कि मुस्लिम मौलवी भी करते हैं। सावित्रीबाई फुले और फातिमा शेख मिलकर स्त्री शिक्षा की अलख जगाती हैं। यह वही फातिमा हैं, जो उनके शरणदाता परिवार की सदस्य थीं और जिन्होंने सावित्री के साथ मिलकर भारत का पहला महिला स्कूल चलाया। यहीं से दलित साहित्य की नींव भी रखी जाती है, जब एक दलित छात्रा के निबंध ने नए विमर्श को जन्म दिया।

फिल्म का सबसे शक्तिशाली क्षण वह है, जब फुले खुद एक दलित शादी में पुरोहित बनते हैं—यह सिर्फ़ सामाजिक व्यवस्था को चुनौती नहीं, बल्कि उसके आर्थिक आधार पर भी सवाल है। जब फुले को ईसाई धर्म अपनाने का प्रस्ताव मिलता है, तब वे इसे अस्वीकार करते हैं और दिखाते हैं कि उनकी लड़ाई धर्म नहीं, बल्कि व्यवस्था से है—वह व्यवस्था जो अंग्रेजों की साजिश के तहत जातियों में बाँट दी गई थी।

फिल्म का निर्देशन सधा हुआ है और यह तब और भी प्रभावशाली हो जाता है जब एक ब्राह्मण निर्देशक अपने ही समुदाय की गलतियों पर सिनेमा के माध्यम से उंगली उठाता है। अनंत महादेवन का साहस काबिल-ए-तारीफ है, खासकर ऐसे समय में जब इतिहास को एक खास चश्मे से देखने की कोशिशें आम होती जा रही हैं। 74 साल की उम्र में ऐसी सच्ची और स्पष्ट दृष्टिकोण वाली फिल्म बनाना, अपने आप में एक क्रांतिकारी कार्य है।

अभिनय के स्तर पर प्रतीक गांधी युवा और वृद्ध दोनों अवतारों में ज्योतिबा फुले के किरदार को अच्छे से निभाते हैं, हालांकि शुरुआत में उनकी डायलॉग डिलीवरी में एकरूपता दिखती है। पत्रलेखा के अभिनय में थोड़ी असहजता है, खासकर भाषा और उच्चारण के मामले में, पर जैसे-जैसे फिल्म आगे बढ़ती है, वे सावित्री के किरदार में ढलती जाती हैं। सहायक भूमिकाओं में विनय पाठक और एलेक्स ओ’नील खास प्रभाव छोड़ते हैं। मोनाली ठाकुर का गाया और कौसर मुनीर का लिखा गीत ‘साथी’ फिल्म को भावनात्मक गहराई देता है।

फिल्म की सिनेमैटोग्राफी, संपादन और बैकग्राउंड स्कोर इसे तकनीकी रूप से भी सशक्त बनाते हैं। सुनीता राडिया की कैमरा वर्क और रौनक फडनिस का संपादन फिल्म को कसावट देते हैं।

यह फिल्म सिर्फ़ देखी जाने वाली नहीं है, यह सिखाने और सहेजने लायक दस्तावेज़ है। इसे देश के हर स्कूल में मुफ्त दिखाया जाना चाहिए और यदि वह न हो सके, तो कम से कम इसे जीएसटी से मुक्त कर देना चाहिए। यह सिर्फ़ एक फिल्म नहीं, बल्कि वह आईना है, जिसमें आज का भारत अपने अतीत के अंधेरों को पहचान सकता है—और उन्हें पार करके एक समानता से भरे भविष्य की ओर कदम बढ़ा सकता है।

Asmita Sarkar

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