
डिज़्नी की नई लाइव-एक्शन फिल्म ‘लीलो एंड स्टिच’ वर्ष 2002 में आई अपनी ही एनिमेटेड क्लासिक का रीमेक है। यह कहानी हवाई की एक अकेली बच्ची लीलो की है, जो स्टिच नाम के एक विचित्र प्राणी को पालतू समझकर गोद ले लेती है, जबकि असल में वह एक विनाशकारी एलियन होता है। इस बार फिल्म को तकनीकी रूप से भले ही नई ऊंचाइयों पर ले जाया गया हो, लेकिन इसकी आत्मा—जो कभी शरारतों, मासूमियत और “ओहाना” (परिवार) के इमोशन से भरपूर थी—अब थोड़ी फीकी पड़ती दिखती है।
डिज़्नी की लाइव-एक्शन रीमेक की होड़
बीते एक दशक में डिज़्नी अपनी हिट एनिमेटेड फिल्मों को लाइव-एक्शन और CGI के ज़रिए दोबारा पेश करने में जुटा है। ‘ब्यूटी एंड द बीस्ट’ (2017) से शुरू हुआ यह सिलसिला ‘द लॉयन किंग’ (2019) और ‘द लिटिल मरमेड’ (2023) के बाद अब ‘लीलो एंड स्टिच’ तक आ पहुंचा है। हालांकि तकनीक के मामले में ये फिल्में खूब चमकती हैं, भावनात्मक जुड़ाव की कसौटी पर ये बार-बार चूकती रही हैं।
तकनीक ज़्यादा, भावना कम
डीन फ्लेशर कैम्प के निर्देशन में बनी इस फिल्म में CGI का उपयोग बेहतरीन है, लेकिन स्टिच के नए रूप में वह मासूम शरारत और प्यारा झबरीलापन कहीं खो गया है। मूल फिल्म का स्टिच जहां एल्विस प्रेमी और खुराफाती एलियन था, वहीं इस फिल्म का स्टिच एक डिज़ाइन किया गया डिज़िटल पात्र भर लगता है।
माया कीलोहा की मासूमियत ही फिल्म की जान
नई लीलो बनी हैं माया कीलोहा, जो अपने किरदार में चमकती हैं। वह सुंदर, मासूम और सजीव हैं, लेकिन उनके किरदार का गुस्सा, अकेलापन और बचपन की नटखट पागलपन थोड़ा दबा-दबा लगता है। लगता है, डिज़्नी ने इस बार सब कुछ ‘संतुलन’ के नाम पर थोड़ा ज्यादा ही संतुलित कर दिया है।
फिल्म में कुछ नए और कुछ पुराने सीन
फिल्म में मूल कहानी के अलावा कुछ अतिरिक्त दृश्य डाले गए हैं, जैसे समुद्र की लहरों पर सर्फिंग वाला सीन, लेकिन वह भी दिल जीतने में असफल रहा। स्टोरीटेलिंग में मूल फिल्म की आत्मा को बनाए रखने की कोशिश की गई है, लेकिन वह असर कम दिखता है।
“ओहाना” का मतलब सिर्फ परिवार नहीं
फिल्म “लीलो एंड स्टिच” एक बार फिर याद दिलाती है कि ओहाना यानी परिवार, सिर्फ खून का रिश्ता नहीं होता—बल्कि वो भावनात्मक जुड़ाव है जो हमें जोड़े रखता है। लेकिन इस बार की कहानी में वो गहराई नहीं है, जो पहली फिल्म में थी। फिल्म की सिनेमैटोग्राफी (नाइजल ब्लक) और संपादन (एडम गर्स्टेल, फिलिप जे. बार्टेल) फिल्म को चुस्त रखते हैं, और इसकी 108 मिनट की लंबाई बच्चों के लिए इसे एक वन टाइम वॉच बना देती है।
‘लीलो एंड स्टिच’ का यह लाइव-एक्शन संस्करण तकनीक की दुनिया में डिज़्नी की महारत तो दिखाता है, लेकिन भावना की वो ऊंचाई नहीं छू पाता जो मूल फिल्म का दिल था। nostalgia है, पर जादू अधूरा है। शायद डिज़्नी को फिर से समझने की ज़रूरत है कि दर्शक सिर्फ रीयल इमेज नहीं, रीयल फील भी चाहते हैं।




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