देश के प्रमुख कोचिंग केंद्र कोटा में छात्र आत्महत्याओं की बढ़ती घटनाओं ने एक बार फिर चिंता बढ़ा दी है। मेडिकल और इंजीनियरिंग प्रवेश परीक्षाओं की तैयारी के लिए लाखों छात्र हर साल इस शहर का रुख करते हैं, लेकिन हाल के वर्षों में तनाव और दबाव के चलते आत्महत्या के मामलों में चिंताजनक इजाफा हुआ है। वर्ष 2025 की शुरुआत से अब तक 14 छात्रों की आत्महत्या के मामले सामने आ चुके हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने इस गंभीर स्थिति पर संज्ञान लेते हुए हाल ही में दो आत्महत्या मामलों की सुनवाई के दौरान राजस्थान सरकार से कड़ी पूछताछ की। न्यायमूर्ति पारदीवाला की अध्यक्षता वाली पीठ ने सरकार के रवैये पर नाराजगी जताई और सवाल किया, “राज्य सरकार इस मुद्दे को लेकर क्या कर रही है? ये घटनाएं सिर्फ कोटा में ही क्यों हो रही हैं? क्या आपने कभी इस पर गहराई से विचार किया?”
पिछले वर्षों के आंकड़ों पर नजर डालें तो 2022 में 15, 2019 में 18, 2018 में 20, 2017 में 7, 2016 में 17 और 2015 में 18 छात्रों ने आत्महत्या की थी। यह सिलसिला अब भी जारी है, जिससे प्रशासन और समाज दोनों के लिए यह एक गंभीर चेतावनी बन चुका है।
प्रशासन के उठाए गए प्रमुख कदम
स्प्रिंग-लोडेड पंखे: 2023 में आत्महत्या की घटनाएं रोकने के लिए छात्रावासों और पीजी में इन्हें अनिवार्य किया गया।
मानसिक स्वास्थ्य सेवाएं: कोचिंग संस्थानों में काउंसलिंग और हेल्पलाइन सेवाओं की शुरुआत की गई।
अनिवार्य स्क्रीनिंग टेस्ट: कमजोर छात्रों की पहचान कर उन्हें अतिरिक्त सहायता दी जा रही है।
रैंकिंग प्रणाली में बदलाव: छात्रों पर रैंकिंग का दबाव कम करने के लिए अब उन्हें वर्णानुक्रम में सूचीबद्ध किया जाता है।
सुप्रीम कोर्ट की कड़ी प्रतिक्रिया से स्पष्ट है कि अब केवल सतही उपायों से काम नहीं चलेगा। सरकार और कोचिंग संस्थानों को मिलकर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा के लिए ठोस और दीर्घकालिक रणनीति बनानी होगी।




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