
केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) ने स्कूली शिक्षा में एक अहम बदलाव करते हुए मातृभाषा को प्राथमिक शिक्षा का माध्यम बनाने की दिशा में कदम उठाया है। नई गाइडलाइन के अनुसार, अब 3 से 11 साल की उम्र के बच्चों — यानी प्री-प्राइमरी से लेकर कक्षा 5वीं तक — की पढ़ाई उनकी मातृभाषा, घरेलू भाषा या क्षेत्रीय भाषा में कराई जाएगी।
यह फैसला राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 (NEP 2020) और राष्ट्रीय पाठ्यचर्या रूपरेखा स्कूल शिक्षा 2023 (NCFSE 2023) पर आधारित है, जो प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा के उपयोग को सबसे अधिक प्रभावशाली मानते हैं।
स्कूलों को दिए गए स्पष्ट निर्देश
सीबीएसई ने 22 मई को जारी सर्कुलर में सभी संबद्ध स्कूलों से कहा है कि वे छात्रों की मातृभाषा को जल्द से जल्द मैप करें और उसी के अनुसार शिक्षण व्यवस्था तैयार करें। इस नई नीति को जुलाई 2025 से लागू किया जा सकता है।
प्री-प्राइमरी से कक्षा 2 तक की शिक्षा को “फाउंडेशनल स्टेज” कहा गया है, जिसमें मातृभाषा या घरेलू भाषा में पढ़ाई अनिवार्य होगी।
कक्षा 3 से 5वीं तक के लिए भी मातृभाषा में पढ़ाई की सिफारिश की गई है, लेकिन इस स्तर पर माध्यम बदलने का विकल्प खुला रहेगा।
मातृभाषा क्यों है जरूरी?
सर्कुलर के अनुसार, छोटे बच्चे अपने घर की भाषा में सबसे तेज़ और गहराई से अवधारणाओं को समझते हैं। इसलिए प्रारंभिक शिक्षा में मातृभाषा का उपयोग बच्चों की सीखने की क्षमता, आत्मविश्वास और समझ को कई गुना बढ़ा सकता है।
एनसीएफ कार्यान्वयन समिति का गठन अनिवार्य
सीबीएसई ने सभी स्कूलों को मई 2025 के अंत तक ‘एनसीएफ कार्यान्वयन समिति’ (NCF Implementation Committee) गठित करने का निर्देश दिया है। यह समिति छात्रों की मातृभाषा की पहचान करेगी और आवश्यक भाषा संसाधनों की मैपिंग करेगी। साथ ही, स्कूलों को जल्द से जल्द लैंग्वेज मैपिंग एक्सरसाइज पूरी करने को कहा गया है।
नीति की स्पष्ट प्राथमिकता: मातृभाषा
NEP 2020 और NCFSE 2023 दोनों ही दस्तावेज़ इस बात पर ज़ोर देते हैं कि शिक्षा का प्राथमिक माध्यम बच्चे की मातृभाषा, घरेलू भाषा या परिचित भाषा होनी चाहिए — विशेष रूप से 8 वर्ष तक की उम्र के बच्चों के लिए। इससे शिक्षा अधिक प्रभावशाली, सहज और बच्चों के अनुभव से जुड़ी हुई बनती है।




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