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अनिश्चितता और मानसिक दबाव से जूझ रहे हार्वर्ड में पढ़ रहे भारतीय छात्र 

हार्वर्ड यूनिवर्सिटी में पढ़ने वाले भारतीय छात्र इन दिनों गहरी अनिश्चितता और मानसिक तनाव के दौर से गुजर रहे हैं। उनके मुताबिक वे एक भावनात्मक ‘रोलरकोस्टर’ पर सवार हैं, जहां वीज़ा नीतियों में अस्थिरता, नौकरी की अनिश्चितताएं और अमेरिका की राजनीतिक उथल-पुथल ने उनके सपनों को प्रभावित किया है।

न्यूयॉर्क से मिली रिपोर्टों के अनुसार, हार्वर्ड के भारतीय छात्रों पर मानसिक दबाव लगातार बढ़ता जा रहा है। ट्रंप प्रशासन की ओर से विश्वविद्यालय पर हो रहे हमले, फंडिंग में कटौती और विदेशी छात्रों की एंट्री को लेकर सख्त नीतियों ने उनकी स्थिति को और जटिल बना दिया है।

छात्रों की चिंता: पढ़ाई के बाद क्या होगा?
हार्वर्ड के केनेडी स्कूल से हाल ही में स्नातक हुई एक भारतीय छात्रा ने नाम न छापने की शर्त पर कहा, “यह समय बेहद उलझन भरा है। समझ नहीं आ रहा कि भारत लौटूं या यहीं कोई रास्ता निकालूं।”

वहीं, डिजाइन स्कूल की एक अन्य छात्रा ने कहा, “पहले हार्वर्ड का नाम ही काफी था, लेकिन अब कंपनियां इंटरनेशनल छात्रों को हायर करने से बच रही हैं। वीज़ा की स्थिति इतनी अस्थिर है कि कोई भी हमें काम पर रखना नहीं चाहता।”

कठोर नीतियों के चलते हालात और खराब
ट्रंप प्रशासन ने हार्वर्ड की अंतरराष्ट्रीय छात्रों की नामांकन पात्रता रद्द कर दी है और SEVP सर्टिफिकेशन भी समाप्त कर दिया है। इसके चलते सैकड़ों विदेशी छात्रों को या तो अन्य संस्थानों में स्थानांतरित होना पड़ा या अमेरिका में रहने का कानूनी अधिकार खोना पड़ा।

इसके साथ ही 2.2 अरब अमेरिकी डॉलर की रिसर्च ग्रांट को फ्रीज कर दिया गया है, जिससे नीति निर्माण, स्वास्थ्य, जलवायु परिवर्तन जैसे अहम क्षेत्रों में नौकरियों पर असर पड़ा है।

अमेरिकी गृह सुरक्षा विभाग (DHS) ने हार्वर्ड पर आरोप लगाया है कि उसने “एंटी-अमेरिकन और आतंकवाद समर्थक प्रदर्शनकारियों” को परिसर में पनपने दिया, जिससे विश्वविद्यालय की सुरक्षा पर सवाल खड़े हो गए हैं। राष्ट्रपति ट्रंप ने भी यह दावा किया कि हार्वर्ड ने उन विदेशी छात्रों की जानकारी साझा करने से इनकार किया है जो “गैरकानूनी या खतरनाक गतिविधियों” में शामिल हैं।

भारत लौटने पर विचार कर रहे कई छात्र
केनेडी स्कूल की एक छात्रा ने कहा, “मैं अभी बुरी तरह से नौकरी की तलाश में हूं, लेकिन कंपनियां वीज़ा के अस्थिर हालात की वजह से इंटरनेशनल छात्रों से दूरी बना रही हैं।”

कई छात्रों का मानना है कि ट्रंप प्रशासन की फंडिंग कटौती ने पब्लिक हेल्थ, जलवायु नीति और रिसर्च जैसे क्षेत्रों में अवसरों को सीमित कर दिया है। इस माहौल को देखते हुए कई छात्र अब भारत लौटने पर गंभीरता से विचार कर रहे हैं।

एक छात्र ने कहा, “इतनी दूर रहकर यह तनाव सहना अब बेकार लगता है। अमेरिका की मौजूदा स्थिति ने हमारी उम्मीदों को तोड़ दिया है।”

क्या है आगे की राह?
हालांकि, अमेरिकी स्टेट डिपार्टमेंट ने अपने वैश्विक दूतावासों को निर्देश दिए हैं कि वे हार्वर्ड छात्रों के वीज़ा आवेदनों को फिर से प्रोसेस करें। इसके बावजूद, छात्रों में डर बना हुआ है। कुछ छात्रों ने कहा कि वे अब यूरोप या अन्य देशों में पढ़ाई के विकल्प तलाश रहे हैं।

कुछ नए छात्रों को वीज़ा तो मिल चुका है, लेकिन वे असमंजस में हैं कि यदि वे इस वर्ष अमेरिका नहीं गए, तो कहीं स्कॉलरशिप या फंडिंग न छिन जाए। हार्वर्ड इंटरनेशनल ऑफिस के अनुसार, 2024–25 सत्र में भारत से 788 छात्र और शोधार्थी हार्वर्ड में नामांकित हैं।

‘अमेरिकन ड्रीम’ पर सवाल
केनेडी स्कूल के एक छात्र ने कहा, “जो ‘अमेरिकन ड्रीम’ कभी भारत जैसे देशों के छात्रों को आकर्षित करता था, वह अब वैसा नहीं रहा। पिछले पांच वर्षों में जो नुकसान हुआ है, वह शायद ही पूरी तरह से भरा जा सके।”

हालांकि, उन्होंने यह भी जोड़ा कि “सबसे राहत की बात यह रही कि हार्वर्ड प्रशासन और वहां के छात्र इंटरनेशनल छात्रों के समर्थन में मजबूती से खड़े हैं।”

निष्कर्षतः, हार्वर्ड में पढ़ रहे भारतीय छात्रों के लिए यह समय चुनौतियों और अनिश्चितताओं से भरा है, लेकिन वे अब भी आशा और विकल्पों की तलाश में हैं — किसी नए सपने, नई जमीन और शायद एक नई शुरुआत के साथ।

Asmita Sarkar

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