
केरल सरकार ने स्कूली शिक्षा में एक महत्वपूर्ण बदलाव की घोषणा की है। अब छात्रों को राज्यपालों की संवैधानिक शक्तियों और कर्तव्यों के बारे में भी पढ़ाया जाएगा। राज्य के सामान्य शिक्षा मंत्री वी. शिवनकुट्टी ने बताया कि स्कूली पाठ्यपुस्तकों में जल्द ही यह नया विषय जोड़ा जाएगा, ताकि छात्र लोकतंत्र और संविधान की बेहतर समझ विकसित कर सकें।
मंत्री ने कहा कि स्कूल लोकतंत्र के मूल्यों को समझने और अपनाने के लिए सबसे उपयुक्त स्थान हैं। इसीलिए पाठ्यपुस्तकों में राज्यपालों की संवैधानिक भूमिकाओं को शामिल किया जाएगा। उन्होंने यह भी कहा कि यह कदम छात्रों को लोकतंत्र की कार्यप्रणाली और संविधान की रक्षा के महत्व को समझाने में मदद करेगा।
राज्यपालों की भूमिका पर बढ़ती बहस के बीच निर्णय
इस घोषणा का संदर्भ उस घटनाक्रम से जुड़ा है जब गुरुवार को मंत्री शिवनकुट्टी राज्यपाल राजेंद्र विश्वनाथ आर्लेकर की मौजूदगी में एक कार्यक्रम से बाहर चले गए थे। इसके बाद राजभवन की ओर से मंत्री की कड़ी आलोचना की गई और इसे प्रोटोकॉल का उल्लंघन बताया गया।
मंत्री ने पलटवार करते हुए राज्यपाल पर आरोप लगाया कि उन्होंने आधिकारिक समारोह को राजनीतिक रंग देकर संविधान की भावना का उल्लंघन किया है।
संविधान को लेकर उठे सवालों का मिलेगा जवाब
मंत्री शिवनकुट्टी ने कहा, “हाल के दिनों में निर्वाचित सरकारों को अस्थिर करने के लिए राज्यपाल के पद का दुरुपयोग बढ़ा है। सर्वोच्च न्यायालय ने भी राज्यपाल की शक्तियों की स्पष्ट व्याख्या की है।” इसी को ध्यान में रखते हुए स्कूलों में इस विषय को शामिल किया जा रहा है।
सामाजिक विज्ञान की पुस्तकों में होगा समावेश
मंत्री ने बताया कि इस वर्ष सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक के दूसरे खंड में राज्यपालों की संवैधानिक शक्तियों को लेकर नया पाठ जोड़ा जाएगा। इसके अलावा उच्चतर माध्यमिक विद्यालय स्तर की पुस्तकों में भी आगामी बदलाव किए जाएंगे।
राजनीतिक विवादों के बीच शिक्षा में सुधार की पहल
यह घोषणा ऐसे समय में आई है जब केरल में राज्यपाल और राज्य सरकार के बीच संबंध तनावपूर्ण बने हुए हैं। भगवा वस्त्रधारी छवियों और ‘भारत माता’ के उपयोग को लेकर भी सरकार को आलोचना का सामना करना पड़ा है। वहीं राज्यपाल ने देशभक्ति और राष्ट्रीयता की भावना को भारत माता से जोड़ते हुए कहा है कि इसे हटाने का कोई सवाल ही नहीं उठता।
इस विवाद के बीच पाठ्यक्रम में बदलाव का यह फैसला न केवल शैक्षिक दृष्टि से महत्वपूर्ण है, बल्कि यह संवैधानिक जागरूकता बढ़ाने की दिशा में एक सकारात्मक कदम भी माना जा रहा है।




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