
भारत में शिक्षा नीति के स्तर पर पिछले कुछ वर्षों में यह लगातार दोहराया गया है कि बच्चों को उनकी मातृभाषा में पढ़ाया जाना चाहिए। नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (NEP) भी प्राथमिक कक्षाओं में मातृभाषा में शिक्षा देने की जोरदार सिफारिश करती है। इसके पीछे वैज्ञानिक कारण हैं — छोटे बच्चों के लिए अपनी भाषा में सीखना आसान और प्रभावी होता है। यानी शिक्षा को लेकर भारत सरकार बीते वर्षों में जिस दिशा में बढ़ी है, उसमें मातृभाषा को ही केंद्रीय भूमिका दी गई है।
लेकिन ज़मीनी सच्चाई कुछ और ही कहानी बयां करती है। अधिकांश अभिभावक और छात्र अब भी अंग्रेज़ी माध्यम को प्राथमिकता दे रहे हैं, चाहे सरकार क्षेत्रीय भाषाओं को जितना भी बढ़ावा क्यों न दे। अब केंद्र सरकार देशभर में विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं को भी भारतीय भाषाओं में आयोजित कर रही है। लेकिन सवाल यह है कि जब सरकार मातृभाषा में शिक्षा और परीक्षा का विकल्प दे रही है, तो अधिकांश छात्र अब भी अंग्रेज़ी को ही क्यों चुनते हैं?
CUET-UG 2025 के आँकड़े इसका सीधा जवाब देते हैं। इस वर्ष यह परीक्षा हिंदी, अंग्रेज़ी समेत 13 भारतीय भाषाओं में आयोजित की गई। फिर भी कुल 8,73,115 उम्मीदवारों ने अंग्रेज़ी माध्यम में परीक्षा दी, जबकि हिंदी में मात्र 1,85,605 ने, और अन्य भाषाओं—बांग्ला (4,869), तमिल (3,450), असमी (1,493), पंजाबी (78)—का आँकड़ा बहुत सीमित रहा।
यह स्थिति इस तथ्य को उजागर करती है कि सरकारी प्रयासों और नीति समर्थन के बावजूद, छात्रों और अभिभावकों के बीच अंग्रेज़ी का आकर्षण पहले जैसा ही बना हुआ है — या कहें और बढ़ा है।
इस विरोधाभास को समझने के लिए हाल की एक घटना पर भी गौर किया जा सकता है। दिल्ली के शिक्षा मंत्री आशीष सूद ने हाल ही में लंदन के ब्रिटानिया विलेज प्राइमरी स्कूल का दौरा किया। यह स्कूल “गूगल रेफरेंस स्कूल” के नाम से जाना जाता है और इसकी शिक्षा पद्धति पूरी तरह तकनीक-समर्थ, समावेशी और छात्र-केंद्रित है।
सूद ने वहाँ देखा कि कैसे 1:1 क्रोमबुक क्लासरूम, जिज्ञासा आधारित शिक्षण पद्धतियाँ, लचीले कक्ष और विद्यार्थियों के मानसिक स्वास्थ्य पर दिया गया ध्यान शिक्षा को नए स्तर पर ले जा रहे हैं। लेकिन एक चीज़ स्पष्ट थी — यह पूरा शैक्षणिक मॉडल अंग्रेज़ी आधारित था।
अभिलाषा और अवसर का माध्यम: अंग्रेज़ी
अंग्रेज़ी अब सिर्फ एक भाषा नहीं रही — यह एक सामाजिक और आर्थिक अभिलाषा बन चुकी है। विशेषकर मध्यमवर्ग और निम्न-मध्यमवर्ग के लिए, अंग्रेज़ी शिक्षा का मतलब है एक बेहतर भविष्य की संभावना। सरकारी नौकरी हो, प्राइवेट सेक्टर की नौकरी हो, उच्च शिक्षा या विदेश जाने का सपना — अधिकतर रास्ते अंग्रेज़ी से होकर ही जाते हैं।
इसी वजह से दिल्ली हो या सूरत, सरकारी स्कूलों में जब स्मार्ट क्लास, AI लैब या रोबोटिक्स की बात होती है, तो उनके सॉफ्टवेयर, कंटेंट और संवाद का माध्यम अक्सर अंग्रेज़ी ही होता है।
भारत में अंग्रेज़ी सिर्फ एक भाषा नहीं, एक संभावना है। रोजगार, उच्च शिक्षा, कॉर्पोरेट जगत और वैश्विक अवसर — इन सभी का प्रवेशद्वार आज भी अंग्रेज़ी ही बना हुआ है।
एक ग्रामीण छात्र के लिए अंग्रेज़ी माध्यम में परीक्षा देना शायद कठिन हो, लेकिन फिर भी वह यह जोखिम उठाता है, क्योंकि उसे लगता है कि “अगर मैं अंग्रेज़ी में सफल हुआ, तो रास्ते ज़्यादा खुलेंगे।” यह मानसिकता पूरे देश में देखने को मिल रही है — उत्तर प्रदेश, बिहार, मध्य प्रदेश जैसे हिंदीभाषी राज्यों में भी छात्र अंग्रेज़ी माध्यम को प्राथमिकता दे रहे हैं।
नीति निर्माता इस दुविधा में हैं — बच्चों की समझ और संस्कृति की दृष्टि से मातृभाषा में शिक्षा सही है, लेकिन व्यावसायिक दृष्टि से अंग्रेज़ी आवश्यक लगती है।
दिल्ली सरकार के CM श्री स्कूलों में जिस तरह से स्मार्ट बोर्ड, रोबोटिक्स लैब, AI और समावेशी तकनीक लाई जा रही है, वह सराहनीय है। लेकिन यह तकनीकी क्रांति अधिकतर अंग्रेज़ी भाषा में ही सुलभ है, जिससे एक बार फिर अंग्रेज़ी ही श्रेष्ठ माध्यम के रूप में उभरती है।
समस्या का हल यह नहीं कि हम अंग्रेज़ी को त्याग दें या केवल मातृभाषा पर ज़ोर दें। हमें एक ऐसा बहुभाषी शिक्षा मॉडल विकसित करना होगा जिसमें शुरुआती शिक्षा मातृभाषा में हो, लेकिन धीरे-धीरे अंग्रेज़ी को भी सशक्त रूप से जोड़ा जाए — न कि सिर्फ भाषा के रूप में, बल्कि तकनीक, विज्ञान और सोच के माध्यम के रूप में भी।
इसके लिए जरूरी है कि हम उच्च गुणवत्ता वाली शैक्षणिक सामग्री क्षेत्रीय भाषाओं में विकसित करें, स्मार्ट टूल्स को बहुभाषी बनाएं और शिक्षकों को इस मिश्रित माध्यम के लिए प्रशिक्षित करें।
इस विरोधाभास को दूर करने के लिए सिर्फ भाषाई विकल्प देना काफी नहीं है। हमें ज़रूरत है भारतीय भाषाओं में उच्च गुणवत्ता की शैक्षणिक सामग्री और तकनीक तैयार करने की। सार्वजनिक और निजी क्षेत्र में मातृभाषा में दक्ष छात्रों के लिए समान अवसर सुनिश्चित करने की। मूल्यांकन की पारदर्शिता और भाषा-निरपेक्षता पर ज़ोर देने की।
अगर छात्र यह महसूस करेंगे कि मातृभाषा में पढ़कर भी वे उसी स्तर की सफलता पा सकते हैं, तब ही वे इस विकल्प को गंभीरता से अपनाएंगे।
सरकार का क्षेत्रीय भाषाओं को बढ़ावा देना स्वागतयोग्य कदम है। लेकिन जब तक मातृभाषा में शिक्षा को भी उतना ही आधुनिक, गुणवत्तापूर्ण और रोज़गारोन्मुख नहीं बनाया जाता — तब तक छात्र और अभिभावक अंग्रेज़ी की ओर आकृष्ट होते रहेंगे।
भाषा नीति को काग़ज़ पर नहीं, ज़मीनी स्तर पर लागू करना होगा — संसाधनों के साथ, भरोसे के साथ और यह भरोसा तब ही बनेगा जब मातृभाषा में शिक्षा भी उत्कृष्टता का पर्याय बन जाए।




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