
हर साल जुलाई आते-आते कॉलेजों में दाखिले का माहौल बनता है — लेकिन इस बार पश्चिम बंगाल में कुछ बदल गया है, और बदलाव शुभ संकेत नहीं देता। दाखिले की अंतिम तारीख बढ़ाई गई है, कारण बताया गया — “छात्रों की सुविधा”। लेकिन यदि हम सतह के नीचे देखें, तो साफ़ होता है कि समस्या कहीं ज़्यादा गंभीर और गहराई से जुड़ी हुई है।
तथ्य तो खुद बोलते हैं। राज्य सरकार के केंद्रीकृत दाखिला पोर्टल पर सिर्फ 3.2 लाख छात्र लॉगिन कर पाए हैं। यह आंकड़ा तब और परेशान करता है जब हम जानते हैं कि राज्य में हाल के वर्षों में 12वीं के छात्रों की संख्या 90 लाख से अधिक रही है। यह न केवल भागीदारी में भारी गिरावट को दर्शाता है, बल्कि शिक्षा व्यवस्था के प्रति घटते विश्वास का भी संकेत है।
दाखिला पोर्टल — उम्मीदों से नीचे
पिछले साल बड़े जोर-शोर से शुरू किया गया यह पोर्टल पारदर्शिता, सरलता और गति का वादा लेकर आया था। लेकिन आज यह पोर्टल बदइंतज़ामी और देरी का प्रतीक बन गया है। इस साल इसका देर से खुलना — जो कि OBC आरक्षण को लेकर लंबी खींची कानूनी लड़ाई के चलते हुआ — ने कई छात्रों को वैकल्पिक रास्ते अपनाने पर मजबूर कर दिया।
और यह वैकल्पिक रास्ता अब दूसरे राज्यों की ओर जा रहा है। छात्र दिल्ली, मुंबई, बेंगलुरु, भुवनेश्वर जा रहे हैं — वहां न केवल संस्थान बेहतर हैं, बल्कि सुरक्षा, योग्य फैकल्टी और रोज़गार की संभावना भी ज़्यादा है।
कक्षाएं खाली, मन भी खाली
यह पलायन सिर्फ आंकड़ों में नहीं, कॉलेजों की कक्षाओं में भी नज़र आता है। जिन विभागों में पहले सैकड़ों आवेदन आते थे, अब वहां गिनती के छात्र ही मिल रहे हैं। कई विभागों में पिछले साल के मुकाबले एक-तिहाई से भी कम छात्रों ने रुचि दिखाई है। यह न सिर्फ संस्थानों के लिए संकट है, बल्कि पूरे राज्य के लिए एक आगामी अकादमिक आपातकाल का संकेत है।
युवा अब डिग्री नहीं, दक्षता चाहते हैं
इस समय का छात्र केवल डिग्री नहीं चाहता — वह दुनिया के लिए तैयार होना चाहता है। वह जानता है कि पुरानी सोच वाले कोर्स, देरी से शुरू होने वाला सेमेस्टर और पारंपरिक मूल्यांकन अब पर्याप्त नहीं हैं। इसलिए वह वोकेशनल कोर्स, हुनर आधारित ट्रेनिंग या सीधे रोज़गार की दिशा में जा रहा है। और यह एक विकास की दिशा है — जिसे राज्य की शिक्षा नीति अब तक पहचानने में विफल रही है।
नीति और मानसिकता — दोनों में बदलाव ज़रूरी
पश्चिम बंगाल के पास प्रतिभा है। यहां के कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की गौरवशाली विरासत रही है। लेकिन सिर्फ इतिहास के दम पर भविष्य नहीं बनाया जा सकता। आज की ज़रूरत है नीतिगत स्पष्टता, सुरक्षा और संरचना की मजबूती, और सबसे अहम — छात्रों के मन की समझ।
डेडलाइन बढ़ा देने से संकट नहीं सुलझेगा। असली सवाल है — छात्र बंगाल के कॉलेजों में क्यों नहीं आना चाहते?
शिक्षा के प्रति भरोसा बहाल करना होगा
अगर बंगाल को अपनी खोती हुई अकादमिक प्रतिष्ठा को बचाना है, तो उसे आत्ममंथन करना होगा। दाखिला प्रक्रिया को सिर्फ सुचारु नहीं, प्रासंगिक और आकर्षक बनाना होगा। शिक्षकों की भर्ती, कोर्स की नवीनता, रोजगार की दृष्टि और छात्रों की मानसिक सुरक्षा — इन सभी पहलुओं पर एक सुनियोजित सुधार जरूरी है।
क्योंकि अगर यह ढांचा नहीं बदला, तो बंगाल की शिक्षा प्रणाली वही खो देगी जो उसकी सबसे बड़ी ताकत हुआ करती थी — युवाओं का विश्वास।




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