
आज के दौर में मोबाइल फोन और कंप्यूटर हमारे जीवन का जरूरी हिस्सा बन गए हैं। बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक, हर कोई दिनभर इन उपकरणों में व्यस्त रहता है। चाहे पेमेंट करना हो या जानकारी खोजनी हो, हमारी जिंदगी का बड़ा हिस्सा अब स्क्रीन पर ही बीतता है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि मोबाइल से दिनभर चिपके रहने की ये आदत हमारी सेहत, खासकर बच्चों की मानसिक सेहत के लिए खतरे की घंटी बनती जा रही है?
कोरोना के बाद बच्चों की दिनचर्या में बदलाव
कोरोना महामारी के समय ऑनलाइन क्लासेस के चलते बच्चों का मोबाइल से जुड़ाव बढ़ गया। धीरे-धीरे ये उपकरण उनकी दिनचर्या का अहम हिस्सा बन गया। अब स्थिति ये है कि बच्चों के लिए मोबाइल फोन से दूरी बनाना बेहद मुश्किल हो गया है। नतीजा — फोकस में कमी, पढ़ाई में मन न लगना और मानसिक तनाव जैसी परेशानियां।
अध्ययन क्या कहते हैं?
‘जर्नल ऑफ द अमेरिकन मेडिकल एसोसिएशन (JAMA) साइकेट्री’ में छपी एक रिपोर्ट के अनुसार, दिन में दो घंटे से ज्यादा स्क्रीन देखने वाले बच्चों की ध्यान केंद्रित करने की क्षमता 60% तक घट जाती है। साथ ही उनका मूड और व्यवहार भी प्रभावित होता है।
चिड़चिड़ापन, बेचैनी और आक्रामक व्यवहार उन बच्चों में ज्यादा देखने को मिल रहा है जिनका स्क्रीन टाइम अधिक है।
एम्स की रिपोर्ट: बच्चों में स्क्रीन की लत
एम्स के एक अध्ययन में सामने आया कि भारत में 8 से 14 साल के हर तीन में से एक बच्चा डिजिटल डिवाइस पर निर्भर हो चुका है। यह एक तरह की लत बन गई है, जिससे बच्चों के लिए किसी एक काम पर ध्यान केंद्रित करना मुश्किल हो गया है।
स्क्रीन की यह लत बच्चों की नींद पर भी असर डाल रही है। रात में मोबाइल देखने से नींद की गुणवत्ता 45% तक घटती है, जिससे सुबह स्कूल में ध्यान लगाने में परेशानी होती है।
आखिर कारण क्या है?
विशेषज्ञों का मानना है कि ज्यादा स्क्रीन टाइम बच्चों के संज्ञानात्मक (Cognitive) विकास को प्रभावित करता है। मोबाइल के कारण बच्चे दोस्तों और परिवार से कम बातचीत करते हैं और एक अलग आभासी दुनिया में जीने लगते हैं।
इसके अलावा, सोशल मीडिया रील्स और शॉर्ट वीडियो लगातार देखने की आदत ने भी बच्चों को बेचैन बना दिया है। वे किसी भी काम पर लंबे समय तक ध्यान नहीं दे पाते।
क्या है समाधान?
डॉक्टरों का कहना है कि टेक्नोलॉजी जरूरी है, लेकिन उसका संतुलित उपयोग और सीमित समय में होना चाहिए। बच्चों के मानसिक और शैक्षणिक विकास को ध्यान में रखते हुए कुछ जरूरी कदम उठाए जा सकते हैं:
स्क्रीन टाइम की सीमा तय करें: विशेषज्ञ 1 घंटे से अधिक स्क्रीन देखने की अनुमति नहीं देने की सलाह देते हैं।
रचनात्मक गतिविधियों को बढ़ावा दें: बच्चों को खेल, संगीत, चित्रकला और आउटडोर गतिविधियों में व्यस्त रखें।
सोने से पहले मोबाइल से दूरी: सोने के एक घंटे पहले मोबाइल बंद कर दें, जिससे नींद बेहतर होगी और अगला दिन सक्रिय रहेगा।
पढ़ाई में किताबों की वापसी: बच्चों में फिर से ऑफलाइन पढ़ाई की आदत डालें। किताबों से पढ़ना एकाग्रता और याददाश्त को बेहतर बनाता है।
मोबाइल और कंप्यूटर आज की जरूरत हैं, लेकिन इन पर निर्भरता से बच्चों की मानसिक और शैक्षणिक सेहत को खतरा है। जरूरी है कि माता-पिता और शिक्षक मिलकर एक संतुलित तकनीकी माहौल बनाएं, जहां बच्चों का भविष्य रोशनी से भरा हो — न कि स्क्रीन की चमक में खोया हुआ।




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