
केंद्रीय विद्यालय (केवी) देश के उन चुनिंदा शैक्षणिक संस्थानों में गिने जाते हैं जो वर्षों से अपनी शिक्षा की गुणवत्ता, अनुशासन और परिणामों के कारण एक विशेष पहचान बनाए हुए हैं। खासकर केंद्र सरकार के कर्मचारियों और सशस्त्र बलों में कार्यरत लोगों के लिए, केवी हमेशा एक भरोसेमंद विकल्प रहा है। ऐसे में यह जानना चौंकाने वाला है कि हाल के वर्षों में केंद्रीय विद्यालयों में नामांकन की संख्या में लगातार गिरावट देखी जा रही है। यह न सिर्फ शिक्षा व्यवस्था के लिए चिंता का विषय है, बल्कि नीति-निर्माताओं के लिए भी आत्ममंथन का अवसर है।
क्या कहते हैं आंकड़े?
लोकसभा में प्रस्तुत आंकड़ों के अनुसार, 2024-25 में केंद्रीय विद्यालयों में नए नामांकन पिछले पांच वर्षों के सबसे निचले स्तर 1.39 लाख पर पहुंच गए हैं। यह गिरावट 2020-21 में 1.95 लाख से शुरू हुई थी और धीरे-धीरे कम होती चली गई। कुल छात्रों की संख्या में भी गिरावट आई है – 2020-21 में 13.88 लाख से घटकर 2024-25 में 13.5 लाख।
यह तब हो रहा है जब सरकार ने 85 नए केंद्रीय विद्यालयों को खोलने की योजना को मंजूरी दी है, जिस पर 5,872 करोड़ रुपये से अधिक खर्च किए जाने हैं।
तो आखिर समस्या क्या है?
इस सवाल का उत्तर आसान नहीं है, लेकिन कुछ बिंदु स्पष्ट हैं:
स्थानांतरण नीतियों में बदलाव:
केवी मुख्यतः केंद्र सरकार के कर्मचारियों के बच्चों के लिए बनाए गए हैं। यदि इन कर्मचारियों की स्थानांतरण नीतियों में कोई बदलाव हुआ है या नौकरियों की प्रकृति स्थिर होती जा रही है, तो इसका असर नामांकन पर पड़ना स्वाभाविक है।
निजी स्कूलों की आक्रामकता:
बड़े शहरों में निजी स्कूल सुविधाएं, इंफ्रास्ट्रक्चर और ब्रांडिंग के दम पर पैर जमा चुके हैं। कई अभिभावकों को लगता है कि निजी स्कूलों में तकनीक आधारित शिक्षा और एक्स्ट्रा-करिकुलर एक्टिविटीज़ अधिक हैं।
स्थानीय स्तर पर शिक्षकों की कमी या गुणवत्ता:
कई केवी में शिक्षकों की नियुक्ति समय पर नहीं होती या विषय विशेषज्ञों की कमी रहती है, जिससे अभिभावकों का भरोसा डगमगाता है।
मध्याह्न भोजन योजना और सरकारी योजनाओं पर प्रभाव:
शिक्षा मंत्रालय ने खुद स्वीकार किया है कि पीएम-पोषण योजना के क्रियान्वयन में गिरावट आई है। इससे छात्रों और अभिभावकों में सरकारी स्कूलों को लेकर नकारात्मक छवि बनती है।
डिजिटल युग में बदलती प्राथमिकताएं:
अब छात्र और अभिभावक स्मार्ट क्लासरूम, एआई-आधारित लर्निंग, और इंटरनेशनल करिकुलम की ओर आकर्षित हो रहे हैं। केवी की पारंपरिक प्रणाली इस बदलाव के साथ पूरी तरह सामंजस्य नहीं बिठा पा रही है।
सवाल यह भी है: क्या इन गिरते आंकड़ों से चिंतित है सरकार?
सरकार ने बजट में केवीएस को दी जाने वाली राशि को लगातार बढ़ाया है, जो सकारात्मक संकेत है। 2020-21 में 6,437 करोड़ से बढ़कर 2024-25 में 8,727 करोड़ रुपये तक फंड आवंटन हुआ है। साथ ही नए स्कूल खोलने की मंजूरी भी दी गई है। लेकिन बुनियादी सवाल यह है कि जब पहले से मौजूद स्कूलों में छात्रों की संख्या घट रही है, तो नए स्कूलों की सफलता की क्या गारंटी है?
अब जरूरी है आत्मचिंतन और व्यवहारिक समाधान
संवाद: सरकार और केवीएस को शिक्षकों, छात्रों और अभिभावकों से सीधे संवाद कर वास्तविक समस्याओं की पहचान करनी चाहिए।
गुणवत्ता सुधार: डिजिटल एजुकेशन, स्किल डेवलपमेंट और करियर-ओरिएंटेड शिक्षण को बढ़ावा देना होगा।
स्थानीय प्रशासन की भागीदारी: प्रत्येक स्कूल में स्थानीय अधिकारियों की नियमित निगरानी होनी चाहिए ताकि बुनियादी सुविधाएं बनी रहें।
छात्रों के अनुभव का विश्लेषण: छात्रों के नजरिए से स्कूल के माहौल और शिक्षा को जांचना होगा।
केंद्रीय विद्यालय सिर्फ सरकारी स्कूल नहीं हैं, ये देश की शिक्षा व्यवस्था का सम्मानजनक स्तंभ हैं। अगर छात्रों का रुझान इससे हट रहा है तो यह केवल एक आंकड़ा नहीं, एक संकेत है – व्यवस्था में कहीं कुछ चूक हो रही है। इस दिशा में ईमानदारी से सोचने और ठोस कदम उठाने की जरूरत है। वरना एक दिन ऐसा भी आ सकता है जब केंद्रीय विद्यालय “गौरव का विषय” नहीं, बल्कि “विकल्पों की सूची में पिछला नाम” बनकर रह जाए।




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