
वक्त कितनी जल्दी करवट बदलता है, यह अगर देखना हो तो मध्य प्रदेश के इंजीनियरिंग कॉलेजों की हालत पर एक नजर डाल लीजिए। कभी ये कॉलेज युवा सपनों का केंद्र हुआ करते थे—जहां दाखिले के लिए लंबी लाइनें लगती थीं, सीट पाने की होड़ मचती थी, और मां-बाप लाखों खर्च करने को तैयार रहते थे। आज वही परिसर वीरान हैं। ऐसा लगता है जैसे किसी समय के भव्य महल अब खंडहर में बदल रहे हों।
एक दौर था जब इंजीनियर बनना सपना था
इंजीनियरिंग की डिग्री कभी “सेट फ्यूचर” की गारंटी मानी जाती थी। समाज में इसका रुतबा था और नौकरी की संभावनाएं भी मजबूत लगती थीं। लेकिन अब वह आकर्षण खो चुका है। युवाओं का इंजीनियरिंग से मोहभंग हो चुका है। यह कोई भावनात्मक आकलन नहीं है, बल्कि आंकड़े इसकी गवाही दे रहे हैं।
मध्य प्रदेश के इंजीनियरिंग कॉलेजों की 73,412 सीटों में से लगभग 40,000 सीटें अब भी खाली हैं। यानी राज्य के आधे से ज्यादा छात्र अब इंजीनियरिंग में दिलचस्पी ही नहीं दिखा रहे हैं। दो चरण की काउंसलिंग के बाद भी यह हाल है और अब तीसरे चरण की CLC काउंसलिंग शुरू की गई है ताकि बची सीटें किसी तरह भर जाएं।
खाली क्लासरूम, बंद होने की कगार पर कॉलेज
प्रदेश में 124 इंजीनियरिंग कॉलेज हैं, लेकिन छात्रों के अभाव में कई कॉलेजों का संचालन ही खतरे में आ गया है। प्राइवेट कॉलेजों की हालत तो और भी चिंताजनक है—कई संस्थान बंद होने की कगार पर हैं या फिर गैर-इंजीनियरिंग कोर्सों की ओर रुख कर चुके हैं।
युवाओं की प्राथमिकताएं बदली हैं
सवाल यह है कि आखिर ऐसा हुआ क्यों? जवाब सीधा है—रोजगार की अनिश्चितता और आउटडेटेड पाठ्यक्रम। आज की पीढ़ी यूट्यूब, डिजिटल मार्केटिंग, डेटा साइंस, AI, ग्राफिक डिजाइन जैसे क्षेत्रों में अधिक रुचि ले रही है। वहीं दूसरी ओर, इंजीनियरिंग की पढ़ाई अब भी उसी ढर्रे पर चल रही है जो दो दशक पहले था।
अब बदलाव का वक्त है
अगर सरकार और शैक्षणिक संस्थान अब भी नहीं जागे तो इंजीनियरिंग शिक्षा का यह ढांचा पूरी तरह ढह जाएगा। पाठ्यक्रम को उद्योग की जरूरतों के अनुसार अपडेट करना होगा, स्टूडेंट्स को स्किल-बेस्ड लर्निंग देनी होगी और सबसे जरूरी बात—इंजीनियरिंग को एक बार फिर “सपनों की डिग्री” बनाना होगा।
वरना वो दिन दूर नहीं जब इंजीनियरिंग कॉलेजों का जिक्र सिर्फ बीते जमाने की बातों में ही मिलेगा।




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