
भारत में शिक्षा सुधार की जितनी बातें होती हैं, उनमें सबसे बड़ा और अक्सर अनदेखा किया जाने वाला मुद्दा है—शिक्षक शिक्षा की गुणवत्ता। पाठ्यक्रम बदले जा सकते हैं, तकनीक लाई जा सकती है, भवन खड़े किए जा सकते हैं—लेकिन अगर शिक्षक प्रशिक्षित, ईमानदार और प्रतिबद्ध नहीं होंगे, तो शिक्षा व्यवस्था ढह जाएगी।
गिरावट की कहानी
कोठारी आयोग (1964–66) के बाद शिक्षक प्रशिक्षण संस्थानों का तेज़ी से विस्तार हुआ। उद्देश्य था—हर स्कूल में प्रशिक्षित शिक्षक पहुँचाना। लेकिन जल्दबाज़ी में गुणवत्ता की बलि चढ़ गई। निजी संस्थान खुले, कई ऐसे हाथों में चले गए जिनकी नज़र शिक्षा से ज्यादा मुनाफ़े पर थी। राज्य सरकारों ने नए सरकारी प्रशिक्षण केंद्र खोलने से कतराना शुरू किया, और नतीजा यह हुआ कि बाज़ार में डिग्रियों की खुली बिक्री होने लगी।
1970 के दशक में विश्वविद्यालयों ने पत्राचार से बीएड पाठ्यक्रम शुरू किए, बिना पर्याप्त संसाधन जुटाए, सिर्फ आर्थिक लाभ के लिए। 1998–99 में ‘बिहार बीएड स्कैंडल’ ने यह सच्चाई देश के सामने रख दी कि डिग्रियाँ सिर्फ कागज़ के टुकड़े बनकर बिक रही हैं। 2012 में न्यायमूर्ति जे.एस. वर्मा आयोग ने स्थिति को “गंभीर और शर्मनाक” बताते हुए लिखा कि 10,000 से अधिक शिक्षक शिक्षा संस्थान अध्यापन की गंभीरता से बजाय डिग्री बेचने में व्यस्त हैं।
नियमन की कमजोरी
हमारी नियामक संस्थाएँ भी इस लड़ाई में कमजोर साबित हुईं। एनएएसी के 800 निरीक्षक भ्रष्टाचार के आरोप में हटाए गए, जिससे व्यवस्था की खोखली नींव उजागर हो गई। हालांकि, इतिहास में एनसीटीई का एक साहसी कदम याद रखा जाना चाहिए—जब उसने एक राज्य में एक ही साल में 70 नए बीएड कॉलेज खोलने की मंजूरी को अवैध घोषित कर दिया और सार्वजनिक रूप से चेतावनी दी कि इन कॉलेजों की डिग्रियाँ मान्य नहीं होंगी। भारी राजनीतिक दबाव के बावजूद यह निर्णय वापस नहीं लिया गया।
आगे का रास्ता
आज भी स्थिति बहुत नहीं बदली है। शिक्षक शिक्षा की गुणवत्ता सुनिश्चित किए बिना शिक्षा सुधार की बातें खोखले वादों से आगे नहीं बढ़ सकतीं। समाधान कठिन नहीं है-
– हर स्वीकृत पद को समय पर भरना।
– संस्थानों की मान्यता के लिए कठोर, पारदर्शी और ईमानदार निरीक्षण।
– भ्रष्टाचार पर जीरो टॉलरेंस।
– प्रशिक्षण को केवल औपचारिकता नहीं, बल्कि गंभीर पेशेवर तैयारी बनाना।
किसी भी राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था की रीढ़ उसके शिक्षक होते हैं। अगर शिक्षक शिक्षा पर गंभीरता से ध्यान नहीं दिया गया, तो नई शिक्षा नीति, डिजिटल क्रांति और वैश्विक प्रतिस्पर्धा सब व्यर्थ साबित होंगी। समय कम है—या तो हम अभी सुधार कर लें, या आने वाली पीढ़ियों को एक कमजोर और खोखली शिक्षा व्यवस्था सौंप दें।




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